केला की व्यावसायिक खेती: किसानों की तरक्की का सुनहरा जरिया
“Commercial Banana Farming: A Golden Way to Farmers’ Prosperity”
केला की व्यावसायिक खेती: केला की खेती की 10 लाभप्रद बातें, किस्में, तकनीक, लागत, सरकारी सब्सिडी योजनाएँ और 1 एकड़ से होने वाली आय-व्यय जानकारी।
खेती में बदलाव की तलाश कर रहे किसानों के लिए केला की खेती नई उम्मीद लेकर आ आयी है। पारंपरिक फसलों की तुलना में कम समय और कम जोखिम में अधिक पैदावार देने वाली यह फसल किसानों की मोटी कमाई कराने में बड़ी भूमिका निभा रही है। बाजार में इसकी सालभर मांग बनी रहती है, वहीं प्रोसेसिंग और निर्यात उद्योग भी इसे खास महत्व देता है। वैज्ञानिक तकनीकों, ऊतक संवर्धन (टिश्यू कल्चर) पौधों और आधुनिक प्रबंधन से खेती करने पर किसान अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं। सब्जी व फल दोनों तरह से बड़ी मात्रा में उपभोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त केले का बड़ी मात्रा में उपयोग चिप्स, बेबी फूड, आटा, चटनी, जैम आदि बनाने में किया जाता है। पौधे के तने का प्रयोग टिशू पेपर व रेशा पेपर बोर्ड बनाने में किया जाता है। यही वजह है कि देश के कई हिस्सों में किसान अब केला उत्पादन की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं और इसे एक टिकाऊ व लाभकारी व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं। इस लेख के जरिए किसानों को केले की खेती के वैज्ञानिक पहॅलुओं, तकनीकी प्रयोग, उचित प्रबंधन, सरकारी सब्सिडी योजनाएँ एवं 1 एकड़ खेती का आय-व्यय की जानकारी दी जा रही है। इससे आपको अंदाजा लग जायगा कि अन्य फसलों की तुलना में केला की खेती कितनी लाभकारी है।

जलवायु: केला की सफल खेती के लिए गर्म व तर जलवायु की आवश्यकता होती है। पाला व अधिक ठण्ड पौधों की वृद्धि के हानि कारक होता है। अधिक गर्मी का फसल पर प्रतिकूल प्रभाव नही होता है। गर्मी में जहा 36 से 38 सेन्टीग्रेड तापमान के आस – पास रहता हो इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम रहता है।
भूमि का चुनाव: इसकी खेती के लिए दोमट या मटियार दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। अधिक उत्पादन की दृष्टि से जीवांश युक्त उर्वर भूमि का चुनाव करना चाहिए। भूमि का पी.एच मान 6 से 7.5 तक होना चाहिए। भूमि में एक मीटर की गहराई तक सख्त व पथरीली सतह नही हानी चाहिए। भूमि में अच्छे जल निकास की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
खेत की तैयारी: खेत को मिट्टी पलट हल से 3 – 4 जुताई करने के बाद पाटा चलाकर अच्छी तरह समतल कर देना चाहिए। यदि समतल खेत में सीधे रोपण का कार्य करना है तो खेत में अन्तिम जुताई के समय हेप्टाक्लोर या एल्ड्रिन 5 प्रतिशत धूल 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए। इससे भूमिगत लगभग सभी तरह के कीड़ों का नियंत्रण हो जाता है।
रोपण का उपयुक्त समय: खेत में पौध रोपण का मुख्य समय मार्च-अप्रैल गर्मियों से पहले यानी प्री-मानसून का होता हैं। इस समय पौधे अच्छी तरह जड़ बना लेते हैं और मानसून से पहले या मानसून के शुरू होते ही तेजी से विकास होनें लगता है। दूसरा अच्छा समय जुलाई -अगस्त और अगस्त – सितम्बर यानी मानसून के बीच या फिर बाद का समय होता हैं। नए पौध रोपण के लिए बारिश अच्छी होती है। बारिस से मिट्टी नरम रहती है और पौधों की बढवार आसानी से होती है। अत्याधिक ठंड के महीने (दिसम्बर-जनवरी) और अत्यधिक सूखे महीनों में रोपण से बचना चहिए।
उन्नतशील प्रजातिया : किसान भाई हमेश उन्नतशील प्रजातियों का चुनाव करें। हरी छाल, बसराई, अल्पान, मालभोग, रोबस्टा, मंथुन, ग्रास मिचेल, मूलेठी, सफेद बेलची, लाल केला, भुरकेल, लाल बेलची, भिडोली, गजेली, सोन केला, राजापुरी, आदि केले की उन्नतशील किस्में हैं।
सब्जी की किस्में : कोठिया, हजारा, कम्पियरगंज, कंचकेल, बेहुला आदि किस्में सब्जी के लिए उगाई जाती हैं। केले बहुत किस्में उपलब्ध हैं, लेकिन यू. पी. में केले की व्यावसयिक खेती के लिए ये किस्में ज्यादा लाभकारी अच्छी हैं।
यूपी में केले की प्रमुख Improved Varieties
- G-9 (Grand Naine / G-9 Tissue Culture)
- सबसे लोकप्रिय व्यावसयिक किस्म।
- 11–12 महीने में तैयार हो जाती है।
- गुच्छे बड़े, औसतन 25–30 किलो तक।
- ऊतक संवर्धन पौधे से समान आकार और रोग प्रतिरोधी पौधे।
- ड्वार्फ कैवेंडिश (Dwarf Cavendish)
- पौधे छोटे कद के, हवा से कम गिरते हैं।
- उपज ~30–35 टन प्रति हेक्टेयर।
- रोबस्टा (Robusta)
- बड़ा गुच्छा और अच्छे दाने।
- मिठास और स्वाद बेहतर।
अन्य महत्वपूर्ण किस्में
- भुसावाल किस्में (Basrai) – यह किस्म उत्तर प्रदेश के कई जिलों में उगाई जाती है।
- लाल केला (Red Banana) – मुख्यतः दक्षिण भारत में, पर अब उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी परीक्षणाधीन है।
- नेंदरन (Nendran) – चिप्स और प्रोसेसिंग के लिए।
- मलभोग – मिठास के कारण स्थानीय बाजार में लोकप्रिय।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन : केले की अच्छी पैदावार के लिए खेत में रासायनिक उर्वरकों के साथ देशी खादों का प्रयोग करना चाहिए है। इसके लिए 200 ग्राम नत्रजन, 100 ग्राम फास्फोरस और 240 ग्राम पोटाश प्रति पौधा जरूरत होती है। इनमें नत्रजन की पूरी मात्रा को 8 बराबर भागों में बाट कर अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर व फरवरी, मार्च, अप्रैल एवं मई माह में देना चाहिए। फास्फोरस की आधी मात्रा रोपाई के पूर्व देशी खाद और मिट्टी में मिलाकर देना चाहिए। शेष बची मात्रा को दो बार में अक्टूबर व मार्च माह में प्रयोग करना चाहिए। इसी तरह पोटाश की पूरी मात्रा को तीन बराबर भागों में बाट कर व नत्रजन के साथ मिलाकर अगस्त, अक्टूबर एवं अप्रैल माह में फूल आने से पूर्व पौधों को देना चाहिए। इन खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग पौधे के तने से 10 से 15 सेंमी. की दूरी पर चारों तरफ डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देते है।
प्रवर्धन : केले के पौधों का प्रवर्धन पुत्तियों/सकर्स के व्दारा होता है। ये सकर्स दो प्रकार की होती हैं। प्रथम सोर्ड व व्दितीय वाटर सकर्स होती हैं। इसमें सोर्ड सकर्स रोपाई के लिए सर्वोत्तम होती है। व्दितीय प्रकार की वाटर सकर्स रोपाई के लिए उपयुक्त नही होती, क्याकि इनमें फल देर से व कम संख्या में लगते हैं। इन सकर्स को मुख्य पौधों से निकाल कर रोपण से पूर्व नर्सरी में तैयार करते है, तत्पश्चात खेत में रोपाई करते है। रोपण के बाद एक हल्की सिंचाई अवश्य करना चाहिए।
रोपण विधि : पौधों की दूरी किस्म, स्थान एवं मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करता है। कम बढ़ने वाली किस्मों को 1.5 से 2 मीटर व अधिक बढ़ने वाली किस्मों को 2 से 3 मीटर की दूरी पर रोपाई की जाती है। हालांकि सघन रोपण करने से उत्पादन अधिक प्राप्त होता है। रोपण के लिए उचित दूरी पर चिनह लगा कर 50×50×50 सेंमी. आकार के गड्डे तैयार कर लिए जाते है। इन गढ्डों में उचित मात्रा में खाद व मिट्टी भरने के बाद रोपण करना चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन : केला की फसल अधिक पानी चाहने वाली फसल है। ग्रीष्म ऋतु में एक सप्ताह के अन्तर पर व शीत ऋतु में 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। केले के खेत में नमी बनाएं रखना चाहिए, लेकिन जल भराव नही होना चाहिए। पाला पड़ने की सम्भावना हो तो सिंचाई अवश्य करना चाहिए। केला की फसल में ड्रिप सिंचाई विधि लाभकारी होती है। इससे खर्च घटता है और उत्पादन बढ़ता है।
खरपतवार नियंत्रण : खेत को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए आवश्यकतानुसार निकाई-गुडाई करते रहना चाहिए। केला उथली जड़ वाली फसल होने के कारण कम निकाई-गुडाई की जरूरत पड़ती है। आरम्भ में खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना बहुत आवश्यक होता है।
मल्चिंग : खेत में पौधों के नीचे गन्ने की पत्ती व पुआल की 8 से 10 सेंमी. मोटी पर्त बिछाने की क्रिया को मल्चिंग कहते हैं। मल्चिंग से उत्पादन व भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ जाती है। मल्चिंग अक्टूबर माह में करनी चाहिए। इसके लिए पालीथीन का भी इस्तेमाल कर सकते है। इससे सिंचाई जल में 40 प्रतिशत तक की कमी आती है और खरपतवारों से भी छुटकारा मिल जाता है।
मिट्टी चढ़ना : पौधों में वर्षा ऋतु में मिट्टी चढ़ाना लाभकारी होता है। इससे पौधे के तने के पास पानी नही ठहरता, जिससे वर्षा व तेज हवा चलने पर पौधे गिरते नही हैं।
सकर्स निकालना : मुख्य पौधे से पूरे जीवन काल में बहुत सी सकर्स निकलती है। इन सभी सकर्स को काटते रहना चाहिए। पौधे में फूल आते समय प्रथम सकर्स व फल पकते समय दूसरी सकर्स बढ़ने के लिए छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से फसल से हमेशा उत्पादन मिलता रहता है।
फलों के गुच्छों को काटना : केले में पौध रोपण के 12 माह बाद फूल आते हैं और दो माह में फल बन जाते हैं। पौधों पर फलिया आ जाने के बाद निचले पुष्पक्रम के अगले भाग को काट देना चाहिए। इससे फलों की बढ़वार अच्छी होती है। पौधों की सूखी कीट व रोग्रसित पत्तियों को काट अलग कर देना चाहिए।
सहारा देना : पौधों पर गुच्छे आ जाने के बाद पौधों का उपरी भाग भारी हो जाता है और पौधा गिरने की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिए बास की कैची बना कर पौधों को सहारा दे देना चाहिए। इस क्रिया को प्रोपिंग कहते हैं।
फसल सुरक्षा : केले की फसल को मुख्य रूप से घुन, पत्ती और फल भृंग एवं माहू आदि कीट प्रमुख रूप से हानि पहॅुचाते हैं। ये सभी कीट पौधों को नाना प्रकार से हॅानि पहॅुचाते है। घुन के नियंत्रण के लिए एल्ड्रिन 5 प्रतिशत धूल को प्रति पौधा 30 से 50 ग्राम जमीन में डालना चाहिए। पत्ती और फल भृंग कीट के नियंत्रण के लिए थायोडान 35 ई.सी. दवा का 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। माहू के नियंत्रण के लिए डायोमेथोएट 50 ग्राम प्रति पौधा की दर से देना चाहिए।

केले की फसल को रोगों से बहुत नुकसान होता है। इनमें पर्ण चित्ती, बन्चीटाप, फल विगलन, तना गलन आदि प्रमुख रोगों से हानि पहुचती है। पर्ण चित्ती के नियंत्रण लिए ब्लाईटास्क दवा का 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। बन्चीटाप रोग के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 1.25 मिली.लीटर दवा का छिड़काव करना चाहिए। फल विगलन रोग के नियंत्रण के लिए ब्लाईटास्क-50 या कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत के दर से 2 से 3 छिड़काव करना चाहिए। तना गलन रोग के लिए डाईथेन -45 का 0.2 प्रतिशत के दर से 10 से 15 दिन के अन्तर पर आवश्यकतनुसार छिड़काव करना चाहिए।
थैला बंदी : गुच्छों को तेज धूप, ठंड, धूल व चिड़ियों से बचाने के लिए थैला बंदी करना चाहिए। पौधों की पत्तियो व बोरों से गुच्छों को ढकने का कार्य किया जा सकता है। अब तो रेडीमेड थैले बाजार में आ गए हैं।
फलों की कटाई : फलों की कटाई का समय प्रयोग की गई किस्मों के उपर निर्भर करता है। पौधों की रोपाई के बाद छोटी किस्में 11 से 14 माह व लम्बी किस्में 15 से 16 माह में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब फलियों की चारों धारिया तिकोने से गोलाई में परिवर्तित हो जाय तो समझना चाहिए फल कटाई के लिए तैयार हैं। कटाई का कार्य सितमबर से अप्रैल तक होता है। केले के गुच्छों की कटाई डंठल सहित तेज धार दार चाकू से करना चाहिए।
फलों को पकाना: व्यावसायिक स्तर पर केला को पकाने के लिए केले के ढेर पर 500 पी.पी.एम. का इथ्रेल का छिड़काव करके बोरे से ढक देते है। इससे केला अच्छी तरह पकने के साथ-साथ फलों का रंग भी अच्छी तरह विकसित होता हैं। फलों को पकाने के लिए घार को बंद कमरे में रखकर केले की पत्तियों से ढक दिया जाता है। कमरे के किसी एक कोने में अॅगीठी या उपले जलाकर कमरें को गीली मिट्टी से अच्छी तरह सील कर देते हैं। इस प्रकार से केला 48 से 72 घंटे में पककर तैयार हो जाता है। इस विधि से पकाने से फलों चित्तिया पड़ जाती है और केला में मिठास अधिक होती है।
उत्पादन एवं आर्थिकी : केले की औसत पैदावार 200 से 250 कुन्तल प्रति एकड़ तक होती है। केले का उत्पादन किस्म, भूमि की उर्वरा शक्ति, फसल प्रबंधन, खेत में पौधों की संख्या, जलवायु आदि पर निर्भर करता है।
एक एकड़ केले की खेती का संभावित आय–व्यय विवरण
लागत (व्यय)
| मद | अनुमानित खर्च (₹ में) |
| ज़मीन की तैयारी (जुताई, समतल करना, गड्ढे खोदना) | 6,000 – 8,000 |
| टिश्यू कल्चर पौधे (लगभग 1,200 पौधे @ ₹12–15 प्रति पौधा) | 14,000 – 18,000 |
| खाद (गोबर, कम्पोस्ट) | 8,000 – 10,000 |
| रासायनिक उर्वरक (DAP, MOP, यूरिया आदि) | 10,000 – 12,000 |
| कीटनाशक व दवाई | 5,000 – 6,000 |
| सिंचाई (ड्रिप लगाने पर शुरुआती लागत अधिक, लेकिन बाद में बचत) | 8,000 – 12,000 |
| मजदूरी (रोपाई, गुड़ाई, पत्तियाँ काटना, कटाई आदि) | 15,000 – 20,000 |
| बांस/रस्सी/सहारा (propping) | 6,000 – 8,000 |
| पैकिंग व ट्रांसपोर्ट | 10,000 – 12,000 |
| कुल व्यय | 85,000 – 1,05,000 |
उत्पादन व आय
- पौधे: लगभग 1,200
- प्रति पौधा फल: औसतन 20–25 किलो
- कुल उत्पादन: 22–25 टन (22,000 – 25,000 किलो)
- औसत बाजार भाव: ₹12 – ₹18 प्रति किलो (मंडी/सीजन पर निर्भर)
कुल आय:
- न्यूनतम: 22,000 × ₹12 = ₹2,64,000
- अधिकतम: 25,000 × ₹18 = ₹4,50,000
शुद्ध लाभ (Net Profit)
- कुल आय – कुल व्यय
- न्यूनतम: ₹2,64,000 – ₹1,05,000 = ₹1,59,000
- अधिकतम: ₹4,50,000 – ₹85,000 = ₹3,65,000
आर्थिक पहलू : देश में 86 फीसदी छोटे एवं सीमांत किसान है। आर्थिक दृष्टि से इन किसानों के लिए केले की खेती जादू की छडी साबित हो सकती है। एक एकड़ केले से किसान लगभग 1.5 से 3.5 लाख तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं, जो बाजार भाव, उत्पादन और लागत पर निर्भर करता है।
यूपी में केले की खेती से संबंधित प्रमुख सरकारी योजनाएँ
- Establishment of New Gardens of Fruits under National Horticulture Mission (NHM / MIDH ) – इस योजना के तहत केले सहित विभिन्न फलों के नए बगीचे स्थापित करने पर किसानों को इनपुट-लागत पर 40-50% की सब्सिडी मिलती है।
- Phalpatti Vikas Yojana – यह योजना राज्य बागवानी विभाग द्वारा चलायी जाती है, जिसका उद्देश्य फल बेल्टों का विकास करना है, जैसे फल उद्यान बनाना, ग्रेडिंग-पैकिंग केंद्र इत्यादि सुविधाएँ बढ़ाना। केले की खेती से जुड़ी योजनाओं में यह एक आधार योजना है।
- वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (One District One Product / ODOP) – कुशीनगर जिला – केले की खेती को ODOP योजना में विशेष उत्पाद के रूप में शामिल किया गया है, जिससे विशेष विकास, विपणन और सहायता प्राप्त होती है।
- Integrated Horticulture Mission / बागवानी मिशन अन्तर्गत अनुदान – जिलों में बागवानी (जिनमें केला भी शामिल है) के लिए विभिन्न अनुदानों की व्यवस्था है जैसे जैविक खेती, वर्मी कंपोस्ट, कीटनाशक, आदि।
केला की व्यावसायिक खेती के फायदे :
- अधिक पैदावार – पारंपरिक फसलों की तुलना में केला से प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन मिलता है।
- जल्दी आय – केवल 11 से 12 महीने में फसल तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को जल्दी आमदनी मिलती है।
- सालभर मांग – केला ऐसा फल है जिसकी बाजार में हर मौसम यानी साल भर मांग बनी रहती है।
- प्रोसेसिंग और निर्यात – चिप्स, पाउडर, जैम और निर्यात के कारण अतिरिक्त आय के अवसर खुलते है।
- सरकारी सहायता – राज्य सरकारे बागवानी योजनाओं और सब्सिडी से किसानों को आर्थिक सहयोग प्रदान करती है। वैज्ञानिक खेती से मुनाफा दोगुना – टिश्यू कल्चर पौधे और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकें उत्पादन बढ़ाती हैं और लागत घटाती हैं।
- रोजगार सृजन – इससे किसानों को केवल खेती तक सीमित लाभ नहीं मिलता, बल्कि पैकिंग, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन से भी अतिरिक्त कमाई के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।

केला की खेती में 10 प्रमुख ध्यान देने वाली लाभप्रद बातें :
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) में नामांकन करवाएं। यह प्राकृतिक आपदा और कीमत गिरने से होने वाले नुकसान को कवर करता है।
- केला अच्छी किस्म (जैसे G-9 tissue culture) का चुनाव बहुत ज़रूरी है।
- केला की फसल में ड्रिप सिंचाई से खर्च घटता है और उत्पादन बढ़ता है।
- पौधों को समय पर सहारा (propping) और पत्तियों की छंटाई से फल की क्वालिटी बेहतर मिलती है।
- छोटे किसान बिचौलियों को हटाकर सीधे उपभोक्ताओं, रिटेलर्स और होटल-रेस्तराओं से संपर्क करने पर अधिक लाभ मिलता है।
- Farmer Producer Organizations (FPO) बनाकर सामूहिक बिक्री करें। FPO में शामिल होने से किसानों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति बढ़ती है।
- फसल लगाने के समय ही भविष्य की कीमत लॉक कर दें (हेजिंग), जिससे कीमत गिरने का जोखिम कम हो जाए। FPO के माध्यम से सामूहिक हेजिंग करना अधिक फायदेमंद होता है।
- WhatsApp Business, Facebook के जरिए डायरेक्ट कस्टमर बेस बनाएं।
- मोबाइल ऐप्स के माध्यम से रियल-टाइम कीमतों की जानकारी लें।
- किसान प्री-हार्वेस्ट कॉन्ट्रैक्ट में उचित दरें तय करें और लिखित समझौता करें।

