पपीते की व्यावसायिक खेती
वैज्ञानिक तरीके से प्रति एकड 3.5 लाख तक की आय कैसे पाएं
पपीते की वैज्ञानिक खेती— किस्में, रोपाई, उर्वरक, सिंचाई, रोग प्रबंधन, लागत व लाभ की पूरी जानकारी।
Key Words : पपीते की खेती, उपयुक्त जलवायु, मृदा चयन, उन्नत किस्में, नर्सरी प्रबंधन, पपीता रोपाई का समय, रोपण तकनीक, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई प्रबंधन और ड्रिप सिस्टम, पपीते के प्रमुख रोग एवं कीट नियंत्रण, पुष्पन, फलन और तुड़ाई, उत्पादन, लागत और लाभ, सरकारी सब्सिडी
डा. जितेन्द्र सिंह
हमारे देश में पपीते की खेती किसान नकदी और व्यावसायिक फसल के रूप में करते हैं। इसकी सबसे खास यह है कि यह रोपण के 8-10 माह बाद ही फल देना प्रारम्भ कर देता है, जिससे कम समय में किसानों को नियमित आय मिलना शुरू हो जाता है। एक बार पौध रोपण के बाद लगातार 2-3 वर्षों तक व्यावसायिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
पपीता एक अत्यंत पौष्टिक, सुपाच्य और औषधीय गुणों से भरपूर फल है, जो विटामिन- ए, विटामिन -सी तथा पपेन एंजाइम का प्रमुख स्रोत माना जाता है। लोगो के लिए स्वास्थ्यवर्धक फसल है, तो किसानों के लिए आर्थिक समवृद्धि का जरिया। यही कारण है कि आज पपीते की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल बन चुकी है। उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न प्रान्तों में किसान पपीते की खेती सफलतापूर्वक कर रहे हैं और इससे उनकों खूब आर्थिक लाभ भी मिल रहा है। छोटे और सीमांत किसानों की आय बढाने की दृष्टि से पपीत की खेती किसी वरदान से कम नही हैं।
यदि किसान वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उन्नत तकनीक, किस्मों का चयन, संतुलित पोषण प्रबंधन, उचित सिंचाई एवं रोग-कीट नियंत्रण आदि कृषि क्रियाओं को अपना कर भरपूर उत्पादन और लाभ प्राप्त कर सकते हैं। मार्च – अप्रैल का समय रोपण के लिए उपयुक्त माना जाता है, विशेषकर अप्रैल में लगाए गए पौधों में विषाणु एवं फफूंद जनित रोगों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। कम लागत, शीघ्र उत्पादन और स्थिर बाजार मांग, इन तीनों कारणों से पपीते की वैज्ञानिक खेती, आज किसानों के लिए एक भरोसेमंद और लाभकारी विकल्प बनकर सामने आ रही है।
जलवायु आवश्यकता :
पपीते की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। यह उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अच्छी तरह से उगता है। पपीते के पौधे के समुचित विकास के लिए 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम होता है।
मृदा चयन :
पपीते की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का PH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। हल्की मिट्टी में देशी खादों का प्रयोग कर पपीते की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। पपीतें की व्यावसायिक खेती के लिए 2-3 इंच ऊंची उठी हुई क्यारियां बनाकर करना अधिक उपयुक्त होता है।
पपीते की उन्नत किस्में :
कृषि वैज्ञानिकों द्वारा पपीते की कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं जो अधिक उत्पादन और रोग प्रतिरोधकता के लिए जानी जाती हैं।
किस्म का नाम विकास वर्ष पौधे की ऊंचाई प्रति पौधा उपज
पूसा नन्हा 1983 120 सेमी 25-30 किग्रा
पूसा जायंट 1981 92 सेमी 30-35 किग्रा
पूसा डेलिशियस 1986 216 सेमी 40-45 किग्रा
पपीते की प्रमुख उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं :
पूसा नन्हा किस्म:
यह किस्म 1983 में विकसित की गई थी। इसके पौधे की ऊंचाई 120 सेमी होती है । फल मध्यम तथा छोटे आकार के होते हैं। जब पौधे जमीन से 30 सेमी बड़े हो जाते हैं, तब फल लगने की क्रिया शुरू हो जाती है ।
पूसा जायंट किस्म :
1981 में विकसित इस किस्म के फल मध्यम और छोटे आकार के होते हैं। जब पौधे जमीन से 92 सेमी की ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं, तब फूल आना शुरू हो जाता हैख्3,।
पूसा डेलिशियस किस्म :
यह 1986 में विकसित एक उच्च उत्पादकता वाली किस्म है जो प्रति पौधा 40-45 किलोग्राम फल देती है। पौधे 80 सेमी की ऊंचाई पर फल देना शुरू कर देते हैं।
पौध तैयार करना : नर्सरी प्रबंधन
बीज की मात्रा और उपचार :
प्रति हेक्टेयर के लिए 250-300 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बीजों को बुवाई से पूर्व 0.1 प्रतिशत मोनोसान (फिनाइलमर्क्यूरिक एसीटेट) या सेरेसिन से उपचारित करना चाहिए।
बीज की बुवाई :
बीजों को 3 मीटर लंबी और 1 मीटर चैड़ी क्यारियों में 10 सेमी की दूरी पर पंक्तियों में लगभग 1 सेमी गहराई पर बोना चाहिए। बुवाई के बाद बीजों को महीन कंपोस्ट या पत्ती की खाद से ढक देना चाहिए।
सिंचाई और देखभाल :
नर्सरी में सुबह के समय हल्की सिंचाई करनी चाहिए। नर्सरी की क्यारियों को पॉलीथीन शीट या सूखे धान के पुआल से ढककर रखना चाहिए ताकि अंकुरण के समय नमी बनी रहे और सीधी धूप से पौधे सुरक्षित रहें। लगभग 2 महीने में 15 से 20 सेमी ऊंचे पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
खेत की तैयारी
भूमि की जुताई :
पपीते की खेती के लिए खेत की अच्छी तैयारी आवश्यक है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए, उसके बाद 2-3 बार हैरो या कल्टीवेटर से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए।

गड्ढों की तैयारी :
रोपाई से लगभग 15-20 दिन पहले 60×60×60 सेमी आकार के गड्ढे खोदने चाहिए। गड्ढों को 15-20 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 50 ग्राम क्लोरोपाइरीफॉस चूर्ण के मिश्रण से भर देना चाहिए।
रोपाई की विधि
रोपाई का समय :
पपीते की रोपाई के लिए मार्च-अप्रैल और जून-जुलाई का समय सबसे उपयुक्त होता है। अप्रैल में लगाए गए पौधों में रोग का प्रकोप कम होता है।
पौधों की दूरी :
सामान्य घनत्व वाली खेती में पौधे से पौधे की दूरी 2 मीटर और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 2 मीटर रखी जाती है। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर लगभग 2500 पौधे लगाए जा सकते हैं।
उच्च घनत्व वाली खेती :
उच्च घनत्व रोपण (HDP) में बौने पौधों का उपयोग करते हुए प्रति हेक्टेयर अधिक पौधे लगाए जाते हैं। इस विधि में पौधों की दूरी 1.5×1.5 मीटर या 1.8×1.8 मीटर रखी जाती है।
विभिन्न रोपण प्रणालियों में पौधों की संख्या :
रोपण प्रणाली पौधों की दूरी प्रति हेक्टेयर पौधे
सामान्य घनत्व 2×2 मीटर 2500
उच्च घनत्व 1.8×1.8 मीटर 3000-3500
अति उच्च घनत्व 1.5×1.5 मीटर 4000-4500
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
जैविक खाद :
प्रति पौधे को प्रतिवर्ष 20-25 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट देनी चाहिए। यह खाद दो भागों में विभाजित करके जुलाई और अक्टूबर महीने में देनी चाहिए।
रासायनिक उर्वरक :
पपीते के पौधे को प्रतिवर्ष निम्नलिखित मात्रा में उर्वरक की आवश्यकता होती हैरू
- नाइट्रोजन (छ) 200 ग्राम प्रति पौधा
- फॉस्फोरस (च्) 200 ग्राम प्रति पौधा
- पोटाश (ज्ञ ) 400 ग्राम प्रति पौधा
इन उर्वरकों को तीन बराबर भागों में विभाजित करके फरवरी, जून और अक्टूबर महीने में देना चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन :
सिंचाई की आवृत्ति :
पपीते के पौधे को नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। गर्मियों में 4-5 दिन के अंतराल पर और सर्दियों में 10-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली :
ड्रिप सिंचाई प्रणाली पपीते की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इससे पानी की बचत होती है और पोषक तत्वों का समान वितरण होता है। एक एकड़ के लिए ड्रिप सिंचाई सिस्टम की लागत लगभग ₹30,000 होती है।
व्यावसायिक खेती में मल्चिंग शीट के साथ ड्रिप पाइपलाइन लगाई जाती है जो मिट्टी की नमी बनाए रखने और खरपतवार नियंत्रण में सहायक होती है।

कटाई-छंटाई और प्रशिक्षण :
उच्च घनत्व रोपण में कटाई-छंटाई का मुख्य उद्देश्य ऐसे पौधे का रूप विकसित करना है जो आकार में छोटा हो, प्रकाश का अच्छा वितरण हो और प्रबंधन में आसान हो। उचित शाखा कोण और अंग दूरी वृद्धि नियंत्रण में सहायता करती है।
रोग एवं कीट प्रबंधन
प्रमुख रोग :
- पपीता मोजेक वायरस- यह विषाणु जनित रोग है जो पत्तियों पर धब्बे बनाता है। रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें और संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें।
- पाउडरी मिल्ड्यू- पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत दिखाई देती है। गंधक के घोल या कैराथेन का छिड़काव करें।
- डैम्पिंग ऑफ- यह फफूंद जनित रोग नर्सरी में अंकुरण के समय पौधों को नुकसान पहुंचाता है। बीजोपचार और उचित जल निकास से बचाव किया जा सकता है।
प्रमुख कीट :
- फल मक्खी- यह फलों को भीतर से खराब कर देती है। फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करें।
- माहू- पत्तियों और कोमल तनों से रस चूसते हैं। नीम के तेल का छिड़काव करें।
- लाल मकड़ी- पत्तियों की निचली सतह पर पाई जाती है। घुलनशील गंधक का छिड़काव करें।
पुष्पन और फलन :
पपीते के पौधे रोपाई के 6-7 महीने बाद फूल देना शुरू कर देते हैं। पूसा नन्हा जैसी किस्मों में फलन और भी जल्दी शुरू हो जाता है जब पौधे केवल 30 सेमी ऊंचे होते हैं।
पपीते में तीन प्रकार के पौधे होते हैं – नर, मादा और उभयलिंगी। व्यावसायिक खेती के लिए मादा और उभयलिंगी पौधों को रखा जाता है जबकि नर पौधों को हटा दिया जाता है।
फलों की तुड़ाई :
पपीते के फल रोपाई के 9-10 महीने बाद तुड़ाई योग्य हो जाते हैं। फलों की तुड़ाई तब करनी चाहिए जब उनके ऊपर हल्का पीला रंग दिखाई देने लगे। पूरी तरह पके फल बाजार में भेजने के लिए उपयुक्त नहीं होते क्योंकि वे जल्दी खराब हो जाते हैं।
तुड़ाई के समय फलों को डंठल सहित तोड़ना चाहिए और सावधानीपूर्वक संभालना चाहिए ताकि वे क्षतिग्रस्त न हों।

उत्पादन एवं आर्थिक लाभ :
वैज्ञानिक विधि से की गई पपीते की खेती से प्रति हेक्टेयर 30-40 टन उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उच्च घनत्व रोपण में यह उत्पादन और भी अधिक हो सकता है।
एक एकड़ में अनुमानित लागत और लाभ
खर्च का मद राशि (₹)
खेत की तैयारी और खाद 15,000
पौधे (1000 पौधे / ₹5) 5,000
ड्रिप सिंचाई सिस्टम 30,000
उर्वरक और कीटनाशक 20,000
श्रम और अन्य खर्च 30,000
कुल लागत 1,00,000
अनुमानित उत्पादन 12-16 टन
बाजार मूल्य (/₹20-30/kg) 2,40,000-4,80,000
शुद्ध लाभ 1,40,000 – 3,80,000
एक एकड़ पपीता खेती की अनुमानित लागत और आय
किसान वैज्ञानिक विधि अपनाकर प्रति एकड़ 1.5 से 3.5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं ।
उच्च घनत्व रोपण की विशेषताएं
उच्च घनत्व रोपण (HDP) की सफलता के लिए निम्नलिखित घटक महत्वपूर्ण हैं ।
- बौनी किस्मों का उपयोग
- उचित रोपण प्रणाली
- छत्र प्रबंधन (ब्ंदवचल डंदंहमउमदज)
- बौना बनाने वाले रूटस्टॉक का उपयोग
- कुशल प्रशिक्षण और छंटाई
- पौध वृद्धि नियामकों का उपयोग
- उपयुक्त फसल प्रबंधन प्रथाएं
पपीता की खेती के सफलता के सूत्र :
- रोपाई के लिए मार्च-अप्रैल का समय सर्वोत्तम होता है, विशेष रूप से अप्रैल महीने में लगाए गए पौधों में रोग का प्रकोप कम होता है।
- उन्नत और रोग प्रतिरोधी किस्मों का ही चयन करें।
- खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करें ।
- ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग का उपयोग अवश्य करें।
- नियमित रूप से पौधों की देखभाल करें और रोग-कीट प्रबंधन करें।
- खेत से संक्रमित और नर पौधों को तुरन्त हटाएं।
- फर्टिगेशन (सिंचाई जल के साथ उर्वरक देना) तकनीक अपनाएं।
- उचित समय पर फलों की तुड़ाई करें और सावधानीपूर्वक संभालें।
सरकारी योजनाएं :
पपीते की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाएँ चल रही हैं। इन योजनाओं के माध्यम से किसानों को पौधए सिंचाईए संरचना और प्रशिक्षण आदि पर सब्सिडी का लाभ उठा सकते हैं। प्रमुख योजनाएँ इस प्रकार हैंरू
Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) :
यह केंद्र सरकार की प्रमुख बागवानी योजना हैए जिसके अंतर्गत पपीता सहित फल फसलों की खेती को बढ़ावा दिया जाता है।
मुख्य लाभ
- नए बाग लगाने पर लगभग 40-50 प्रतिशत तक सब्सिडी
- उन्नत किस्मों के पौधे उपलब्ध कराना
- ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और पौध संरक्षण पर सहायता
- नर्सरी विकास के लिए भी अनुदान
Pradhan Mantri Krishi Sinchai Yojana (PMKSY) – माइक्रो इरिगेशन
पपीता में ड्रिप सिंचाई बहुत लाभकारी होती हैए इसलिए इस योजना से किसान को सहायता मिलती है।
मुख्य लाभ
- ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पर 55दृ75ः तक सब्सिडी
- पानी की बचत और उत्पादन में वृद्धि
- छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता
National Horticulture Mission (NHM) :
यह भी बागवानी विकास से जुड़ी योजना हैए जो कई राज्यों में डप्क्भ् के अंतर्गत लागू होती है।
मुख्य लाभ
- फल बाग लगाने पर आर्थिक सहायता
- पौध सामग्रीए प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन
- जैविक खेती और पौध संरक्षण पर सहायता
Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana (PMFBY) :
अगर पपीते की फसल प्राकृतिक आपदा से खराब हो जाए तो किसान को बीमा सुरक्षा मिलती है।
मुख्य लाभ
- कम प्रीमियम पर फसल बीमा
- सूखाए बाढ़ए ओलावृष्टि आदि से नुकसान की भरपाई
- बैंक या ऑनलाइन माध्यम से आवेदन
Paramparagat Krishi Vikas Yojana (PKVY) :
यदि किसान पपीते की जैविक खेती करना चाहता है तो इस योजना से सहायता मिलती है।
मुख्य लाभ
- जैविक इनपुट के लिए आर्थिक सहायता
- प्रशिक्षण और प्रमाणन
- जैविक उत्पाद की मार्केटिंग में मदद
निष्कर्ष:
पपीते की वैज्ञानिक खेती किसानों के लिए एक लाभकारी व्यवसाय सिद्ध हो सकती है। यह कम अवधि में अच्छा उत्पादन देने वाली फसल है जो उचित देखभाल और वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग से उच्च लाभ प्रदान करती है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित उन्नत किस्में, उच्च घनत्व रोपण तकनीक, ड्रिप सिंचाई और एकीकृत कीट प्रबंधन के माध्यम से किसान पपीते की खेती से अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

