संकट में केला उत्पादक किसान: मिठास में छुपा कड़वा सच
उत्तर प्रदेश के केला किसानों की समस्याओं पर एक व्यापक कवर स्टोरी :
Dr. Jitendra Singh
Cover Story on Banana Grower Farmers : Rising costs, falling prices
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के केला उत्पादक किसानों की आंखों में आंसू हैं। वह अपने हाथों से लगाई गई केले की फसल को ट्रैक्टर से जोत रहे हैं। पिछले साल जो केला ₹2,000-2,300 प्रति क्विंटल बिकता था, इस साल वह महज ₹600-700 प्रति क्विंटल मिल रहा है। यह सिर्फ लखीमपुर खीरी के किसानों की कहानी नहीं है – कमोबेस यह पूरे उत्तर प्रदेश के केले किसानों के संघर्ष की दास्तान है।

कीमतों में भयावह गिरावट
वर्ष 2025 केला किसानों के लिए विनाशकारी साबित हुआ है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं – केले की कीमतें 60 फीसदी तक गिर गई हैं। जो फल बाजार में ₹60-70 प्रति दर्जन बिकता है, उसी के लिए किसान को केवल ₹7 प्रति किलो यानी ₹700 प्रति क्विंटल मिलता है। लागत ही ₹800-900 प्रति क्विंटल आती है, तो किसान घाटे में कैसे न जाएं?
सीतापुर जिले के किसान बताते हैं कि पिछले साल केले का थोक रेट ₹1,800-2,200 प्रति क्विंटल था, लेकिन इस बार केवल ₹700-800 मिल रहा है। एक एकड़ में 1,250 पौधे लगाने की लागत प्रति पेड़ ₹140 तक आती है। किसानों का कहना है कि, “अब केले में मिठास नही, मुश्किलें ज्यादा हैं।“
उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी के प्राचार्य एवं विधि विशेषज्ञ प्रो. धर्मेन्द्र कुमार सिंह का मानना है कि, “अन्य फसलों की तरह केले का भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) होना चाहिए। साथ ही, फसल बीमा योजना को और प्रभावी एवं किसानों की वास्तविक जरूरतों के मुताबिक बनाया जाना चाहिए, ताकि प्राकृतिक आपदा या बाजार में मूल्य गिरावट जैसी परिस्थितियों में किसानों को पर्याप्त आर्थिक सुरक्षा मिल सके।”
उत्पादन बढ़ा, लेकिन आय घटी
विडंबना यह है कि पिछले पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में किसानों ने केले की खेती अपनाई है। अतिरिक्त उत्पादन और बाजार में आपूर्ति बढ़ने से कीमतों में गिरावट आई है। राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत किसानों को ₹30,738 का अनुदान दिया जा रहा है, लेकिन बाजार की समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा।
बिचौलियों का शिकंजा
केले की खेती में सबसे बड़ी समस्या बाजार में बिचौलियों का वर्चस्व है। बिचौलिये किसानों से कम दाम पर केला खरीदकर शहरों में ऊंचे दामों पर बेचते हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें न तो भंडारण की सुविधा मिलती है और न ही प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंच है। बाजार तक पहुंचने के लिए वे मजबूरन बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं।
मौसम की मार
प्राकृतिक आपदाओं का कहर ने केले किसानों की मुश्किलें और भी बढ़ा दी हैं। पंजाब और आसपास के राज्यों में बाढ़ के कारण परिवहन में दिक्कत हुई है, जिससे बाहरी व्यापारी यूपी के जिलों तक नहीं पहुंच पा रहे। अनियमित वर्षा, सूखा और बेमौसमी बारिश ने फसल की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। केले की खेती के लिए महीने में 100 मिमी वर्षा की कमी से गुच्छों का वजन 9 फीसदी तक कम हो सकता है। साल में 1,100 मिमी से कम वर्षा होने पर उत्पादन में 20-65 तक की हानि हो सकती है।
कीट और बीमारियों का प्रकोप
केले की खेती में फ्यूजेरियम विल्ट (पनामा रोग), सिगैटोका पत्ती रोग, और केले का बंची टॉप वायरस जैसी बीमारियां प्रमुख चुनौतियां हैं। पारंपरिक पौधे रोपण से रोगों का फैलाव होता है। टिश्यू कल्चर तकनीक से रोगमुक्त पौधे मिलते हैं, लेकिन इसकी उपलब्धता और जानकारी का अभाव है।
उत्तर प्रदेश में केला उत्पादन कुल बागवानी क्षेत्र का 12 फीसदी और कुल उत्पादन का 27 फीसदी है, लेकिन राष्ट्रीय उत्पादन में राज्य का योगदान केवल 4.5 फीसद है। यह दर्शाता है कि उत्पादकता में सुधार की गुंजाइश है।
उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी की कृषि विज्ञानी प्रो. प्रज्ञा परमिता का कहना है कि, “केले की खेती में स्थायित्व लाने के लिए फसल विविधीकरण और टिश्यू कल्चर आधारित पौधों का उपयोग बेहद जरूरी है। साथ ही किसानों को प्रशिक्षण और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देकर ही उन्हें बाजार प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाया जा सकता है।”
किसानों की आर्थिक दुर्दशा
केले की खेती में भारी निवेश की जरूरत होती है। कौशांबी जिला, जिसे यू. पी. का केला लैंड से जानते हैं, के किसानों का कहना है कि प्रति हेक्टेयर ₹1.02 लाख तक का निवेश करते हैं। लेकिन उचित मूल्य न मिलने से वे कर्ज में डूब जाते हैं। कई किसानों ने ऋण चुकाने के लिए अपनी जमीन तक बेच दी है।
प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव
उत्तर प्रदेश में केले के प्रसंस्करण की मूलभूत सुविधाएं तक नही हैं। पारंपरिक विपणन पद्धति अपनाने वाले अधिकांश किसान केले को प्रसंस्करित नहीं कर पाते क्योंकि सुविधाओं और बाजार संपर्क का अभाव है। केला चिप्स, पल्प, पाउडर जैसे मूल्य संवर्धित उत्पादों की संभावनाएं हैं, लेकिन निवेश की कमी है।
सरकारी योजनाओं का धीमा रफ्तार
केंद्र सरकार की एमआईडीएच योजना के तहत केले की खेती के लिए सकर रोपण हेतु ₹0.87 लाख प्रति हेक्टेयर और टिश्यू कल्चर के लिए ₹1.25 लाख प्रति हेक्टेयर की 40 फीसदी सहायता दी जाती है। प्रदेश में 23 जिलों में टिश्यू कल्चर केले की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन की गति धीमी है और किसानों तक सही जानकारी नहीं पहुंच रही। ड्रिप सिंचाई के लिए अनुसूचित जातिध्जनजाति को 90 प्रतिशत और सामान्य वर्ग को 80 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान है, लेकिन इसका लाभ सीमित किसानों को ही मिल पा रहा है।
समाधान की तलाश
तत्काल सुधार की दरकार
मूल्य स्थिरीकरण: केले के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा होनी चाहिए। साथ ही फसल बीमा योजना को और प्रभावी बनाने की जरूरत है।
प्रसंस्करण इकाइयां: जिला स्तर पर केले की प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करनी होंगी। कोल्ड स्टोरेज और पैक हाउस की सुविधा बढ़ानी होगी।
किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ): सामूहिक विपणन के लिए एफपीओ का गठन करना होगा ताकि बिचौलियों की दखल कम हो सके।
तकनीकी सुधार: टिश्यू कल्चर पौधों की उपलब्धता बढ़ानी होगी और किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देनी होगी।
डिजिटल मार्केटिंग: ऑनलाइन और ईकामर्स प्लेटफॉर्म के जरिए किसानों को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ना होगा।
व्यक्तिगत प्रयास: पीएम-किसान योजना के तहत ₹6000 सालाना सहायता का लाभ उठाएं एवं किसान क्रंडिट कार्ड से कम दर पर ऋण लेकर अपनी वित्तीय स्थिरता को बनाए रखें।
आगे की राहः उत्तर प्रदेश के केले किसानों की स्थिति तभी सुधरेगी जब सरकार, कृषि वैज्ञानिक और निजी क्षेत्र मिलकर किसानों की समस्या का एक समग्र रणनीति तैयार करें। केले की बढ़ती मांग को देखते हुए, यदि खेत से लेकर बाजार तक पूरी श्रृंखला को सुधारा जाए तो यह फसल किसानों के लिए वरदान बन सकती है।
लेकिन, फिलहाल तो उत्तर प्रदेश के हजारों किसान अपने सपनों को ट्रैक्टर से रौद रहे हैं। उनकी नम आंखों में सवाल है – क्या सरकार उनकी सुनेगी? क्या बाजार में न्याय मिलेगा? या फिर लोगो को मिठास देने वाली यह फसल किसानों के लिए कड़वी साबित होगी। फिर मिलेंगे, एक और सवाल के सच की तलाश में।

