1

कृषि के लाभकारी पक्षी : Beneficial Birds of Farming

जानें खेती में लाभकारी पक्षियों का महत्व और फायदे । ये कैसे कीट नियंत्रण, परागण और चूहा नियंत्रण कर फसल की रक्षा कर उत्पादन बढ़ाते हैं— शोध आधरित पूरी वैज्ञानिक जानकारी।

गावों, खेतों और खलिहानों में चहचहाते ये पक्षी केवल वातावरण को सुंदर और मधुर नहीं बनाते, बल्कि फसलों की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाते हैं। कोई फसल को कीटों से बचाता  है, तो कोई चूहों का नियंत्रण करता है, कुछ फूलों के परागण में मदद करते हैं, तो कुछ बीज फैलाकर जैव विविधता को बढ़ाने का काम करते हैं। दरअसलए ये पक्षी फसलों के लिए सुरक्षाकवच का काम करते हैं, जो दिन.रात बिना रुके  थके  निःशुल्क किसान के लिए काम करते हैं। यदि खेतों में इनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जाएए तो ये न सिर्फ कीटनाशकों की जरूरत को कम कर सकते हैंए बल्कि फसल की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अब समय आ गया है कि किसान इन पक्षियों को सिर्फ देखने भर तक सीमित न रखेंए बल्कि इन्हें अपनी खेती – किसानी का हिस्सा भी बनाएं। तो आइए जानते हैंकृकृषि के ऐसे ही लाभकारी पक्षियों के बारे में जो खेती में महती महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन पक्षियों को कृषि में उनके योगदान के आधार पर बाटकर उनके महत्व को समझ सकते हैं।

1.         कीट खाने वाले पक्षी –  Insectivorous Birds  

2.         चूहे और छोटे जानवर खाने वाले पक्षी – Predatory Birds

3.         परागण में मदद करने वाले पक्षी –  Pollinator Birds

4.         बीज फैलाने वाले पक्षी – Seed Dispersers

5.         खेत साफ रखने वाले पक्षी – Scavenger Birds

6.         जलयुक्त खेतों के लाभकारी पक्षी – Wetland Birds

1. कीट खाने वाले पक्षी  Insectivorous Birds  

गौरैया: Passer domesticus  यह गौरैया देश के पारंपरिक कृषि प्रणाली का एक अहम हिस्सा रही है। हाल के वर्षों में इसकी संख्या में तेसी से कमी आई है, लेकिन वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि यह छोटी-सी चिड़िया किसानों के लिए प्राकृतिक कीट नियंत्रक (biological pest controll½ के रूप में बेहद उपयोगी है। गौरैया के बच्चों का पोषण मुख्यतः कीटों पर निर्भर होता हैं। एक जोड़ा गौरैया अपने बच्चों को पालने के दौरान हजारों कीट caterpillars, aphids beetles  खिलाकर नष्ट करते हैं।  खासकर फसल के शुरुआती चरण में ये कीट सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं, जिन्हें गौरैया नियंत्रित करती है। इससे कीटनाशकों की जरूरत घटती है और फसल सुरक्षित रहती है। गौरैया टिड्डी, इल्ली, सुंडी और पत्ती खाने वाले कीट खाकर फसल को बचाती है। यह विशेष रूप से गेहूं, धान, दलहनी और सब्जियों की फसल के लिए बहुत लाभकारी है। रिसर्च बताती है कि जिन क्षेत्रों में पक्षियों की उपस्थिति ज्यादा होती है, वहां कीट प्रकोप कम और उत्पादन बेहतर पाया गया है। गौरैया खेतों में फूड चेन (Healthy agro-ecosystem indicator)  का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी मौजूदगी को स्वस्थ ंहतव.मबवेलेजमउ का पदकपबंजवत माना जाता है। इसलिए, गौरैया का संरक्षण को बढ़ावा देना सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि किसान की उपज और आय बढ़ाने का भी एक प्रभावी तरीका है।

मैना :  ¼Acridotheres tristis½ यह गावों और खेतों में आसानी से दिखने वाला आम पक्षी है, लेकिन इसका योगदान अक्सर कम आंका जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों और कृषि के जानकारों से पता चलता है कि मैना प्राकृतिक कीट नियंत्रण में बेहद प्रभावी भूमिका निभाती है। विभिन्न शोध संस्थानों जैसे FAO और BNHS के अनुसार मैना दीमक, टिड्डे , सुंडी, भृंग जैसे हानिकारक कीटों को बड़े पैमाने पर खाती है। खेत की जुताई या सिंचाई के समय ये पक्षी सक्रिय होकर मिट्टी से निकलने वाले कीटों को तुरंत पकड़ लेते हैं। एक वयस्क मैना रोजाना काफी संख्या में कीट खाकर कीड़ों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद करती है। इससे फसल पर कीटों का दबाव कम होता है और कीटनाशी दवाओं की जरूरत में कमी आती है। मैना विशेष रूप से धान, गेहूं, गन्ना और सब्जी फसलों में कीटों की रोकथाम में मदद करती है। शोध बताते हैं कि शुरुआती फसल अवस्था में यह कीटों को खाकर पौधों को बचाती है। जहां मैना और अन्य कीटभक्षी पक्षियों की संख्या अधिक होती है, वहां फसल क्षति कम और उत्पादन बेहतर होता है। यह एक सर्वाहारी पक्षी है, जो कीटों के साथ-साथ फल और बीज भी खाती है। मैना कभी-कभी पके फलों और अनाज को थोड़ा नुकसान भी पहुंचा सकती है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इसका कुल लाभ नुकसान से कहीं अधिक पाया गया है, खासकर कीट नियंत्रण में। इसकी उपस्थिति को स्वस्थ कृषि पारिस्थितिकी का संकेत माना जाता है। आधुनिक खेती में रासायनिक कीटनाशकों के अधिक उपयोग से कीटभक्षी पक्षियों की संख्या प्रभावित हो रही है। इससे प्राकृतिक कीट नियंत्रण की डोर कमजोर पड़ता है

4

ड्रोंगो : इसे “किसान का सच्चा मित्र” कहा जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में यह एक अत्यंत प्रभावी प्राकृतिक कीट नियंत्रक के रूप में पहचाना गया है। शोध बताते है कि यह पक्षी हवा में उड़ते हुए कीटों जैसे टिड्डे, पतंगे, भृंग और अन्य फसल के हानिकारक कीट को तेजी से खाकर उनकी संख्या को नियंत्रित करता है। खास बात यह है कि ड्रोंगो अक्सर खेत की जुताई के समय  बैलों या ट्रैक्टर के आसपास मंडराता है। जुताई के दौरान मिट्टी से बाहर आने वाले कीटों को तुरंत खा लेता है। इससे फसल के शुरुआती चरण में होने वाला नुकसान काफी कम हो जाता है। कई फील्ड स्टडीज बताती है कि जिन खेतों में ड्रोंगो की उपस्थिति अधिक होती है, वहां कीट प्रकोप कम होता है। ड्रोंगो न केवल कीटनाशकों पर निर्भरता को कम करता है, बल्कि कम लागत वाली प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बुलबुल :  ¼Pycnonotus spp½ यह पंक्षी कृषि पारिस्थितिकी में एक महत्वपूर्ण कीट नियंत्रक और बीज प्रसारक के रूप में जानी जाती है। विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि बुलबुल फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीडों जैसे इल्ली, एफिड्स और छोटे भृंग को खाकर उनकी आबादी को नियंत्रित करती है, जिससे खेती में कीटनाशकों का प्रयोग कम होता है। इसमें एक विशेष गुण और होता है। यह जंगली और बागवानी पौधों के फलों को खाकर उनके बीजों का प्रसार करती है। इससे गांवों और खेतों के आसपास जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन मजबूत होता है। हालांकि कुछ स्थितियों में यह पके फलों को खाकर हल्का नुकसान भी पहुंचा सकती है, लेकिन शोध दर्शाते हैं कि कुल मिलाकर इसका योगदान फसल सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन के लिए अधिक लाभकारी है।

वुडपेकर : (Picidae) यह पेड़ों पर रहने वाला ऐसा पक्षी है, जो खेती के साथ बागवानी फसलों में बखूबी कीट नियंत्रक का काम करता है। इस पर हुए शोधों से पता चलता है कि वुडपेकर पेड़ों की छाल और तनों में छिपे हानिकारक कीटों जैसे लकड़ी खाने वाले लार्वा, भृंग और दीमक को निकालकर खा जाता है, जो आम, नीम, नारियल और अन्य फलदार पेड़ों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। यह विशेष रूप से बागवानी की फसलों में बहुत उपयोगी साबति होता है। यह कीटों को जड़ से खत्म करके पेड़ों को स्वस्थ बनाए रखने का काम बखूबी करता है। शोध बताते हैं कि जहां वुडपेकर की उपस्थिति होती है, वहां पेड़ों में कीट संक्रमण दर बहुत कम होती है। इस तरह, वुडपेकर रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटाने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में एक प्रभावी भूमिका निभाता है।

कोयल : (Cuckoo) यह सिर्फ अपनी मधुर आवाज के लिए ही नही जानी जाती, बल्कि यह एक कीट नियंत्रक और बीज प्रसारक के रूप में भी जानी जाती है। इस पर हुए अध्ययन बताते है कि कोयल मुख्य रूप से पेड़ों और फसलों पर पाए जाने वाले हानिकारक कीटों जैसे इल्ली, भृंग और अन्य पत्ती-खाने वाले कीटों को खाकर उनकी संख्या को नियंत्रित करती है। जिससे फसल पर लगने वाले कीडों से नुकसान कम होता है। इसके अलावा, यह विभिन्न जंगली और फलदार पौधों के फल खाकर उनके बीजों को दूर-दूर तक फैलाने का भी काम करती है। इससे जैव विविधता के विस्तार में बहुत मदद मिलती है। हालांकि कोयल सीधे तौर पर खेत में ज्यादा समय नहीं बिताती, लेकिन आसपास के पेड़ों और बागानों में इसकी सक्रियता खेती-किसानी के लिए बहुत लाभकारी होती है। कोयल प्राकृति के संतुलन को बनाए रखने में एक आदर्श पक्षी मानी जाती है।

नीलकंठ : (Indian Roller) हमारे देश में इस पक्षी को देखना शुभ माना जाता है। जंगलों और खेतों में व्यापक रूप से पाया जाने वाला पक्षी है, जो एक प्रभावी तरीके से कीट नियंत्रण का काम करता है। नीलकंठ फसलों में लगने वाले टिड्डे, भृंग, दीमक, सुंडी और अन्य हानिकारक कीटों को खाकर इनकी रोकथाम करता है। यह अक्सर खुले खेतों, बिजली के तारों या पेड़ों पर बैठकर शिकार पर पैनी नजर रखता है और तेजी से नीचे आकर कीटों का शिकार करता है। खासकर जुताई के समय जब कीट सतह पर आ जाते हैं तो उन्हें पंभावी तरीके से नियंत्रित करता है। फील्ड स्टडीज बताती है कि जहां नीलकंठ की उपस्थिति अधिक होती है, वहां कीट प्रकोप कम और किसान की फसल बेहतर रहती है। इस तरह नीलकंठ पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पपीहा :  (Common Hawk) पूरे कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक उपयोगी पक्षी है। यह पेड़ों और बागवानी फसलों में बखूबी कीट नियंत्रण का काम करता है।  विभिन्न अध्ययनों के अनुसार पपीहा मुख्य रूप से इल्ली , पत्ती-खाने वाले कीट और अन्य हानिकारक कीटों को खाता है, जो आम, नीम, अमरूद जैसे पेड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह पक्षी पेड़ों की ऊंचाई पर सक्रिय रहकर उन कीटों को नियंत्रित करता है जो अक्सर किसानों की नजर से छिपे रहते हैं। शोध बताते हैं कि जहां ऐसे कीटभक्षी पक्षियों की उपस्थिति होती है, वहां बागवानी फसलों में कीट प्रकोप कम और पौधों की सेहत बेहतर रहती है। इस प्रकार, पपीहा प्राकृतिक तरीके से कीट नियंत्रण कर रासायनिक दवाओं की जरूरत को कम कर टिकाऊ कृषि प्रणाली को मजबूत बनाने में योगदान देता है।

5

2. चूहे और छोटे जानवर खाने वाले पक्षी Predatory Birds

उल्लू : (Owl)  विशेष रूप से बार्न आउल (ज्लजव ंसइं), कृषि में प्राकृतिक रूप से चूहा नियंत्रण का प्रभावी तरीके से काम करता है। कई शोधों के निष्कर्ष के अनुसार एक वयस्क उल्लू एक रात में कई चूहे खा सकता है। प्रजनन काल में एक जोड़ा उल्लू सैकड़ों चूहों को खत्म कर देता है। चूहे फसलों को जड़ से नुकसान पहुंचाते हैं और भंडारण में भी भारी हानि करते हैं, ऐसे में उल्लू उनकी संख्या को नियंत्रित करके सीधे तौर पर उत्पादन और भंडारण सुरक्षा दोनों में मदद करता है। कई फील्ड स्टडीज में यह पाया गया है कि जिन खेतों या गोदामों के आसपास उल्लू की उपस्थिति होती है, वहां चूहों से होने वाला नुकसान काफी कम होता है। एक प्रकार से उल्लू रासायनिक जहर के उपयोग को घटाकर किसानों के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा भी करता है।

चील : (Eagle) पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक सफाईकर्मी और शिकारी पक्षी के रूप में जानी जाती है, जो खेतों में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार चील मृत जीवों, छोटे चूहों, कीटों और अन्य हानिकारक जीवों को खाकर खेतों को साफ रखने का कार्य करती है। इससे रोगों के फैलने का खतरा कम होता है। यह अप्रत्यक्ष रूप से कीट और कृंतक आबादी को नियंत्रित कर फसलों की सुरक्षा प्रदान करती है। शोध बताते हैं कि जहां चील की उपस्थिति से खेतों और उसके आसपास के क्षेत्रों में जैविक कचरा जल्दी समाप्त होता है जिससे संक्रमण का जोखिम कम होता है। इस तरह से चील खेती को स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

बाज : (Eagle) एक शिकारी पक्षी के रूप में जाना जाता है। यह खेत-खलिहानों में हानिकारक जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बाज मुख्य रूप से चूहे, छिपकलियां और छोटे पक्षियों का शिकार करता है, जिनमें कई ऐसे जीव शामिल होते हैं जो फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। विशेष रूप से चूहों पर इसका नियंत्रण किसानों के लिए बेहद लाभकारी साबित होता है। फील्ड स्टडीज बताती है कि जहां बाज जैसे शिकारी पक्षियों की उपस्थिति होती है, वहां चूहों की संख्या कम और नियंत्रित रहती है।

बार्न आउल : (Owl) यह खेती में एक अत्यंत प्रभावशाली चूहा नियंत्रक के रूप में कार्य करता है।  यह पक्षी मुख्य रूप से चूहों और अन्य छोटे कृंतकों का शिकार करता है, जो फसलों और भंडारण दोनों में भारी नुकसान पहुंचाते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि एक वयस्क बार्न आउल एक रात में कई चूहे खा सकता है। जबकि प्रजनन काल में एक जोड़ा सैकड़ों चूहों को समाप्त कर सकता है। कई देशों में खेतों और गोदामों के पास नेस्ट बॉक्स लगाकर बार्न आउल को आकर्षित किया जाता है, जिससे चूहों की आबादी को प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित की जा सके। इस प्रकार बार्न आउल खेती में रासायनिक दवाओं/जहरों के इस्तेमाल को काफी हद तक कम करता है।

स्पॉटेड आउलेट : यह ग्रामीण परिदृश्य में आमतौर पर पाया जाने वाला एक छोटा उल्लू है, जो कृषि में प्रभावी तरीके से कीट एवं चूहों के नियंत्रण  में मदद करता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यह पक्षी रात के समय सक्रिय होकर चूहे, छोटे कीट, भृंग, टिड्डे और अन्य हानिकारक जीवों का शिकार करता है, जिससे फसलों और भंडारण के समय होने वाला नुकसान से बचाता है। इसकी शिकार करने की क्षमता और खेतों के आसपास रहने की आदत इसे किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाती है। फील्ड स्टडीज में पाया गया है कि जहां स्पॉटेड आउलेट की उपस्थिति होती है, वहां चूहों और कीटों की संख्या नियंत्रित रहती है। इस तरह से यह पक्षी रासायनिक दवाओं और कीटनाशकों के उपयोग को कम आर्थिक नुकसान से बचाता है। 

3. परागण में मदद करने वाले पक्षी  – Pollinator Birds

सनबर्ड : यह खेती और बागवानी की फसलों में एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक परागणकर्ता के रूप में जानी जाती है। शोध बताते है कि सनबर्ड फूलों का रस पीते समय एक पौधे से दूसरे पौधे तक पराग पहुंचाती है। इससे परागण प्रक्रिया बेहतर होने से फल और बीज बनने की दर बढ़ती है। यह विशेष रूप से सब्जियों, फलों और बागवानी फसलों में उत्पादन बढ़ाने में मददगार होती है। इसके अलावा, सनबर्ड छोटे कीट भी खाती है, जिससे हल्का कीट नियंत्रण भी होता है। शोध बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक परागणकर्ता पक्षियों की संख्या अधिक होती है, वहां फसल की गुणवत्तायुक्त पैदावार होती हैं। यह छोटी चिड़िया खेती और जैव विविधता में बड़ी भूमिका निभाती है।

हमिंगबर्ड : विश्व के कई हिस्सों में अत्यंत प्रभावी प्राकृतिक परागणकर्ता के रूप में जानी जाती है। हालांकि यह हमारे देश में प्राकृतिक रूप से नहीं पाई जाती। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोधों और संस्थानों जैसे थ्।व् के अनुसार हमिंगबर्ड फूलों का रस पीते समय पराग को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुंचाती है, जिससे परागण की क्षमता बढ़ती है। इससे फल-बीज बनने की प्रक्रिया मजबूत होती है। खासकर ट्यूबलर/नलीनुमा फूलों वाली फसलों और पौधों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके अलावा, ये छोटे-छोटे कीटों को खाकर कीट नियंत्रण में भी मदद करती है।

4. बीज फैलाने वाले पक्षी  – Seed Dispersers

तोता : (Parrot)  यह  एक अच्छा बीज प्रसारक और आंशिक रूप से कीट नियंत्रण में मदद करता है। तोता जंगली और बागवानी पौधों के फलो को खाकर उनके बीजों को दूर-दूर तक फैलाता है, जिससे जैव विविधता का नैसर्गिक रूप से विस्तार होता है। यह कुछ कीटों को भी खाता है, जिससे थोडी कीट नियंत्रण में भी मदद मिलती है। हालांकि, यह पके फलों, मक्का, बाजरा और सूरजमुखी जैसी फसलों को नुकसान भी पहुंचाता है। फिर भी शोध बताते हैं कि संतुलित पारिस्थितिकी में तोते का योगदान पर्यावरणीय स्थिरता और पौधों के प्रसार के लिए महत्वपूर्ण है।

कबूतर : Pigeon)  कृषि पारिस्थितिकी में मुख्यतः एक बीज प्रसारक और पोषक-चक्र (nutrient cycling) में योगदान देने वाला पक्षी है। कबूतर विभिन्न पौधों के बीजों को खाकर उन्हें अन्य स्थानों पर फैलाते हैं। इनके मल (dropping) में पोषक तत्व होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को आंशिक रूप से बढ़ा सकते हैं। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि कबूतर अनाज और बीजों को खाकर कुछ हद तक फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं, विशेषकर भंडारण और बुवाई के समय। फिर भी, संतुलित पारिस्थितिकी में इनकी भूमिका पर्यावरणीय स्थिरता और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। खेती के लिए यह एक आंशिक रूप से लाभकारी पक्षी हैं।

3

हॉर्नबिल : ¼Bucerotidae) हॉर्नबिल को उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण बीज प्रसारक  और पारिस्थितिकी तंत्र का इंजीनियर माना जाता है।  अध्ययनों से पता चला है कि हॉर्नबिल बड़े फलों को खाकर उनके बीजों को लंबी दूरी तक फैलाने का काम करता है। पक्षी की इस गतिविधि से जंगलों और खेतों के आसपास जैव विविधता  और प्राकृतिक रूप् से वनस्पतियों का विस्तार होता है। यह प्रक्रिया मिट्टी की उर्वरता, नमी संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत बनाती है, जो  दीर्घकालिक से कृषि उत्पादन के लिए बहुत लाभकारी साबित होता है। इसके अलावा, हॉर्नबिल कुछ कीटों को भी खाता है, जिससे कुछ हद तक कीट नियंत्रण में मदद मिलती है। शोध बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में हॉर्नबिल की उपस्थिति होती है, वहां वनस्पति पुनर्जनन प्रक्रिया बेहतर बनती है। इस तरह, हॉर्नबिल सीधे फसलों पर कार्य न करते हुए भी एक स्वस्थ और टिकाऊ कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

मैना :  (Myna) मैना पूरे कृषि तंत्र में एक प्रभावी कीट नियंत्रक का कार्य करती है। यह दीमक, टिड्डे, सुंडी और भृंग जैसे फसल-हानिकारक कीटों को बड़ी मात्रा में खाकर खेतों में कीटों के प्रकोप को कम करती है। यह अक्सर जुताई या सिंचाई के समय खेतों में सक्रिय होकर मिट्टी से निकलने वाले कीटों को तुरंत पकड़ती है। इससे फसल को शुरुआती चरण में सुरक्षा मिलती है। हालांकि यह कुछ स्थितियों में पके फलों को नुकसान भी पहुंचा सकती है, लेकिन शोध बताते हैं कि इसका कुल योगदान कीट नियंत्रण और कृषि पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में अधिक लाभकारी है, जो प्राकृतिक खेती को मजबूती प्रदान करती है।

5 . खेत साफ रखने वाले पक्षी Scavenger Birds

गिद्ध :  (Vulture) गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नैसर्गिक सफाईकर्मी (cavenge) रूप से कार्य करता है। यह पर्यावरण और खेती दोनों की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। शोधों के अनुसार गिद्ध मृत पशुओं के अवशेषों को तेजी से खाकर वातावरण को साफ रखते हैं, जिससे खेतों और गांवों के आसपास रोगजनक जीवाणुओं के फैलने का खतरा काफी कम हो जाता है। यह विशेष रूप से एंथ्रेक्स, रैबीज और अन्य संक्रामक बीमारियों के प्रसार को रोकने में अप्रत्यक्ष रूप से मदद करते हैं, जो पशुधन और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरनाक हो सकती हैं। शोध बताते हैं कि जहां गिद्धों की संख्या में कमी आई है, वहां मृत पशुओं के सड़ने से आवारा कुत्तों और चूहों की संख्या बढ़ने से रोग फैलने का खतरा भी बढ़ा है। गिद्ध एक प्राकृतिक बायो-सैनिटेशन सिस्टम की तरह कार्य करते हैं। हालांकि गिद्ध सीधे फसलों पर काम नहीं करते, लेकिन उनकी मौजूदगी खेतों के आसपास के वातावरण को स्वच्छ और सुरक्षित बनाकर खेती को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाती है। इसलिए गिद्धों का संरक्षण प्राकृतिक खेती और ग्रामीण स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

कौआ : (Crows) यह कृषि पारिस्थितिकी में एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक सफाईकर्मी और सर्वाहारी पक्षी के रूप में जाना जाता है, जो खेतों के आसपास स्वच्छता और जैव संतुलन बनाए रखने में योगदान देता है। कौआ मृत जीवों, कचरे, कीटों और छोटे जीवों को खाकर वातावरण को साफ रखने में मदद करता है, जिससे रोगजनक जीवों के फैलाव का खतरा कम होता है। यह खेतों में मौजूद टिड्डे, सुंडी, भृंग जैसे कीटों को खाकर कीट नियंत्रण में भी योगदान देता है। हालांकि, कौआ कुछ परिस्थितियों में बीज, अंकुरित पौधों और पके फलों को खाकर नुकसान भी पहुंचा सकता है। लेकिन शोध बताते हैं कि इसका कुल प्रभाव पर्यावरणीय सफाई और जैव संतुलन बनाए रखने में अधिक होता है। यह खेतों के आसपास जैविक अपशिष्ट को तेजी से समाप्त कर “प्राकृतिक सफाई प्रणाली” की तरह कार्य करता है।

6 . जलयुक्त खेतों के लाभकारी पक्षी (Wetland Birds खासकर धान के खेत)

बगुला : (Herons) विशेष रूप से कैटल एगरेट, कृषि पारिस्थितिकी में एक प्रभावी प्राकृतिक कीट नियंत्रक के रूप में जाना जाता है। यह पक्षी खेतों में जुताई या पशुओं जैसे गाय-भैंस के आसपास सक्रिय रहकर टिड्डे, दीमक, सुंडी, घासफूस के कीट और अन्य छोटे जीवों को बड़ी मात्रा में खाता है। खासकर धान, गेहूं और सब्जी फसलों में यह कीटों की संख्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फील्ड स्टडीज में पाया गया है कि जहां बगुलों की उपस्थिति अधिक होती है, वहां कीट प्रकोप कम और फसल की स्थिति बेहतर रहती है। इसके अलावा, यह जलयुक्त खेतों जैसे- धान के खेत में मेंढक, छोटी मछलियां और कीट खाकर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखता है। इस प्रकार बगुला खेती में रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता कमकर पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण निभाता है।

सरस : (Cranes) भारतीय कृषि परिदृश्य, विशेषकर धान और जलयुक्त खेतों में यह महत्वपूर्ण कीट एवं जीव नियंत्रक के रूप में जाना जाता है। सारस कीड़ों, टिड्डों, मेंढकों, घोंघों और छोटे जलजीवों को खाकर उनकी आबादी को नियंत्रित कर फसलों को नुकसान से बचाता हैं। विशेष रूप से धान के खेतों में यह घोंघों और कीटों की संख्या को प्रभावी तरीके से कम करता है। सारस की उपस्थिति को स्वस्थ और संतुलित कृषि पारिस्थितिकी  का संकेत माना जाता है, क्योंकि यह साफ पानी और सुरक्षित वातावरण में ही पनपता है। हालांकि कभी-कभी यह अंकुरित बीजों को हल्का नुकसान भी पहुंचाता है। लेकिन शोध बताते हैं कि इसका समग्र योगदान पर्यावरण संतुलन और कीट नियंत्रण में अधिक लाभकारी है। इस तरह सारस प्राकृतिक खेती और जैव विविधता संरक्षण का एक महत्वपूर्ण प्रतीक भी माना जाता है।

किंगफिशर :  यह जलस्रोतों के आसपास पाया जाने वाला पक्षी है, जो विशेष रूप से धान और अन्य जलयुक्त खेतों में जैव नियंत्रण करता है। किंगफिशर मुख्य रूप से छोटी मछलियां, कीट, जलीय लार्वा और छोटे जीवों को खाता है, जिससे जलयुक्त खेतों में कीटों और हानिकारक जीवों की संख्या नियंत्रित रहती है। यह विशेष रूप से उन कीटों को कम करने में मदद करता है जो पानी में पनपकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा, इसकी उपस्थिति को स्वच्छ जल और स्वस्थ पारिस्थितिकी का संकेत माना जाता है। हालांकि यह सीधे फसलों पर कम प्रभाव डालता है, लेकिन जल-आधारित खेती में संतुलन बनाए रखकर अप्रत्यक्ष रूप से फसलों को सुरक्षित रखने में योगदान देता है।

2

खेतों के आसपास लाभकारी पक्षियों की संख्या बढ़ाने के व्यवहारिक सुझाव

  • खेतों के पास खाली जहग व मेड़ पर पेड़ लगाएँ – नीम, बबूल, शीशम, करंज जैसे पेड़ लगाकर पक्षियों को बैठने व घोंसला बनाने की जगह बनाएं।
  • नेस्ट बॉक्स (घोंसले) लगाएँ – खासकर गौरैया और बार्न आउल के लिए कृत्रिम घोंसले लगाने की व्यवस्था करें।
  • पानी की व्यवस्था करें – खेत के पास छोटा तालाब, कुंड या पानी का बर्तन रखें।
  • कीटनाशकों का कम से कम उपयोग करें – रासायनिक दवाओं की जगह जैविक तकनीक अपनाएँ ।
  • मिश्रित खेती अपनाएँ – विविध फसलें और झाड़ियाँ रखने से अलग-अलग पक्षी आकर्षित होते हैं।
  • पशुपालन को जोड़ें – बगुला जैसे पक्षी पशुओं के आसपास कीट खाते हैं
  • बैठने के लिए डंडे लगाएँ – ड्रोंगो और नीलकंठ को शिकार में मदद मिलती है
  • घोंसलों और पक्षियों की सुरक्षा करें – शिकार न करें, घोंसले नष्ट न करें
  • खेत की मेड़ों में थोड़ी प्राकृतिक घास – झाड़ियाँ लगाएं।

निष्कर्ष :

पक्षी केवल प्रकृति की सुंदरता बढ़ाने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि ये खेती-किसानी के सच्चे प्रहरी भी हैं। गौरैया, मैना, ड्रोंगो, नीलकंठ और बगुला जैसे पक्षी प्राकृतिक रूप से कीट नियंत्रण कर फसलों को सुरक्षा प्रदान करते हैं, जबकि उल्लू और बाज जैसे शिकारी पक्षी चूहों की संख्या नियंत्रित कर किसानों को भारी नुकसान से बचाते हैं। वहीं सनबर्ड जैसे पक्षी परागण में मदद कर उत्पादन बढ़ाते हैं। हॉर्नबिल और तोता जैसे पक्षी बीज प्रसार कर जैव विविधता को मजबूत बनाते हैं। गिद्ध और कौआ जैसे सफाईकर्मी पक्षी पर्यावरण को स्वच्छ रखकर रोगों के प्रसार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जिन क्षेत्रों में पक्षियों की विविधता अधिक होती है, वहां कीट प्रकोप कम, मिट्टी और पर्यावरण अधिक संतुलित तथा फसल उत्पादन बेहतर पाया जाता है। यही कारण है कि टिकाऊ और प्राकृतिक खेती में पक्षियों की भूमिका को फिर से महत्व दिया जा रहा है। यदि किसान खेतों के आसपास पेड़ लगाएं, जल स्रोत बनाएं, रासायनिक कीटनाशकों का कम उपयोग करें तथा पक्षियों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करें, तो ये पक्षी प्राकृतिक खेती के सहयोगी बनकर खेती की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *