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सेहत और मुनाफे से भरपूर खीरा की वैज्ञानिक खेती

 खीरा की वैज्ञानिक खेती से किसान प्रति हेक्टेयर कैसे करें लाखों की कमाई ? पढ़ें पूरी जानकारी।

डा. जितेन्द्र सिंह

Key Words : खीरा की खेती, खीरा की उन्नत किस्में, खीरा की फसल आर्थिकी, गर्मी में खीरा की खेती, खीरा से लाभ, वैज्ञानिक खेती, khira ki kheti in hindi

गर्मी की तपिश में जब शरीर को ठंडक और ताजगी की जरूरत होती है, तब खीरा हम सब को खूब भाता है। खीरा में भरपूर मात्रा में उपलब्ध पानी, विटामिन और खनिज तत्व स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी होते है। यदि खीरा की फसल को आधुनिक तकनीकों, उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए किया जाय, तो यह लोगो के स्वास्थ्य के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को भी सुधार सकता है। दरअसल, खीरा कम समय में तैयार होने वाली नगदी फसल है। इसकी निरंतर तुड़ाई से किसानों को लम्बे समय तक नियमित आय मिलने से छोटे और मध्यम किसानों के लिए बहुत उपयोगी और आकर्षक फसल साबित होती है। सलाद, रायता, अचार से लेकर सौंदर्य प्रसाधन और आयुर्वेदिक उपयोग के कारण इसकी उपयोगिता बाजार में वर्ष भर बनी रखती है। आज इस लेख के माध्यम से विस्तार से चर्चा करेंगे खीरा की वैज्ञानिक खेती के बारे में ताकि किसान कम समय और कम खर्च में अधिक लाभ प्राप्त कर सके।

 भूमि प्रबंधन :

खीरा को सभी तरह की भूमि में उगाया जा सकता है, लेकिन फसल से भरपूर उत्पादन लेने के लिए दोमट या रेतीली दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। खेत की मिट्टी का पी. एच. मान 5.5 से 6.7 तक होना चाहिए। क्योकि अत्यधिक अम्लीय और क्षारीय मृदा में पौधों का विकास अच्छी तरह नही हो पाता है। रबी मौसम की फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेत या पहले से खाली खेत को एक या दो गहरी जुताई के बाद हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। अन्तिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर लगभग 100 से 150 कुन्तल गोबर की सड़ी खाद खेत में मिला देना चाहिए। यदि खेत में दीमक या मिट्टी में रहने वाले अन्य कीड़ों की अशंका हो तो क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियान नामक रसायन का 2 प्रतिशत चूर्ण 25 से 30 किग्रा./हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय खेत में मिलाना चाहिए।

बीज की मात्रा :

बीज की मात्रा बुआई के तरीके, नालियों/गड्ढ़ो की दूरी, प्रयोग किए जाने वाले बीज के किस्मों पर निर्भर करती है। सामान्यतः एक हेक्टेयर की बुआई के लिए 1 से 1.5 किलोग्राम बीज का प्रयोग करना चाहिए।

बोने का समय व बीजोंपचार : इन फसलों के बीज की बुआई का कार्य जनवरी माह से शुरू कर मार्च माह तक कर सकते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बीज को बोने से पूर्व बीजों को मैंकोजेब की 5 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी मे घोलकर 10-20 घंटे के लिए भिगो देना चाहिए। इससे बीज का जमाव अच्छा एवं पौधे निरोगी तैयार होते हैं। उन्नतशील किस्मों का प्रति गड्ढ़ा/स्थान 3-4 बीज एवं संकर किस्म का बीज प्रति गड्ढ़ा/स्थान 2 बीज बोना चाहिए।

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उन्नत किस्में :  

अधिक उत्पादन की दृष्टि से सदैव उन्नतशील प्रजातियों का ही चुनाव करना चाहिए। अच्छी गुणवत्ता का बीज किसी विश्वसनीय संस्थान से ही क्रय करना चाहिए।

खुले खेत के लिए :

  1. पूसा उदय
    • जल्दी तैयार होने वाली किस्म
    • फल हल्के हरे, मध्यम लम्बे
    • गर्मी व बरसात दोनों मौसम में उपयुक्त
  2. पूसा बरखा
    • वर्षा ऋतु के लिए विशेष
    • रोग सहनशील
    • उच्च उत्पादन क्षमता
  3. स्वर्ण पूर्णा
    • मध्यम अवधि की किस्म
    • फल आकर्षक हरे रंग के
    • बाजार में अच्छी मांग
  4. पंत खीरा‑1
    • उत्तर भारत के लिए उपयुक्त
    • अधिक फलन और अच्छी गुणवत्ता

संकर किस्में (Hybrid) :

  1. मल्टीस्टार F1
    • समान आकार के गहरे हरे फल
    • अधिक पैदावार
    • लंबी तुड़ाई अवधि
  2. ग्रीन लॉन्ग F1
    • लम्बे, चिकने फल
    • ताजा बाजार के लिए उपयुक्त
  3. काकुंबर F1
    • रोग प्रतिरोधी
    • ऑफ-सीजन खेती के लिए उपयुक्त

पॉली हाउस  के लिए :

  1. पूसा संयोग
    • पार्थेनोकार्पिक (बिना परागण फल देने वाली)
    • संरक्षित खेती के लिए विशेष
  2. केतकी F1
    • उच्च गुणवत्ता
    • निर्यात के लिए उपयुक्त

उपजाऊ  और भरोसेमंद किस्में

  • पूसा लॉन्ग ग्रीन – उत्तर भारत में लोकप्रिय उन्नत किस्म, विशेषकर वसंत-ग्रीष्म और खरीफ दोनों में अच्छी पैदावार देती है।
  • पंत संकर खीरा 1 – संकर (हाइब्रिड) किस्म, सधा हुआ उत्पादन और अच्छी फल गुणवत्ता के लिए जाना जाता है।
  • पंत खीरा‑1 – समय से जल्दी तुड़ाई देने वाली खुली खेत की स्थिर किस्म; बाजार में मांग रहती है।
  • स्वर्ण शीतल – 60 दिनों में पकने वाली अच्छी फसल; जल्दी बाजार उपलब्धता का फायदा।
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Other Improved Varieties : उन्नतशील किस्मों में जापानी लाग ग्रीन, स्वर्ण स्वेता, स्वर्ण अगैती, पोइनसट, बालम खीरा, प्रिया, पूना खीरा, कल्यानपुर हरा, संकर- पूसा संयोग, उपहार, राजधानी, तृप्ति, रानी, चायना आदि प्रमुख हैं। 

उर्वरक प्रयोग :

अधिक उत्पादन लिए जरूरी होता है कि खेत में देशी खादों के साथ आवश्यकतानुसार रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाय। इसके लिए 50 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस, 100 किग्रा. पोटाश एवं 30 किग्रा. कैल्सियम तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से देना उपयुक्त होता हैं। इनमें नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फोरस, पोटाश, कैल्सियम की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय देते हैं। शेष बची नत्रजन की मात्रा पौधों पर फल आते समय छिड़काव करना चाहिए।

गड्ढ़ों की खुदाई :

खीरा की बुआई उचित दूरी पर नालियों में या फिर गड्ढ़ो में करना ज्यादा लाभकारी होता है।  इसके लिए 1.5 से 2 मीटर लाइन से लाइन एवं 0.50 से 1 मीटर पौध से पौध की दूरी पर नालियाॅ या गड्ढे़ बनाकर बीज की बुआई करते हैं। गड्ढ़ो में बुआई करने के लिए उचित स्थान पर चिंह लगाकर 40 सेंमी. चौड़ा तथा 30 सेंमी. गहरे गड्ढ़ों की खुदाई करते हैं।

यदि खेत की तैयारी के समय रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नही किया गया है तो गड्ढों में बीज बोने से पूर्व 50-60 ग्राम अमोनियम सल्फेट 80-100 ग्राम सिंगल सुपरफास्फेट, 20-30 ग्राम पोटैशियम सल्फेट एवं 40-50 ग्राम जिप्सम प्रति गड्ढ़ा मिट्टी में मिलाना चाहिए।

पौध तैयार करना :

रबी की फसलों की कटाई में विलम्ब से होने के कारण बुआई में काफी देर हो जाती हैं। इससे बचने के लिए बीज को 10 से 15 सेमी. आकार के पाली बैग में बालू, रेत, खाद और मिट्टी का मिश्रण भरकर और उसमें बीज की बुआई कर पौध तैयार कर सकते हैं। इसके लिए ग्रीन हाउस/पाली हाउस का प्रयोग किया जा सकता है। जब फसल की कटाई के बाद खेत खाली हो जाय, तब इन पाली बैग में तैयार हो रही पौध को खेत में उचित दूरी पर रोपाई कर सकते हैं। इस तरह एक-डेढ़ माह पूर्व फसल तैयार की जा सकती हैं।

पौध विरलीकरण :

पौधों में जब 5-6 पत्तिया आ जाएं तो पौधों का विरलीकरण कर देना चाहिए। इसके लिए प्रति गड्ढ़ा/स्थान एक या दो स्वस्थ पौधों को छोड़कर अन्य सभी कमजोर एवं अस्वस्थ पौधों को निकाल देते हैं।

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सिंचाई प्रबंध:

कद्दू वर्गीय फसलों में उत्पादन, गुणवत्ता और स्वाद को बनाये रखने के लिए उचित जल प्रबंधन करना बहुत जरूरी होता है। हाल के कुछ वर्षों में इन फसलों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली बहुत कारगर साबित हुई हैं। इस प्रणाली से सिंचाई करने से 50 से 60 फीसदी तक पानी की बचत होने के साथ-साथ उपज में भी बढ़ोत्तरी होती है, क्योंकि पौधों को पानी आवश्यकतानुसार और लगातार नियंत्रित मात्रा में मिलता रहता है। नियंत्रित मात्रा में खेत में पानी देने से खरपतवार भी कम उगते है। दशी विधि से गर्मी के दिनों 4 से 5 दिन के अन्तराल में सिंचाई करना चाहिए।

कम फलन की समस्या एवं निदान :

प्रायः देखने में आता है कि पौधों पर फूल तो काफी संख्या में आते हैं, लेकिन फल बहुत कम लगते हैंै। इसका प्रमुख कारण पौधों पर नर फूलो की अधिकता और मादा फूलों की कमी होना। पौधों में मादा फूलों पर ही फल बनते हैं। यही कारण है कि पौधों पर फूल आने के बावजूद फल लगने की संख्या काफी कम होती है। इस समस्या से निजात पाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कुछ रसायनों को खोजा है जिन्हें पादप नियामक/हार्मोन के नाम से जाना जाता है। इन पादप नियामकों का पौधों पर दो या चार पत्तियों की अवस्था पर छिड़काव करने से उपज में काफी वृद्धि होती है। खीरा की फसल में जिब्रेलिक एसिड पादप नियामक की 10 मिली लीटर मात्रा को एक लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने से फलन में काफी वृद्धि होती है। पादप नियामकों को अच्छी तरह प्रयोग करने के लिए विशेशज्ञों से जानकारी ले लेनी चाहिए।

फसल सुरक्षा :

गर्मी के मौंसम में कद्दू वर्गीय फसलों पर कीड़े-मकोड़े एवं ब्याधियों का प्रकोप अधिक होता है। अधिक उत्पादन लेने के लिए कीड़े-मकोड़े एवं ब्याधियों का समुचित प्रबन्ध करना आवश्यक होता है।

लाल कीट :

यह कीट फसल को सर्वाधिक हानि पहुचाता हैं। यह लाल रंग का छोटा कीड़ा उड़ने में सक्षम होता है। गर्मी की फसल में इस कीडे़ का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता हैं। फसल पर इस कीड़े का अक्रामण प्रारंभिक अवस्था में पौधे की कोमल पत्तियां को खाकर नुकसान पहुचाता है। यदि इस कीड़े को समय पर न नियंत्रित किया गया तो पूरी की पूरी फसल नष्ट हो जाती है। इस कीडे़ के नियंत्रण के लिए मैलाथियान दवा की 2 मिली. या कार्बोरिल 4 ग्राम मात्रा को एक लीटर पानी की दर से घोल बनाकर एक या दो छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।

फल मक्खी :

यह दूसरा सबसे अधिक हानि पहुचाने वाला कीट हैं। यह पीले रंग की होती है। इसका अक्रामण फलों पर प्रारंभिक  अवस्था में शुरू हो जाता है। यह मक्खी फलों के अंदर घुसकर खाना शुरू करती है जिससे अंदर ही अंदर फल सड़ जाते हैं। इस कीड़े का अक्रामण बहुत अधिक होता है, जिससे 70-80 प्रतिशत तक फल नष्ट हो जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 10 मिली. 50 ई.सी. दवा और 100 ग्राम गुड़ को 10 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर एक सप्ताह के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। इन दवाओं के प्रयोग के बाद लगभग 10 दिनों तक फलों की तुड़ाई नही करनी चाहिए।

थ्रिप्स और रस चूसक कीट :

लाल कीट एवं फल मक्खी के अतिरिक्त इस वर्ग की फसलों को थ्रिप्स और रस चूसक कीड़े भी फसल को बहुत नुकसान पहुचाते हैं। इन कीड़ो के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास या डाईमेथोएट नामक दवा की 2 मिली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

एन्थ्रेकनोज :

यह बीमारी पौधों पर एक प्रकार के फफूद से फैलती है। इस बीमारी से फलों और पत्तियों पर छोटे-छोटे लाल व भूरे धब्बे बनते हैं जिसके कारण पत्तिया झुलसी हुई दिखाई देती हैं। इसकी रोकथाम के लिए डाईथेन एम-45 दवा की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर जरूरत के मुताबिक छिड़काव करना चाहिए।

पाउडरी मिल्ड्यू या खर्रा रोग :

यह बीमारी भी फफूद के कारण फैलती है। इस बीमारी की प्रारंभिक आवस्था में पत्तियों की सतह पर गोल सफेद  पाउडर जैसे धब्बे पड़ते हैं, बाद ये धब्बे पूरी पत्तियों पर फैल जाते हैं। पौधों पर इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते ही घुलनषील गंधक 2 ग्राम या कैराथीन 1 मिली. या फिर कैलिक्सिन 0.5 मिली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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फलों की तुड़ाई :

खीरे की कुछ किस्में बुआई के 45 दिन बाद तो कुछ 60 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं। फलों की तुड़ाई दो-तीन दिन के अन्तर पर दो माह तक की जा सकती है। तुड़ाई के बाद फलों को छोटे-छोटे झाबों व जूट के बोरो में भर कर बाजार में बिक्री के लिए भेजना चाहिए।

उपज :

खीरा की उन्नत तकनीक से खेती की जाय और फसल का समुचित प्रबंधन भी किया जाय तो प्रति हेक्टेयर 200 से 250 कुन्तल तक पैदावार होती है। यदि बुआई के लिए संकर बीज का प्रयोग किया जाता है तो उत्पादन में और भी बढोत्तरी होती है।

फसल आर्थिकी :

गर्मी के दिनों में खीरा का सेवन लोगों को प्यास से राहत व शरीर तरो ताजगी प्रदान करता है। इसलिए गर्मी में बड़ी चाव से खाना पसंद करते हैं। इन दिनों बाजार में माॅग अधिक होने के कारण भाव भी अच्छा मिलता है। कभी-कभी बाजार भाव इतना अच्छा मिल जाता है कि बहुत कम क्षेत्रफल से ही किसानों को लाखों  की कमाई हो जाती है। 

एक हेक्टेयर खुले खेत में खीरा की फसल की अनुमानित आर्थिकी :

लागत का विवरण

मद                   अनुमानित खर्च ()
भूमि तैयारी (जुताई, पाटा)15,000
बीज (हाइब्रिड)18,000 – 25,000
गोबर खाद/कम्पोस्ट12,000
रासायनिक उर्वरक15,000
सिंचाई (डीजल/बिजली)10,000
खरपतवार नियंत्रण8,000
कीट एवं रोग नियंत्रण12,000
श्रम (बुवाई, तुड़ाई आदि)25,000
अन्य खर्च8,000
कुल लागत1,23,000 – 1,30,000

उत्पादन एवं आय

  • औसत उत्पादन: 200–250 क्विंटल/हेक्टेयर
  • औसत बाजार भाव: ₹12–20 प्रति किलो
  • यदि औसत 220 क्विंटल × ₹15/kg = ₹3,30,000 सकल आय

शुद्ध लाभ

  • सकल आय: ₹3,30,000
  • कुल लागत: ₹1,25,000 (औसत)

शुद्ध लाभ: लगभग ₹2,00,000 प्रति हेक्टेयर(मौसम व बाजार के अनुसार बढ़-घट सकता है)

  • उन्नत संकर किस्में जैसे पूसा उदय या पूसा बरखा का चयन करें।
  • टपक सिंचाई व मल्चिंग अपनाएँ।
  • जल्दी फसल तैयार कर ऑफ-सीजन में बेचें।
  • सीधे मंडी/थोक व्यापारी से संपर्क रखें।

निष्कर्ष : खीरा की वैज्ञानिक खेती छोटे सीमांत और मध्यम किसानों की आय बढ़ाने का एक बढिया जरिया है। यह एक ऐसी नगदी सब्जी फसल है जो किसानों को निरंतर आय के अवसर प्रदान करती है। अनुकूल बाजार भाव मिलने पर यह फसल बहूत कम क्षेत्रफल से लाखों की आमदनी दिलाने की क्षमता रखती है। सही योजना उन्नत तकनीक और बाजार प्रबंधन के साथ यह फसल किसानों की आर्थिक समृद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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