गेहूँ उत्पादकता और मुनाफा बढ़ाने का मास्टर प्लान
गेहॅू उत्पादन की आधुनिक तकनीक

Key Words : गेहूँ उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्नत किस्में, आधुनिक बुआई विधियाँ, खाद-उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई का समय, खरपतवार नियंत्रण, फसल सुरक्षा, सरकारी अनुदान, MSP और बीज सब्सिडी की नवीनतम जानकारी। किसानों के लिए उपयोगी वैज्ञानिक तकनीकें और क्षेत्र-वार गेहूँ की सर्वश्रेष्ठ किस्मों का विस्तृत विवरण।
देश की खाद्यान्न आवश्यकताओं एवं पोषण में गेहूँ की भूमिका लगातार बढती जा रही है। धान के बाद यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी खाद्यान्न फसल है। लगभग 32 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है, जिससे हर वर्ष करीब 115 मिलियन टन उत्पादन प्राप्त किया जाता है। कुल खाद्यान्न उत्पादन में इसका हिस्सा लगभग 33 प्रतिशत है। बढ़ती जनसंख्या के दबाव को देखते हुए गेहूँ उत्पादन में तेजी लाना कृषि क्षेत्र की प्रमुख आवश्यकता बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक कृषि तकनीकों को किसानों तक पहुँचाकर बेहतर उत्पादन और लाभ कमाया जा सकता है।
पोषण की दृष्टि से महत्त्व :
गेहूँ दुनिया में दूसरी सबसे अधिक उपभोग की जाने वाली फसल है। रोटी, ब्रेड, बिस्किट, दलिया, सूजी, मैदा और चोकर जैसे अनेक उत्पाद इसके प्रमुख उपयोग हैं। गेहूँ के दानों में विटामिन बी.1, बी.2, बी. 6 और विटामिन ई के साथ-साथ लोहा, फॉस्फोरस, जिंक और मैग्नीशियम जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यही वजह है कि यह संतुलित आहार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
उपयुक्त जलवायु : गेहू ठंडे जलवायु की फसल है। पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए विभिन्न अवस्थाओं में अलग-अलग तापमान की आवश्यकता होती है। बीज के अच्छे अंकुरण के लिए 20 से 22 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है। फसल को पकते समय अधिक तापमान की जरूरत होती है। पौधों की वृद्धि के लिए 50-60 प्रतिशत आद्रता जरूरी होती है। लेकिन फसल को पकते समय कम आद्रता और गर्म मौंसम की आवश्यकता होती है।
भूमि और तैयारी : दोमट भूमि गेहॅू के लिए सर्वोंत्तम मानी जाती है। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में अलग -अलग तरह की मिट्टी में गेहॅू की खेती की जाती है। ऐसी मिट्टी जिनका पी.एच. मान 5 से 7.5 के मध्य हो गेहॅू की खेती की जा सकती है । अधिक अम्लीय और क्षारीय मिट्टी गेहॅू के लिए अनुपयुक्त होती है।
गेहू की बुआई के लिए भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है। फसलों की कटाई के बाद एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और दो-तीन बार कल्टीवेटर से जुताई करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए।
भूमि शोधन: फसल को दीमक एवं भूमि में रहने वाले कीडे़-मकोड़ों से बचाव के लिए भूमि शोधन अवश्य करें। इसके लिए मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण या फिर क्यूनालफास नामक दवा का 1.5 प्रतिशत चूर्ण की 25-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला दें ।
बीज की मात्रा : बीज हमेशा प्रमाणित और विष्वनीय स्रोत से खरीदना चाहिए। सिंचित दशा में बुआई के लिए 90- 100 किग्रा., देर से बुआई के लिए 125-130 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर प्रयोग करते हैं। मध्य और देर पकने वाली किस्मों का 80 से 90 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
उन्नत किस्में :
गेहॅू की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए सदैव उन्नतषील प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बुन्देलखण्ड में अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार सिंचित एवं असिंचित दोनों दशाओं के लिए अलग किस्मों की सिफारिश की गई है।
गेहूँ की किस्में (क्षेत्रवार)
1. उत्तर प्रदेश (पूर्वी व पश्चिमी)
सिंचित क्षेत्र :
- HD-2967
- HD-3086
- HD-3226
- PBW-343
- PBW-502
- PBW-550
- DBW-187 (Karan Vandana)
- DBW-222
- WH-1105
असिंचित / वर्षा आधारित क्षेत्र :
- HI-1544
- DBW-168
- K-307
- K-9644
- HI-1418
- WH-157
2. राजस्थान :
सिंचित क्षेत्र
- Raj-3765
- Raj-3077
- Raj-4120
- HD-2932
- HI-1605
- DBW-187
असिंचित / सूखा क्षेत्र :
- Raj-4037
- Raj-3777
- Raj-1555
- HI-8498 (Durum)
- HD-2733
3. मध्य प्रदेश (मालवा–निमाड़–भोपाल क्षेत्र)
सिंचित क्षेत्र :
- HI-1544
- HI-1605
- HI-1612
- HI-8737 (Pusa Tejas)
- GW-366
- HD-2932
असिंचित / वर्षा आधारित क्षेत्र :
- HI-8381 (Malav Kirti)
- HI-8627
- HI-1418
- JW-3288
- JW-3020
4. बुन्देलखण्ड (UP–MP का शुष्क क्षेत्र)
सिंचित क्षेत्र :
- HD-2932
- HI-1544
- PBW-550
- DBW-187
- HD-2967
असिंचित / सूखा क्षेत्र :
- HI-1418
- HI-8498 (Durum)
- K-9644
- JW-3020
- HI-8381
ये किस्में अपनी उच्च उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता और बदलते मौसम में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ किस्में कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं तो कुछ अधिक उपज देने के लिए जानी जाती हैं।
बीज उपचार : रोगों से सुरक्षा का पहला कदम
बीज जनित बीमारियों से बचाने के लिए बोने से पूर्व बीज को थायरम या मैंकोजेब की 2-2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। ईयरकोकल एवं टुन्डू रोग से रोकथाम के लिए बीज को 20 प्रतिशत नमक के घोल में डुबोकर हल्के और रोग ग्रस्त बीजों को निकाल कर अलग कर देना चाहिए। स्वस्थ बीजों की अच्छे पानी से धोकर व सुखा कर बुआई करना चाहिए। इसके बाद बीज को जीवाणु कल्चर एजोटोबैक्टर 3-5 पैकेट से एक हैक्टेयर बुआई के लिए पर्याप्त बीज को उपचारित कर बुआई करें। इससे रासायनिक उर्वरकों की काफी बचत होती है।
बोने का समय :
गेहॅू की बुआई मिट्टी के तापमान पर निर्भर करता है। गेहॅू के अंकुरण के लिए 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उचित रहता है। यह तापमान मघ्य नवम्बर माह के आस-पास आता है। अतः गेहॅू की समय से बुआई 15 नवम्बर तक कर देना चाहिए। असिंचित दशा में मिट्टी में नमी संरक्षित करके अक्टूबर के दूसरे पखवारे तक की जा सकती है। धान और गन्ना की फसल की कटाई के उपरान्त गेहू की बुआई दिसम्बर के दूसरे सप्ताह तक कर सकते है। असिंचित दशा में बीज दर कम करके 75-80 किग्रा. रखते हैं।
बुआई का ढंग :
गेहॅू की बुआई हल के पीछे कॅूड़ में, सीडड्रिल व्दारा एवं छिटकवा तरीके से की जाती है। छिटकवा विधि से बुआई करने से पौघों की बीच की दूरी व पौघों की सघनता निश्चित नही हो पाती है। जिससे अन्तः कृषि क्रियायें ठीक से नही हो पाती साथ ही बीज की मात्रा भी अधिक लगती हैं। अधिक उत्पादन लेने के लिए गेहॅू की बुआई सदैव पक्ति में करनी चाहिए। सीडड्रिल से सिंचित क्षेत्रों में समय से बुआई के लिए पक्ति से पंक्ति की दूरी 15 से 18 सेमी. एवं असिंचित क्षेत्रों में पक्ति से पंक्ति की दूरी 25 से 30 सेमी. रखनी चाहिए। बीज की बुआई 4 से 5 सेमी. गहरे करनी चाहिए। अधिक गहरी बुआई करने से अंकुरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंध :
खाद एवं उर्वरक गेहॅू की प्रजाति, सिंचाई के साधन, बोने की विधि, खाद की किस्म एवं भूमि की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करती है। उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाच के परिणाम के आधार पर करना चाहिए। मिट्टी की जाच न हो पाने की दशा में प्रति हैक्टेयर 200 कुन्तल गोबर की सडी खाद पहली जुताई से पूर्व खेत में समान रूप से डाल देना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग सिंचित दशा में समय से बुआई करने पर नाइट्रोजन 100-120 किग्रा., फास्फोरस 60 किग्रा. एवं पोटाष 40 किग्रा. प्रति हैक्टेयर देना चाहिए। असिंचित दशा में नाइट्रोजन 40-60 किग्रा., फास्फोरस 30 किग्रा. एवं पोटाश 20 किग्रा. प्रति हैक्टेयर देना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में फास्फोरस और पोटश की पूरी मात्रा व नाइट्रोजन की आधी मात्रा का मिश्रण बनाकर बीज की पंक्ति से 5 सेमी. बगल में और पाच सेमी. बीज की सतह से नीचे कूड में देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई के बाद कल्ले निकलते समय देना चाहिए। असिंचित दशा में उर्वरकों की पूरी मात्रा एक साथ बुआई के समय प्रयोग करना चाहिए। कुछ क्षेतों में जिंक, सल्फर, मैग्नीज आदि तत्वों के कमी के लक्षण भी गेहॅू की फसल में दिखाई देते हैं। खड़ी फसल में 5 किग्रा. जिंक सल्फेट एवं 20 किग्रा. यूरिया को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें। सल्फर की कमी को पूरा करने के लिए 200 किग्रा. जिप्सम प्रति हैक्टेयर खेत की तैयारी के समय देना चाहिए।
जल प्रबंधन :
बीज के अच्छे अंकुरण के लिए बुआई करते समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। सिंचाई की संख्या और समय बोई गई किस्मों पर निर्भर करता है। गेहू की उन्नतशील प्रजातियों में सिंचाई का विशेष महत्व है। फसल की कुछ विशेष क्रान्तिक अवस्थाओं पर सिंचाई करना आवश्यक होता है। सिंचाई की इन क्रान्तिक अवस्थाओं को सारणी में दर्शाया गया है।
गेहू की फसल में सिंचाई की विभिन्न क्रांतिक अवस्थाएं
| सिंचाई | सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाएं | बुआई के सिंचाई का समय |
| पहली सिंचाई | क्राउन रूट अवस्था पर | बुआई के 20-25 दिन बाद |
| दूसरी सिंचाई | कल्ले फूटते समय | बुआई के 40-45 दिन बाद |
| तीसरी सिंचाई | गांठ बनते समय | बुआई के 60-65 दिन बाद |
| चैथी सिंचाई | पुष्पा अवस्था पर | बुआई के 80-85 दिन बाद |
| पाचवी सिंचाई | दुग्धा अवस्था पर | बुआई के 100-105 दिन बाद |
| छठी सिंचाई | दाना बनते समय | बुआई के 115-120 दिन बाद |
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण :
अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। खरपतवार गेहॅू की फसल को बहुत हानि पहुचाते हैं। फसल की पहली सिंचाई के 10-12 दिन बाद एक निराई-गुड़ाई कर खरपतवार निकाल देना चाहिए। गेहॅू के खेत से विभिन्न प्रकार के खरपतवारों को खत्म करने के लिए खरपतवारनाशी दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों जैसे-बथुआ, कृष्णनील, सैंजी, हिरनखुरी, कटेली, चटरी आदि के नियंत्रण के लिए 2-4 डी रसायन की 625 ग्राम दवा को 700 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के 30 से 35 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए। सकरी पत्ती वाले खरपतवारों जैसे- जंगली जई और गुल्ली डंडा के नियंत्रण के लिए आईसोप्रेट्यूरान या पैन्डीमेथिलीन 1 किग्रा. दवा की मात्रा को 700 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के 30 से 35 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए।

फसल सुरक्षा :
अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए फसल सुरक्षा बहुत जरूरी है। फसल को दीमक से काफी नुकसान होता है। इसका अधिक प्रकोप बलुई और दोमट भूमियों में अधिक होता है। इसके नियंत्रण के लिए सिंचाई के समय 2-4 लीटर क्लोरपायरीफास नामक दवा का प्रयोग करना चाहिए। बीमारियों में मुख्य रूप से अनावृत्त कडुआ रोग और करनाल बंट रोग से फसल को नुकसान पहुचता है। अनावृत्त कडुआ रोग के नियंत्रण के लिए बीज रोग ग्रसित बाली को तोडकर मिट्टी में दबा दें । रोग अवराधी किस्मों की बुआई कर। बीज को कार्बेंन्डाजीम 2 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुआई करें। करनाल बंट रोग के नियंत्रण के लिए बीज को कार्बेंन्डाजीम उपचारित करके बुआई करें। खड़ी फसल में दाना बनते समय मैंकोजेब 2 किलोग्राम दवा को 800 लीटर पानी में घोलकर बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
कटाई और उपज :
जब दाने में नमी 14-15 प्रतिशत रह जाए, तभी कटाई की जानी चाहिए। सुनहरे रंग और झुकी हुई बालियाँ फसल पकने का संकेत देती हैं। अच्छी देखरेख और आधुनिक तकनीक के उचित उपयोग से 60-75 क्विंटल दाना तथा 70-80 क्विंटल भूसा प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हो जाता है।
गेहूँ की खेती का संक्षिप्त आर्थिक विश्लेषण :
1. लागत (Cost of Cultivation per Hectare)
- बीज: ₹2,300–₹3,000
- जुताई व भूमि तैयारी: ₹4,000–₹5,000
- खाद–उर्वरक: ₹6,000–₹8,000
- सिंचाई: ₹3,000–₹4,000
- कीटनाशक/फफूंदनाशी: ₹1,000–₹1,500
- मजदूरी: ₹4,000–₹5,000
- अन्य खर्च: ₹1,000
कुल लागत लगभग: ₹20,000–₹25,000 प्रति हेक्टेयर
2. उत्पादन (Yield)
- उत्तम तकनीक से: 55–75 क्विंटल/हेक्टेयर
3. आय (Income)
यदि MSP पर बिक्री हो: ₹2,425 प्रति क्विंटल (2025-26)
औसत उत्पादन 60 क्विंटल मानें:
60 × 2,425 = ₹1,45,500 / हेक्टेयर
4. शुद्ध लाभ (Net Profit)
₹1,45,500 – ₹25,000 = ₹1,20,000 प्रति हेक्टेयर (लगभग)
सरकारी अनुदान :
उत्तर प्रदेश सरकार, गेहूं की फसल के लिए 2025 में किसानों को कई प्रकार के अनुदान व सहायता दी जा रही है। सरकारी अनुदान की ये योजनाएं गेहूं उत्पादन की लागत घटाने, अधिक उपज प्राप्त करने और किसान आय बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई हैं।
गेहूं बीज पर अनुदान:
- किसानो को गेहूं की उन्नत व प्रमाणित किस्मों के बीजों पर 50 तक सब्सिडी दी जा रही है।
- प्रमाणित गेहूं बीज का बाजार मूल्य लगभग ₹4,680 प्रति क्विंटल है, जिस पर ₹2,340 प्रति क्विंटल का अनुदान है। किसान को सिर्फ ₹2,340 प्रति क्विंटल ही देना होगा।
- उन्नत किस्म डीबीडब्ल-303 के लिए बाजार मूल्य ₹4,872 और अनुदान ₹2,436 प्रति क्विंटल है।
- बीज सरकारी कृषि केंद्रों, बीज गोदाम में पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर मिलेंगे। खरीदते समय POS मशीन पर अंगूठा लगाकर भुगतान करना अनिवार्य है।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य : MSP
- 2025-26 में गेहूं फसल का एमएसपी ₹2,425 प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो पिछले वर्ष से ₹150 अधिक है।
- गेहूं की सरकारी खरीद 17 मार्च 2025 से 15 जून 2025 तक चलेगी, कुल 6,500 केंद्रों पर खरीद होगी।
- किसानों को अपना पंजीकरण fcs.up.gov.in या ‘UP Kisan Mitra’ ऐप पर करना होगा।
- भुगतान पीएफएमएस पोर्टल के माध्यम से 48 घंटे के भीतर किसान के आधार-लिंक्ड बैंक खाते में सीधे किया जाएगा।
- जरूरी दस्तावेज व शर्तें :
- आधार कार्ड, बैंक खाता , भूमि अभिलेख या बोआई प्रमाण, मशीन पर बायोमेट्रिक।
- बीज व एमएसपी दोनों स्कीम में उपरोक्त दस्तावेज जरूरी हैं, और किसान को अपनी उपस्थिति व सत्यापन देना भी जरूरी है।
- अन्य सुविधाएँ :
- कृषि यंत्रों पर भी अलग 40-50% तक अनुदान का प्रावधान है।
- किसान स्थानीय कृषि विभाग कार्यालय या कृषि केंद्र बीज वितरण केंद्र से विवरण एवं मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं.

