जायद में कद्दू वर्गीय फसलों की आधुनिक खेती की पूरी जानकारी
Complete Information About Improved Cultivation of Cucurbits Crops in Summer
पोषण, उत्पादन और लाभ का अद्भुद संगम : कद्दू वर्गीय फसलें
डा. जितेन्द्र सिंह
Keywords : गर्मियों में लौकी, करेला, खीरा, तरबूज, खरबूज आदि कद्दू वर्गीय फसलों की उन्नत खेती, जलवायु व मिट्टी, खाद.उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई, फूल.फल झड़ने की समस्या, रोग.कीट व लाभ की पूरी जानकारी।
अपने देश में सब्जी उत्पादन में कद्दू वर्गीय फसलों का विशेष महत्व है। लौकी, करेला, कद्दू, खीरा, तोरई, तरबूज, खरबूज जैसी फसलें न केवल मानव पोषण की दृष्टि से उपयोगी हैं, बल्कि गर्मी के मौसम में किसानों की आमदनी बढ़ाने का सशक्त माध्यम भी हैं। इन फसलों की बढ़ती मांग, कम समय में तैयार होने का गुण और विविध उपयोगिता इन्हें व्यावसायिक खेती के लिए अत्यंत लाभकारी बनाती है।
हालाँकि, परंपरागत खेती पद्धतियों, वैज्ञानिक तकनीकों की कमी, उन्नत किस्मों के सीमित उपयोग तथा पोषक तत्वों और जल प्रबंधन में असंतुलन के कारण इन फसलों की उत्पादकता अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाई है। इन फसलों के उत्पादन में आधुनिक तकनीक का समावेश, उन्नत किस्मों का चुनाव, संतुलित उर्वरक उपयोग, समुचित सिंचाई प्रबंधन एवं फसल सुरक्षा को अपनाकर भरपूर उत्पादन और लाभ अर्जित किया जा सकता है।
भूमि प्रबंधन:
आमतौर से हमारे देश में जायद में कद्दू वर्गीय सब्जियों की बुआई रबी फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेतों में की जाती है। साथ ही मिट्टी की किस्म का भी घ्यान नही दिया जाता, जिससे फसलों की बुआई एवं बढ़वार दोनांे ही प्रभावित होती है। यदि रबी मौसम की फसलों की कटाई के बाद बुआई करना हो तो उन्हीं खेतों को चुनाव करें जिन फसलों की अगैती कटाई की जा सके। इस वर्ग की फसलों से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए रेतीली या रेतीली दोमट मृृृदा सर्वोत्तम होती है। इन फसलों के लिए खेत की मिट्टी का पी. एच. मान 5.5 से 7.8 के मध्य होना चाहिए। लेकिन, भूमि प्रबंधन और उचित देख-रेख के व्दारा कद्दू वर्गीय फसलों को भारी दोमट मिट्टी से लेकर रेतीली दोमट मिट्टी तक सभी प्रकार की भूमि में सफलता पूर्वक खेती की जा सकती है।
रबी मौसम की फसलों की कटाई के बाद खाली हुए खेत या पहले से खाली खेत को एक या दो गहरी जुताई के बाद हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। अन्तिम जुताई के समय 100 से 150 कुन्तल प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी खाद खेत में मिलाना चाहिए। यदि खेत में दीमक या मिट्टी में रहने वाले अन्य कीड़ों की अशंका हो तो क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पैराथियान नामक रसायन का 2 प्रतिशत चूर्ण 25 से 30 किग्रा./हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय खेत में मिलाना चाहिए।

उर्वरक प्रयोग:
प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक उत्पादन लेने के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। टिकाउ एवं लगातार अधिक उत्पादन लिए जरूरी है कि खेत में देशी खादों के साथ-साथ आवश्यकतानुसार रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाय। इसके लिए 80 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. फास्फोरस, 30 किग्रा. पोटाश एवं 30 किग्रा. कैल्सियम तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से देते हैं। इनमें नत्रजन की एक तिहाई मात्रा तथा फास्फोरस, पोटाश , कैल्सियम की पूरी मात्रा बीज की बुआई के पूर्व खेत/गड्ढों में मिला देते हैं।
प्रजातियों का चयन :
खेती में उपयोग होने वाले विभिन्न आदानों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बीज होता है। बीज की किस्म एवं गुणवत्ता पर फसल का उत्पादन और उत्पादकता निर्भर करती है। कद्दू वर्गीय फसलों के बुआई के लिए हमेशा उन्नतशील प्रजातियों का चुनाव करें। बीज को किसी विश्वसनीय संस्थान से ही क्रय करना चाहिए।
सारणी-1 कद्दू वर्गीय फसलों की उन्नतशील प्रजातिया
| क्र.सं. | फसल | उन्नतशील प्रजातिया/संकर प्रजातिया |
| 1. | लौकी | पूसा समर प्रोलिफिक लाॅग, राउण्ड, पूसा नवीन, पूसा मेघदूत, पूसा मंजरी, अर्का बिहार, पंजाब कोमल, नरेन्द्र लौकी-1, कल्यानपुर लौकी-13, कल्यानपुर हरी लम्बी, स्ंकर लौकी- पूसा मेघदूत, पूसा मंजरी, पूसा संकर-3, स्वाती, वरद, गोला |
| 2. | करेला | पूसा दो मासी, पूसा विशेष, अर्का हरित, कल्यानपुर सोना, कल्यानपुर बारह मासी, पंजाब करेला-4, प्रिया, संकर करेला विश ेष, संकर करेला- विनय, सुब्रा, ग्रीन लाॅग, चमन, समर ग्रीन |
| 3. | तरोई | पूसा नसदार, पूसा चिकनी, कल्यानपुर चिकनी, सतपुतिया, संकर- गोल्डन-40 प्रिया, हरिता, उत्सव, सुरखा, ग्रीन गोल्ड, रवीना, लता, नम्रता |
| 4. | कद्दू | येलोफ्लेश , अर्काचंदन, पूसा विश्वास, को. 1, को. 2, संकर- पूसा अलंकार, चद्रिका, पूसा संकर-1, |
| 5. | टिण्डा | अर्का टिण्डा, टिण्डाबीकानेरी ग्रीन, टिण्डा लुधियाना, टिण्डा पंजाब, कल्यानपुर, फैजाबादी, दिलपसंद |
| 6. | चिचिण्डा | को. 1, टी.ए. 19, हल्की सफेद पट्टी वाली,गहरी पट्टी वाली |
| 7. | पेठा | संकर-एमडीयू-1 |
| 8. | खीरा | समरकिंग लांग, लार्ज येलों, लार्ज रेड, सी.ओ.-1, सी.ओ.-2 जापानी लाॅग ग्रीन, पोइनसट, बालम खीरा, प्रिया, पूना खीरा |
| 9. | खरबूजा | कल्यानपुर हरा, संकर- पूसा संयोग, उपहार, राजधानी, तृप्ति, रानी, पूसा शर्बती, पूसा रसराज, हरा मधु, पंजाब सुनहरी, दुर्गापुर मधु, |
| 10. | तरबूज | लखनउ सफेद, हरा धारीदार, संकर-मधुराज, पंजाब हाईब्रिड, ड्रेक, एम. एच. सी. 2, एम.एच.सी. 6, सुगरबेबी, दुर्गापुर केसर, अर्कामानिक, अर्काज्योति, पूसा बेदाना, दुर्गापुर मीठा, इम्प्रूब्ड शि यर, संकर- संतृप्ति, अमृत, माधुरी, मधुबाला, खुसबू, जी.सी. 282, जी.सी. 286, जी.एस. 15, डिस्को 287 |
गड्ढ़ों की खुदाई:
कद्दू वर्गीय फसलों की बुआई उचित दूरी पर नालियों में या फिर गड्ढ़ो में करना ज्यादा लाभकारी होता है। फसलों को 2 से 2.5 मीटर लाइन से लाइन एवं .50 से 1 मीटर पौध से पौध की दूरी पर नालियाॅ या गड्ढे़ बनाकर बीज की बुआई करते हैं। गड्ढ़ो में बुआई करने के लिए उचित स्थान पर चिंह लगाकर 40 सेंमी. चौड़ा तथा 30 सेंमी. गहरे गड्ढ़ों की खुदाई करते हैं।

बीज की मात्रा:
कद्दू वर्गीय फसलों की बीज की मात्रा बुआई के तरीके, नालियों/गड्ढ़ो की दूरी, प्रयोग किए जाने वाले बीज के किस्म पर निर्भर करती है।
सारणी – 2 कद्दू वर्गीय फसलों की बीज की मात्रा, बोने की गहराई एवं पौध अन्तरण
| क्र.सं. | फसल का नाम | उन्नत किस्में किग्रा./हे. | संकर किस्में किग्रा./हे. | बोने की गहराई सें.मी. | कतार से कतार की दूरी सें.मी | कतार से कतार की दूरी सें.मी |
| 1. | लौकी | 5.0 | 1.5-2.0 | 3-4 | 200-400 | 60-90 |
| 2. | करेला | 6-7 | 1.9-2.25 | 3-4 | 120-150 | 50-60 |
| 3. | तरोई | 5-6 | 1.25-1.50 | 2-3 | 200-400 | 60-90 |
| 4. | कद्दू | 5-6 | 1.5-2.0 | 2-3 | 200-400 | 100-120 |
| 5. | टिण्डा | 6-7 | 1.5-2.0 | 2-3 | 120-200 | 50-60 |
| 6. | चिचिण्डा | 4-5 | 1.0-1-5 | 3-4 | 120-150 | 50-60 |
| 7. | खीरा | 3-4 | 0.80-1.0 | 3-4 | 150-200 | 60-100 |
| 8. | पेठा | 3-4 | 1.5-2.0 | 3-4 | 150-200 | 60-100 |
| 9. | खरबूजा | 2.5-3.0 | 0.50-1.0 | 2-3 | 200-300 | 70-75 |
| 10. | तरबूज | 3-4 | 0.80-1.0 | 2-3 | 200-300 | 70-75 |
बुआई एवं बीजोंपचार :
इन फसलों के बीज की बुआई का कार्य जनवरी माह से शुरू कर मार्च माह तक कर सकते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। बीज को बोने से पूर्व बीजों को मैंकोजेब की 5 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी मे घोलकर 10-20 घंटे के लिए भिगो देना चाहिए। इससे बीज का जमाव अच्छा एवं पौधे निरोगी तैयार होते हैं। उन्नतशील किस्मों का प्रति गड्ढ़ा/स्थान 4-5 बीज एवं संकर किस्म का बीज प्रति गड्ढ़ा/स्थान 2 बीज बोना चाहिए। यदि खेत की तैयारी के समय रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नही किया गया है तो गड्ढों में बीज बोने से पूर्व 50-60 ग्राम अमोनियम सल्फेट 80-100 ग्राम सिंगल सुपरफास्फेट, 20-30 ग्राम पोटैशि यम सल्फेट एवं 40-50 ग्राम जिप्सम प्रति गड्ढ़ा मिट्टी में मिलाना चाहिए।
पौध तैयार करना :
हमारे देश में रबी की फसलेंा की कटाई विलम्ब से होने कारण जायद की फसलों की बुआई में काफी देर हो जाती हैं। विलम्ब से बुआई से बचने के लिए कद्दू वर्गीय फसलों के बीज को 10 से 15 सेमी. आकार के पाली बैग में बालू, रेत, खाद और मिट्टी का मिश्रण भरकर व बीज की बुआई कर पौध तैयार कर सकते हैं। इसके लिए ग्रीन हाउस/पाली हाउस का प्रयोग किया जा सकता है। जब फसल की कटाई के बाद खेत खाली हो जाय, तब इन पाली बैग में तैयार हो रही पौध को खेत में उचित दूरी पर रोपाई कर सकते हैं। इस तरह कद्दू वर्गीय फसलों जैसे- लौकी, तरोई, नेनुआ, करेला, चिचिन्डा, कद्दू, पेठा, खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज एवं हिरमिंडी आदि की अगैती रोपाई कर एक-डेढ़ माह पूर्व फसल तैयार कर सकते हैं।
पौधों का विरलीकरण :
पौधों में जब 5-6 पत्तियाॅ आ जाएं तो विरलीकरण कर देना चाहिए। इसके लिए प्रति गड्ढ़ा/स्थान एक-दो स्वस्थ पौधों को छोड़कर अन्य सभी कमजोर एवं अस्वस्थ पौधों को निकाल देना चाहिए।
जल प्रबंधन :
कद्दू वर्गीय फसलों में उत्पादन, गुणवत्ता और स्वाद को बनाये रखने के लिए जल प्रबंधन करना बहुत जरूरी होता है। हाल के कुछ वर्षों में इन फसलों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली बहुत कारगर साबित हुई हैं। इस प्रणाली से सिंचाई करने से 50 से 60 फीसदी तक पानी की बचत होने के साथ-साथ उपज में भी बढ़ोत्तरी होती है, क्योंकि पौधों को पानी आवश्यकतानुसार और लगातार नियंत्रित मात्रा में मिलता रहता है। नियंत्रित मात्रा में खेत में पानी देने से खरपतवार भी कम उगते है। देशी विधि से गर्मी के दिनों आवश्यकतानुसार 4 से 5 दिन के अन्तराल में सिंचाई करना चाहिए। इस वर्ग की फल वाली फसलों जैसे- तरबूज, खरबूज और हिरमिंडी आदि में फलों के पकते समय कम पानी देना चाहिए, जिससे फल अधिक मीठे और स्वादिस्ट बन सके।

कम फलन की समस्या एवं निदान :
कम फलन कद्दू वर्गीय फसलों में एक प्रमुख समस्या है। प्रायः देखने में आता है कि पौधों पर फूल तो काफी संख्या में आते हैं लेकिन फूलों पर फल बहुत कम लगते हैंै। इसका प्रमुख कारण पौधों पर नर फूलो की संख्या अधिक होना और मादा फूलों की संख्या का कम होना। पौधों में मादा फूलों पर ही फल बनते हैंै। यही कारण है कि पौधों पर फूल आने के बावजूद फल लगने की संख्या काफी कम होती है। इस समस्या से निजात पाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कुछ रसायनों को खोजा है जिन्हें पादप नियामक के नाम से जाना जाता है। इन पादप नियामकों का पौधों पर दो या चार पत्तियों की अवस्था पर छिड़काव करने से उपज में काफी वृद्धि होती है। 2-4-5 ट्रा्रई आयाडोबेन्जोइक एसिड या मैलिक हाइड्राजाईड पादप नियामकों की 5 ग्राम दवा को 100 लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से मादा फूलों की संख्या काफी बढ़ जाती है। कुछ पादप नियामक अलग-अलग फसल पर अधिक कारगर होते हैं। खीरा की फसल में जिब्र्रेलिक एसिड पादप नियामक की 10 मिली./लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना ज्यादा लाभकारी होता है। इसी प्रकार तरबूज की फसल में 2-4-5 हाइड्रोबेन्जोइक एसिड की 25 मिली./लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना लाभकारी होता है। इसी प्रकार करेला और लौकी की फसलों में बोरान की 3 मिली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर पौधों पर छिड़काव करना बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है। इन पादप नियामकों के प्रयोग से फसलों में 50 प्रतिशत तक मादा फूलों में वृद्धि हो जाती है। पादप नियामकों को अच्छी तरह प्रयोग करने के लिए विशेषज्ञों से जानकारी ले लेनी चाहिए।
फसल सुरक्षा :
गर्मी के मौंसम में कद्दू वर्गीय फसलों पर कीड़े-मकोड़े एवं ब्याधियों का प्रकोप अधिक होता है। फसल से अधिक उत्पादन के लिए कीड़े-मकोड़े एवं ब्याधियों का समुचित प्रबन्ध करना आवश्यक होता है।
लाल कीट :
यह कीट कद्दू वर्गीय फसलों को सबसे अधिक हाॅनि पहुॅचाता हैं। यह लाल रंग का छोटा कीड़ा उड़ने में सक्षम होता है। गर्मी की फसल में इस कीडे़ का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता हैं। फसल पर इस कीड़े का अक्रामण प्रारंभिक अवस्था में पौधे की कोमल पत्तियां को खाकर नुकसान पहुॅचाता है। यदि इस कीड़े को समय पर न नियंत्रित किया गया तो पूरी की पूरी फसल नष्ट हो जाती है। इस कीडे़ के नियंत्रण के लिए मैलाथियान दवा की 2 मिली. या कार्बोरिल 4 ग्राम मात्रा को एक लीटर पानी की दर से घोल बनाकर एक या दो छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।
फल मक्खी :
यह कद्दू वर्गीय फसलों का दूसरा सबसे अधिक हाॅनि पहुॅचाने वाला कीट हैं। यह पीले रंग की होती है। इसका अक्रामण फलों पर प्रारंभिक अवस्था में शरू हो जाता है। यह मक्खी फलों के अंदर घुसकर खाना शुरू करती है जिससे अंदर ही अंदर फल सड़ जाते हैं। इस कीड़े का अक्रामण बहुत अधिक होता है, जिससे 70-80 प्रतिशत तक फल नष्ट हो जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 10 मिली. 50 ई.सी. दवा और 100 ग्राम गुड़ को 10 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर एक सप्ताह के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए। इन दवाओं के प्रयोग के बाद लगभग 10 दिनों तक फलों की तुड़ाई नही करनी चाहिए।
थ्रिप्स और रस चूसक कीट :
लाल कीट एवं फल मक्खी के अतिरिक्त इस वर्ग की फसलों को थ्रिप्स और रस चूसक कीड़े भी फसल को बहुत नुकसान पहुचाते हैं। इन कीड़ो के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास या डाईमेथोएट नामक दवा की 2 मिली. मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
एन्थ्रेकनोज :
यह बीमारी पौधों पर एक विशेष प्रकार के फफूॅद के कारण फैलती है। इस बीमारी से पत्तियों पर छोटे-पीले धब्बे दिखाई पड़ते हैं जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं। इस बीमारी के लगने के बाद पौधों का विकास रूक जाता है। इसकी रोकथाम के लिए डाईथेन एम-45 दवा की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर आवश्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए।
पाउडरी मिल्ड्यू या खर्रा रोग :
यह बीमारी भी फफूॅद के कारण फैलती है। इस बीमारी की प्रारंभिक आवस्था में पत्तियों की सतह पर गोल सफेद पाउडर जैसे धब्बे पड़ते हैं, बाद ये धब्बे पूरी पत्तियों पर फैल जाते हैं। पौधों पर इस प्रकार के लक्षण दिखाई पड़ते ही घुलनशील गंधक 2 ग्राम या कैराथीन 1 मिली. या फिर कैलिक्सिन 0.5 मिली. पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
उत्पादन: कद्दू वर्गीय फसलों जैसे- लौकी, तरोई, सीताफल, तरबूज आदि की पैदावार 250 से 300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर एवं करेला, खीरा, टिण्डा, चिचिण्डा, खरबूज आदि की पैदावार 100 से 200 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है। यदि इन फसलों की बुआई के लिए संकर बीज का प्रयोग किया जाता है तो लगभग 30 से 50 प्रतिशत तक उत्पादन और बढ़ जाता है।
निष्कर्ष : देश में सब्जी की फसलों के लिए ठंड का मौंसम अनुकूल होने के कारण बड़ी मात्रा में नाना प्रकार की सब्जिया उपलब्ध रहती है। लेकिन गर्मी के मौंसम में प्रमुख रूप से कद्दू वर्गीय सब्जी की फसलों पर ही निर्भर रहना पड़ता हैं। इस कारण गर्मी के मौंसम में बाजार में कद्दू वर्गीय सब्जियों की भारी माग होती है। इस कुल की कुछ फसलों जैसे- तरबूज, खरबूज, हिरमिन्डी इत्यादि को गर्मी के प्रमुख फलों के रूप में सेवन किया जाता है। इस कारण गर्मी के दिनों में इन फलों की भी भारी माॅग होती है। पोषण की दृष्टि से भी इस कुल की सब्जिया एवं फल बहुत महत्वपूर्ण होती है। जरूरत है इस कुल की फसलों के वैज्ञानिक पहलुओं के प्रचार-प्रसार की ताकि इस कुल की फसलों से किसान भरपूर उत्पादन और आमदनी प्राप्त कर सके।


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