किसानों की भरोसे मंद नगदी फसल : प्याज की उन्नत खेती
सही तकनीक, समय पर प्रबंधन और बाजार की समझ— सफल प्याज उत्पादन की कुंजी हैं।
डा. जितेन्द्र सिंह, कृषि वैज्ञानिक
Key Words : प्याज की उन्नत खेती, प्याज के औषधीय और पोषण गुण, उपयुक्त, जलवायु और मिट्टी, उन्नत किस्मों का चयन, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, बुआई, नर्सरी और रोपाई , सिंचाई और फसल प्रबंधन, कटाई, सुखाना और भंडारण, आय-व्यय विश्लेषण, संभावित लाभ।
प्याज आज सिर्फ एक सब्जी नहीं] बल्कि किसानों की आय बढ़ाने वाली एक अहम नकदी फसल बन चुकी है। भारतीय रसोई में इसकी अनिवार्य मौजूदगी] घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार मांग प्याज की खेती को बेहद लाभकारी बनाते हैं। सब्जी और सलाद से लेकर अचार व मसालों तक हर रूप में इस्तेमाल होने वाली प्याज खाड़ी देशों सहित कई विदेशी बाजारों में भी निर्यात की जाती है] जिससे देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। यही वजह है] अन्य फसलों की तुलना में प्याज की खेती से अधिक लाभ प्राप्त होता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है। क्षेत्रफल और उत्पादन में विश्व में हमारा देश पहले स्थान पर और चीन दूसरे स्थान पर आता है। भारत में दुनिया के कुल प्याज उत्पादन का करीब 28 % हिस्सा पैदा होता है। यानी पूरी दुनिया में जितना प्याज उगाया जाता है, उसका लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले भारत में ही उत्पादन होता है।
यदि किसान वैज्ञानिक तरीके व्यक्तिगत सूझ-बूझ और तकनीक के इस्तेमाल से खेती करें] तो प्रति हेक्टेयर उत्पादन और मुनाफा बढाकर समवृद्धि के व्दार खोल सकते है। आज बात करते है प्याज की वैज्ञानिक खेती के हर पहलू के बारे में ताकि किसान अधिक से अधिक उत्पादन के साथ भरपूर मुनाफा कमा सके।

स्वाद और औषधीय गुणों से भरपूर फसल :
आयुर्वेद की दृष्टि से प्याज औषधीय गुणों की खान माना जाता है। प्याज सुपाच्य] वायु] कफ] शीतल और कृमि नाशक का कार्य करती है। सफेद प्याज स्फूर्तिदायक] नये जीवन का संचार करने वाली] ताजगी प्रदान करने के साथ पुरूषत्व को बढाती है।
इसमें अनिद्रा] अजीर्ण] क्षय रोग] बवासीर] कुष्ठ रोग] रक्त विकार के रोगों का नाश करती है। यह कीटाणु नाशक एवं श्वसन तंत्र के रोगों को दूर करती है। त्वचा के सभी विकारों के लिए गुणकारी होती है।
महिलाओं की सुन्दर काया] सुडौल शरीर और अद्भुत सौंदर्य निखारने का गुण होता है। लाल प्याज भूख को बढ़ाने व अनिद्रा को दूर करती है। प्याज कीटाणु नाशक होने के कारण दातों] मसूड़ों एवं उदर के जीवाणुओं को नष्ट करती है।
जलवायु :
प्याज की फसल के लिए समशीतोष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। पौधों की बढ़वार के लिए तापमान और प्रका”k काल का बहुत महत्व होता है। गांठ बनने के पूर्व 15-5 से 21 डिग्री सेल्सियस और 10 घंटे की प्रकाश अवधि बेहतर रहती है। फरवरी माह में अचानक तापमान बढ़ने से कंद छोटे रह जाते है। प्याज की वृद्धि एवं पुष्पन में बड़ा दिन और तापमान का विशेष महत्व होता है।
मिट्टी का चयन :
प्याज की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। खेत की मिट्टी का पी.एच. मान 6 से 7 के बीच होना चाहिए। अधिक ह्यूमस वाली रेतीली दोमट या सिल्ट दोमट भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है। अधिक अम्लीय भूमि में इसकी खेती नही करनी चाहिए। भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
खेत की तैयारी :
खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद दो बार कल्टीवेटर से जुताई करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। यदि मिट्टी में गंधक की कमी हो तो 400 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय कम से कम 15 दिन पहले मिलाना चाहिए।

उन्नत किस्मों का चुनाव :
प्याज की लाल] पीली और सफेद किस्में होती है।
लाल रंग वाली किस्में- पटना लाल] नासिक लाल] पूसा लाल] लाल ग्लोब] पूना लाल] बेलारी लाल] पूसा रतनार] हिसार-2] पंजाब लाल गोल] अर्का प्रगति] अर्का निकेतन] कल्यानपुर लाल] अर्का लालिमा।
पीली रंग वाली किस्में- अर्ली ग्रेनों] येलो ग्लोब] अर्का पीताम्बर एवं आई.आई.एच.आर. पीली आदि हैं।
गुलाबी रंग वाली किस्में- एग्रीफाउण्ड लाइट रेड] अर्का बिन्दू।
सफेद रंग वाली किस्में- नासिक सफेद] सफेद ग्लोब] प्याज चयन-106] प्याज चयन-131] उदयपुर 102] पूसाव्हाइट राउण्ड] पूसाव्हाइट फ्लैट] पूसा राउण्ड फ्लैट आदि हैं।
खाद एवं उर्वरक :
खाद एवं उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जाच के आधार पर देना चाहिए। अधिक पैदावार के लिए समय पर खाद एवं उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करना आवष्यक होता है। मिट्टी की जाच न हो पाने की दशा में 250&300 कुन्तल गोबर की खाद] नाइट्रोजन 100 किग्रा.] फास्फोरस 60 किग्रा.] पोटाश 125 किग्रा. गंधक 25 किग्रा.] बोरान 8 किग्रा.] मोलिब्लेडनम 1 किग्रा. प्रति हेक्टेयर देना चाहिए।
देशी खाद को खेत की तैयारी के समय बिखेर कर मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर खेत में मिला दे। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं शेष सभी उर्वरकों को ड्रिल या घेरे की सहायता देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा को रोपाई के 30&35 दिन बाद खड़ी फसल में दे।
बुआई का उजित समय :
प्याज के बुआई का समय काफी हद तक क्षेत्र विशेष और किस्मो के चयन पर निर्भर करता है। उत्तर भारत में पौध”kkला में बीज बोने का समय अक्टूबर से नवम्बर तथा पौध”kkला में तैयार पौधों का खेत में रोपाई का समय मघ्य दिसम्बर से जनवरी का प्रथम सप्ताह तक होता है।
बीज की मात्रा :
प्याज को बीज या कंदों की बुआई कर तैयार किया जाता है। एक हेक्टेयर की रोपाई के लिए पौध”kkला में 8&10 किग्रा. बीज की बुआई करना चाहिए। कंदों व्दारा बुआई करना हो तो 12 कुन्तल कंद एक हेक्टेयर खेत के लिए प्याप्त होता है। बीज उत्पादन के लिए 25 कुन्तल कंद प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई करते हैं।
पौध तैयार करना :
प्याज के एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए 500 वर्ग मीटर क्षेत्र में नर्सरी तैयार करने की आवश्यकता होती है। नर्सरी 1 मीटर चैड़ी और तीन मीटर लम्बी क्यारिया बनाना चाहिए। नर्सरी में बीज बोने से पूर्व 1 किलोग्राम अमोनियम सल्फेट और पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद प्रति 40 वर्ग मीटर की दर से डाल कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
नर्सरी से खरपतवारों को निकालने के लिए प्रत्येक दो क्यारियों के बीच 30 सेमी. की जगह छोड़ देना चाहिए। बीज को बोने से पूर्व कैप्टान या एग्रोसन जी.एन. नामक दवा से उपचारित करना चाहिए। उपचारित बीज को तैयार क्यारियों में 1-25 सेमी. गहरे व 5 से 7 सेमी. की दूरी पर बुआई करें।
बोने के बाद बीज को बरीक खाद एवं भुरभुरी मिट्टी व घासफूस या पुआल से ढ़क दें। उसके बाद सुबह-“kkम फौव्वारे से हल्की सिंचाई करते रहें। अंकुरण के बाद घासफूस और पुआल को सावधानी पूर्वक हटा लेना चाहिए। नर्सरी में बीज बोने के 55&60 दिन बाद पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
रोपाई :
नर्सरी में जब पौधे 12&15 सेमी. लम्बे 1@4 से 1@6 सेमी. व्यास के हो जाएं तो उन्हें अच्छी तरह तैयार खेत में रोपाई करते हैं। रोपाई करते समय कतारों के बीच की दूरी 15 सेमी. और पौध से पौध के बीच की दूरी 10 सेमी. रखते हैं। कंदों की बुआई मेंडों में करते हैं। पंक्तियों और पौधों की आपस की दूरी क्रमषः 22.5 सेमी. और 15 सेमी रखी जाती है। बुआई के लिए 1-5 से 2-0 सेमी. व्यास वाले आकार के कंद प्रयोग में लेना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण :
अधिक उपज के लिए प्याज की फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। खरपतवारों के कारण उत्पादन 50 से 80 प्रति”kत तक कमी आ जाती है। खरपतवारों का नियंत्रण निकाई-गुड़ाई करके किया जा सकता है। प्याज की फसल में उथली निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए।
रासायनिक विधि से नियंत्रण के लिए टोक-ई-25 दवा की 5 से 7-5 किग्रा. मात्रा को 600 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के 8&10 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त बासालिन दवा की 2 किग्रा. मात्रा को 600 लीटर पानी में घोल बना कर रोपाई के पूर्व खेत में छिड़काव करना चाहिए।

सिंचाई :
प्याज की फसल की सिचांई भूमि एवं जलवायु पर निर्भर करती है। सामान्यतः 12&15 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। प्याज उथली जड़ वाली फसल होने के कारण जल्दी-जल्दी हल्की सिचांई करने से लाभ होता है। सिंचाई की अधिक आवश्यकता कंद निर्माण के समय होती है। खुदाई के 3&4 दिन पहले सिंचाई बंद कर देना चाहिए।
कटाई : प्याज की कटाई फसल उगाने के उद्ेदश्य पर निर्भर करती है। हरी प्याज का उपभोग के लिए जब छोटे-छोटे कंद बन जाय तो उखाड़ कर बाजार में बिक्री के लिए भेज देना चाहिए। कंदों के लिए उगाई गई फसल को पूर्ण विकसित और पके कंदों की खुदाई करनी चाहिए।
उपज :
प्याज की उपज फसल की उचित देख-रेख और उगाई गई किस्मों पर निर्भर करती है। हरी प्याज 60-65 कुन्तल और पके हुए कंदो की उपज 250-300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है।
सुखाना :
खुदाई की गई गांठ़ों को पत्तियों के साथ एक सप्ताह तक सुखाना चाहिए। गांठ़ों को हल्की धूप में सुखाते हैं। तेज धूप होने पर गांठ़ों को छाया में सुखाते। एक सप्ताह बाद पत्तियों को गांठ से 2 से 2-5 सेमी. उपर से काट देते हैं। इसके बाद पुनः एक सप्ताह तक गांठ़ों को सुखाने का कार्य करना चाहिए।
भण्डारण :
गांठ़ों को अच्छी तरह सुखाने के बाद हवादार कमरों में फैलाकर रखना चाहिए। भण्डारण से पूर्व कटे-फटे व रोग ग्रसित कंदों को छाट कर अलग कर दे। भण्डार गृह में कंदों को समय-समय पर पलटते रहना चाहिए।
एक हेक्टेयर प्याज की खेती का आय–व्यय का पूरा गणित
प्याज एक ऐसी नकदी फसल है, जिसमें सही तकनीक और समय पर प्रबंधन से किसान को अच्छा मुनाफा प्राप्त होता है। नीचे सामान्य परिस्थितियों में उत्तर भारत के आधार पर एक हेक्टेयर प्याज की खेती का औसत खर्च और आय का आकलन प्रस्तुत है।
कुल लागत (व्यय) — प्रति हेक्टेयर
| मद | अनुमानित खर्च (₹) |
| खेत की तैयारी (जुताई, पाटा आदि) | 8,000 |
| बीज (8–10 किग्रा.) | 6,000 |
| नर्सरी तैयारी व देखभाल | 5,000 |
| रोपाई मजदूरी | 10,000 |
| गोबर की खाद (250–300 क्विंटल) | 12,000 |
| रासायनिक उर्वरक (NPK, गंधक, सूक्ष्म तत्व) | 15,000 |
| खरपतवार नियंत्रण (दवा + मजदूरी) | 6,000 |
| सिंचाई (12–15 बार) | 8,000 |
| कीट–रोग नियंत्रण | 5,000 |
| कटाई, सुखाना व ग्रेडिंग | 10,000 |
| परिवहन व अन्य खर्च | 5,000 |
| कुल लागत | ₹1,10,000 (लगभग) |
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उत्पादन व आय
- औसत उपज: 250–300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
- औसत बाजार मूल्य: ₹1,500 प्रति क्विंटल (सामान्य सीजन)
कुल उत्पादन मूल्य (आय) :
- 250 क्विंटल × ₹1,500 = ₹3,75,000
- 300 क्विंटल × ₹1,500 = ₹4,50,000
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शुद्ध लाभ (Net Profit)
| विवरण | राशि (₹) |
| न्यूनतम आय | 3,75,000 |
| अधिकतम आय | 4,50,000 |
| कुल लागत | 1,10,000 |
| शुद्ध लाभ | ₹2,65,000 से ₹3,40,000 |
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लाभ–लागत अनुपात (B:C Ratio)
1 : 2.4 से 1 : 3.1
निष्कर्ष :
एक हेक्टेयर प्याज की वैज्ञानिक खेती से किसान 2.5 से 3.5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकता है। यदि भंडारण कर सही समय पर बिक्री की जाए, तो यह लाभ और भी बढ़ सकता है। यही कारण है कि प्याज आज किसानों की सबसे भरोसेमंद नकदी फसलों में शामिल है।

