तिलहनी फसलो का उभरता सितारा: सुपर फूड अलसी की खेती

Keywords : अलसी की खेती, फ्लैक्स सीड फार्मिंग, जलवायु, मिट्टी, उन्नत किस्में, बीज दर, उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई, रोग नियंत्रण, उपज और लागत/लाभ विश्लेषण, अलसी के औषधीय गुणों की विस्तृत जानकारी।
भारत तिलहनी फसलों के उत्पादन और उपभोग के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। सरसों, राई, सूरजमुखी यहा की प्रमुख तिलहनी फसलें है जिनकी खेती बडे पैमाने पर किसान करते हैं। लेकिन आज हम इससे इतर, ऐसी तिलहनी फसल की चर्चा करेंगे, जो कम लागत और कम संसाधन में भरपूर उत्पादन और बम्पर कमाई कराती है। इतना ही नही, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस फसल को सुपर फूड की श्रेणी में भी रखा है। आर्थिक दृष्टि से इस फसल को किसान तेल और तने से लिनेन रेशा प्राप्त करने के लिए उगाते है। तो आईए आज विस्तार से जानते हैं सुपर फूड और अत्याधिक मूल्यवान फसल अलसी की उन्नत खेती की पूरी जानकारी के बारे में।

अलसी की खेती के लाभदायक पहलू :
इसकी खेती का एक विशेष लाभ यह है कि अलसी के अतिरिक्त तेल, रेशा और खली से भी आमदनी मिलती है। इसके बीज से 33-47 प्रतिशत तक तेल प्राप्त होता है। बाजार में तेल ₹240-350 प्रति लीटर तक बिकता है। 100 किग्रा अलसी दाना से लगभग 40 लीटर तेल मिलता है। तेल निकालने के बाद की उच्च गुणवत्ता की खली भी प्राप्त होती है जो पशुओं के लिए पौष्टिक आहार का काम करती है। यह बाजार में ₹4,000-6,000 प्रति क्विंटल मिलती है। अलसी की फसल से अच्छी गुणवत्ता का रेशा उत्पादन भी किया जाता है। तने से लिनेन रेशा मिलता है जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है। टेक्सटाइल उद्योग में लिनेन कपड़े की कीमत ₹200-500 प्रति मीटर है। फसल के कुल उत्पादन का 38-45 प्रतिशत रेशा प्राप्त होता है।
औषधीय गुणों से भरपूर: सुपर फूड
अलसी अपने पोषण मूल्य और औषधीय गुणों से परिपूर्ण होने के नाते विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे सुपर फूड की संज्ञा दी है। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, फाइबर, लिगनिन, प्रोटीन और कई आवश्यक खनिज पाए जाते हैं। अलसी में ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में होता है, जो हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करता है। खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है। पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है। इसमें घुलनशील एवं अघुलनशील दोनों प्रकार का फाइबर पाया जाता है। कब्ज, गैस, अपच और पेट की सफाई में बेहद प्रभावी। अलसी ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद करती है। इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाने का गुण रखती है। वजन घटाने में सहायक। फाइबर अधिक होने से पेट देर तक भरा रहता है। भूख कम लगती है और वजन नियंत्रित रहता है।

अलसी में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो जोड़ों के दर्द, गठिया में लाभकारी हैं। त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद। त्वचा को मुलायम बनाता है और झुर्रियों को कम करने में मदद करता है। बालों को मजबूत बनाता है और बालों का गिरना कम करता है। अलसी में मौजूद लिगनिन एंटीऑक्सीडेंट कैंसर रोधी गुण का कार्य करते हैं। विशेष रूप से स्तन कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम को कम करने में सहायक। महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं में लाभ। हार्मोन संतुलन में मदद करता है। पीरियड्स अनियमितता, रजोनिवृत्ति (डमदवचंनेम) के लक्षणों को नियंत्रित करता है। रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायक। हाई बीपी को नियंत्रित रखने में अलसी उपयोगी है। एंटीऑक्सीडेंट गुण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
अलसी का उपयोग कैसे करें ?
एक चम्मच पिसी हुई अलसी रोज सुबह गुनगुने पानी के साथ ले सकते हैं। दही, सलाद, दलिया, रोटी या खिचड़ी में मिलाकर भी सेवन किया जा सकता है। बीज को हल्का भूनकर पीसकर उपयोग करना सबसे बेहतर माना जाता है।
जलवायु : अलसी रबी मौसम में उगाई जाने वाली फसल है। इसे ठंडे व शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। पाला को आसानी से सहन कर लेती है, लेकिन अधिक ठंड से दाना भरना प्रभावित होता है। फूल आने के समय अधिक तापमान व गर्म हवाए फसल को नुकसान पहुचाती है। इसके लिए 20-25° डिग्री तापमान अनुकूल होता है।। अच्छी पैदावार के लिए 45-50 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त होते है। इसकी खेती समशीतोष्ण प्रदेशों के लिए उपयुक्त है।
मृदा आवश्यकताएं : अलसी के लिए दोमट और मध्यम दोमट मिट्टी सर्वात्तम होती है। खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक है। खराब जलनिकास वाली भूमि में खेती नहीं करनी चाहिए। इसे सिंचित और असिंचित दोनों परिस्थितियों में अच्छी तरह उगाया जा सकता है। इसकी खेती के लिए 6 – 7 पीएच मान वाली मिटटी उपयुक्त रहती हैं।
भूमि की तैयारी : बीज के अच्छे जमाव के लिए खेत की एक बार गहरी जुताई व 2 से 3 बार हल्की जुताई करे। महीन व भुरभुरी मिट्टी बनाने के बाद पाटा लगाकर खेत समतल कर ले ताकि पानी न रुक सके।
उन्नत किस्में : विभिन्न क्षेत्रों और परिस्थितियों के अनुसार अलसी की अनेक उन्नत किस्में विकसित की गई हैं।
1. उत्तर भारत – उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब
सिंचित क्षेत्र
- T-397
- Shubhra (RL-914)
- LC-54
- Neelam (LCK-152)
- Kirat (LCK-9211)
असिंचित / वर्षा आधारित क्षेत्र
- Padmini (LCK-502)
- Ayogi (LCK-1403)
- RLC-92
- Meera (TL-98)
2. मध्य भारत – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
सिंचित क्षेत्र
- Indira Alsi-1
- Jawahar Alsi-16
- Jawahar Alsi-17
- RLC-92
असिंचित क्षेत्र
- Jawahar Alsi-51
- LC-185
- Padmini
3. राजस्थान
सिंचित क्षेत्र
- Mukta (LCK-1107)
- RLC-29
- Kirat
असिंचित क्षेत्र
- T-397
- Padmini
4. बुन्देलखण्ड क्षेत्र
- Kirat
- Padmini
- TL-98
- LCK-152 (Neelam)
- TL-146
5. महाराष्ट्र, कर्नाटक
- Nagarkoil-1
- NL-97
- PKDL-39
- RLC-92
सिंचित क्षेत्रों के लिए : शुभ्रा, शेखर, पार्वती, रश्मि, शिखा, जवाहर एलसी-185, जेएलएस-165, प्रताप अलसी-2 ये सभी सिंचित क्षेत्रों के लिए उत्तम किस्में हैं जो अधिक उपज के लिए जानी जाती हैं। इन किस्मों की औसतन 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
बीज दर : एक हेक्टेयर में 20 से 25 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। रेशा उत्पादन के लिए 30 से 35 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकता होती है।
बीजोपचार : फसल को बीज से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए बीजोपचार अवश्य करना चाहिए। बीज को थीरम 2.5 ग्राम या कार्बेन्डाजिम 2.5-3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। इससे झुलसा और उखटा रोग से बचाव हो जाता है। जैविक विकल्प के रूप में ट्राइकोडर्मा 5 – 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना काफी लाभप्रद होता है।
बुवाई का उचित समय : अलसी की अच्छी पैदावार के लिए समय से बुआई पर जोर दे। देर से बुवाई करने में उपज काफी कम हो जाती है। सिंचित इलाको में नवंबर का प्रथम पखवाड़ा से लेकर नवंबर के अंत तक बुवाई की जा सकती है। असिंचित क्षेत्र में अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा का समय सबसे उपयुक्त होता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन : बेहतर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी के समय 100 से 120 कुन्तल सड़ी हुई गोबर खाद का इस्तेमल जरूर करें। सिंचित क्षेत्र के लिए नाइट्रोजन 100 किग्रा, फास्फोरस 60 किग्रा एवं पोटाश 40 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर दें। असिंचित क्षेत्र के लिए नाइट्रोजन 50 किग्रा, फास्फोरस 40 किग्रा, पोटाश 40 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुआई के दौरान एवं शेष मात्रा खडी फसल में टाप डे्रसिेग के रूप में प्रयोग करें। तिलहनी फसलों में सामान्यत 3: 2: 1 के अनुपात में रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल करना लाभ दायक होता है।
सिंचाई प्रबंधन : अलसी कम पानी चाहने वाली फसल है, फिर भी फसल में वैज्ञानिक नजरिए से सिचाई किया जाय तो उपज में काफी इजाफा होता है। सिचाई करते समय ध्यान रखें की खेत में पानी ठहरने न पाये, वरना झुलसा रोग व फसल के गिरने का खतरा बढ़ जाता है। पहली सिंचाई 25-30 दिन पर शाखा बनते समय, दूसरी 55-60 दिन पर फूल आते समय और तीसरी दाना भराव की अवस्था में जरूरत के अनुसार सिचाई अवश्य करें।
खरपतवार प्रबंधन : खरपतवारों से पैदावार के साथ-साथ तेल की गुणवत्ता में भी कमी आ जाती है। जब पौधे 30-35 दिन के हो जाय तो निकाई और गुड़ाई करके खरपतवारों को निकाल देना चाहिए। इसी समय पौधों की छटाई कर पौधों के बीच 5-7 सेमी. फासला निर्धारित करें। अलसी में दो निकाई – गुड़ाई पर्याप्त होती है। मजदूरों से निकाई कराने में काफी खर्च आ जाता है। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डामेथीलीन 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के तुरन्त बाद व अंकुरण से पूर्व खेत में छिड़काव करें।
रोग एवं कीट प्रबंधन : अलसी का झुलसा रोग: इस बीमारी से पूरा पौधा प्रभावित होता है। शुरूआत में पत्तियों के उपरी सतह पर कत्थई रंग के धब्बे दिखाई पडते है। बाद में तने से लेकर फलियों तक फैल जाते हैं। इसके नियन्त्रण के लिए बीज को उपचारित कर बुआई करें। खडी फसल में मैन्कोजेब 2.5 किग्रा./हेक्टेयर की दर से 40-50 दिन पर छिडकाव करें। आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर दूसरा और तीसरा छिडकाव कर सकते हैे।
रतुआ या गेरूई रोग : इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों, पुष्पों व तनों पर नारंगी रंग के धब्बे दिखाई पडते है। इसके नियन्त्रण के लिए मैन्कोजेब 2.5 किग्रा. या फिर घुलनशील गंधक 3 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें।
बुकनी रोग : इस रोक में पत्तियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है। बाद में पत्तिया सूख जाती है। इसके नियन्त्रण के लिए घुलनशील गंधक 3 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें।
उकठा रोग: इस रोग में पत्तियां नीचे से उपर की ओर पीली पडने लगती है। बाद में पूरा पौधा सूख जाता है। इसकी रोक थाम के लिए लम्बी अवधि का फसल चक्र अपनाना चाहिए।
अलसी का माहू : इसके नियत्रण के लिए मेटासिस्टाक्स या रोगोर की 1 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
कटवर्म : यह कीट पौधे को काटकर गिरा देता है। इसके नियत्रण के लिए क्लोरपाइरीफॉस 1.5 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
गालमिज कीट : इसकी छोटी गिडारे कलियो के अन्दर घुसकर पुन्केसर को खाकर नुकसान पहुचाती है। इसके कारण फलियों में दाने नही बनते । इसके नियत्रण के लिए कलिया बनते समय इण्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.25 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में घोल कर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
कटाई मडाई, और उत्पादन : जब 70-80 प्रतिशत कैप्सूल भूरे रंग के हों जाय तो अलसी की कटाई कर लेना चाहिए। विलंब से कटाई करने पर दाना झड़ने का खतरा बढ जाता हैं। नमी 8 से 10 प्रतिशत आने पर मड़ाई कर दाना निकाल लेना चाहिए। अलसी की फसल को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खेती करने पर 18 – 25 कुन्टल तक उत्पादन आसानी से हो जाता है।
अलसी की खेती की आर्थिकी : लाभ-लागत विश्लेषण
अलसी की खेती एक अत्यंत लाभदायक फसल है। विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां अन्य अधिक जल-गहन फसलों के लिए सिंचाई के साधन सीमित हैं। यह फसल अपेक्षाकृत कम निवेश और कम श्रम में अच्छा मुनाफा देने वाली है। सामान्य दशा में इसकी खेती से लागत का 3-4 गुना लाभ मिलता है। अलसी की प्रीमियम या जैविक खेती से लागत का 8-10 गुना तक आमदनी प्राप्त की जा सकती है।

खेती की कुल लागत :
एक हेक्टेयर में अलसी की खेती की कुल लागत ₹25,000 से ₹35,000 आती है। यह सिंचित और असिंचित दोनों स्थितियों के लिए सबसे कम खर्चीली फसलों में से एक है।
पैदावार : 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (औसतन 18 क्विंटल)
बाजार भाव : वर्तमान बाजार दर ₹6,700-7,300 प्रति क्विंटल (अगस्त 2025 तक)
प्रीमियम गुणवत्ता का बीजः ₹18,000-20,000 प्रति क्विंटल तक बिक सकता है
कुल आय (प्रति हेक्टेयर) :
सिंचित दशा में ₹100,500-1,46,000 (वर्तमान दरों पर)
प्रीमियम गुणवत्ता के बीजरू ₹2,70,000-3,60,000 तक
शुद्ध लाभ/मुनाफा
अलसी की खेती से किसान उच्च रिटर्न प्राप्त कर सकते हैं।
सामान्य दशा (वर्तमान बाजार भाव)
सिंचित खेतीरू ₹65,000-1,11,000 प्रति हेक्टेयर
प्रीमियम उत्पाद/जैविक खेती
सिंचित ₹2,35,000-3,25,000 प्रति हेक्टेयर
सरकारी योजनाएं और सहायता :
उत्तर प्रदेश में मुफ्त बीज योजना : रबी सीजन में किसानों को निःशुल्क अलसी बीज मिनीकिट दी जाती है कम सिंचाई वाली फसल होने से ग्राउंडवाटर संरक्षण को प्रोत्साहन दिया जाता हैं। जैविक खेती के लिए सब्सिडी उपलब्ध है।
निष्कर्ष :
अलसी की खेती ₹65,000-1,11,000 प्रति हेक्टेयर शुद्ध मुनाफा दे सकती है, जो इसे आर्थिक रूप से अत्यंत लाभदायक बनाता है। विशेषकर उन किसानों के लिए जिनके पास पर्याप्त सिंचाई के साधन नहीं हैं। यह फसल उन किसानो के लिए एक बेहतरीन विकल्प है। बाजार में स्थिर मांग, कम लागत, और दोहरी आय की संभावना के साथ, अलसी की खेती भारतीय किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक सुरक्षित और लाभदायक विकल्प है।

