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अरहर की वैज्ञानिक खेती से बढ़ाएँ पैदावार और लाभ

अरहर की वैज्ञानिक खेती की सम्पूर्ण जानकारी। उन्नत किस्में, बीज उपचार, खाद प्रबंधन, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, रोग एवं कीट प्रबंधन से अधिक उत्पादन प्राप्त करें।

खरीफ मौसम की दलहनी फसलों में अरहर (तूर) का विशेष महत्व है। अपने उत्कृष्ट स्वाद, उच्च पौष्टिकता और व्यापक उपयोगिता के कारण यह पूरे भारत में सबसे लोकप्रिय दालों में से एक है। भारतीय शाकाहारी भोजन में अरहर की दाल को विशेष स्थान प्राप्त है। प्रोटीन से भरपूर होने के कारण इसे गरीबों का “प्राकृतिक प्रोटीन बैंक” भी कहा जाता है। देश में लगभग 50.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में अरहर की खेती की जाती है, जिससे लगभग 43.4 लाख टन उत्पादन प्राप्त होता है। इसके बावजूद देश की मांग के अनुरूप उत्पादन अभी भी पर्याप्त नहीं है।

अरहर के दानों में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन, आवश्यक अमीनो अम्ल, वसा, खनिज लवण तथा अन्य पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। यह न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि संतुलित आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। अरहर केवल खाद्यान्न फसल ही नहीं, बल्कि भूमि सुधारक फसल भी है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले विशेष प्रकार के राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नत्रजन को स्थिर करके मिट्टी में उपलब्ध कराते हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है।

जलवायु : अरहर की फसल को नम और शुष्क दोनों तरह के क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए प्रारम्भ में गर्म और तर अर्थात नम मौंसम की आवश्यकता होती है। इसकी खेती के लिए अधिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त नही होते। पौधों में फूल आते समय व फलियों में दाना बनते समय शुष्क मौंसम व तेच धूप होना लाभकारी होता है। फसल को पकते समय 90 – 95 फारेनहाइट तापमान सबसे उपयुक्त होता है। अरहर पाला के प्रति बहुत ही संवेदनशील फसल है। अतः पाला पड़ने वाले क्षेत्रों में इसकी खेती नही करनी चाहिए। 

उपयुक्त भूमि : उचित प्रबंधन के व्दारा अरहर की खेती सभी तरह की भूमियों में की जा सकती है। इसके पौधे हल्की भूमियों में अच्छी वृद्धि करते हैं। लेकिन अधिक उत्पादन की दृष्टि से दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। खेत में अच्छे जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए। मिट्टी की जल धारण क्षमता अच्छी होनी चाहिए। उदासीन या 6-8 पी.एच. मान वाली भूमि अरहर के लिए अच्छी होती है। लवणीय या क्षारीय भूमि में अरहर की खेती नही करना चाहिए। 

खेत की तैयारी  :  खेत की पहली गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद दो-तीन जुताई हैरो से करें।  खेत को समतल बनाये रखने के लिए प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगावें। वर्षाधारित क्षेत्रों में खेत को छोटे – छोटे भागों में बाट कर पानी रोकने के लिए मेंड़ बंदी करना बहुत ही लाभकारी होता है। अच्छे अंकुरण के लिए बीज की बुआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

प्रजातियों का चुनाव : कृषि में हुए तकनीकी विकास एवं अनुसंधान के चलते आज अरहर की अधिक उपज देने वाली किस्में उपलब्ध हैं। अरहर की उन्नतशील किस्मों को उनके पकने की अवधि के अनुसार तीन वर्गो में शीघ्र पकने वाली, मध्यम समय में पकने वाली एवं लम्बी अवधि में पकने वाली किस्मों में बाटा गया है। फसल से भरपूर उत्पादन लेने में उचित किस्मों का चुनाव करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। अरहर की किस्मों का चुनाव क्षेत्र विशेष को ध्यान में रखते हुए, रोग अवरोधिता के आधार पर व पकने के समय के आधार पर करना चाहिए।

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सारणी-1 अरहर की प्रमुख उन्नतशील प्रजातियाएवं उनके विशेष गुण (Improved Varieties of Pigeonpea)

अरहर की किस्मों का चयन क्षेत्र, सिंचाई सुविधा तथा फसल अवधि के आधार पर करना चाहिए। प्रमुख उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं :

1. शीघ्र पकने वाली किस्में 120–160 (दिन)

प्रजातिअवधि (दिन)विशेषता
UPAS-120120–140शीघ्र पकने वाली, उत्तर भारत के लिए उपयुक्त
पूसा अगेती150–160अधिक उपज, शीघ्र परिपक्व
पूसा-855140–150मध्यम ऊँचाई, अच्छी उपज
पूसा-992140–150रोग सहनशील, अच्छी गुणवत्ता
पूसा-33140–150उत्तर भारत के लिए उपयुक्त
ICPL-87120–130अधिक उपज देने वाली
जागृति (ICPL-151)120–130शीघ्र पकने वाली एवं अच्छी दाना गुणवत्ता
आजाद (K-91-25)130–140उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त

2. मध्यम अवधि वाली किस्में  160–200 दिन    

प्रजातिअवधि (दिन)विशेषता
आशा (ICPL-87119)170–190व्यापक अनुकूलता, उच्च उत्पादन
टाइप-21 (T-21)160–180परंपरागत लोकप्रिय किस्म
जवाहर अरहर-4180–190मध्य भारत के लिए उपयुक्त
VSMR-583180–190अच्छी उपज क्षमता
पंत अरहर-6170–180उत्तर भारत के लिए अनुशंसित
पंत अरहर-7170–190विल्ट रोग प्रतिरोधी

3. देर से पकने वाली किस्में  (220–260 दिन

प्रजातिअवधि (दिन)विशेषता
बहार250–280उत्तर भारत में लोकप्रिय
मालवीय चमत्कार240–260उच्च उपज क्षमता
IPA-203 (प्रकाश)245–255विल्ट प्रतिरोधी
IPA-206 (गंगा)245–250विल्ट एवं स्टेरिलिटी मोजेक प्रतिरोधी
IPA-15-2 (शारदा)240–25528–33 क्विंटल/हेक्टेयर तक क्षमता

उत्तर प्रदेश के लिए विशेष रूप से अनुशंसित किस्में

  • UPAS-120
  • पूसा-992
  • पूसा अगेती
  • आशा (ICPL-87119)
  • पंत अरहर-6
  • पंत अरहर-7
  • IPA-206 (गंगा)
  • IPA-15-2 (शारदा)

बीज की मात्रा : बीज की मात्रा बीज की गुणवत्ता, बीज भार, बोने का तरीका एवं मौंसम विशेष पर निर्भर करती है। एक हेक्टेयर की बुआई के लिए 12-15 किग्रा. बीज का प्रयोग करना चाहिए। ज्वार, बाजरा, मूग, उर्द, मूगफली लोबिया, तिल आदि के साथ मिश्रित खेती के लिए  8 – 10 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।

बीज उपचार :  फसल को फफूद जनित बीमारियों से बचाने के लिए बुआई से पूर्व बीज को कैप्टान या थीरम या बैविस्टिन नामक रसायन से उपचारित कर लेना चाहिए। इसके लिए 2 से 2.5 ग्राम दवा प्रति किग्रा. बीज की दर से प्रयोग में लाना चाहिए। इसके बाद बीज को राईजोबियम कल्चर से भी उपचारित करना चाहिए। इससे वायुमण्डलीय नत्रजन के एकत्री करण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस कल्चर एक लीटर पानी में 125 ग्राम गुड़ व 2 ग्राम गोंद को उबालने के बाद ठंडा होने के लिए छोड़ दें। ठंडा होने पर इस घोल में दो पैकेट राईजोबियम कल्चर मिला दें। इस तैयार घोल को पूरे बीज में अच्छी तरह मिलाये जिससे बीज में एक पर्त जम जाय। अब बीज को छाया में सुखानें के बाद बुआई के लिए प्रयोग में लाना चाहिए।

बोने का समय : उत्पादन एवं कीट-व्याधियों के वचाव की दृष्टि से अरहर की बुआई समय पर करना बहुत आवश्यक होता है। वर्षाधारित खेती की बुआई मानसून की पहली बारिश के बाद कर देना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में 1-15 जून तक अरहर की बुआई कर देनी चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्ताह बाद बुआई करने से उपज में कमी होना शुरू हो जाती है। 

बुआई का तरीका : अरहर की अच्छी पैदावार के लिए बीज की बुआई सदैव हल के पीछे कूड़ में या सीड ड्रिल से उचित दूरी पर करनी चाहिए। बीज की बुआई 50 सेंमी. पंक्ति से पंक्ति एवं 15 सेंमी. पौध से पौध की दूरी पर बुआई करते हैं। बीज 5-8 सेंमी. गहराई पर बोते हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में एवं उचित जल निकास के आभाव में बुआई मेंड़ों पर करना चाहिए।

पोषक तत्व प्रबंधन : अधिक उत्पादन के लिए पोषक तत्वों का समुचित प्रबंध करना आवश्यक होता है। रासायनिक उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण मृदा परीक्षण की जाच के आधार पर करते हैं। मृदा परीक्षण न हो पाने की दशा में 20-30 किग्रा. नाईट्र्रोजन, 80-100 किग्रा. फास्फोरस तथा आवश्यकतानुसार 40-60 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। इन उर्वरकों की पूरी मात्रा बुआई के समय खेत में डाल देनी चाहिए। जिंक एवं सल्फर की कमी वाले क्षेत्रों में 25 किग्रा. जिंक सल्फेट व 20 किग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। अरहर की फसल में सूक्ष्म पोषक तत्व मोलीब्लेडनम देने से उपज में काफी वृद्धि देखी गई है। राईजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करने से 15-20 फीसदी उत्पादन में वृद्धि होती है।

सिंचाई : समय पर व अच्छी वर्षा होने से आमूमन सिंचाई की आवश्यकता नही होती है। अरहर की फसल में सदैव हल्की सिंचाई करना चाहिए। फूल आते समय व फलियों में दाना बनते समय सिंचाई का विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। सर्दियों में फसल को पाले से सुरक्षा के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रखना चाहिए।

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खरपतवार नियंत्रण :  खरपतवारों से फसल को काफी हाॅनि पहुॅचती है। अतः समय से निकाइ-गुड़ाई कर खेत का खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। पहली निकाई-गुड़ाई बुआई के 20-25 दिन बाद व दूसरी 40 दिन व तीसरी 50 दिन में करते हैं।  रासायनिक विधि से खरपतवारों के नियंत्रण के लिए पेंडामेथलीन 30 प्रतिशत ईसी 1  लीटर मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के बाद 1 से 3 दिन के अन्दर खेत में छिड़काव करना चाहिए।

फसल सुरक्षा : अरहर की फसल को कीट और व्याधियों से बहुत हानि पहुचती है। अतः फसल से भरपूर उत्पादन प्राप्त करने के लिए समय से इनकी रोकथाम के उपाय सुनिश्चित करना चाहिए।

फली बेधक कीट :  यह कीट अरहर की फसल को सर्वाधिक हानि पहुचाता है। इनकी गिडारे फलियों के अन्दर छेदकर दाना को खा जाती हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए एड़ोसल्फान 35 ईसी 1.5 लीटर दवा को 600-800 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। दवा का पहला छिड़काव फूल बनते समय व दूसरा दूसरा फलियों में दाना बनते समय करें।

फली बेधक मक्खी : इस मक्खी का लारवा फसल हानि पहॅुचता है। इसका लारवा फलियों में विकसित हो रहे दानों को खाकर नुकसान पहॅुचाते है। इस कीट के नियत्रंण के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ईसी 1.25 लीटर दवा को 600-800 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

पत्ती लपेटक कीट : इस कीट आक्रमण सितम्बर माह में होता है। इस कीट की सूड़िया पौधों की शीर्ष की पत्तियों को लपेटकर जाला बनाती है। उसी में छिपकर खाती है। बाद में फूॅलों और फलियों को भी नुकसान पहुॅचाती है। इसकी रोकथाम भी इण्डोसल्फान नामक कीट नाशक का छिड़काव कर की जा सकती है।

घुन : यह कीट खेत और गोदाम दोनों जगह हानि पहुचाता है। इस कीट से वचाव के लिए दानों को धूप में अच्छी तरह सुखा कर भण्डारण करना चाहिए। दानों में नीम या सरसों का तेल 10 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से मिलाकर भण्डारण करना चाहिए।

उकठा रोग : यह अरहर की फफूद जनित सबसे घातक बीमारी है। इस रोग से प्रभावित पौधों की जड़े काली पड़ जाती है। पौधों की उपरी पत्तिया पीली पड़कर गिर जाती है। पौधों के उपरी भाग में पानी व खाद्य का संचार रूक जाता है। इसकी रोकथाम के लिए रोग अवरोधी किस्मों को उगाना चाहिए। अधिक प्रकोप वाले क्षेत्रों में ज्वार के साथ सह-फसली खेती को बढ़ावा देना चाहिए। खेत में उचित जल निकास का प्रबंध करना चाहिए। बीज को उपचारित करके बुआई करना चाहिए।

पत्तियों का चकत्ता रोग : यह रोग भी फफूद के व्दारा फैलता है। इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियो पर काले गोल धब्बे या चकत्ते दिखाई देते है। पत्तिया मुड़कर गिरने लगती हैं। इसके लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए। बोडो मिश्रण या जिनेब 0.25 प्रतिशत घोल का 2-3 छिड़काव करना चाहिए।

कटाई और मड़ाई : अरहर की फसल 120-300 दिन में बोई गई प्रजाति के अनुसार  पक कर कटाई के लिए तैयार होती है। कम समय में तैयार होने वाली किस्में नवम्बर दिसम्बर व देर से तैयार होन  वाली किस्में मार्च-अप्रैल तक पक कर तैयार हो जाती है। जब खेत में 80 फीसदी फलियाॅ पक जाय तो फसल की कटाई कर लेना चाहिए।  फसल की कटाई समय से करना चाहिए अन्यथा फलियों के चटखनें से नुकसान होने की संभावना होती है। फसल को काटने के बाद सुरक्षित स्थान में एकत्र कर अच्छी तरह सुखा लेते हैं। अच्छी तरह सुखाने के बाद पावर थ्रेसर, डण्डों से पीट कर दाना निकाल लेना चाहिए। 

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उत्पादन एवं भण्डारण : अरहर का उत्पादन उन्नत सस्य क्रियाओ, उचित देखरेख, प्रजाातियों का चुनाव, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, पोषक तत्वों का समुचित प्रबंधन, कीट और व्याधियों से फसल की सुरक्षा आदि पर निर्भर करता है। यदि इन पहलुओं को घ्यान में रखते हुए अरहर की खेती की जाती है तो 20 से 35 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हो जाता है। इसके अतिरिक्त 50 से 60 कफन्तल लकडी व काफी मात्रा में भूसे की प्रप्ति होती है। अरहर के दानों का भण्डारण अच्छी तरह धूप में सुखाने के बाद करना चाहिए। भण्डारण के लिए दानों को 10 -12 फीसदी नमी तक सुखाना चाहिए। भण्डार गृह में कीड़ों से बचाव के लिए नीम व सरसों का तेल मिलकर भण्डारण करना चाहिए।

निष्कर्ष :

अरहर की खेती एक लाभकारी दलहनी फसल है, जिसे यदि वैज्ञानिक तकनीक और उन्नत सस्य क्रियाओं के साथ किया जाए तो बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। सही किस्मों का चयन, समय पर बुवाई, संतुलित खाद प्रबंधन, बीज उपचार, सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण तथा रोग-कीट प्रबंधन से फसल की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर अरहर न केवल किसानों की आय बढ़ा सकती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) :

Q1. अरहर की खेती के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन-सा है?
उत्तर: वर्षा आधारित क्षेत्रों में मानसून की पहली बारिश के बाद बुवाई करनी चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में 1 से 15 जून तक बुवाई सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

Q2. अरहर की अच्छी उपज के लिए कौन-सी मिट्टी उपयुक्त है?
उत्तर: दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है, जिसमें जल निकास अच्छा हो और pH मान 6–8 के बीच हो।

Q3. प्रति हेक्टेयर अरहर के लिए बीज की मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः 12–15 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। मिश्रित खेती में 8–10 किग्रा बीज पर्याप्त है।

Q4. अरहर की अधिक उपज के लिए कौन-सी प्रमुख उन्नत किस्में हैं?
उत्तर: UPAS-120, पूसा-992, आशा (ICPL-87119), पंत अरहर-6, IPA-206 (गंगा) आदि प्रमुख उन्नत किस्में हैं।

Q5. बीज उपचार क्यों जरूरी है?
उत्तर: बीज उपचार से फफूंद जनित रोगों से बचाव होता है और राइजोबियम कल्चर से नाइट्रोजन स्थिरीकरण बढ़ता है, जिससे उत्पादन 15–20% तक बढ़ सकता है।

Q6. अरहर में सिंचाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई की जरूरत नहीं होती, लेकिन फूल आने और फलियों में दाना बनने के समय हल्की सिंचाई जरूरी है।

Q7. अरहर में सबसे हानिकारक कीट कौन-सा है?
उत्तर: फली बेधक कीट सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है, जो फलियों के अंदर दाने को खा जाता है।

Q8. अरहर की फसल में मुख्य रोग कौन-सा है?
उत्तर: उकठा रोग (Wilt disease) सबसे घातक है, जिससे पौधे मुरझा जाते हैं और उत्पादन कम हो जाता है।

Q9. अरहर की कटाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: जब लगभग 80% फलियाँ पक जाएं, तब कटाई करनी चाहिए। समय पर कटाई बहुत जरूरी है।

Q10. अरहर से औसतन कितना उत्पादन प्राप्त हो सकता है?
उत्तर: उन्नत तकनीक अपनाने पर 20 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

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