अरवी की वैज्ञानिक खेती : कम लागत, अधिक उत्पादन और बेहतर कमाई
डा. जितेन्द्र सिंह
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अरवी की खेती पूरे देश में की जाती है, लेकिन बड़े क्षेत्रफल पर प्रमुख रूप से उत्तर भारत एवं पूर्वी राज्यों में की जाती है। इसको घुइयाँ, हाथीकान, कच्चू, सारू आदि नामों से भी जाना जाता है। उत्तर भारत में इसकी खेती को नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है। इसकी खेती गृहवाटिका से लेकर व्यावसायिक स्तर पर की जाती है। किसानों के लिए उत्पादन एवं आय की दृष्टि से अरबी एक लाभकारी फसल है। अरबी की फसल लगभग 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इसको जायद और खरीफ दोनों ही मौंसम में उगाया जा सकता है।
व्यावसयिक महत्व :
इसकी खेती मुख्य रूप से कंदों के लिए की जाती है। कच्चे कंदों का उपयोग सब्जी बनाने के काम में लाया जाता है। इसके कंदों को उबाल कर फलाहार के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। इसके पत्तों और डंठल को भी खानें के काम में लाया जाता है। पत्तों और डंठल से स्वादिष्ट साग और पकौड़ियाॅ तैयार की जाती हैं। कंद से चिप्स भी बनाये जाते हैं।
पोशक मूल्य :
अन्य कंदीय फसलों की तुलना में अरबी में अधिक पोशक तत्व पाये जाते हैं। इसमें पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन्स एवं खनिज लवण पाये जाते हैं। अरबी की कुछ किस्मों में कनकनाहट अधिक पाई जाती है जो कैल्सीयम आक्साइड के कारण होती है। कनकनाहट पत्तों और कंदों दोनों में पाई जाती है। उबाल देने के बाद कनकनाहट समाप्त हो जाती है।
मौंसम :
अरवी गर्म और आर्द्र मौंसम की फसल है। अतः इसे गर्मी और वर्षा दोनों मौंसम में उगाया जा सकता है। उत्तर भारत की जलवायु इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त रहती है।
उत्पत्ति एवं इतिहास :
इसकी उत्पत्ति स्थान के सन्दर्भ में काफी मतभेद है। कुछ वैज्ञानिकों ने प्राचीन विष्व के अयन वृत के मध्य का क्षेत्र को उत्पत्ति स्थान माना है। जबकि मैरीगोवडा-1952 के अनुसार अरबी का उत्पत्ति स्थान भारत ही है। वर्तमान में प्रमुख रूप से उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली आदि राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इन राज्यों के अतिरिक्त भी इसकी खेती का विस्तार तेजी से हो रहा है। उप एवं उपउष्ण देशों में इसकी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

मिट्टी का चयन :
अधिक उत्पादन लेने के लिए अच्छे जल निकास वाली गहरी उपजाउ दोमट से लेकर भुरभुरी दोमट मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन पर्याप्त कार्बनिक प्रदार्थ वाली रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोंत्तम होती है।
खेत की तैयारी :
अरवी कंद वाली फसल होने के कारण खेत की प्रथम गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से करनी चाहिए। इसके बाइ 2-3 बार हैरो व कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। बाद में पाटा चलाकर खेत को समतल कर देना चाहिए। इसके बाद खेत को सुविधा अनुसार क्यारियों में बांट देना चाहिए।
उन्नतशील किस्मों का चयन :
वर्तमान में अरवी की दे देशी या स्थानीय प्रजातियों की खेती अधिक की जाती है। लेकिन अधिक उपज प्राप्त करने के लिए उन्नतशील व सुधरी प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए।
स्थानीय/देसीकिस्में:
फैजावादी, बंसी, लाधरा, बरूआ, गोरिया, गेडिया, सागरी, बॉसी, पंचमुखी, गुरूरी काचू, सरकाचू, तारकाचू, काका काचू, काशी, बग्गा आदि।
उन्नतकिस्में:
नरेन्द्र-1, एस-3, एस-4, एन.डी.सी-1, एन.डी.सी-2, वार्म-1, वार्म-2, ग्यानो-12, ग्यानो-36, ग्यानो-40, सी-135, सी-149, सी-266, रश्मि, एफ.सी-1, एफ.सी-2, एफ.सी-3, एफ.सी-4, एफ.सी-6 आदि।
अरवी की कुछ उन्नतशील किस्में उनके औसत उत्पादन के साथ दी जा रही हैं :
1. स्री रश्मि (Sree Rashmi)
- अवधि: 180–200 दिन
- औसत उत्पादन: 280–320 क्विंटल/हेक्टेयर
- विशेषता: बड़े कंद, एकसार आकार, व्यावसायिक खेती के लिए श्रेष्ठ
2. स्री पल्लवी (Sree Pallavi)
- अवधि: 190–210 दिन
- औसत उत्पादन: 250–300 क्विंटल/हेक्टेयर
- विशेषता: रोग सहनशील, अच्छी गुणवत्ता का गूदा
3. श्री किरण (Sree Kiran)
- अवधि: 170–180 दिन
- औसत उत्पादन: 220–260 क्विंटल/हेक्टेयर
- विशेषता: जल्दी तैयार, कम रेशा, स्वाद अच्छा
4. मुक्ता (Muktakeshi / Mukta)
- अवधि: 180–200 दिन
- औसत उत्पादन: 200–240 क्विंटल/हेक्टेयर
- विशेषता: स्थानीय बाजार में मांग, पकाने में मुलायम
5. नरेंद्र अरवी-1
- अवधि: 180–190 दिन
- औसत उत्पादन: 250–280 क्विंटल/हेक्टेयर
- विशेषता: उत्तर भारत की जलवायु के लिए उपयुक्त
यदि उन्नत किस्म के साथ संतुलित खाद, जल निकास वाली भूमि, समय पर निराई-गुड़ाई एवं रोग-कीट प्रबंधन अपनाया जाए तो उत्पादन 350 क्विंटल/हेक्टेयर तक है।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन :
खाद एवं उर्वरक की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाॅच के परिणाम के आधार पर करना चाहिए। मिट्टी की जाॅच न हो पाने की दषा में 200 से 250 कुन्तल प्रति हेक्टेयर कम्पोस्ट या गोबर की सडी खाद बुआई के 15 दिन पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 100 किग्रा., फास्फोरस 60 किग्रा. एवं पोटाश 80 किग्रा. प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की षेश मात्रा को दो बराबर भागों में बाॅटकर बुआई के 35 से 40 दिन और 70 दिन बाद खड़ी फसल में बुरकाव/टापड्र्रेसिंग करना चाहिए।
बोने का समय :
अरवी की बुआई वर्ष में दो बार की जाती है।
- जायद फसल : फरवरी–मार्च
- खरीफ फसल
- जून–जुलाई : दक्षिण भारत में इसकी बुआई सितंबर–अक्टूबर माह में की जाती है।
बीज की मात्रा एवं उपचार :
एक हेक्टेयर खेत की बुआई के लिए 8 से 10 कुन्तल अच्छे स्वस्थ कंदों की आवष्यकता होती है। बुआई के लिए सिर्फ अंकुरित कंदों का उपयोग करना चाहिए। बीज के रूप में मध्यम आकार के अरवी के कंदों का चुनाव करना चाहिए। कंदों को बुआई से पूर्व 0.5 प्रतिशत एगलाल के घोल में डुबोकर 5 मिनट तक उपचारित कर लेना चाहिए। कंदों की बुआई मेंड़ों पर उचित दूरी में करने से बीज की बचत होती है।
बोने की विधि :
अरबी की बुआई दो तरीके से की जाती है। समतल खेत में क्यारियाॅ बनाकर व डौलों/मेंड़ों पर बुआई की जाती है। समतल खेत में बुआई करने के लिए खेत को सुविधा अनुसार क्यारियों में बाॅट लेना चाहिए। सममतल खेत में पंक्ति से पंक्ति 45 सेमी. और पौध से पौध की 30 सेमी. की दरी पर कंदों को 7.5 सेमी. की गहराई पर बुआई करना चाहिए। 45 सेमी. की दूरी पर डौलों/मेंड़ों को बनाकर पर कंदो को 30 सेमी. की दूरी 7.5 सेमी. की गहराई पर बुआई की जाती है।

सिंचाई :
वर्षा कालीन फसल को कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। जायद मौंसम की फसल को अधिक सिंचाईयों की आवष्यकता होती है। गर्मियों में 6-7 दिन के अन्तर पर तथा वर्षा कालीन फसल को 10-12 दिन के अन्तर पर सिंचाई करने के जरूरत पड़ती है।
निराई-गुड़ाई :
सामान्यतः फसल को 2-3 निराई-गुड़ाई की आवष्यक होती है। प्रत्येक निकाई के बाद खुली हुई जड़ों और कंदों के उपर मिट्टी चढ़ा देना चाहिए। जून के अन्त या जुलाई के प्रथम सप्ताह तक मिट्टी चढ़ानें का कार्य कर देना चाहिए। यदि फसल में अधिक संख्या में तने निकल रहे हो तो एक-दो मुख्य तनों को छोड़ कर अन्य सभी की छटाई करके निकाल देना चाहिए। मिट्टी चढ़ाने से पैदावार पर अच्छा असर पड़ता है। निराई-गुड़ाई करते समय खेत से खरपतवारों को निकाल देना चाहिए।
फसल सुरक्षा :
अरवी की फसल को लगने वाले कीड़े और बीमारियों से काफी नुकसान होता है। अतः अधिक उत्पादन लेने के लिए फसल सुरक्षा बहुत आवष्यक है। अरवी की फसल में मुख्य रूप निम्न कीट और बीमारियों से हानि पहॅुचती है।
सूडी व मक्खी :
यह कीट पौधों की पत्तियों को खाकर हानि पहुॅचाता है। ये कीट पौधे की नई पत्तियों को खा जाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए 0.2 प्रतिशत थायोडान दवा का छिड़काव करना चाहिए।
माइट कीट :
इस कीट से पत्तियों पर छोटे-छोटे सफेद एवं मटमैले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 1 लीटर डाइमिथोएट दवा को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
अरवी का झुलसा रोग :
अरवी की फसल का यह एक बहुत ही भयंकर रोग है। यह रोग ‘फाइटोपथोरा कोलकेसी’ नामक फफूदी के कारण फैलता है। इस रोग का प्रकोप फसल पर जुलाई-अगस्त माह में होता है। षुरू में पत्तों पर मटमैले सफेद, गोल, काले रंग के धब्बे बनना षुरू होते हैं। बाद में पत्तियाॅ गल कर गिरने लगती हैं। इस रोग से प्रभावित पौधों में कंदों का निर्माण बिल्कुल भी नही हो पाता है।
रोकथाम :
1. खेत से पौधों के अवषेश को एकत्र कर जला देना चाहिए।
2. बीज के लिए कंदों को स्वस्थ फसल से चुनाव करना चाहिए।
3. दो – तीन वर्ष का फसल चक्र अपनाना चाहिए।
4. फसल में षुरूआत से ही 15 दिन के अन्तर पर डाइथेन एम-45 नामक रसायन की 2 किग्रा. मात्रा को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करते रहना चाहिए। अरवी की पत्तियाॅ चिकनी होती हैं। इसलिए दवा में 2 प्रतिशत अलसी के तेल को मिलाना चाहिए।

खुदाई :
अरवी के कंदों की खुदाई का समय कंदों के आकार, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, मौंसम और प्रजातियों के चुनाव पर निर्भर करता है। अरवी की फसल बुआई के 3 माह बाद खुदाई योग्य तैयार हो जाती है। पौधों की पत्त्यिाॅ पीली होकर सूखने लगे और गिरने लगे तब खुदाई कर लेनी चाहिए। उत्पादन: अरवी की सुधरी हुई खेती किया जाय और फसल की उचित देख-रेख भी की जाय तो 300 से 400 कुन्तल प्रति हेक्टेयर उपज आसानी से मिल जाती है।
भण्डारण :
अरवी के कंदों को ठंड वाले स्थान में या जिन कमरों में गर्मी न हो भण्डारण किया जा सकता है। कंदों को कमरा में अच्छी तरह फैलाने के बाद कुछ दिन के अन्तराल पर पलटते रहना चाहिए। पलटते समय सड़े-गले कंदों को छाॅट कर अलग करते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त कंदों को सुखाने के बाद जूट के बोरों में भर कर भण्डार गृह में रखा जा सकता है। भण्डार गृह से आवश्यकतानुसार बाजार में बिक्री के लिए कंदों को निकालते रहना चाहिए।
अरवी (Arbi / Colocasia) की वैज्ञानिक खेती पर 1 हेक्टेयर का अनुमानित व्यय और आय का विस्तृत विवरण दिया गया है :
लागत (Cost of Cultivation) :
| खर्च का विवरण | अनुमानित खर्च (₹/हेक्टेयर) |
| बीज कंद (1200 kg) | ₹20,000 – ₹25,000 |
| मजदूरी (बुवाई, रख-रखाव, कटाई) | ₹12,000 – ₹15,000 |
| खाद और उर्वरक | ₹10,000 – ₹12,000 |
| सिंचाई खर्च | ₹5,000 – ₹8,000 |
| कीटनाशक/रोग नियंत्रण | ₹3,000 – ₹5,000 |
| अन्य खर्च (ट्रांसपोर्ट, रख-रखाव आदि) | ₹8,000 – ₹10,000 |
| कुल अनुमानित लागत | ≈ ₹60,000 – ₹75,000 |
स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से लागत थोड़ा ऊपर-नीचे हो सकती है।
उपज (Yield Estimate) :
कंद का उत्पादन लगभग 18–25 टन प्रति हेक्टेयर आमदनी के साथ अच्छी फसल मिल सकती है।
3) बिक्री भाव और आय (Income from Sale)
बाजार दर :
₹15 – ₹30 प्रति किलो (मौसम और गुणवत्ता के अनुसार)
आय का अनुमान :
- यदि उपज 20 टन = 20,000 किग्रा
- औसत भाव ₹20/किलो → ₹4,00,000 कुल बिक्री
ग्रॉस (कुल) आय: लगभग ₹3,40,000 – ₹5,25,000 प्रति हेक्टेयर
निष्कर्ष : अरवी की वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित खाद-उर्वरक, समय पर सिंचाई और रोग-कीट प्रबंधन से यह फसल सुरक्षित व लाभकारी बनती है। सही तकनीक के साथ अरवी नकदी फसल के रूप में किसानों की आय बढ़ाने वाली अच्छी फसल है। बस जरूरत है सही जानकारी को अपनाने और समय पर कार्य करने की।

