सूरन की व्यावसायिक खेती: कम जोखिम, ज्यादा मुनाफा
Keywords : सूरन की खेती, ओल की खेती, जलवायु, मिट्टी, उन्नत किस्में, बीज दर, उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई, रोग नियंत्रण, उपज और फसल की आर्थिकी की पूरी जानकारी।
डा. जितेन्द्र सिंह, कृषि वैज्ञानिक
परम्परागत सब्जी के रूप में पहचाना जाने वाला सूरन, आज किसान की आमदनी को तेजी से बढा रहा है। कभी घर के आगे-पीछे खाली पड़ी जमीन में उगने वाला यह पौधा अब बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर नगदी फसल के रूप में व्यावसायिक खेती हो रही है। जिमीकंद और ओल के नाम से लोकप्रिय यह फसल सब्जी, चोखा और अचार तीनों रूपों में घरेलू रसोई और बाजार दोनों की पसंद है।
किसानों को सूरन खूब आकर्षित करता है क्योंकि यह कम जोखिम और अधिक उत्पादन देने वाली फसल है। खाद्यान्न फसलों की तुलना में सूरन प्रति इकाई क्षेत्र से कई गुना अधिक पैदावार देता है। यही नहीं, इसकी एक बड़ी खासियत है अव्दितीय प्राकृतिक भंडारण क्षमता।
खुदाई के बाद इसके कंद 4 से 6 महीने तक बिना किसी विशेष व्यवस्था के सुरक्षित रखे जा सकते हैं। इस कारण किसान बाजार की मांग के अनुसार धीरे-धीरे बिक्री कर बेहतर दाम प्राप्त कर लेते हैं। किसान इसे नकदी फसल के रूप में उगाते हैं। आइए आज बात करते है व्यवसायिक महत्व की फसल सूरन की खेती के हर पहलू के बारे में ताकि किसान अधिक उत्पादन के साथ भरपूर मुनाफा कमा सके।

मौसम व जलवायु :
सूरन के कंदों के अच्छे अंकुरण के लिए उच्च तापमान व वानस्पतिक वृद्धि के लिए आर्द्र-गर्म मौंसम की आवश्यकता होती है। अतः इसे गर्मी और वर्षा दोनों मौंसम में उगाया जा सकता है। उत्तर भारत की जलवायु इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त रहती है। कंदों के वृद्धि लिए ठण्ड व शुष्क मौसम उपयुक्त रहता है।
पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए 20-42 डिग्री सेटीग्रेट तापमान तथा 60-85 प्रतिशत आपेक्षिक आद्रता होनी चाहिए। इसके पौधे सूखा, वर्षा और कम तापमान के प्रति सहनशील होते हैं। अधिक कंद उत्पादन के लिए सामान्य रूप से अच्छी वर्षा होना लाभकारी होता है।
मिट्टी का चयन : उचित प्रबंधन के जरिए इसकी खेती सभी तरह की भूमि में की जा सकती है। लेकिन उत्पादन की दृष्टि अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोंत्तम होती है। साथ ही, भूमि की जल धारण क्षमता भी अच्छी होनी चाहिए।
मिट्टी का पी. एच. मान 6 से 8 के बीच होना चाहिए। रेतीली तथा चिकनी मिट्टी में सूरन की खेती करने से बचना चाहिए, क्योकि ऐसी मिट्टी में कंदो का विकास ठीक से नही हो पाता।
खेत की तैयारी : बढ़िया उपज की बुनियाद
जुताई से पूर्व खेत में 200 कुन्तल गोबर की खाद के साथ एक टन मुर्गियों की बीट की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना बहुत लाभकारी होता है। कंद वाली फसल होने के कारण खेत की गहरी जुताई करना जरूरी होता है।
इसलिए पहली जताई मिट्टी पलट हल से करनी चाहिए। इसके बाद 2-3 बार हैरो व कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना ले और पाटा चलाकर खेत को समतल कर ले। सिंचाई के लिए खेत में सुविधा अनुसार मेडे और नालियां बना लेना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक : पौधे की जरूरत के अनुसार
खाद व उर्वरक की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाच के परिणाम के आधार पर करे। सूरन की फसल में मुर्गियों की बीट की खाद के प्रयोग से बहुत अच्छे परिणाम मिले हैं। देशी खाद के रूप में 200 से 250 कुन्तल कम्पोस्ट या गोबर की सडी खाद के साथ एक टन मुर्गियों की बीट की खाद प्रति हेक्टेयर बुआई के 15 दिन पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला दे।
रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 150 किग्रा., फास्फोरस 60 किग्रा. एवं पोटाश 150 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करे। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को बुआई के 60 दिन बाद खड़ी फसल में टापड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए।
बुआई के लिए कंदों का चुनाव :
सूरन की अधिक उपज के लिए रोग मुक्त कंदों की बुआई करना चाहिए। व्यावसायिक खेती के लिए 500 सौ ग्राम से 1 किलो ग्राम वजन के कंद बुआई के लिए आदर्श माने जाते हैं। कंदों को पूर्ण व काट कर बुआई के काम लाया जाता है।
जहा तक सम्भव हो 500 सौ ग्राम वजन के पूर्ण कंदों को बुआई के लिए इस्तेमाल में लाना चाहिए। 500 सौ ग्राम वजन के कंदों की 50 कुन्तल तथा 1 किलो ग्राम वनज के कंदों की 100 कुन्तल प्रति हैक्टेयर की दर से स्वस्थ कंदों की आवश्यकता होती है। प्रत्येक कंद में कम से कम दो आखे अवश्य होनी चाहिए।
बीज शोधन:
कंदों को बुआई से पूर्व 0.5 प्रतिशत एगलाल के घोल में डुबोकर 5 मिनट तक उपचारित कर लेना चाहिए। कंदों को बोने से पूर्व 2 प्रतिशत तूतिया के घोल में डुबो कर 5 मिनट तक उपचारित किया जा सकता है। कंदों को उपचारित करने से फसल को फफूद जनित रागों से रोकथाम हो जाती है।
उन्नतशील प्रजातिया :
सूरन की उन्नतशील प्रजातियों में गजेन्द्र, श्रीपदमा, संतरागाछी और कोव्वयुर प्रमुख है। इन प्रजातियों की विशेषताएं निम्नलिखित हैं।
गजेन्द्र : देश में उगाई जाने वाली किस्मों में यह सर्वाधिक लोकप्रिय सूरन की किस्म है। इसमें कैल्सियम आक्जलैट की मात्रा कम होने के कारण चरपराहट रहित किस्म है। इस किस्म का विकास चयन व्दारा किया गया है। खाने में स्वादिष्ट होने के कारण बाजार भाव अच्छा मिलता है। इस किस्म के घन कंद 30 सेमी. आकार तक के होते हैं। इसमें केवल एक ही घनकंद प्रति पौधा बनता है। इसकी उत्पादन क्षमता 800 से 1000 कुन्तल प्रति हैक्टेयर तक होती है।
श्री पद्मा : सूरन की यह किस्म केरल के वायनाड क्षेत्र की स्थानीय किस्म है। इसको अन्य राज्यों में भी उगाया जा सकता है। इसकी उत्पादन क्षमता 800 कुन्तल प्रति हैक्टेयर तक है।
संतरागाछी : इस किस्म के पौधे अच्छे बढ़ते हैं। कंद कुछ-कुछ कडुवे स्वाद के होते है। खाने में गले और मुॅह में जलन तथा खुजलाहट भी होती है। यह किस्म पूर्वी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। कंद खुरदरे व मक्खनी रंग के होते हैं। यह किस्म 500 से 750 कुन्तल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन देती है।
कोव्वयुर : यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है। इसके पौधों की बढ़वार अच्छी होती है। इसके कंद बड़े व चिकने होते हैं। इसमें चरपराहट कम होती है। एक पौधे में एक कंद बनता है और कंद एक समान अकार के बनते हैं।
बोने का समय : उत्तर भारत में फरवरी-मार्च बुआई का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। दक्षिण भारत में कंदों की बुआई मई माह में की जाती है।
बोआई का तरीका : छोटे कदम, बड़े परिणाम
खेत में 1X1 मीटर की दूरी पर 30 सेंटी मीटर आकार के गड्डे खोद लें। इस तरह से एक हैक्टेयर खेत में 10 हजार गड्ढे बनते हैं। इन्हीं गड्ढों में कंदों की बुआई की जाती है। बड़े आकार के कंदों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर बुआई की जा सकती है। लेकिन समूचे कंदों की बुआई करना अधिक लाभप्रद होता है। गड्ढों में कंदों की बुआई के बाद अच्छी तरह मिट्टी से ढक देना चाहिए। गड्ढों को पुआल या घास-फूस से ढक देने से नमी बनी रहती है, जिससे अंकुरण अच्छा होता है।
सिंचाई प्रबंधन : खेत में उचित जल निकास का प्रबंध होना जरूरी होता है। वर्षा ऋतु में खेत में पानी लगने से कंदों का विकास रूक जाता है। बुआई के बाद खेत में नमी कम होने पर एक हल्की सिंचाई अवश्य करे। बाद में आवश्यकतानुसार 10-12 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहिए। कंदों की खुदाई के एक सप्ताह पूर्व खेत की हल्की सिंचाई करना आवश्यक होता है।
निराई-गुड़ाई : सूरन की फसल में काफी खरपतवारों का प्रकोप होता है। अतः खेत का खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। फसल के उत्पादन पर निराई-गुड़ाई का बहुत अच्छा असर पड़ता है। सामान्यतः फसल की 2-3 निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। पहली निराई-गुड़ाई बुआई के 40 से 60 दिन बाद तथा दूसरी 80 से 90 दिन बाद करनी चाहिए। निकाई के साथ-साथ पौधों में मिट्टी चढ़ानें का काम भी करना चाहिए।
फसल सुरक्षा : फसल को कीड़े और बीमारियों से अन्य फसलों की तरह काफी नुकसान होता है। अतः फसल से अधिक उत्पादन के लिए फसल सुरक्षा बहुत आवश्यक है। सूरन की फसल को मुख्य रूप निम्नलिखित कीट और बीमारियों से हानि पहॅुचती है।
कीट : सूरन की फसल को जिमीकंद का भृंग और तम्बाकू की सूड़ी आदि कीटों से विशेष हानि पहुचती है। जिमीकंद भृग 8-9 मिलीमीटर लम्बा, हल्के लाल, भूरे रंग का होता है। इसका कीट और सूडी पौधे की पत्तियों और डण्ठल को खाकर हानि पहुचाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए मैलाथियान 50% EC 1.0–1.25 लीटर दवा को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
तम्बाकू की सूड़ी सूरन की फसल को दूसरा प्रमुख हानि पहुचाने वाला कीट है। इसकी सूडी 35-40 मिलीमीटर लम्बी होती हैं।
ये सूडिया हरे-भूरे रंग की होती हैं। सूडिया जुलाई से सितम्बर तक पौधों की पत्तिया खाकर नुकसान पहुचाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए इन्डोफल्फान 35 EC फॉर्मूलेशन का लगभग 1.0–1.5 लीटर दवा को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
झुलसा रोग : सूरन की फसल का यह बहुत हानि कारक रोग है। यह रोग ‘फाइटोपथोरा कोलकेसी’ नामक फफूदी से फैलता है। इस रोग के प्रकोप से पौधों की पत्तिया झुलस जाती हैं और तने में गलन शुरू हो जाती है। इस रोग से प्रभावित पौधों में कंदों का निर्माण रूक जाता है।
इसकी रोकथाम के लिए बुआई के लिए स्वस्थ कंदों का चुनाव करना चाहिए। कंदों को बुआई से पूर्व 2 प्रतिशत तूतिया के घोल में 5 मिनट तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। गड्ढ़ों में कंदों की बुआई करते समय ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग करना चाहिए।
पौधों पर बीमारी के लक्षण प्रकट होते ही डाईथेन जेड-78 दवा का 0.2 प्रतिषत के घोल का छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 10-15 दिन बाद पुनः छिड़काव करना चाहिए।
खुदाई व भंडारण : लंबी अवधि की सुरक्षा
जब पौधों की अधिकतर पत्तिया पीली पड़ कर सूख जाय तो समझना चाहिए कि सूरन की फसल की खुदाई के लिए तैयार है। बुआई के 7-8 महीने बाद फसल खुदाई योग्य हो जाती है। अक्टूबर से लेकर दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक कंदों की खुदाई का समय होता है।
खुदाई के समय ध्यान रखना चाहिए कि कंद कटे नही। कंदों को साफ करके 4-5 दिन छायादार स्थान में सुखाकर हवादार कमरों में भण्डारित करना चाहिए। छोटे कंदों को छाॅट कर अगले वर्ष बुआई के लिए छायादार स्थान में सुखाकर हवादार जगह में सुरक्षित भण्डारित करना चाहिए। लम्बी अवधि तक भण्डारण के लिए कंदों को 10-12 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर भण्डारण करना चाहिए।
उत्पादन : सूरन का उत्पादन बुआई के लिए प्रयुक्त कंदों का आकार, मिट्टी की उर्वरा शक्ति एवं प्रजातियों के उपर निर्भर करता है। यदि सूरन की वैज्ञानिक ढंग से खेती किया जाय तो 400 से 600 कुन्तल प्रति हेक्टेयर उपज आसानी से मिल जाती है। अधिक उपज देने वाली किस्मों का उत्पादन 1000 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होता है।
सूरन की फसल की आर्थिकी : सूरन एक नगदी फसल है। इसकी खेती आर्थिक रूप से काफी लाभकारी साबित होती है। सामान्यतः एक हेक्टेयर सूरन की खेती में 1.5 से 2 लाख पूजी निवेश की जरूरत पडती है। सामान्य फसल से एक हेक्टेयर में 400 से 600 कुन्तल तक उपज आसानी से मिल जाती है।
अधिक उपज देने वाली किस्मों से 800 से 1000 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल जाता है। यदि सूरन की औसत उपज 500 मान ले और आज के थोक बाजार भाव 50 रूपया प्रति किग्रा. की दर से बिक्री किया जाय तो कुल 25 लाख रूपये आय की प्राप्ति होती है। यदि इस धनराशि से रू 2 लाख लागत निकाल दें तो फसल से शुद्ध लाभ लगभग 23 लाख प्रति हेक्टेयर तक मिल जाता है।

निष्कर्ष :
सूरन किसानों के लिए एक ऐसी फसल बनकर उभरा है जो परंपरा, पोषण और मुनाफा तीनों को एक साथ समेटे हुए है। कम लागत, बेहतर भंडारण, उच्च उत्पादन और स्थिर बाजार मांग इसे आज की कृषि में एक सशक्त व्यावसायिक विकल्प माना जाता हैं।
सरकारी अनुदान :
- कुछ राज्यो जैसे बिहार सरकार ने नकदी/बागवानी फसल़ कंद (सूरन/ओल/जिमीकंद) की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस योजना में खेती शुरू करने पर किसानों को अनुदान मिल दिया जा रहा है।
- उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में सुरन की खेती के लिए अनुदान देना शुरू किया किया है। एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत खेती/बागवानी से जुड़ी अनुदान-सब्सिडी योजनाए उपलब्ध हैं।
- किसान अन्य योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं जैसे कृषि यंत्रीकरण सब्सिडी, सिंचाई सब्सिडी (जैसे सोलर पंप, ड्रिप, स्प्रिंकलर) आदि जिससे लागत में कमी आती है। इन यंत्रों पर 50-80 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है।
- हाल ही में प्रदेश में फेंसिंग (बाड़) पर 50 प्रतिशत सब्सिडी की व्यवस्था की गई है ताकि बागवानी/उद्यान फसलों की सुरक्षा हो सके।
- एकीकृत बागवानी विकास मिशन प्रदेश के कई जिलों में लागू है उसके तहत खेती/बागवानी से जुड़ी अनुदान-सब्सिडी योजनाएँ उपलब्ध हैं।
- आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज जैसे-खतौनी, पहचानपत्र, बैंक खाता, जमीन की स्थिति आदि कागजात की जरूरत होती है।

