भूमिहीन ग्रामीणों के आय का बेहतर जरिया : बकरी पालन व्यवसाय
भूमिहीन ग्रामीणों के लिए बकरी पालन एक कम लागत, कम जोखिम और अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय है। जानें नस्ल, प्रशिक्षण, टीकाकरण, लागत और लाभ एवं सरकारी सब्सिडी की पूरी जानकारी ।
डा. जितेन्द्र सिंह
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देश के ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन कृषक मजदूरों की आजीविका को सशक्त बनाने के लिए भारत सरकार एवं राज्य सरकारें निरंतर प्रयासरत हैं। इसके लिए सरकार व्दारा विभिन्न पशुपालन योजनाओं और सब्सिडी कार्यक्रमों का संचालन बखूबी किया जा रहा है। इन सरकारी योजनाओं का उद्देश्य ऐसे परिवारों को स्थायी आय का साधन उपलब्ध कराना है, जिनके पास न तो कृषि भूमि है और न ही बड़े निवेश की क्षमता। इस दिशा में बकरी पालन एक अत्यंत व्यवहारिक, कम जोखिम और शीघ्र लाभ देने वाला व्यवसाय बनकर उभरा है।
राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM), राज्य पशुपालन विभाग, नाबार्ड तथा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से बकरी पालन के लिए 40 से 60 प्रतिशत तक अनुदान, प्रशिक्षण, नस्ल सुधार, पशु बीमा एवं विपणन सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है। इन योजनाओं के कारण आज भूमिहीन ग्रामीणए महिलाएँ और युवा सीमित संसाधनों के बावजूद वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन कर स्वरोज़गार, पोषण सुरक्षा के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहे हैं।
यदि पारंपरिक तरीके से किए जाने वाले बकरी पालन व्यवसाय को सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और आधुनिक तकनीकों से जोड़ कर किया जाए तो यह व्यवसाय लघु एवं सीमांत किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि के अनेकों व्दार खोल सकता है ।
बकरी पालन का महत्व :
बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक ऐसा सशक्त आधार है, जिससे दूध, मांस, खाल, जैविक खाद और बहुमूल्य पाश्मीना प्राप्त होता है। इन्हीं वजह से बकरी को बकरी को बहुउपयोगी पशु कहा गया है। बकरी का दूध स्वास्थ्य की दृष्टि से गाय और भैंस के दूध की तुलना में अधिक सुपाच्य एवं पौष्टिक होता है। इसमें प्रचुर मात्रा में खनिज लवण और औषधीय गुण पाए जाते हैं जिससे यह क्षय रोग (टीबी) एवं कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले रोगियों के लिए रामबाण औषधि की तरह काम करता है।
बकरे का मांस स्वादिष्ट, पौष्टिक और सर्वश्रेष्ठ मांस की श्रेणी में आता है। इसकी निरंतर बढ़ती मांग के कारण देशी बाजार सदैव गर्म रहता है, जिससे पशुपालकों को तुरंत और सुनिश्चित नकद आय प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त बकरी पालन से मिलने वाली खाल, पाश्मीना ऊन तथा जैविक खाद किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत बनते हैं।
कम पूँजी, कम स्थान और न्यूनतम जोखिम के कारण बकरी पालन भूमिहीन, सीमांत और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने परिवारों के लिए अत्यंत सरल एवं लाभकारी व्यवसाय है। यही नहीं, यदि प्रत्येक ग्रामीण परिवार दो – चार बकरियाँ भी पाल ले तो वह अपनी आर्थिक स्थिति काफी हद तक मजबूत कर सकता है ।
बकरे 8 – 10 माह की अवधि में विक्रय योग्य हो जाते हैं । आवश्यकतानुसार इन्हें कभी भी बेचकर आर्थिक तंगी से आसानी से निपटा जा सकता है। इसीलिए बकरी पालन के व्यवसाय को ग्रामीण परिवारों का एटीएम कहा गया है।

बकरी विकास पर अनुसंधान :
देश में बकरी पालन को उन्नत एवं लाभकारी बनाने की दिशा में केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान द्वारा उल्लेखनीय कार्य किए गए हैं। बकरियों के समग्र विकास के लिए पोषण, आनुवंशिकी, भ्रूण विज्ञान, रोग नियंत्रण, वैक्सीन निर्माण, प्रजनन प्रौद्योगिकी एवं आहार प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग से अनुसंधान को नई दिशा और गति मिली है ।
इन अनुसंधानों का प्रतिफल यह है कि भारत में बकरियों की संख्या लगभग 14.89 करोड़ है । यह आँकड़ा बकरी पालन की बढ़ती उपयोगिता और आर्थिक महत्त्व को स्पष्ट रूप से दर्शाता है । देश में बकरी पर अनुसंधान कार्य को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया गया है ।
प्रथम चरण :
इस चरण में बकरियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके अंतर्गत कृत्रिम गर्भाधान तकनीक के माध्यम से नस्ल सुधार कर अधिक दूधए बेहतर वृद्धि एवं उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
द्वितीय चरण :
इस चरण में भ्रूण प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान किया जा रहा है जिसमें बकरियों के प्रजनन काल का समकालीकरण अधिअण्डाणु उत्पादन, भ्रूण प्रत्यारोपण परखनली भ्रूण निर्माण तथा भ्रूण का लिंग निर्धारण जैसी उन्नत तकनीकें प्रमुख रूप से शामिल हैं।
तृतीय चरण :
तीसरे चरण में अत्याधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए ट्रांसजेनिक बकरी उत्पादनए क्लोन बकरी निर्माणए आनुवंशिक अभियांत्रिकी तथा डीएनए फिंगरप्रिंटिंग जैसी तकनीकों पर कार्य किया जा रहा है जिससे भविष्य में उच्च उत्पादक एवं रोग प्रतिरोधी नस्लों का विकास संभव हो सकेगा।
प्रशिक्षण : हमारे देश में बकरी पालन के कुषल प्रबंधन और संवर्धन हेतु प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई है। यह संस्थान 755 एकड़ भूमि पर फैला है जो उत्तर प्रदेश के जनपद मथुरा, मकदूम, पेास्ट फरह नामक जगह पर स्थित है। इसकी दूरी मथुरा से 22 किमी तथा आगरा से 32 किमी है । यह संस्थान नस्लों के सुधार, पोषण, स्वाथ्य और चरागाहों पर अनुसंधान का कार्य करता है। यहा पर समय – समय पर ग्रामीणों और किसानों को बकरी पालन पर वैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रषिक्षण प्रदान किया जाता है। इसके अतिरिकत दूध, मांस और रेशा उत्पादन तथा इनके प्रसंस्करण पर भी जानकारी प्रदान की जाती है। ग्रामींण लोग बकरी पालन का कार्य षुरू करने से पूर्व या बाद में इस संस्थान से व्यवहारिक प्रषिक्षण लेकर इस व्यवसाय को और भी लाभकारी बना सकते हैं।
नस्लों का चुनाव : व्यवसायिक रूप से बकरी पालन के लिए उन्नत नस्ल की बकरियों का चयन करना जरूरी होता है।
उन्नत नस्लें : इस वर्ग में बकरी की जमुनापारी, बरबरी, मेहसाना, मारवाड़ी, बीटल, जलवाड़ी, बेवड़ी आदि नस्ले आती हैं।
विदेशी नस्लें : इसमें बकरी की अंगोरा, ओगनबर्ग, अल्पाइन, सानेन आदि नस्ले आती हैं। अपने देश में बकरियों की देशी उन्नत नस्लों का पालन व्यावसायिक दृष्टि से उपयोगी होता है। जमुनापारी और बीटल नस्ल दूध व मांस दोनों के उत्पादन के लिए उपयोगी होती है। शहरों व कस्बों में जहां बकरियों के चराने की सुविधा उपलब्ध न हो तो बरबरी नस्ल की बकरियों का पालन अधिक उपयुक्त रहता है। इस नस्ल की बकरियों को एक स्थान में बाधकर रखने से भी अच्छा उत्पादन मिल जाता हैं।

आवास व्यवस्था : आमतौर पर गावों में बकरियों के आवास के लिए कोई अलग से व्यवस्था नही होती है। लेकिन व्यवस्थित बकरी पालन हेतु बकरियों के लिए उपयुक्त आवास बहुत आवश्यक होता है। छोटे स्तर पर पालन हेतु दो बकरियों के लिए 5 फीट चैडा और 8 फीट लम्बा स्थान पर्याप्त होता है। बड़े स्तर पर बकरी पालन के लिए प्रति बकरा लगभग 2 से 2X5 वर्गमीटर और प्रति बकरी 1 से 1X2 वर्गमीटर जगह पर्याप्त होती है। अच्छे बकरी आवास के लिए सूखेए उॅचे, हवादार, प्रकाषयुक्त और उत्तम जल निकास वाले स्थान का चुनाव करना चाहिए । बाड़े की दीवार की उचाई 7.8 फीट रखनी चाहिए । छत निरमा्ण के लिए छप्पर, खपरैल, टीन या फिर एस्बेस्टस की चादर का प्रयोग किया जा सकता है। चारे के लिए एक फीट चैडा व डेढ़ फीट फर्स से उची नाद बनाना चाहिए। मल-मूत्र निकालने के लिए भी उचित ब्यवस्था होनी चाहिए ।
शेड का आकार :
100-125 बकरियों के लिए कवर क्षेत्र 10-12 वर्ग फुट प्रति बकरी (कुल लगभग 1200-1500 वर्ग फुट) और ओपन क्षेत्र 20-24 वर्ग फुट प्रति बकरी की जरूरत होती है। छोटे फार्म के लिए 60×20 फुट का शेड आर्थिक रूप से सही रहता है। है, जबकि बड़े फार्म के लिए 125×120 फुट जगह उपयुक्त होती है। उत्तर या दक्षिण की ओर ओपन फेंसिंग के साथ शेड पूर्व-पश्चिम दिशा में बनाएं । दीवारें वेंटिलेशन के लिए 70% खुली रखें । गर्भवती बकरियों के लिए अलग व्यवस्था करें।
100 बकरी शेड की अनुमानित लागत :
| मद | अनुमानित खर्च (₹) |
| बांस/लकड़ी ढांचा | 80,000 |
| छत सामग्री | 40,000 |
| फर्श निर्माण | 30,000 |
| जाली/नेट | 20,000 |
| नाद, पानी टंकी | 20,000 |
| कुल लागत | ₹1.8 – 2.0 लाख |
चारा – दाना : बकरी आहार के प्रति संवेदशील पशु है । बकरिया ताजा, मुलायम और स्वच्छ चारा खाना पसंद करती हैं। यह बरसीम, लोबिया, सोयाबीन, हरी अरहर, लुसर्न, नेपियर घास, सेंजी और सब्जियों के पत्ते खूब चाव से खाती हैं। इसके अतिरिक्त बबूल, बेर, इमली, नीम और महुआ के पत्तों को भी खाना पसंद करती हैं। सूखे चारे में अरहर, मूग, उर्द, चना और गेहू का भूसा खिलाना चाहिए। 50 किलो भार व 2 लीटर दूध देने वाली बकरी को प्रतिदिन 5 किलो हरा चारा के अतिरिक्त 400 ग्राम दाना की जरूरत होती है। इसके अतिरिक्त 2 प्रतिशत खनिज मिश्रण और नमक भी देना चाहिए। एक सामान्य बकरी को प्रतिदिन 2.3 लीटर स्वच्छ पानी की आवश्यकता होती है।
गर्भाधान का समय : गर्भाधान के लिए शीतकाल और बसंतकाल का मौसम सबसे उपयुकत होता है। उन्नत नस्ल के मेमनें पैदा करने के लिए सदैव अच्छे पैतृक गुण के बकरे से गर्भाधान कराना चाहिए। बकरियों में पहला गर्भाधान 10-15 माह की उम्र पर कराना चाहिए ताकि 15 से 20 माह में बकरी बच्चा दे दे। इनका गर्भ काल लगभग 5 माह का होता है। सामान्यतः 18 माह में बकरी दो बार बच्चा देती है। एक ब्यात मे दो से चार तक बच्चे देती हैं।
बकरियों में गर्मी के लक्षण : बकरी चारा-दाना कम कर देती है तथा सुस्त और बेचैन रहने लगती है। पूछ उठाकर विषेष प्रकार की आवाज निकालती है। अचानक दूध कम कर देती है। योनि व्दार में सुर्खी और सूजन आ जाती है और ष्लेष्मा जैसे प्रदार्थ का स्राव होने लगता है। सामान्यतः बकरिया 18-21 दिन में गर्मी पर आती हैं। गर्मी में आने पर बकरी को दूसरे दिन गर्भाधान कराना चाहिए।
ब्यात उपरान्त देखभाल : बकरी के ब्याने के तुरन्त बाद मेमनें की नाक व पूरा शरीर अच्छी तरह साफ करना चाहिए। मेमनों के नाभि में टिंचर आयोंडीन अवश्य लगाएं और मा का दूध पिलाएं। बच्चा जनने के बाद बकरी को जई, अदरक, आधा चम्मच नमक और खनिज मिश्रण को गुड़ के साथ मिलाकर देना चाहिए। इस आहार को दो दिनों तक देने के बाद पुनः पूर्व की तरह आहार देना चाहिए।
बकरा आवास : बकरे के सींग कलिका के पीछे भाग में एक ग्रन्थि होती है जिससे एक विषेष प्रकार की दुर्गंध निकलती है। इस गंध को बकरी का दूध अतिशीघ्र अवशोषित कर लेता है जिस कारण दूध से दुर्गंध आने लगती है। इसके निवारण के लिए बकरे का आवास बकरियों के आवास से कम से कम 50 मीटर की दूरी पर बनाना चाहिए।
बधियाकरण : मेमनों को 2 से 2.5 माह बाद मा से अलग कर देना चाहिए। ढाई माह की आयु में नर-मादा मेमनों को अलग कर देना चाहिए। मेमनों से अच्छा मांस उत्पादन के लिए बकरों का समय से बधिया करना आवश्यक होता है। प्रजनन के लिए एक-दो उन्नत नस्ल के बकरों को छोड़कर अन्य को बधिया कर देना चाहिए। बधियाकरण का कार्य ढाई से तीन माह में आवश्य कर देना चाहिए।
व्यायाम : बकरियों के अच्छे स्वाथ्य के लिए व्यायाम कराना बहुत जरूरी होता है। सूर्योदय के एक-दो घंटे बाद जब ओस सूख जाय तो बकरियों को बाड़े या मैदान में चार-पाच घंटे के लिए घूमने के लिए आवश्य छोड़ना चाहिए। उछलने-कूदने से बकरे और बकरियों का शरीर हस्ट पुस्ट बनता है। नियमित ब्यायाम से दुग्ध उत्पादन के साथ मांस उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी होती है।
स्वास्थ्य रक्षा : आमतौर से छोटे स्तर पर बकरी पालन में घरेलू उपचार से काम चल जाता है, कोई बाहरी चिकित्सा की आवष्यकता नही पड़ती। लेकिन व्यवसाय के रूप में षुरू करने पर इनके चिकित्सा पर ध्यान देना जरूरी होता है। बीमारियों से बचाव के रूप में वर्षा पूर्व बकरियों को गलाघोटू का टीका अवष्य लगवाना चाहिए। गर्मी से पूर्व इन्टेरोटाक्सीमिया का टीका भी लगवाना चाहिए। उदर कृमि और परजीवियों से रक्षा हेतु वर्षा से पूर्व और वर्षा के बाद कृमिनाषक औषधि पिलानी चाहिए।
स्वास्थ्य सुरक्षा एवं रोग प्रबंधन :
सामान्यतः छोटे स्तर पर किए जाने वाले बकरी पालन में घरेलू उपचारों से ही अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाता है और बाहरी चिकित्सा की आवश्यकता कम पड़ती है। किंतु जब बकरी पालन को व्यावसायिक स्तर पर अपनाया जाता है, तब पशुओं के स्वास्थ्य प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि रोगों के कारण होने वाला नुकसान सीधे लाभ को प्रभावित करता है।
रोगों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण और कृमिनाशक उपचार अत्यंत आवश्यक है। वर्षा ऋतु से पूर्व बकरियों को गलाघोंटू (HS) का टीका अवश्य लगवाना चाहिए। इसी प्रकार, गर्मी शुरू होने से पहले एंटरोटॉक्सिमिया (ET) का टीकाकरण कराना जरूरी होता है, जिससे अचानक मृत्यु की संभावना को कम किया जा सके।
इसके अलावा, उदर कृमि एवं बाह्य परजीवियों से बचाव के लिए वर्षा से पहले और वर्षा समाप्त होने के बाद कृमिनाशक दवाएँ नियमित रूप से पिलानी चाहिए। स्वच्छ आवास, साफ पानी और संतुलित आहार के साथ यदि इन स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों को अपनाया जाए, तो बकरियों को स्वस्थ रखकर उत्पादन एवं लाभ दोनों में वृद्धि की जा सकती है।

बकरी पालन के लिए व्यवहारिक और उपयोगी टीकाकरण कैलेंडर (Vaccination Schedule)
| क्रम | रोग का नाम | टीका लगाने की आयु/समय | पुनः टीकाकरण | विशेष टिप्पणी |
| 1 | गलाघोंटू (HS) | वर्षा ऋतु से पूर्व (मई–जून) | हर वर्ष | सभी उम्र की बकरियों को अनिवार्य |
| 2 | एंटरोटॉक्सिमिया (ET) | 3 माह की आयु | 6 माह बाद, फिर हर वर्ष | गर्मी से पूर्व लगवाना लाभकारी |
| 3 | पीपीआर (PPR) | 3–4 माह की आयु | 3 वर्ष में एक बार | अत्यंत घातक रोग, टीका अनिवार्य |
| 4 | एफ.एम.डी. (मुंह-खुर रोग) | 4 माह की आयु | हर 6 माह | सभी पशुओं को एक साथ |
| 5 | ब्रुसेलोसिस | 4–8 माह (केवल मादा) | एक बार जीवन में | गर्भपात से बचाव हेतु |
| 6 | चेचक (Goat Pox) | 3 माह की आयु | हर वर्ष (क्षेत्र अनुसार) | प्रकोप वाले क्षेत्रों में जरूरी |
| 7 | एंथ्रेक्स | वर्षा से पूर्व | हर वर्ष | प्रभावित क्षेत्रों में |
कृमिनाशक (Deworming) कार्यक्रम
| समय | विवरण |
| वर्षा से पूर्व | उदर कृमि नाशक दवा पिलाएँ |
| वर्षा के बाद | पुनः कृमिनाशक उपचार |
| बच्चे (2–3 माह) | 3 माह के अंतराल पर |
कुछ आवश्यक सावधानियाँ :
- टीकाकरण हमेशा स्वस्थ पशु को ही कराएँ
- टीका लगाने से पहले-बाद में पशु को तनाव से बचाएँ
- सभी बकरियों को एक साथ टीकाकरण कराना अधिक प्रभावी
- टीकाकरण का रिकॉर्ड रजिस्टर अवश्य रखें
100 बकरी यूनिट का आर्थिक विश्लेषण (90 मादा + 10 नर /अर्ध-गहन प्रणाली)
प्रारंभिक लागत (एकमुश्त पूजी निवेश)
| मद | मात्रा | अनुमानित दर (₹) | कुल लागत (₹) |
| उन्नत नस्ल की मादा बकरी | 90 | 5,000 | 4,50,000 |
| उन्नत नस्ल के नर | 10 | 8,000 | 80,000 |
| बकरी शेड निर्माण | — | — | 1,50,000 |
| चारा भंडारण/पानी टंकी | — | — | 30,000 |
| बर्तन, उपकरण, मैनेजमेंट | — | — | 25,000 |
| कुल प्रारंभिक लागत | 7,35,000 |
वार्षिक परिचालन लागत
| मद | वार्षिक खर्च (₹) |
| हरा व सूखा चारा | 1,20,000 |
| दाना/कन्सन्ट्रेट | 60,000 |
| दवा, टीकाकरण | 20,000 |
| श्रम/देखभाल | 60,000 |
| अन्य खर्च | 20,000 |
| कुल वार्षिक खर्च | 2,80,000 |
वार्षिक उत्पादन एवं आय :
| स्रोत | विवरण | अनुमानित आय (₹) |
| बच्चों का उत्पादन | 90 × 1.8 × 1.5 वर्ष ≈ 240 बच्चे | — |
| बिक्री योग्य बच्चे | 200 (मृत्यु घटाकर) | — |
| औसत विक्रय मूल्य | ₹5,000 प्रति बकरी | 10,00,000 |
| खाद/गोबर बिक्री | — | 25,000 |
| कुल वार्षिक आय | 10,25,000 |
शुद्ध लाभ (Net Profit) :
| विवरण | राशि (₹) |
| कुल वार्षिक आय | 10,25,000 |
| कुल वार्षिक खर्च | 2,80,000 |
| वार्षिक शुद्ध लाभ | 7,45,000 |
सब्सिडी के बाद वास्तविक लाभ
यदि 50% सरकारी सब्सिडी (NLM/राज्य योजना) मिले:
- सब्सिडी : ₹3,67,500
- किसान का स्वयं का निवेश : ₹3,67,500
- पहले ही वर्ष में निवेश वसूली संभव
निष्कर्ष :
100 बकरी पालन यूनिट ग्रामीणों, महिलाओं और युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव साबित हो सकता है। सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और उचित प्रबंधन के साथ यह मॉडल 6–8 लाख रुपये तक वार्षिक शुद्ध आय देने में सक्षम है । यह न केवल कम पूंजी और सीमित संसाधनों में शुरू होने वाला व्यवसाय है, बल्कि सही नस्ल चयन, वैज्ञानिक प्रबंधन, और सरकारी योजनाओं के सहयोग से यह स्थायी आय का स्रोत भी बन जाता है।“ग्रामीणों का एटीएम” कहलाने वाला यह व्यवसाय जरूरत के समय त्वरित नकद उपलब्ध कराकर आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करता है। यदि सरकारी अनुदान, प्रशिक्षण और किसान का कौशल मिलाकर इस दिशा में कदम बढ़ाएँ, तो बकरी पालन ग्रामीण भारत की आर्थिक तस्वीर बदलने की पूरी क्षमता रखता है।

