गर्मी में मॅूग की उन्नत खेती कैसे करें
कम समय में अधिक कमाई
डा. जितेन्द्र सिंह
Key Words : गर्मी में मूंग की उन्नत खेतीए किस्में, बुवाई का सही समय, बीज दर, उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई, कीट रोग नियंत्रण और 1 हेक्टेयर का पूरा आर्थिक विश्लेषण।
मॅूग एक अत्यंत लोकप्रिय, पोषक तत्वों से भरपूर लाभकारी दलहनी फसल है। इसकी खेती खरीफ और जायद दोनों ही मौसमों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। जायद की दलहनी फसलों में मूॅग का प्रूमुख स्थान है, क्योंकि यह कम समय में तैयार होकर किसानों को शीघ्र आय प्रदान करती है। मूंग के दानों में लगभग 25 प्रतिशत प्रोटीन, 60 प्रतिशत कार्बाेहाइड्रेट, 1-3 प्रतिशत वसा एवं पर्याप्त मात्रा में खनिज लवण पाए जाते हैं, जिससे यह मानव पोषण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मूंग की फसल न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है। इसकी जड़ों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता होती है, जिससे भूमि की उर्वरता प्राकृतिक रूप से बढ़ती है। मूंग का भूसा पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होता है, जिसे पशु बड़े चाव से खाते हैं। देश में दलहन उत्पादन में चना और अरहर के बाद मूंग का तीसरा स्थान है। मूंग का व्यावसायिक उपयोग दाल, नमकीन उद्योग, पापड़, मिठाई तथा मूंगोड़ी जैसे विविध उत्पादों में किया जाता है।
यदि किसान उन्नत तौर-तरीके अपनाएँ-जैसे उन्नत किस्मों का चयन, समय पर बुवाई, संतुलित पोषण प्रबंधन, समुचित सिंचाई एवं प्रभावी कीट-रोग नियंत्रण तो मूंग की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। सही तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मूंग की खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ देश की पोषण सुरक्षा को भी सुदृढ़ बना सकती है।
भूमि का चुनाव :
मूग की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली, कार्बनिक प्रदाथों से भरपूर दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। हालाकि की मूॅग की खेती काली मिट्टी, मटियार एवं एल्यूवियल आदि सभी प्रकार की भूमियों में सफलता पूर्वक खेती की जा सकती है। भारी भूमियों की आपेक्षा हल्की भूमियों में खेती करना अधिक उपयुक्त होता है।
खेत की तैयारी :
रबी की फसलों की कटाई के बाद एक – दो जुताई देशी हल या हैरो से करने बाद एक जुताई कल्टीवेटर से करते हैं। हर जुताई के बाद पाटा लगाए ताकि मिट्टी में पर्याप्त नमी सुरक्षित रह सके।

किस्मों का चयन :
किसी भी फसल से अधिक उत्पादन लेने के लिए सही प्रजातियों का चुनाव सबसे आवश्यक पहलू होता है। मूॅग की उन्नतशील प्रजातियों का चुनाव क्षेत्र विशेष को ध्यान में रखते हुए, रोग अवारेधिता के आधार पर व पकने के समय के आधार पर करना चाहिए। मूॅग की उन्नतशील किस्मों में सम्राट, पूसा वैसाखी, शीला, पन्त मॅूग-1, पन्त मॅूग-2, टा.-44, के.-851, पी.एस.-16, मोहिनी, नरेन्द्र मॅूग आदि प्रमुख हैं। मूॅग की उन्नतशील प्रजातियों को उनके कुछ खास गुणों के अनुसार सारणी एक में दिया गया है।
सारणी – 1 मूग की कुछ प्रमुख उन्नतशाील किस्मों का क्षेत्रवार विवरण
| क्र्र.सं. | किस्म का नाम | उपज कु./हे. | पकने की अवधि दिन | उत्पादन के लिए उपयुक्त क्षेत्र | विशेष गुण |
| 1. | सम्राट पी.डी.एम.139 | 12-15 | 55-60 | उत्तर प्रदेश | मध्य रोगरोधी |
| 2. | पूसा बोल्ड विशाल | 11 – 12 | 60 – 62 | उत्तर पश्चिमी क्षेत्र | पीला मोजैक रोगरोधी |
| 3. | पूसा बैसाखी | 8 – 10 | 60 – 65 | उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र | |
| 4. | पी.डी.एम.-11, पी.एस. -16, एस-8 | 8 – 9 | 72 – 75 | मध्य प्रदेश | पीला मोजैक रोगरोधी |
| 5. | आई.पी.एम. 99-125 टी.एम.99-37 | 10 – 11 | 66 – 67 | मैदानी क्षेत्र | पीला मोजैक रोगरोधी |
| 6. | पूसा 9531 | 9 – 10 | 60 – 62 | मध्य क्षेत्र |
उपरोक्त के अतिरिक्त नीचे मूंग की एक साथ (समान अवधि में) तैयार होने वाली उन्नत किस्में दी जा रही हैं, जो आधुनिक खेती, यांत्रिक कटाई और अधिक उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं।
मूंग की एक साथ पकने वाली प्रमुख किस्में:
1. सम्राट (PDM-139 / IPM-02-03)
अवधि: 60 – 65 दिन
विशेषता :
- पौधे एकसमान बढ़ते हैं
- फलियाँ एक साथ पकती हैं
- पीला मोजेक रोग सहनशील
उपज : 12-15 क्विंटल/हेक्टेयर
क्षेत्र : उत्तर भारत, मध्य भारत
2. विराट (IPM-02-14)
अवधि: 65-70 दिन
विशेषता :
- समकालिक फूल व फल
- कम फल झड़ाव
- जायद व खरीफ दोनों के लिए उपयुक्त
उपज: 13-16 क्विंटल/हेक्टेयर
3. साम्राट-3 (PDM-139 / IPM-02-03)
अवधि: 60-65 दिन
विशेषता:
- एक साथ पकने की उच्च क्षमता
- दाने चमकीले हरे
- यांत्रिक कटाई हेतु उपयुक्त
उपज: 14-16 क्विंटल/हेक्टेयर
4. IPM-02-19
अवधि: 65 दिन
विशेषता:
- लगभग 85-90 % फलियाँ एक साथ पकती हैं
- पीला मोजेक रोग सहनशील
उपज: 15 क्विंटल/हेक्टेयर तक
5. SML-668
अवधि: 60-65 दिन
विशेषता:
- शीघ्र पकने वाली
- दाने का आकार समान
- एक बार में कटाई संभव
उपज: 12-14 क्विंटल/हेक्टेयर
एक साथ पकने वाली किस्मों के लाभ :
- कटाई लागत कम
- दाना झड़ने की समस्या कम
- मशीन से कटाई संभव
- गुणवत्ता बेहतर
- समय व श्रम की बचत

बीजदर :
अधिक पैदावार के लिए सदैव उचित मात्रा में बीज प्रयोग में लाना चाहिए। बीजदर बीज की गुणवत्ता, बीज भार, बोने का ढंग एवं मौंसम विशेष पर निर्भर करती है। जायद की खेती के लिए 30 – 35 किग्रा. एवं वर्षा कालीन फसल के लिए 20 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई करनी चाहिए। मिश्रित फसल में 8 – 10 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
बोने का समय :
उत्तर भारत में मॅूग की बुआई 15 फरवरी से 15 अप्रैल तक किसी भी समय की जा सकती है। बुआई में देरी करने से दानें की गुणवत्ता व उपज पर बुरा असर पड़ता है।
बीजोपचार :
फफूद जनित बीमारियों से बचाने के लिए बुआई से पूर्व बीज को कैप्टान या थीरम या फिर एग्रोसन जी.एन. नामक रसायन से 2 से 2.5 ग्राम दवा प्रति किग्रा. की दर से बीज का शोधन कर लेना चाहिए।
टीकाकरण :
मॅूग दलहनी फसल होने के नाते इसके बीज को राईजोबियम कल्चर से अवश्य उपचारित कर लेना चाहिए। राईजोबियम कल्चर के 250 ग्राम का एक पैकेट 10 किगा. बीज के लिए पर्याप्त होता है। आधा लीटर पानी में 50 ग्राम गुड़ या चीनी का घोल बनाकर 10 से 15 मिनट तक गर्म करने बाद ठण्डा होने देते है। अब एक पैकेट राईजोबियम कल्चर इस तैयार घोल में मिलाते हैं। एक बड़े पात्र में 10 किग्रा बीज डालकर तैयार घोल को बीज में अच्छी तरह मिलाते हैं ताकि बीज में कल्चर की एक परत अच्छी तरह लग जाय। बीज को एक-दो घंटे छाया में सुखाने के बाद सुबह या शाम के समय बुआई करें। तेज धूप में बुआई नही करनी चाहिए क्योकि कल्चर में उपस्थित जीवाणुओं के मरने की सम्भावना होती है।
बुआई का तरीका :
मूग की बुआई छिटकवा और लाईन में की जा सकती है। लेकिन अधिक उत्पादन की दृष्टि से लाइन में बुआई करना अधिक लाभकारी होता है। लाइन में बुआई के लिए देशी हल के पीछे कूॅड़ में या सीडड्रिल से कूॅड़ों में 20-25 सेंमी. की दूरी पर बुआई करते हैं। बीज की बुआई 4-6 सेंमी.की गहराई पर करना चाहिए।
पोषक तत्व प्रबंधन :
अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए फसल में पोषक तत्वों का समुचित प्रबंध करना आवश्यक होता है। उचित मात्रा में फसल को पोषक तत्व देने के लिए मिट्टी की जाॅच की अनुसंशा के मुताबिक देना चाहिए। यदि समय पर मृदा परीक्षण संम्भव न हो तो 20-30 किग्रा. नाईट्र्रोजन, 50-60 किग्रा. फास्फोरस तथा आवश्यकतानुसार 30-40 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। मुख्य पोषक तत्वों के अतिरिक्त व्दितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों को फसल में देने से उपज में काफी वृद्धि होती है। इन तत्वों में प्रमुख रूप से सल्फर 20 किग्रा., कापर 4 किग्रा., मैंगनीज आधा किग्रा., बोरान 6 किग्रा., आयरन 1 किग्रा., प्रति हेक्टेयर की दर प्रयोग करना चाहिए। जायद की फसल आलू या गेहू के बाद बोई जा रही है तो उर्वरकों की मात्रा कम कर सकते हैं।
सिंचाई :
जायद की फसल में सिंचाई का बहुत महत्व होता है। सामान्यतः इस मौंसम की फसल को 3-5 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। सिंचाई की संख्या व सिंचाई का समय मिट्टी की किस्म, प्रजाति, तापमान आदि पर निर्भर करता है। मूग में पहली सिंचाई बुआई के 20-25 दिन बाद करनी चाहिए। इसके बाद फसल की आवश्यकतानुसार 10-15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। फूल आते समय व दाना बनते समय ंिसंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। पानी का समुचित प्रयोग करने के लिए ंिसंचाई छोटी-छोटी क्यारियाॅ बना कर करनी चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण :
फसल को प्रारम्भिक अवस्था में खरपतवारों से अधिक हाॅनि होती है। क्योकि गर्मी में पौधों की बढ़वार धीमी गति से होती है। खरपतवरों के कारण 40-50 फीसदी तक पैदावार में कमी आ जाती है। रासायनिक विधि से खरपतवारों के नियंत्रण के लिए पेंडामेथलीन 30 ईसी 3.3 लीटर या एलाक्लोर 50 ईसी 3 लीटर मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोल बनकर बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव कर देना चाहिए। पहली सिंचाई के बाद निकाइ-गुड़ाई करने से मिट्टी में वायु संचार बढ़ने से जडों में पाये जाने वाले जीवाणु अच्छी तहर क्रियाशील हो जाते हैं।
फसल सुरक्षा :
मूग की फसल में पीला मोजैक बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। यह वायरस जनित बीमारी है जो सफेद मक्खी से फैलता है। इस रोग से प्रभावित पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है। प्रभावित पौधां में फूल व फलियाॅ कम संख्या में बनती हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोग रोधी किस्मों की खेती करना चाहिए। फसल पर एड़ोसल्फान 35 ईसी 1.25 लीटर दवा को 600-800 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त मूॅग की फसल को थ्रिप्स, सफेद मक्खी व जैसिडस आदि कीट नुकसान पहुॅचाते हैं। ये कीट पौधे की पत्तियों का रस चूसते हैं पौधों की वृद्धि रूक जाती है और पौधे सूख जाते हैं। इनके प्रभावी तरीके से नियत्रण के लिए बुआई के समय फोरेट गे्रन्यूल्स 10 प्रतिशत की 10 किग्रा. मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
कटाई और मड़ाई : मूग की कुछ किस्मों की फलियाॅ एक साथ पकती हैं। ऐसी किस्मों में जब 80 फीसदी फलियाॅ पीली पड़ जाय तो कटाई कर लेना चाहिए। अलग-अलग समय में तैयार होन वाली किस्मों की तुड़ाई दो-तीन बार में करनी चाहिए। फलियों के पकने के बाद फसल को अधिक समय तक खेत में खड़ा नही रखना चाहिए अन्यथा फलियों के चटखनें से नुकसान होने की संभावना बढ़ जाती है। फसल को काटने के बाद सुरक्षित स्थान में एकत्र कर अच्छी तरह सुखा लेते हैं। अच्छी तरह सुखाने के बाद पावर थ्रेसर, डण्डों या फिर बैलों की दाय चलाकर मड़ाई करते हैं।
उत्पादन :
मूग का उत्पादन किस्मों का चुनाव, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, पोषक तत्वों का समुचित प्रबंधन, कीट और व्याधियों से फसल की समय से सुरक्षा एवं अपनाई गई कर्षण क्रियाओं पर निर्भर करता है। यदि मूॅग की खेती वैज्ञानिक दृष्किोण से की जाय तो 12 से 15 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन आसानी से हो जाता है।
भण्डारण :
मूग के दानों का भण्डारण अच्छी तरह धूप में सुखाने के बाद करना चाहिए। भण्डारण के लिए मॅूग के दानों को 10 फीसदी नमी तक सुखाना चाहिए। भण्डार गृह का भण्डारण से पूर्व पुताई और मरम्मत कर देना चाहिए। कीड़े-मकोड़ों को नष्ट करने के लिए मैलाथियाान 50 प्रतिशत तैलीय घोल को 0.5 प्रतिशत का अच्छी तरह छिड़काव करना चाहिए। उचित भण्डारण के लिए कुठला या अच्छे पात्र में भरकर सल्फास की 3 ग्राम वाली दो गोलियाॅ प्रति 10 कुन्तल की दर से रखकर वायु अवरूद्ध कर देना चाहिए।
एक हेक्टेयर मूंग की फसल का आर्थिक विश्लेषण
उत्पादन लागत (Cost of Cultivation)
| क्र. | मद | अनुमानित लागत (₹/हेक्टेयर) |
| 1 | खेत की तैयारी (जुताई, पाटा) | 5,000 |
| 2 | उन्नत बीज (18–20 किग्रा) | 2,000 |
| 3 | बीज उपचार (राइजोबियम + ट्राइकोडर्मा) | 500 |
| 4 | उर्वरक (DAP, सल्फर, जिंक आदि) | 3,000 |
| 5 | बुवाई खर्च | 1,500 |
| 6 | सिंचाई (2–3 बार) | 3,000 |
| 7 | खरपतवार नियंत्रण | 2,000 |
| 8 | कीट एवं रोग नियंत्रण | 2,500 |
| 9 | कटाई, मड़ाई व ढुलाई | 3,500 |
| कुल लागत | 25,000 ₹ (लगभग) |
उत्पादन : (Yield)
- औसत उपज (आधुनिक तकनीक से)
12–15 क्विंटल/हेक्टेयर
आय (Gross Income)
- मूंग का औसत बाजार मूल्य: ₹7,000–8,000/क्विंटल
| उपज | न्यूनतम आय | अधिकतम आय |
| 12 क्विंटल | ₹84,000 | ₹96,000 |
| 15 क्विंटल | ₹1,05,000 | ₹1,20,000 |
शुद्ध लाभ (Net Profit)
| विवरण | राशि (₹) |
| कुल आय | ₹90,000 – ₹1,10,000 |
| कुल लागत | ₹25,000 |
| शुद्ध लाभ | ₹65,000 – ₹85,000/हेक्टेयर |
अतिरिक्त लाभ :
- मृदा में नाइट्रोजन की वृद्धि
- अगली फसल की लागत कम
- कम समय (60–65 दिन) में फसल तैयार
- पशुओं के लिए पौष्टिक भूसा
निष्कर्ष :
मूंग की 1 हेक्टेयर आधुनिक खेती कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल है। वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर किसान कम समय में अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं, साथ ही भूमि की उर्वरता भी बनाए रख सकते हैं , जो आज की आवश्यकता है।

