भिण्डी बीजोत्पादन: कम लागत में अधिक मुनाफ़ा बढ़ाने का जरिया
भिण्डी का गुणवत्तायुक्त बीजोत्पादन से किसानों की आय दोगुना करने की प्रभावी तकनीक
डा. जितेन्द्र सिंह
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भिण्डी देश की प्रमुख सब्जी फसलों में शुमार है जिसकी खेती खरीफ] रबी और जायद तीनों मौसमों में सफलतापूर्वक की जाती है। विशेष रूप से ग्रीष्मकालीन सब्जी उत्पादन में भिण्डी का स्थान एक अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। देश के लगभग सभी राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होने के कारण हर वर्ष बड़ी मात्रा में स्वस्थ एवं गुणवत्तायुक्त बीज की आवश्यकता पडती है।
इसके बावजूद बाजार में विश्वसनीय और प्रमाणित भिण्डी बीज की उपलब्धता किसानों के लिए आज भी एक बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि भिण्डी बीजोत्पादन किसानों के लिए एक लाभकारी और सुरक्षित व्यावसायिक विकल्प के रूप में उभर रहा है। यदि किसान वैज्ञानिक विधियों, तकनीकी पहलुओं और उचित सावधानियों को अपनाते हुए बीज उत्पादन करें] तो वे न केवल अपनी बीज की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं बल्कि बाजार में बीज की बिक्री कर अच्छी खासी अतिरिक्त आमदनी का जरिया भी बढ़ा सकते हैं।
मिट्टी का चयन :
भिण्डी की खेती सभी तरह की भूमियों में की जा सकती है। लेकिन अधिक उत्पादन के लिए जीवांश युक्त व अच्छे जल निकास वाली दोमट व बलुई दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। मिट्टी का पी. एच. मान 6 से 6-8 तक होना अच्छा माना जाता है। बीजोत्पादन के लिए ऐसे खेत का चयन करें जिसमें पिछले कम से कम दो वर्षो से भिण्डी की फसल न ली गई हो।
खेत की तैयारी :
खेत की जुताई से पूर्व 250 कुन्तल प्रति हैक्टेयर की दर से गोबर की खाद प्रयोग अवश्य करें। खेत की एक गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से करने के बाद 2 – 3 बार हैरो व कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। बाद में पाटा चलाकर खेत को समतल भी कर ले।
बीज :
स्वस्थ और गुणवत्तायुक्त बीजोत्पादन के लिए हमेशा किसी विश्वसनीय संस्था या प्रमाणीकरण संस्था से जनक या आधारीय बीज क्रय करना चाहिए। सामान्यतः एक हेक्टेयर खेत की बुआई के लिए 10 से 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है।
उन्नतशील किस्में :
बाजार में जिन किस्मों के भिण्ड़ी के बीज की अधिक माग हो] उन्हीं किस्मों का बीजोत्पादन करना चाहिए।
परभनी क्रान्ति :
यह भिण्ड़ी की अधिक उपज देने वाली एक लोकप्रिय किस्म है। बुआई के 40-45 दिन में पौधों में फूल आ जाते हैं। यह किस्म बुआई लगभग 55 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इस किस्म पर विषाणु रोग का प्रकोप कम होता है। गर्मी में 80-90 कुन्तल व बरसात में 110-120 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उपज होती है।
पूसा सावनी :
भिण्ड़ी की यह एक बहुत ही लोकप्रिय किस्म है। इस किस्म को दोनों मौंसम में उगाया जा सकता है। यह किस्म गर्मी में बुआई के 40-45 दिन बाद व बरसात में 60-65 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इस किस्म की पैदावार 100 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है। इस पर मोजैक बीमारी का आक्रमण कम होता है।
आई.आई.वी.आर-10
इस किस्म में बुआई के 42 दिन में पौधों में फूल आ जाते हैं। यह किस्म पित्त शिरा मोजैक और पत्ती मोड़ विषाणु रोग से परी तरह मुक्त है। बरसात में इस किस्म की पैदावार 140 कुन्तल से अधिक होती है।
डी.वी.आर – 2
यह विषाणु रोग के प्रति पूर्णतः अवरोधी किस्म है। इसके फल लम्बे और हरे रंग के होते हैं। पूर्वी उ. प्र. विशेष कर वाराणसी क्षेत्र में 220 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उपज देेती है। इन प्रजातियों के अतिरिक्त पूसा मखमली] पंजाब पदमिनी] पंजाब-7] सेलेक्शन-1] सेलेक्शन-2] कोयम्बटूर-1] पैडरा] कल्यानपुर-1] 2] 3] 4 वी.आर.ओ-5] 6 आदि भिण्डी की अधिक उपज देने वाली किस्में हैं।

पृथ्थकरण :
भिण्डी में काफी मात्रा में लगभग 4-19 प्रतिशत पर-परागण होता है। इसलिए भिण्डी की दो प्रजातियों की बीच की दूरी प्रमाणित बीज के लिए 200 मीटर और आधारीय बीज के लिए 400 मीटर की दूरी रखनी चाहिए।
अवांछनीय पौधों को निकालना :
सफल बीजोत्पादन के लिए फसल का तीन बार निरीक्षण कराना पड़ता है। प्रथम- फूल आने से पूर्व, व्दितीय- फूल आने और फल लगते समय, तृतीय- फसल पकने के समय। फसल निरीक्षण के दौरान अवांछनीय पौधे जैसे- खरपतवार, रोगग्रस्त पोधे एवं अन्य प्रजातियों के पौधों को निकाला जाता है। इस क्रिया को रोगिंग कहतें है। इससे बीज की आंनुवांशिक शुद्धता बनी रहती है। अवांछनीय पौधों की पहचान पत्तियों, फूलों, पौधों की उचाई, पत्तियों के रोए, फलियों के आकार में अन्तर के आधार पर रोगिंग क्रिया की जा सकती है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन :
भूमि में उचित मात्रा में पोषक तत्वों को उपलब्ध कराना चाहिए। खाद एवं उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाॅच के अनुसार करें। जाॅच न हो पाने की दशा में 250 से 300 कुन्तल गोबर की सडी खाद प्रति हेक्टेयर बुआई के 15 दिन पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला दे। रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 100 किग्रा., फास्फोरस 50 किग्रा. एवं पोटाश 50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को बुआई के 60 दिन बाद खड़ी फसल में टापड्र्रेसिंग करना चाहिए।
बीज की मात्रा :
बीज की मात्रा बोने की विधि, बीज की गुणवत्ता एवं मौंसम पर निर्भर करती है। सामान्यतः गर्मी की फसल को 18 से 20 व वर्षा कालीन फसल को 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की बुआई करनी चाहिए।
बीजोपचार :
भिण्डी के बीज का बाहरी आवरण सख्त होता है। इसलिए अच्छी तरह अंकुरण के लिए बीज को बुआई से पूर्व 24 घंटे पानी में भिगोने के बाद पानी से निकाल लेना चाहिए और जब बीज थोड़ा सूख जाय तो थीरम या सेरेसन नामक रसायन से 3 ग्राम दवा/किग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीज को छाया में सुखा कर बोने के प्रयोग में लाना चाहिए।
बोने का समय :
उत्तर भारत में गर्मी में भिण्डी की बुआई फरवरी से मार्च तथा पूर्वी भारत में जनवरी से फरवरी माह में की जाती है। वर्षा कालीन फसल की बुआई जून से जुलाई माह में की जाती है। बीजोत्पादन के लिए जुलाई माह में फसल की बुआई करना सर्वाेत्तम रहता है।
बोने की विधि :
भिण्डी की फसल की बुआई दो तरह से मेड़ों पर और समतल खेत में की जाती है। गर्मी की फसल को समतल खेत में छोटी – छोटी क्यारियां बनाकर 30 सेमी. पंक्ति से पंक्ति और 15 सेमी. पौध से पौध की दूरी पर करनी चाहिए। वर्षा कालीन फसल के लिए पंक्तियों और पौधों की दूरी क्रमशः 45 गुणा 30 सेमी. पर करना चाहिए। बीज की बुआई 2 से 2.5 सेमी. की गहराई पर करते हैं। अधिक क्षेत्रफल में बुआई करने के लिए सीड ड्रिल का प्रयोग कर सकते हैं।
सिंचाई :
भिण्डी की गर्मी की फसल को निरन्तर सिंचाई की आवश्यकता होती है। वर्षा कालीन फसल की सिंचाई वर्षा पर निर्भर करती हे। गर्मी के मौंसम में बुआई करते समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। भिण्डी की पहली हल्की सिंचाई अंकुरण के तुरन्त बाद करनी चाहिए। इसके बाद 5 से 6 दिन के अन्तर पर सिंचाई करने की आवश्यकता होती है।

खरपतवार नियंत्रण :
भिण्डी की फसल को खरपतवारों से बहुत हानि होती है। शोधों से पता चला है कि खरपतवारों से 20 से 60 प्रतिशत उपज में कमी आ जाती है। खेत को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए समय-समय पर निकाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। निकाई-गुड़ाई के समय पौधों में मिट्टी चढ़ाने का कार्य भी कर देना चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवारों के नियंत्रण के लिए वासालीन नामक दवा की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर बुआई से पूर्व छिड़काव करना चाहिए।
फसल सुरक्षा :
भिण्डी की फसल को कीड़े और बीमारियों से बहुत नुकसान पहुॅचता है। अतः अधिक उत्पादन लेने के लिए समय से फसल की सुरक्षा करना बहुत आवश्यक होता है। भिण्डी का तना एवं फल छेदक एक बहुत ही नुकसान पहुॅचाने वाला कीट है। शुरू में यह कीट पौधे के शीर्ष तने में घुस कर खाना शुरू कर देता है। जिससे पौधा मुरझा कर गिर जाता है। इसके नियंत्रण के लिए इन्डोसल्फान 35 ई.सी. या मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. के 0-05 सक्रिय घोल को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। जैसिड पत्तियों का रस चूसने वाला एक कीट है। इस कीट से प्रभावित पौधे की पत्तियां पीली पड़कर उपर की ओर मुड़ जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. दवा की 1 लीटर मात्रा को लगभग 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। पीत शिरा मोजैक भिण्डी की सबसे हानिकारक बीमारी है। यह बीमारी विषाणु व्दारा फैलती है। इस बीमारी से प्रभावित पौधों की पत्तियां और फल पीले पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगी पौधों को खेत से उखाड़ कर जला दें। फसल को खरपतवारों से मुक्त रखे। पौधों पर 0-15 प्रतिशत मैलाथियान 50 ई. सी. का छिड़काव करें।

कटाई और मड़ाई :
भिण्डी की फलियों की तुड़ाई बोई गई प्रजातियों पर निर्भर करता है। जब फलियां सूखकर कड़ी हो जाय और रंग भूरा पड़ जाय तो तुड़ाई कर फलियों को 2 से 3 दिनों तक धूप में सूखाने के बाद मड़ाई कर बीज निकालने का काम करें। इसके बाद बीज को तब तक सुखाए जबतक दात से बीज काटने पर कट की आवाज न आ जाय। अच्छी तरह सूखे बीजों को डिब्बों या कपड़े के थैलों में भर कर भण्डारण करना चाहिए। भण्डारण के समय बीजों में 10 से 12 प्रतिशत से अधिक नमी नही होनी चाहिए।
उत्पादन :
आधुनिक तरीके से भिण्डी का बीजोत्पादन करने से 12-15 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक अच्छे गुणवत्ता का बीज प्राप्त हो जाता है।
भिण्डी बीजोत्पादन की फसल अर्थिकी (1 हेक्टेयर)
अनुमानित लागत (Cost of Cultivation)
| क्र. | मद | अनुमानित लागत (₹/हे.) |
| 1. | खेत की तैयारी (जुताई, पाटा आदि) | 6,000 |
| 2. | प्रमाणित आधार बीज (8–10 किग्रा) | 6,000 |
| 3. | बुवाई व दूरी प्रबंधन | 2,000 |
| 4. | गोबर की खाद / कम्पोस्ट | 7,000 |
| 5. | रासायनिक उर्वरक (NPK आदि) | 5,000 |
| 6. | निराई-गुड़ाई (2–3 बार) | 8,000 |
| 7. | सिंचाई (डीजल/बिजली सहित) | 6,000 |
| 8. | कीट-रोग नियंत्रण | 7,000 |
| 9. | रोगग्रस्त पौधों की निकासी (Roguing) | 3,000 |
| 10. | तुड़ाई, सुखाना, मड़ाई | 10,000 |
| 11. | बीज सफाई, ग्रेडिंग, पैकिंग | 6,000 |
| 12. | अन्य/अप्रत्याशित खर्च | 4,000 |
| कुल लागत | ₹80,000 (लगभग) |
उत्पादन व आय (Yield & Income)
- औसत बीज उपज : 12–15 क्विंटल/हेक्टेयर
- औसत विक्रय मूल्य : ₹200–300 प्रति किग्रा
(किस्म, गुणवत्ता व बाजार पर निर्भर)
औसत गणना (सुरक्षित अनुमान)
- बीज उत्पादन = 12 – 15 क्विंटल (1200 किग्रा)
- मूल्य = ₹250/किग्रा
कुल सकल आय = 1200 × 250 = ₹3,00000
शुद्ध लाभ (Net Profit)
- कुल आय : ₹3,00000
- कुल लागत : ₹80,000
शुद्ध लाभ = ₹2,20000 प्रति हेक्टेयर
लाभ-लागत अनुपात (B:C Ratio)
1 : 2.18
(अर्थात हर 1 रुपये के खर्च पर ₹2.18 की वापसी)
निष्कर्ष :
भिण्डी का बीजोत्पादन सीमित लागत में अधिक मुनाफा देने वाली एक भरोसेमंद कृषि-व्यवसाय गतिविधि है। वैज्ञानिक विधि, शुद्धता बनाए रखने और सही बाजार से जुड़ाव होने पर किसान सामान्य सब्जी उत्पादन की तुलना में लगभग दोगुना लाभ कमा सकते हैं।

