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परवल की स्मार्ट खेती से पोषण भी और आमदनी भी

प्रति एकड लाखों में कमाई करना है तो किसान ऐसे करें परवल की खेती

परवल सब्जी के बाजार में एक ऐसा नाम है जिसकी हर मौसम में मांग बनी रहती है। स्वाद और पोषक तत्वों से भरपूर यह सब्जी अब केवल रसोई तक सीमित नहीं, बल्कि किसानों की आमदनी का स्थायी साधन बनती जा रही है। खासतौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में परवल की खेती बड़े पैमाने पर हो रही है। बडे कस्तकारों के साथ अब छोटी जोत वाले किसान भी इसे अपनाकर हर साल लाखों की मोटी कमाई कर रहे हैं। वजह साफ है। परवल एक बहुवर्षीय फसल है। एक बार रोपाई के बाद लगातार 4-5 वर्षों तक अच्छी पैदावार देती है। यही नहीं, इसकी भंडारण क्षमता अन्य सब्जियों की तुलना में अधिक होने से इसे दूरस्थ मंडियों तक भेजना आसान होता है।

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Pointed Guard Crop Growing on Vine For High Yield

परवल पोषक तत्वों का खजाना :

विशेषज्ञों के अनुसार, परवल में तकरीबन 22 प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें विटामिन प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और कई खनिज लवण भरपूर मात्रा में होते हैं। इसकी पोशण षक्ति न सिर्फ पाचन तंत्र को मजबूत करती है बल्कि हृदय, मस्तिष्क और रक्त संचार के लिए भी लाभकारी है। चिकित्सकीय दृष्टि से भी परवल को “प्राकृतिक औषधि” कहा जा सकता है। इसके सेवन से खांसी, बुखार, कब्ज, त्वचा संबंधी रोग और रक्त विकारों में राहत मिलती है। ग्रामीण अंचलों में परवल के पत्तों का रस बुखार में मालिश के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।

खेती के लिए अनुकूल जलवायु और भूमि :

परवल गर्म और आर्द्र जलवायु की फसल है। जहां वार्षिक वर्षा 100 से 150 सेंटीमीटर तक होती है, वहां यह अच्छी उपज देती है। इसकी खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, बशर्ते खेत में जल निकासी की व्यवस्था अच्छी हो। भारी या जलभराव वाली भूमि पर परवल की खेती करने से किसानों को बचना चाहिए।

खेत की तैयारी और पौध रोपण :

खेती शुरू करने से पहले खेत को 2 से 3 बार जोतकर समतल कर लेना चाहिए। पौधों की पंक्ति से पंक्ति और पौध से पौध की दूरी 1.5 मीटर रखनी चाहिए। प्रत्येक गड्ढे में 4 से 5 किलो सड़ी गोबर की खाद, 50 ग्राम नीम की खली और 100 – 150 ग्राम डीएपी मिलाकर भरने से पौध स्वस्थ और मजबूत बनते है।

उन्नत किस्मों का चयन :

अधिक पैदावार के लिए किसान परवल की पारंपरिक किस्मों की जगह उन्नत किस्में की खेती करें। इनमें प्रमुख हैं – नरेन्द्र परवल 260, नरेन्द्र परवल 307, नरेन्द्र परवल 601, नरेन्द्र परवल 604 साथ ही एचपी-1, एचपी-3, एचपी-4, एचपी-5, स्वर्ण रेखा और स्वर्ण आलौकिक जैसी किस्में भी उच्च उत्पादन के लिए जानी जाती हैं।

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Commercial Cultivation of Pointed Guard

रोपाई का सही समय और बीज की मात्रा :

परवल की बेहतर पैदावार के लिए सही बीज मात्रा और रोपाई का उचित समय जानना बेहद जरूरी है। एक एकड़ खेत में बीज से बोआई के लिए करीब 8 से 10 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। वहीं, वानस्पतिक विधि से रोपाई करने पर 1.5 मीटर लंबी लगभग 2,000 कलमें ही पर्याप्त होती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, परवल की रोपाई आम तौर पर साल में दो बार जून और अगस्त में की जाती है। ऊंचे खेत में यह काम अगस्त से सितंबर के बीच करना बेहतर माना जाता है, लेकिन सबसे उपयुक्त समय 15 अगस्त से 30 अगस्त के बीच का होता है। वहीं, नदियों के किनारे और दियारा क्षेत्रों में रोपाई का काम अक्टूबर से नवंबर तक किया जा सकता है। कृशि विशेषज्ञों का कहना हैं कि मौसम और भूमि की स्थिति को ध्यान में रखते हुए तय समय पर रोपाई करने से न केवल पौधों की जड़ें बेहतर तरीके से जमती हैं, बल्कि अगले वर्षों में उत्पादन में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है।

प्रवर्धन विधियाँ : बीज से बेहतर है वानस्पतिक तरीका

परवल के पौधे बीज और वानस्पतिक विधियों (लता या जड़ से) दोनों से तैयार किए जाते हैं। लेकिन वानस्पतिक विधि अधिक सफल मानी जाती है, क्योंकि इससे मादा पौधों का अनुपात सुनिश्चित किया जा सकता है।

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A More Profitable Crop For Farmers : Pointed Guard

तना विधि : पुरानी लताओं को टुकड़ों में काटकर नर्सरी में रोपते हैं, जड़ें निकलने पर खेत में लगा दिया जाता है।

अंगूठी विधि : लताओं को गोलाकार मोड़कर गड्ढों या नालियों में दबाया जाता है।

जड़ विधि : मोटी कंदीय जड़ों से तैयार पौध शीघ्र अंकुरित होते हैं और आसानी से लग जाते हैं।

प्रति एकड़ लगभग 2000 कलमें पर्याप्त होती हैं। ध्यान रहे, हर 15-20 मादा पौधों के बीच एक नर पौधा अवश्य लगाया जाए ताकि परागण सुचारु रूप से हो सके।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन :

मिट्टी परीक्षण के अनुसार उर्वरक देना सर्वोत्तम रहता है। लेकिन मृदा परीक्षण न हो पाने की दषा में सामान्यतः प्रति एकड़

  • गोबर की खाद 100 क्विंटल
    • नाइट्रोजन 30-35 किलोग्राम
    • फॉस्फोरसरू 20 किलोग्राम
    • पोटाशरू 35 किलोग्राम

नाइट्रोजन दो बार में, आधी दिसंबर में और शेष फूल आने पर मार्च में दी जाती है।

सिंचाई और देखभाल :

रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करना अनिवार्य है। वर्षा के बाद मौसम के अनुसार 7-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। फूल और फल बनने के समय पौधों को अधिक पानी की जरूरत होती है। सर्दियों में जब लताएं सूखने लगती हैं, तो यह उनकी सुसुुप्तावस्था होती है। नवंबर माह में पौधों की कटाई-छंटाई करने से नई बेलें निकलती हैं और मार्च से फलों का उत्पादन शुरू हो जाता है।

रोग एवं कीट प्रबंधन :

परवल की फसल पर कई रोग और कीट हमला करते हैं-

  • लाल कीड़ा पत्तियों और फूलों को खाकर नुकसान करता है। इसके लिए 5 प्रतिषत मैलाथियान का छिड़काव करें।
    • फल मक्खीरू कोमल फलों में अंडे देती है। डायजिनान (0.03ः) या थायोडान (0.05ः) प्रतिषत का छिड़काव प्रभावी है।
    • तना छेदक कीट अगस्त से अक्टूबर में सक्रिय सक्रिय रहता हैं। नियंत्रण हेतु 0.02 प्रतिषत मैलाथियान का छिड़काव करें।
    • पाउडरी मिल्ड्यू (बुकनी रोग) सलफेक्स-80 (3 ग्राम/लीटर) का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
    • फल सड़न वर्षा ऋतु में आम बात है। ब्लाइटास्क (3 ग्राम/लीटर) का प्रयोग करें।
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उपज और भंडारण :

परवल की पहली फसल में उत्पादन थोड़ा कम (40 से 50 क्विंटल/एकड़) मिलता है, लेकिन अगले वर्षों में यह 100 से 120 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच जाता है।

भंडारण क्षमता बेहतर होने से इसे चार दिन तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है, जबकि “स्टे-फ्रेश” मोम उपचार से यह 12 -15 दिनों तक सुरक्षित रह सकता है।

एक एकड़ पर परवल की खेती का अनुमानित खर्च

खर्च की मद                      अनुमानित राशि (₹)

भूमि तैयारी व जुताई              ₹10,000 – ₹20,000

पौध                                    ₹2,000 दृ ₹6,000

रोपाई                                 ₹2,000 दृ ₹5,000

मचान निर्माण                       ₹4,000 दृ ₹15,000

खाद व गोबर                       ₹6,000 दृ ₹10,000

सिंचाई                                 ₹5,000 दृ ₹10,000

निराई-गुड़ाई                       ₹3,000 दृ ₹8,000

रोग/कीट नियंत्रण                 ₹3,000 दृ ₹5,000

फसल कटाई व पैकिंग           ₹5,000 दृ ₹8,000

अन्य खर्च                             ₹3,000 दृ ₹8,000

कुल खर्च                             ₹40,000 दृ ₹1,00,000

एक एकड़ फसल का उत्पादन और संभावित आमदनी :

पैदावार : औसतन 80 क्विंटल से 150 क्विंटल तक उत्पादन संभव है, जबकि उन्नत प्रजाति और अच्छे प्रबंधन के साथ 125 – 250 क्विंटल तक पैदावार की रिपोर्ट भी मिलती है।

मंडी भाव (2025) ₹2,000 से ₹3,100 प्रति क्विंटल (उत्तर प्रदेश की मंडियों के ताजा भाव)

कुल आय का अनुमान :

80 क्विंटल × ₹2,500 = ₹2,00,000

150 क्विंटल × ₹3,000 = ₹4,50,000

फसल की विषेश देखभाल करने पर ₹6 से ₹8 लाख तक आमदनी मिल सकती है।

मुनाफा :

कुल आय                                     कुल खर्च

कम से कम ₹2,00,000           ₹40,000 = ₹1,60,000

अधिकतम ₹8,00,000             ₹1,00,000 = ₹7,00,000

विशेष सलाह :

  • मचान विधि का उपयोग करने, ड्रिप सिंचाई, संकर किस्मों, विशेष खाद और उचित नर और मादा पौधों का अनुपात  रखने से उत्पादन एवं आय में वृद्धि हो़ती है।
    • 7-9 महीने तक लगातार उपज लेने के केस में कुल आय और फायदे का ग्राफ बढता है।
    • किसान मंडी चुनते समय उच्चतम भाव वाली जगह पर बेचें।

आर्थिक पहलू : किसानों के लिए लाभ का सौदा

परवल की उन्नत खेती में 1 एकड़ पर खर्च औसतन 40 हजार से 1 लाख रूपये तक आता है। फसल की पैदावार 80-250 क्विंटल तक हो सकती है। वर्तमान मंडी भाव 2,000-3,100 रूपये प्रति क्विंटलतक है। ऐसे में कुल आय 2 से 8 लाख तक संभव है। यह पैदावार, किस्म, विधि (मचान), मिट्टी, तकनीक, बाजार भाव और स्थान पर निर्भर करता है। लेकिन, औसतन किसानों को 1 एकड़ फसल से 2 लाख से 4 लाख तक शुद्ध लाभ मिल जाता है।

आज जब किसान टिकाऊ और लाभदायक फसलों की तलाश में हैं, परवल उनकी नई उम्मीद बनकर उभरा है। कम जोखिम, लगातार आमदनी और स्थायी बाजार मांग, ये तीन कारण इसे किसानों के लिए “हरी सोने की फसल” बना रहे हैं।

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सरकारी अनुदान :

  • उत्तर प्रदेश सरकार परवल की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को 12,000 रुपये की सब्सिडी प्रदान कर रही है। यह सब्सिडी फसल की खेती से जुड़ी लागत को कम करने के उद्देश्य से दी जा रही है, जिसमें परवल के पौधे और उर्वरक भी शामिल हैं।
    • सब्सिडी का लाभ पाने के लिए किसान उत्तर प्रदेश के निवासी होना चाहिए। इसका लाभ लेनेे के लिए किसानों को राज्य कृषि विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर आवेदन करना होगा।
    • यह योजना पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर सब्सिडी दी जाती है। सब्सिडी की राशि सीधे किसानों के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है।
    • इसके अतिरिक्त, बागवानी फसलों की सुरक्षा के लिए सरकार फेंसिंग पर 50 फीसदी तक अनुदान भी देती है, जिससे किसानों को खेती की सुरक्षा में मदद मिलती है।

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