कम लागत ज्यादा मुनाफा: मूली बीजोत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक
एक हेक्टेयर में मूली बीजोत्पादन से 8–15 क्विंटल बीज उत्पादन संभव है। ₹300–600 प्रति किलो दर से ₹2.4 से 9.0 लाख तक सकल आय मिल सकती है।
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डा. जितेन्द्र सिंह, वाराणसी
मूली केवल एक साधारण सब्जी की फसल नहीं, बल्कि किसानों के लिए खूब आय देने वाली महत्वपूर्ण नगदी फसल है। इसकी खेती देश के बड़े हिस्से में की जाती है। इसलिए मूली के बीज की वर्ष भर इसकी मांग बनी रहती है। बढ़ते रकबे और बेहतर उत्पादन की आवश्यकता को देखते हुए उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की मांग लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि निजी कंपनियाँ और बहुराष्ट्रीय फर्में उन्नत बीज तैयार कर ऊँची कीमतों पर बीज बिक्री कर मोटा मुनाफा कमा रही हैं ।
ऐसे में यदि किसान वैज्ञानिक विधियों से मूली का बीजोत्पादन करना सीख लें, तो वे अतिरिक्त आय का मजबूत स्रोत खुद विकसित कर सकते हैं। हमारे देश में एशियाई किस्मों का बीज मैदानी क्षेत्रों में तथा यूरोपीय किस्मों का बीज पहाड़ी क्षेत्रों में आसानी से तैयार किया जाता है। मूली का बीजोत्पादन मुख्यतः ‘बीज से बीज’ और ‘जड़ से बीज’ विधि द्वारा किया जाता है।
उच्च गुणवत्ता वाला बीज तैयार करने के लिए दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं- पहला, स्वस्थ और अच्छी फसल का उत्पादन और दूसरा, किस्म की आनुवांशिक शुद्धता बनाए रखना। यदि इन सिद्धांतों का पालन करते हुए वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जाए, तो मूली बीजोत्पादन किसानों के लिए अत्याधिक लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय सिद्ध हो सकता है।
उपयुक्त जलवायु : मूली ठण्ड जलवायु की फसल है। जडों के समुचित विकास, सुगंध, विन्यास और आकार के लिए ठण्ड मौंसम की आवश्यकता होती है। मूली की खेती के लिए 10 से 15 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त होता है। सब्जी के उद्देश्य से मूली की एशियाई और यूरोपीय किस्मों को मैदानी एवं पहाड़ी दोनों क्षेत्रों में उगाया जा सकता है, लेकिन बीजोत्पादन के लिए दोनों प्रजातियों को अलग.अलग तापक्रम की आवश्यकता होती है। एशियाई किस्मों का बीजोत्पादन मैदानी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक किया जा सकता है क्योकि इसमें किसी प्रकार की सुषुप्तावस्था नही पाई जाती। यूरोपीय किस्मों में सुषुप्तावस्था पाई जाने के कारण बीजोत्पादन के लिए विशेष तापक्रम की आवश्यकता होती है। इसलिए इन किस्मों का बीजोत्पादन सिर्फ पहाड़ों पर ही संभव हो पाता है।

मिट्टी की आवश्यकता : मूली के खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक प्रदार्थ उपलब्ध हो सर्वोंत्तम रहती है। मटियार भूमि मूली की खेती के लिए अनुपयुक्त होती हैए क्योंकि ऐसी भूमि में जड़ों का विकास ठीक से नही हो पाता है। खेत की मिट्टी का पी. एच. मान 6.5 से 7.0 के मध्य होना चाहिए।
खेत की तैयारी : जड़ वाली फसल होने के कारण खेत की गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद दो बार कल्टीवेटर से जुताई करना चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। सिंचाई और निकाई – गुड़ाई के लिए सुविधा अनुसार क्यारिया बनाकर जल निकास का समुचित प्रबंध करना चाहिए।
उर्वरक प्रबंधन : खाद एवं उर्वरक की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाच के परिणाम के आधार पर करना चाहिए। मिट्टी की जाच न हो पाने की दशा में खेत में बीज के बुआई से पूर्व प्रति हेक्टेयर लगभग 300 कुन्तल गोबर की सडी खाद, नाइट्रोजन 60 किग्रा., फास्फोरस 50 किग्रा. एवं पोटाश 50 किग्रा. देना चाहिए। देशी खाद व नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत को तैयार करते समय मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा को बुआई के 25 – 30 दिन बाद खड़ी फसल में टापड्र्सिंग करना चाहिए। जड़ों की रोपाई के समय खेत में फिर लगभग इतनी ही मात्रा में देशी खाद व रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग कर जड़ों की रोपाई करनी चाहिए। खेत की तैयारी के समय नाईट्रोजन की आधी मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। शेष बची हुई नाईट्रोजन को फसल में फूल आने के समय खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए।
बोने का समय : एशियाई किस्मों के बीज की बुआई मध्य अक्टूबर से प्रारम्भ कर मध्य नवम्बर तक की जाती है। यूरोपीय किस्मों की बुआई जड़ तैयार करने के लिए सितम्बर के अन्त से अक्टूबर तक करते हैं।
बीज की मात्रा : अच्छी गुणवत्ता का बीज किसी विश्वसनीय संस्था से लेना चाहिए। प्रजनक, आधारी बीज की बुआई करनी चाहिए। एशियाई किस्मों का 10 किग्रा एवं यूरोपीय किस्मों का 12 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है। बीज की बुआई मेंड़ों पर उचित दूरी में करने से बीज की मात्रा कम लगती है।
बोने का ढंग : मूली की बुआई दो तरह से की जाती है। एक सममतल खेत में क्यारिया बनाकरए दूसरा मेंड़ों पर बुआई की जाती है। सममतल खेत में बुआई करने के लिए खेत को 4 – 5 मीटर लम्बी व 3 मीटर चैड़ी क्यारियों में बाट लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त सिंचाई के लिए नालिया भी बना लेनी चाहिए। इन बनी हुई क्यारियों में या मेंड़ों पर बीज को 30 सेमी पंक्ति से पंक्ति व 10 सेमी पौध से पौध की दूरी पर 2 से 2.5 सेमी की गहराई पर बुआई करनी चाहिए।
जल प्रबंध : बीज की बुआई करते समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। इसके बाद जब पौधे 5.7 सेमी या फिर 3.4 पत्ती के हो जाय तो पहली सिंचाई करनी चाहिए। मूली की फसल में अधिक सिंचाई नहीं करनी चहिए। लेकिन यह भी घ्यान रखना चाहिए कि भूमि में नमी की कमी न होने पाये अन्यथा जड़ों का विकास ठीक से नही हो पाता। आमूमन सर्दी की फसल में 10 – 15 दिन के अन्तर पर एवं गर्मी की फसल में 4 – 5 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।
बीज उत्पादन की विधि : मूली का बीजोत्पादन का कार्य दो तरह बीज से बीज विधि और जड़ से बीज विधि से तैयार किया जाता है। पहली विधि से बीज उत्पादन उसी खेत में बोई गई फसल को नियमित रूप् से रख कर किया जाता है। इस विधि से किस्म की आनुवांशिक शुद्धता बनाए रखना संभव नही होता है। मूली की जिन प्रजातियों के रोपण करने पर पौध अच्छी तरह नही तैयार हो पाते उन प्रजातियों का बीजोत्पादन बीज से बीज विधि तैयार करना उपयुक्त होता है। सामान्यतः प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए यह विधि अपनाई जाती है। दूसरी विधि से शुद्ध और अच्छी गुणवत्ता का बीज प्राप्त होता है। जड़ से बीज विधि में पहले स्वस्थ जड़ों को तैयार किया जाता है और बाद में इन जड़ों की खेत में रोपाई व उचित देखभाल कर बीज तैयार किया जाता है।

जड़ों की रोपाई : बीज की बुआई के लगभग 40 से 70 दिन बाद जड़े रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। बोई गई किस्म की जड़ों की लम्बाई, चैड़ाई, रंग आकार को ध्यान में रखते हुए स्वस्थ व रोग मुक्त जड़ों को रोपाई के लिए छाट लेना चाहिए। इन छाटी हुई जड़ों के नीचे का 1/3 भाग काट कर अलग कर देना चाहिए। इसी तरह पत्ती वाले उपरी भाग को भी एक तिहाई छोड़कर काट देना चाहिए। यूरोपिन किस्म की जड़ों की रोपाई बगैर कटाई किए भी किया जा सकता है। उपर बताई गई खाद एवं उर्वरकों की मात्रा को खेत में डाल कर जडों की रोपाई उचित दूरी पर कर देते हैं। रोपाई 60 सेंमी पंक्ति से पंक्ति एवं 30 सेंमी पौध से पौध की दूरी पर करना उपयुक्त होता है। रोपाई के तुरन्त बाद एक हल्ही सिंचाई करना चाहिए।
जड़ों की रोपाई का समय : मैदानी क्षेत्रों में एशियाई किस्मों के रोपाई का कार्य दिसम्बर अन्त से शुरू कर मध्य जनवरी तक कर देना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में यूरोपियन किस्मों की रोपाई नवम्बर के अन्तिम सप्ताह से शुरू करना चाहिए। रोपाई में विलम्ब करने से बीज का कम उत्पादन होने के साथ.साथ बीज की गुणवता में भी गिरावट आ जाती है।
फसल सुरक्षा : मूली की फसल को लगने वाले कीड़े और बीमारियों से काफी नुकसान पहुचता है। अतः अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए फसल सुरक्षा बहुत आवष्यक है। मूली की फसल में मुख्य रूप से एफिड, साफ्लाई एवं पत्ती काटने वाले कीट हॅानि पहॅुचाते हैं। आमूमन मूली की फसल में कोई बीमारी नही लगती है। फिरभी कभी-कभी रतुआए मोजैक और अल्टरनेरिया ब्लाइट का प्रकोप फसल को नुकसान पहुचाता है। इन बीमारियों के नियंत्रण के लिए डाईथेन जेड-78 नामक दवा की 1.25 किग्रा मात्रा को 400 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से आवष्यकता अनुसार 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। कीटों के नियंत्रण के लिए आधा लीटर मैलाथियान 35 ई सी दवा को 400 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए।
प्रथक्करण दूरी : मूली एक पर.परागित फसल है जिसमें परागण क्रिया मुख्य रूप से मधुमक्खियों व्दारा होता है। प्रजाति की शुद्धता को बनाए रखने के लिए मूली के खेत के आस – पास अन्य प्रजातियों को नही उगाना चाहिए। प्रजाति की आनुवांशिक शुद्धता के लिए आवश्यक है कि प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु 1000 मीटर एवं आधारी बीज हेतु 1600 मीटर के फासले में मूली की किसी अन्य प्रजाति को न उगाया जाय।
अवांछित पौधों को निकालना : उच्च गुणवता के आनुवांशिक रूप से शुद्ध बीज तैयार करने के लिए परम आवश्यक है कि खेत से सभी प्रकार के अवांछित पौधों को बाहर निकाल दिया जाय। यह कार्य निम्न लिखित अवस्थाओं पर करना चाहिए।
रोपाई के समय : पहली छटाई का काम खेत से जड़े उखाड़ने के बाद व रोपाई के पूर्व जड़ों के रंगए रूपए गुणों और आकार के आधार पर छाट कर अन्य अवांछित जड़ों को निकाल देना चाहिए। रोपाई के लिए सिर्फ स्वस्थ जड़ों को प्रयोग में लाना चाहिए।
शाखाएं बनते समय : जब जड़ों में शाखाएं बनने लगे तो बहूत शीघ्र व बहुत देर से शाखाएं निकालने वाले पौधों को खेत से निकाल देना चाहिए। एक साथ शाखाएं निकलने वाले पौधों को ही बीज उत्पादन के लिए खेत में छोड़ना चाहिए।
फूल बनते समय : शाखाओं में फूल बनना शुरू होने पर फूलों के रंग एवं फूल आने के समय में अन्तर दर्शाने वाले पौधों को खेत से निकाल देना चाहिए। इन तीनों अवस्थाओं पर रोग ग्रस्त पौधों को भी निकालना बहुत आवश्यक होता है।
खेत का निरीक्षण : बीज प्रमाणीकरण संस्था व्दारा रोगिंग की विभिन्न अवस्थाओं में निरीक्षण कराना आवश्यक होता है। अतः फसल का संस्था के विशेषज्ञों व्दारा कम से कम दो बार निरीक्षण करा लेना चाहिए।
फसल की कटाई : फलियों में दाना बनने से लेकर परिपक्व होने तक चिड़ियें से बचाना चाहिए। पौधों पर फलिया जब पूर्ण रूप से पक कर सूख जाय तो कटाई कर लेना चाहिए। फसल की कटाई के बाद छोटे – छोटे बण्डलों में बांधकर दो – तीन दिन तक खलिहान में खुले स्थान पर फैला देना चाहिएए ताकि फलिया अच्छी प्रकार सूख जाय।
बीज निकालना : अच्छी तरह सूखी हुई फलियों की डण्डे से कूट कर बीज को अलग करना चाहिए। मड़ाई के बाद पंखा चलाकर औसाई कर बीज को साफ कर लेना चाहिए।
बीज उत्पादन : उन्नत सस्य वैज्ञानिक विधियों के प्रयोग के साथ.साथ फसल की समुचित देख.रेख की जाय तो 8 से 12 कुन्तल प्रति हेक्टेयर बीज का उत्पादन आसानी से हो जाता है।

सुखाना : बीज की सफाई के बाद धूप में अच्छी तरह सुखाना चाहिएए ताकि नमी का प्रतिशत कम हो जाय। बीज को 8 फीसदी नमी रहने तक सुखाना चाहिए।
थैलों में भरना : बीजोपचार के बाद बीज को साफ थैलियों व हवा रहित पात्रों में भरना चाहिए। थैलों के उपर प्रजाति का नाम, बीज उत्पादन वर्ष, शुद्धता प्रतिशत, लाट संख्या व बीज का वर्ग आदि अंकित करना चाहिए।
सारणी- आधारीय एवं प्रमाणित बीज के मानक
| क्.सं. | कारक | आधारीय बीज प्रतिशत | प्रमाणित बीज प्रतिशत |
| 1. | शुद्ध बीज (न्यूनतम) | 98 | 98 |
| 2. | निष्क्रिय प्रदार्थ (अधिकतम) | 2.0 | 2.0 |
| 3. | अन्य फसलों के बीज (अधिकतम) | 0.05 | 0.10 |
| 4. | खरपतवारों के बीज (अधिकतम) | 0.10 | 0.20 |
| 5. | अंकुरण (न्यूनतम) | 70 | 70 |
| 6. | नमी की मात्रा | 8 | 8 |
धागा बांधना : बोरो पर प्रमाणी करण संस्था व्दारा प्रमाणित धागा व सील लगाई जाती है। आधारी बीज के लिए नीले रंग एवं प्रमाणित बीज के लिए सफेछ रंग के धागे प्रयोग में लाये जाते हैं। यह कार्य बीज प्रमाणीकरण संस्था के किसी प्रतिनिधि के सामने की जाती है।
बीज संसाधन : मड़ाई के बाद बीज में काफी मात्रा में डठल, धूल, हल्के, छोटे, क्षतिग्रस्त बीज एवं खरपतवारों के बीज मिले होते हैं। बीज संसाधन संयत्र की मदद से ग्रेडिंग कर इन वस्तुओं को अलग कर शुद्ध बीज तैयार किया जाता है।
बीज उपचार : संसाधन के बाद बीज को कीट एवं रोगों से बचाने के लिए थाईरम या कैप्टान नामक रसायन से उपचारित किया जाता है। इसमें से किसी एक रसायन की 2.5 से 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करते हैं। बीज उपचार का कार्य मशीन व हाथ से किया जा सकता है।

एक हेक्टेयर मूली बीज उत्पादन से संभावित आमदनी
औसत बीज उत्पादन 8 – 15 क्विंटल (800 -1500 किलो)
उन्नत तकनीक और कुशल प्रबंधन के जरिए मूली का बीजात्पादन
न्यूनतम स्थिति (सुरक्षित अनुमान)
- उत्पादनरू 800 किलो
- दर ₹300/किलो
- कुल सकल आय = ₹2,40,000
मध्यम स्थिति (सामान्य अनुमान )
- उत्पादनरू 1000 किलो
- दररू ₹400 किलो
- कुल सकल आय = ₹4,00,000
उन्नत स्थिति (अच्छी गुणवत्ता / ब्रांडेड कम्पनी)
- उत्पादन 1500 किलो
- दरर ₹600 किलो
- कुल सकल आय = ₹9,00000
अनुमानित लागत (एक हेक्टेयर)
- कुल खच ₹1,00,000 से ₹1,20,000
(बीज, खाद, सिंचाई, श्रम, रोग-नियंत्रण, प्रसंस्करण आदि)
संभावित शुद्ध लाभ :
न्यूनतम ₹1,20,000 दृ ₹1,40,000
मध्यम ₹2,80,000 दृ ₹3,00,000
उन्नत ₹9,00,000 तक
मूली बीजोत्पादन के लाभ :
- हरी मूली बेचने की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक लाभ
- कम बार बाजार निर्भरता
- स्टोरेज की सुविधा
- निजी ब्रांड बनाकर और अधिक लाभ की संभावना
- थोक खरीदारध्कंपनी से सीधा अनुबंध संभव
निष्कर्ष :
बाजार में बीज की कीमत उसकी गुणवत्ता, प्रमाणन, किस्म, खरीदार और बिक्री की स्थिति पर भारी निर्भर करता है। फिरभी, यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से बीज उत्पादन करें, अलगाव दूरी का पालन करें, रोग-मुक्त फसल रखें और अच्छी ग्रेडिंग-पैकिंग कर बडी कम्पनियों से कन्र्टैक्ट करें, तो एक हेक्टेयर से ₹ 3 से 8 लाख तक शुद्ध आय संभव है। यही कारण है कि कई प्रगतिशील किसान अब साधारण सब्जी उत्पादन से आगे बढ़कर बीज उत्पादन को व्यवसाय के रूप में अपना रहे और खूब मुनफा कमा रहे हैं।

