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पोषण और कमाई से भरपूर : लौकी की उन्नत खेती

डा. जितेन्द्र सिंह

Key Words : लौकी की खेती से 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर उपज और ₹2-3 लाख शुद्ध लाभ। किस्में, उर्वरक, कीट नियंत्रण, सिंचाई और लागत-आय विवरण। ड्रिप सिंचाई, संकर किस्में और समय पर तुड़ाई से आय दोगुनी करें। 

कद्दू वर्गीय सब्जी की फसलों में लौकी का अपना एक अलग स्थान है। इसे घिया और कद्दू के नाम से भी जानते है। लौकी बारहों महीने उपलबध होने वाली लोकप्रिय हरी सब्जी है। स्वाद और पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण लोग बड़े चाव से खाना पसंद करते हैं। लौकी का उपयोग सब्जी के अतिरिक्त नाना प्रकार की मिठाईया, हलुआ, रायता, कोफ्ते, खीर आदि बनाने में किया जाता है। इसके गूदे, पत्तियों और तनों से औषधिया भी तैयार की जाती हैं। लौकी का ताजा रस मा के दूध के समान पौष्टिक होता है। शहरो में इसका जूस निकाल कर लोग बड़ी मात्रा में सेवन करते हैं। इसके उपभोग को देखते हुए पूरे वर्ष बाजार में इसकी माग बनी रहती है। कृषि वैज्ञानिकों एवं बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि इसकी खेती को आधुनिक तकनीक और व्यावसायिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर करें तो किसानों की माली हालत भी सुधार सकती है। लौकी की फसल का भरपूर उत्पादन और मुनाफे के लिए निम्नलिखित पहलुओं को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

भूमि प्रबंधन : लौकी की खेती विभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है, लेकिन भरपूर उत्पादन के दृष्टि से उचित जल धारण क्षमता वाली जीवांश युक्त हल्की दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। उदासीन पी.एच. मान वाली भूमि इसके लिए अच्छी रहती है।  अत्याधिक अम्लीय और क्षारीय मृदा में इसके पौधों का विकास अच्छी तरह नही हो पाता। खेत को एक या दो गहरी जुताई के बाद हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। अन्तिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर लगभग 100 से 150 कुन्तल गोबर की सड़ी खाद खेत में मिला देना चाहिए। यदि खेत में दीमक या मिट्टी में रहने वाले अन्य कीड़ों की अशंका हो तो क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियान नामक रसायन का 2 प्रतिशत चूर्ण 25 से 30 किग्रा./हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय खेत में मिलाना चाहिए।

उन्नतशील प्रजातिया : लौकी की लम्बी और गोल दो तरह की किस्में होती हैं। भरपूर  उत्पादन की दृष्टि से हमेशा उन्नतशील प्रजातियों का ही चुनाव करना चाहिए। अच्छी गुणवत्ता का बीज किसी विश्वसनीय संस्था से ही क्रय करना चाहिए। लम्बी किस्में:

पूसा समर प्रोलिफिक लाॅग, संकर पूसा मेघदूत, पूसा नवीन, पंजाब कोमल, पंजाब लम्बी, पूसा संकर -3, आजाद नूतन इत्यादि। गोल किस्में: पूसा समर प्रोलिफिक राउण्ड, अर्का बहार, संकर पूसा मंजरी, हिसार सेलेक्सन गोल, पूसा संदेश इत्यादि।

उर्वरक प्रयोग : देशी खाद के साथ रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करना अधिक लाभकारी होता है। इसके लिए 400 से 500 कुन्तल गोबर की सड़ी खाद को जुताई से पूर्व खेत में बिखेर मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में 50 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस, 40 किग्रा. पोटाश एवं 30 किग्रा. कैल्सियम तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से देना चाहिए। इनमें नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फोरस, पोटाश, कैल्सियम की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय देते हैं। शेष बची नत्रजन की मात्रा को दो बार में पहली पौधों में 4 से 5 पत्तिया आने पर दूसरी किस्त पौधों पर फूल आते समय पौधों के चारों ओर देना चाहिए।

बीज की मात्रा: बीज की मात्रा बुआई के तरीके, नालियों/गड्ढ़ो की दूरी, प्रयोग किए जाने वाले बीज के किस्मों पर निर्भर करती है। ग्रीष्म कालीन फसल की बुआई के लिए 4 से 6 किलोग्राम एवं वर्षा कालीन फसल की बुआई के लिए 3 से 4 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की से प्रयोग करना चाहिए।

बोने का समय व बीजोंपचार : ग्रीष्म कालीन फसल की बुआई जनवरी से मार्च एवं वर्षा कालीन फसल की बुआई जून से जुलाई तक कर सकते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बीज को बोने से पूर्व बीजों को मैंकोजेब की 5 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी मे घोलकर 10-20 घंटे के लिए भिगो देना चाहिए। इससे बीज का जमाव अच्छा एवं पौधे निरोगी तैयार होते हैं। उन्नतशील किस्मों का प्रति गड्ढ़ा/स्थान 3-4 बीज एवं संकर किस्म का बीज प्रति गड्ढ़ा/स्थान 2 बीज बोना चाहिए।

गड्ढ़ों की खुदाई : बीज की बुआई समतल क्यारियों की अपेक्षा नालियों या फिर गड्ढ़ो में करना ज्यादा लाभकारी होता है।  इसके लिए 1.5 मीटर लाइन से लाइन एवं .50 से 1 मीटर पौध से पौध की दूरी पर नालिया या गड्ढे़ बनाकर बीज की बुआई करते हैं। गड्ढ़ो में बुआई करने के लिए उचित स्थान पर चिंह लगाकर 40 सेंमी. चौड़ा तथा 30 सेंमी. गहरे गड्ढ़ों की खुदाई करते हैं। यदि खेत की तैयारी के समय रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नही किया गया है तो गड्ढों में बीज बोने से पूर्व 50-60 ग्राम अमोनियम सल्फेट 80-100 ग्राम सिंगल सुपरफास्फेट, 20-30 ग्राम पोटैशियम सल्फेट प्रति गड्ढ़ा मिट्टी में मिलाना चाहिए।

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पौध तैयार करना : रबी की फसलों की कटाई में विलम्ब से होने के कारण बुआई में काफी देर हो जाती हैं। इससे बचने के लिए बीज को 10 से 15 सेमी. आकार के पाली बैग में बालू, रेत, खाद और मिट्टी का मिश्रण भरकर और उसमें बीज की बुआई कर पौध तैयार कर सकते हैं। इसके लिए ग्रीन हाउस/पाली हाउस का प्रयोग किया जा सकता है। जब फसल की कटाई के बाद खेत खाली हो जाय, तब इन पाली बैग में तैयार हो रही पौध को खेत में उचित दूरी पर रोपाई कर सकते हैं। इस तरह एक-डेढ़ माह पूर्व फसल तैयार की जा सकती हैं।

पौध विरलीकरण : पौधों में जब 5-6 पत्तिया आ जाएं तो पौधों का विरलीकरण कर देना चाहिए। इसके लिए प्रति गड्ढ़ा/स्थान एक या दो स्वस्थ पौधों को छोड़कर अन्य सभी कमजोर एवं अस्वस्थ पौधों को निकाल देते हैं।

सिंचाई प्रबंध : ग्रीष्म कालीन फसल में उचित जल प्रबंध करना बहुत जरूरी होता है। हाल के कुछ वर्षों में इन फसलों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली बहुत कारगर साबित हुई हैं। इस प्रणाली से सिंचाई करने से 50 से 60 फीसदी तक पानी की बचत होने के साथ-साथ उपज में भी बढ़ोत्तरी होती है, क्योंकि पौधों को पानी आवश्यकतानुसार और लगातार नियंत्रित मात्रा में मिलता रहता है। नियंत्रित मात्रा में खेत में पानी देने से खरपतवार भी कम उगते है। देशी विधि से गर्मी के दिनों 4 से 5 दिन के अन्तराल में सिंचाई करना चाहिए। वर्षा ऋतु की फसल को आमूमन सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है।

कम फलन की समस्या एवं निदान : प्रायः देखने में आता है कि पौधों पर फूल तो काफी संख्या में आते हैं लेकिन फल बहुत कम लगते हैंै। इसका प्रमुख कारण पौधों पर नर फूलो की अधिकता और मादा फूलों की कमी होना। पौधों में मादा फूलों पर ही फल बनते हैंै। यही कारण है कि पौधों पर फूल आने के बावजूद फल लगने की संख्या काफी कम होती है। इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कुछ पादप नियामक/हार्मोन के प्रयोग की संस्तुति करते है। इन पादप नियामकों का पौधों पर दो या चार पत्तियों की अवस्था पर छिड़काव करने से उपज में डेढ़ से दो गुना तक वृद्धि होती है। लौकी की फसल में मैलिक हाइड्राजाइड हार्मोन की 100 पी.पी.एम.घोल लगभग 2.5 ग्राम रसरयन की मात्रा को 50 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दस से छिड़काव करना चाहिए।

फसल सुरक्षा : लौकी की फसल को वर्षा ऋतु की आपेक्षा गर्मी की फसल को  कीड़े-मकोड़े और ब्याधियों से अधिक नुकसान होता है। अधिक उत्पादन लेने के लिए फसल सुरक्षा का समुचित प्रबन्ध करना आवश्यक होता है।

लाल कीट : यह कीट फसल को सर्वाधिक हाॅनि पहुॅचाता हैं। यह लाल रंग का छोटा कीड़ा उड़ने में सक्षम होता है। गर्मी की फसल में इस कीडे़ का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता हैं। फसल पर इस कीड़े का अक्रामण प्रारंभिक अवस्था में पौधे की कोमल पत्तियां को खाकर नुकसान पहुॅचाता है। यदि इस कीड़े को समय पर न नियंत्रित किया गया तो पूरी की पूरी फसल नष्ट हो जाती है। इस कीडे़ के नियंत्रण के लिए मैलाथियान दवा की 2 मिली. या कार्बोरिल 4 ग्राम मात्रा को एक लीटर पानी की दर से घोल बनाकर एक या दो छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।

फल मक्खी : यह मक्खी फलों में प्रवेश कर जाती है और अन्दर ही अण्डे दे देती है। यह दूसरा सबसे अधिक हानि पहुचाने वाला कीट हैं। यह पीले रंग की होती है। इसका अक्रामण फलों पर प्रारंभिक  अवस्था में शुरू हो जाता है। यह मक्खी फलों के अंदर घुसकर खाना शुरू करती है जिससे अंदर ही अंदर फल सड़ जाते हैं। इस कीड़े का अक्रामण बहुत अधिक होता है, जिससे 70-80 प्रतिशत तक फल नष्ट हो जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 10 मिली. 50 ई.सी. दवा और 100 ग्राम गुड़ को 10 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर एक सप्ताह के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। इस दवा के प्रयोग के बाद लगभग 10 दिनों तक फलों की तुड़ाई नही करनी चाहिए।

थ्रिप्स और रस चूसक कीट : लाल कीट एवं फल मक्खी के अतिरिक्त इस वर्ग की फसलों को थ्रिप्स और रस चूसक कीड़े भी फसल को बहुत नुकसान पहुचाते हैं। इन कीड़ो के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास या डाईमेथोएट नामक दवा की 2 मिली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

एन्थ्रेकनोज : यह बीमारी पौधों पर एक प्रकार के फफूॅद से फैलती है। इस बीमारी से फलों और पत्तियों पर छोटे-छोटे लाल व भूरे धब्बे बनते हैं जिसके कारण पत्तियाॅ झुलसी हुई दिखाई देती हैं। इसकी रोकथाम के लिए डाईथेन एम-45 दवा की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर जरूरत के मुताबिक छिड़काव करना चाहिए।

पाउडरी मिल्ड्यू या खर्रा रोग : यह बीमारी भी फफूॅद के कारण फैलती है। इस बीमारी की प्रारंभिक आवस्था में पत्तियों की सतह पर गोल सफेद  पाउडर जैसे धब्बे पड़ते हैं, बाद ये धब्बे पूरी पत्तियों पर फैल जाते हैं। पौधों पर इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते ही घुलनशील गंधक 2 ग्राम या कैराथीन 1 मिली. या फिर कैलिक्सिन 0.5 मिली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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फलों की तुड़ाई : फलों की तुड़ाई बोई गई प्रजातियों पर निर्भर करता है। फलों को पूर्ण विकसित होने से पूर्व कोमल अवस्था में किसी तेज धार दार चाकू से काटकर पौधे से अलग करना चाहिए। पूर्ण विकसित व कठोर फलों से अच्छी सब्जी नही बनती जिसके कारण बाजार भाव कम हो जाता है। तुड़ाई के बाद फलों को छोटे-छोटे झाबों, टोकरों व जूट के बोरो में भर कर बाजार में बिक्री के लिए भेजना चाहिए।

उपज : उन्नत तकनीक एवं समुचित प्रबंधन के व्दारा 200 से 250 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार होती है। यदि बुआई के लिए संकर बीज का प्रयोग किया जाता है तो उत्पादन और भी बढ़ जाता है।

1 हेक्टेयर का आय–व्यय विवरण

 अनुमानित व्यय  :    Cost of Cultivation

क्र.सं.मदअनुमानित लागत ()
1खेत की जुताई, पाटा, तैयारी8,000
2बीज (संकर किस्म   4–5 किग्रा6,000
3गोबर की सड़ी खाद (120–150 क्विंट12,000
4रासायनिक उर्वरक NPK + Ca7,000
5बीज उपचार एवं पादप वृद्धि नियामक2,000
6बुवाई व रोपाई श्रम5,000
7निराई–गुड़ाई  2–3 बार8,000
8सिंचाई (बिजली/डीजल/ड्रिप रखरखाव)6,000
9कीट एवं रोग नियंत्रण7,000
10तुड़ाई, ढुलाई व पैकिंग10,000
11अन्य/अनपेक्षित खर्च4,000
कुल अनुमानित व्यय  :₹ 85,000

अनुमानित उत्पादन एवं आय   : Returns

  • औसत उपज : 220–250 क्विंटल/हेक्टेयर
  • औसत बाजार भाव : ₹10–15 प्रति किग्रा

न्यूनतम अनुमान (220 क्विंटल @ ₹10/kg)
सकल आय = ₹2,20,000

सामान्य अनुमान (240 क्विंटल @ ₹12/kg)
सकल आय = ₹2,88,000

उच्च मूल्य स्थिति (250 क्विंटल @ ₹15/kg)
सकल आय = ₹3,75,000

शुद्ध लाभ (Net Profit)

स्थिति      सकल आय ()      कुल व्यय ()    शुद्ध लाभ ()
सामान्य       2,88,000      85,000    2,03,000
अधिक       3,75,000      85,000    2,90,000
    

निष्कर्ष :

लौकी की उन्नत एवं वैज्ञानिक खेती से 1 हेक्टेयर में 1.5 से 3.0 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ संभव है। ड्रिप सिंचाई, संकर किस्मों और समय पर तुड़ाई से लाभ और भी बढ़ाया जा सकता है। लौकी की खेती छोटे एवं मध्यम किसानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है।

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