प्रकृति के पालनहार: आदिवासी समुदाय

भारत के आदिवासी समुदाय प्रकृति, जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता के सच्चे संरक्षक हैं। जानिए कैसे उनकी परंपराएँ पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बनती हैं।
Keywords : आदिवासी समुदाय और पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण में जनजातियों की भूमिका, भारत के आदिवासी समाज, जैव विविधता और आदिवासी ज्ञान, पारंपरिक जल एवं वन प्रबंधन

तीब्र गति से बढती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण की आधी ने जल, जमीन, जंगल और पर्यावरणीय संतुलन को तेजी से बिगाड़ा है। इस बीच यदि कुछ नहीं बदला तो वह है भारत के आदिवासी समुदाय का प्रकृति के साथ जुड़ाव और लगाव । इनकी जीवन-शैली, रीति-रिवाज, धर्मिक आस्था और पारम्परिक ज्ञान सदियों से जैवविविधता, जलसंरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ सतत उपयोग का जीवंत मिसाल हैं । देश की 104 मिलियन आदिवासी जनसंख्या जो कुल आवादी का 8.6 प्रतिशत है। प्रकृति संरक्षण, जैवविविधता और पर्यावरणीय संतुलन में मूक प्रहरी की भूमिका निभाते हैं। जब दुनिया वैश्विक ताप वृद्धि, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट से जूझ रही है] तब इस समुदाय की महत्ता और उपयोगिता आधुनिक समाज के लिए और बढ जाती है। आज के लेख में आदिवासी समाज की जीवन-शैली एवं उनकी खासियतों की विवेचना करेंगे जो उन्हे प्रकृति का सच्चा संरक्षक बनाती है। साथ ही नीतिगत सुझाव] चुनौतियां और भारत में पाई जाने बाली कुछ प्रमुख जनजातियो] प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए मनाई जाने वाली स्थानीय प्रथाओं का विस्तार से चर्चा करेंगे।
प्रकृति के साथ आध्यात्मिक संबंध :
आदिवासी समाज के लिए प्रकृति मात्र संसाधनों नहीं, बल्कि एक जीवंत संसाधन है जिससे वे आध्यात्मिक रूप से जुड़े हैं। जल. जंगल और जमीन को जीवन का आधर मानते हैं। नदी उनके लिए माता है, पेड़ देवता हैं और पहाड़ संरक्षक की भूमिका निभाते हैं। यही सोच उनको प्रकृति का पूजक, रक्षक और संरक्षक बनाती है। झारखंड की मुंडा, संथाल और हो जनजातियों में सिंगबोंगा (सूर्य देवता), जाहेरबोंगा (वन देवता) और बुरुबोंगा (पर्वत देवता) की पूजा की परंपरा को दर्शाती है।
जैव विविधता के पवित्र उपवन :
इस समुदाय द्वारा स्थापित पवित्र उपवन समाज के लिए प्रकृति संरक्षण के अद्वितीय मिसाल हैं। झारखंड के सरना स्थल या जाहेरथान, जहां साल और अन्य वृक्ष प्रजातियां संरक्षित हैं। आदिवासी समुदायों की पारिस्थितिकी बुद्धिमत्ता की गहराई को बया करती हैं। इन वनों में वृक्ष काटना, पशुओं-पंक्षियों को हानि पहुंचाना, यहा तक कि पत्तियां तोड़ना भी पूर्णतः वर्जित है। ये उपवन केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जैव विविधता के जीवंत संग्रहालय हैं जहां दुर्लभ वनस्पतिया और जीवो की प्रजातियां सुरक्षित रहती हैं।
ऐसा ही कुछ छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में देवगुड़ी और माताघुड़ी जैसे पवित्र स्थलों को आदिवासी समुदाय जन्म से मृत्यु तक अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। ये स्थान आज पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते के साथ स्थानीय मौसम व जल चक्र को भी नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होते हैं।

कृषि की पारंपरिक पद्धतियां :
आदिवासी समुदायों की समस्त कृषि पद्धतियां पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों पर आधारित हैं। वे झूम कृषि यानि स्थानांतरित खेती करते हैं, जिससे भूमि को विश्राम मिलता है और उसकी उर्वरा शक्ति बनी रहती है। पूर्वोत्तर भारत की जनजातियां नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर और मेघालय में झूम खेती के माध्यम से वनों का पुनर्जनन सुनिश्चित करती हैं। आकडे बताते है कि यह पद्धति 8000 ईसा पूर्व नवपाषाण काल से चली आ रही है। बडी बीत यह है कि इसमें आज भी किसी तरह का रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता।
अरुणाचल के आपातानी जनजाति की धान की गीली खेती प्रणाली जल प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती है, जिसमें पहाड़ों से बहने वाले पोषक तत्व धान की फसल पोषण प्रदान करते हैं। कुछ इसी तरह मध्य प्रदेश के गोंड, प्रधान और बैगा जनजाति के लोग उटेरा खेती करते हैं, जिसमें अगली फसल की बुवाई मुख्य फसल की कटाई से पूर्व कर दी जाती है। इससे मिट्टी की नमी का उपयोग शत-प्रतिशत हो जाता है। कृषि की इस विधा को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भी अपनी मोहर लगा चुका है।
आदिवासी समाज और वन प्रबंधन :
आदिवासी समुदाय वन संसाधनों का सतत उपयोग करने में माहिर हैं। दक्षिण भारत के कादर जनजाति शहद, जलाने की लकड़ी, राल और जड़ी-बूटियों का संग्रह इस प्रकार करते हैं कि उनका पुनर्जनन संभव हो सके। राजस्थान का बिश्नोई समुदाय वन्यजीव संरक्षण के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 1730 में खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई ने 363 लोगों के साथ पेड़ों की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया, जो पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर है। आदिवासी समुदायों द्वारा स्थापित सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र स्थानीय शासन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। अरुणाचल प्रदेश के इडु मिश्मी जनजाति ने अपने वन क्षेत्रों को सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया है, जबकि बिश्नोई टाइगर फोर्स राजस्थान में शिकार के विरुद्ध सक्रिय रूप से कार्य करते हैं ।
जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके :
आदिवासी समुदायों के सदियों पुरानी जल संचयन के तरीकें आज भी प्रासंगिक हैं। उत्तराखंड के वन गुज्जर समुदाय प्राकृतिक झरनों से छोटे तालाब (सुता) बनाते हैं] जो गर्मियों में उनके पशुओं और वन्यजीवों के लिए जल स्रोत बनते हैं। कुछ ऐसा ही गुजरात और छत्तीसगढ़ के आदिवासी किसान चेक डैम] फार्म तालाब और पत्थर की मेढ़ बनाकर वर्षा जल संचयन करते हैं। जल संचयन के इन तरीको से दीर्घकालिक कृषि स्थिरता सुनिश्चित करते हैं। इन तरीकों ने हल्दी, काजू और अनानास जैसी फसलों की खेती को विस्तार दिया है।
श्रीकाकुलम और पार्वतीपुरम मन्यम जिलों में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों द्वारा बनाए गए वर्षा जल संचयन गड्ढे और पत्थर के बांध मिट्टी के स्वास्थ्य को पुनर्जीवित करते हैं।
औषधीय पौधों का संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान :
आदिवासी समुदायों के पास औषधीय पौधों की पहचान] उपयोग और संरक्षण का विशाल ज्ञान भंडार है। केरल की कानी जनजाति का अरोग्यपाचा नामक औषधीय पौधे के बारे में पारंपरिक ज्ञान एक उत्कृष्ट उदाहरण पेस करता है, जिसे आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकारा हैं। विशाखापत्तनम की जनजातियां 150 से अधिक औषधीय पौधों की प्रजातियों का ज्ञान रखती हैं, साथ ही उनका संरक्षण भी बखूबी करती हैं। ठीक इसी तरह असम के बोडो समुदाय की महिलाएं 48 विभिन्न पौधों को विभिन्न उद्देश्यों के लिए संरक्षित करती हैं।
जलवायु परिवर्तन में उपयोगी आदिवासी ज्ञान :
वैश्विक ताप वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इन समुदायों का पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण और कारगर है। सिमिलीपाल बायोस्फीयर रिजर्व की आदिवासी होम गार्डन्स जलवायु लचीलेपन और जैव विविधता संरक्षण के सामाजिक-पारिस्थितिकी का नायाब मॉडल हैं। ये बगीचे कृषि पद्धतियों को जैव विविधता संरक्षण के साथ एकीकृत करते हुए सतत विकास लक्ष्यों को पाूरा करने में कारगर हैं। देश में जनजातीय समुदाय पीढ़ीगत ज्ञान से मौसम के मिजाज का बदलता पैटर्न, मिट्टी की उर्वरता और कीट नियंत्रण की भविष्यवाणी में सक्षम हैं।
वन अधिकार और कानूनी ढाँचा : वन अधिकार अधिनियम 2006, जैविक विविधता अधिनियम 2002 जैसे कानूनों ने आदिवासी समुदायों को उनके पारंपरिक वन, भूमि और संसाधनों पर अधिकार प्रदान किए हैं। यह अधिनियम व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देने के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण] पुनर्जनन और प्रबंधन के अधिकारों को मजबूत करता है।
पर्यावरण संरक्षण की अग्रदूत: आदिवासी महिलाएं :
आदिवासी महिलाएं पर्यावरण संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाती हैं। उत्तराखंड की चिपको आंदोलन में बचनी देवी और गौरा देवी जैसी महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अहिंसक आन्दालन का नेतृत्व किया। ठीक इसी तरह महाराष्ट्र के भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य की आदिवासी महिलाएं रसोई बागवानी के माध्यम से बीज संरक्षण और वन उपज के उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
परंपरा और आधुनिकता का संगम :
आज के आदिवासी युवा पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित कर रहे हैं। उनको अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व की अनुभूति होती है। कई आदिवासी युवा पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग कर वन स्वास्थ्य और वन्यजीव गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का आधार :
आदिवासी समाज की धार्मिक और लोक-कल्पनाओं में पेड़-पौधे, नदी-झरने, पर्वत और जंगली जानवर प्रमुख रूपा से पवित्र और पूजनीय माने जाते हैं। इन पवित्र स्थलों के संरक्षण के लिए सामूदायिक नियम बने हैं, उल्लंघन होने पर सामाजिक बहिष्कार या संस्कृतिक दंड का प्राविधान है। पारंपरिक गीत, नृत्य और रीति-रिवाज प्राकृतिक चक्रों, वर्षा, फसल, ऋतुओं के साथ के साथ तालमेल बनाए रखने में सहायक होते हैं। स्थानीय संवाद के जरिए बेहतर संसाधन उपयोग के नियमों से लोगो को समय-समय पर अवगत काराया जाता है ताकि निरंतरता बनी रहे हैं।

पारंपरिक ज्ञान में झलकता विज्ञान का लोकतत्व :
आदिवासी समुदायों के पास पौधों की उपयोगिता] शिकारी-पशु चक्र] मौसम के सूक्ष्म संकेत] जैवविविधता] भूमि की उर्ववरता और उपजता के बारे में पीढ़ियों से संचित प्रचुर ज्ञान होता है। इस ज्ञान के कुछ प्रमुख आयाम निम्नवत हैं –
- निषेचन और बीज-विनिमय प्रथाएँ] स्थानीय पौधों के आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने के लिए बीज संग्रह और विनिमय के पारंपरिक तरीकों का मजबूत नेटवर्क।
- लघु-यांत्रिक कृषि पर जोर और मिल-जुल कर फसल-चक्र का क्रियान्वयन, मिश्रित बागवानी] मल्चिंग] पारंपरिक बीजों का प्रयोग और स्थानीय कीट-नियंत्रण उपायों को अपनाना।
- वन उपयोग के सख्त नियमों के जरिए सीमित कटाई] सूक्ष्म-उपयोग और ऊर्जा-संशोधन की सामुदायिक स्वीकृत सीमाएँ।
- पवित्र या संरक्षित वनध्ग्रोव समुदाय द्वारा बचाए गए छोटे-छोटे जंगल जो स्थानीय जड़ी-बूटियों] मधुमक्खी और वन्यजीवों के लिए शरणस्थल होते हैं।
ये प्रणालियाँ केवल पर्यावरणीय नहीं] बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं से सीधे जुडी हुई हैं। सामूहिक ज्ञान व निर्णय इन्हें मजबूत बनाती हैं।
आज की चुनौतियाँ : खतरे और विघटन
आदिवासी संरक्षण प्रणालियों पर कई बाहरी दबाव का सामना करना पडता हैं जो उनकी पारंपरिक संरचनाओं को कमजोर कर रहे हैं।
- भूमि अधिकारों का ह्रास और विस्थापन: बड़ी विकास परियोजनाएं] खनन और उपनिवेशी भूमि-प्रथाओं के कारण समुदायों का पारंपरिक संसाधन उपयोग बाधित होता है।
- वन्य जीव एवं पारिस्थितिक दबाव: जलवायु परिवर्तन] विदेशी प्रजातियों का प्रवेश और निरंतर संसाधनों का दोहन जैवविविधता को खतरे में डालते हैं।
- संस्कृतिक विखंडन: औपचारिक शिक्षा, मजदूरी और नगरीकरण से पारंपरिक ज्ञान-संचरण में बाधा आती है।
- नीतिगत व्यवहारिक गिरावट: सरकारी योजनाएँ अक्सर समुदायों की वास्तविक आवश्यकता या ज्ञान को ध्यान में नहीं रख पाती हैं।
चुनौतियों का समय पर सही समाधान होना आवश्यक हैं। यह सिर्फ संसाधनों के संरक्षण की बात नही] बल्कि आदिवासी समाज के लिए सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी जरूरी है।
नीति और कार्यक्रम :
आदिवासी समाज की संरक्षण प्रणालियों को मजबूती देने के लिए कुछ नीति-आधारित सुझाव निम्नवत हैं-
- भूमि और जंगल के पारम्परिक अधिकारों की मान्यता कानूनी रूप से सामुदायिक वन] सामुदायिक बस्तियाँ और संसाधन-स्वामित्व स्पष्ट और सुरक्षित किए जाएँ।
- स्थानीय ज्ञान के संवर्धन के लिए स्कूलों व प्रशिक्षण कार्यक्रमों में पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को समेकित करें और युवा पीढ़ी को पीरियडिक अनुभव दें।
- सामुदायिक-आधारित संरचना के लिए वित्तीय मदद के छोटे अनुदान] बीज बैंक समर्थन और बाजार तक पहुँच के उपाय हों ताकि सामुदायिक संरक्षण आर्थिक रूप से भी टिकाऊ बने।
- नीतियाँ और परियोजनाएँ ऊपर से नीचे की बजाय स्थानीय नेतृत्व और निर्णय में भागीदारी पर आधारित हों] विशेषकर महिलाओं और बुजुर्गों की भूमिका सुनिश्चित की जाए।
- लॉन्ग-टर्म मनिटरिंग व सह-प्रबंधन मॉडल के आधार पर वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय ज्ञानकर्ताओं के बीच साझेदारी से निगरानी व अनुकूलन रणनीतियाँ विकसित की जाय।

निष्कर्ष :
भारत की जनजातियाँ 75 फीसदी वन क्षेत्र का संरक्षण ही नहीं करती हैं, बल्कि एक सुरक्षित और सतत् भविष्य का निर्माण भी कर रही हैं। उनका योगदान जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। आने वाले समय में इन समुदायों के अधिकारों की मान्यता और सहभागी संरक्षण मॉडल को मजबूत करना आवश्यक है। प्रकृति संरक्षण का सबसे भरोसेमंद तार आदिवासी समुदाय से जुड़ा रहा है। इस समुदाय के ज्ञान] नियम और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता से हमें भी कुछ सीखने की जरूरत है। प्रकृति संरक्षण की जिम्मेदारी सिर्फ एक समुदाय विशेष की न होकर पूरे समाज की है। आइए, उनके साथ मिलकर हम भी प्रकृति को हर-भरा बनाने में सहयोग प्रदान करें।

