बैंगन की स्मार्ट खेती : सालभर मांग और भरपूर कमाई
बैंगन की स्मार्ट खेती की पूरी जानकारी – उन्नत किस्में, लागत, उत्पादन, पोषण प्रबंधन, फसल सुरक्षा, और 1 हेक्टेयर में ₹7.5 लाख तक शुद्ध लाभ कैसे पाएं ।
डा. जितेन्द्र सिंह
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सब्जियों की दुनिया में बैंगन का अपना एक विशेष स्थान है। ये अपने स्वाद, पोषण और आमदनी तीनों के लिए बखूबी जाना जाता है। देश के लगभग हर कोने में बडे पैमाने पर बैंगन उगाया जाता है। गांव – कस्बों की मंडियों से लेकर शहरी बाजारों तक इसकी मांग वर्ष भर बनी रहती है, जिससे किसानों को सालभर आमदनी प्राप्त होती है। किसान इसे नकदी फसल के रूप में उगाते हैं। यदि इसकी खेती उन्नत तकनीकों, सही किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, उचित सिंचाई और प्रभावी फसल सुरक्षा के साथ की जाए तो किसान प्रति हेक्टेयर उल्लेखनीय उत्पादन बढाकर बेहतर लाभ कमा सकते हैं।
बैंगन अकेले व अन्य सब्जियों के साथ मिलाकर बनाया जाता है। इससे सब्जी, चोखा, कालौंजी आदि स्वादिष्ट ब्यंजन बानए जाते हैं। एक आकड़े के मुताबिक देश में 5.3 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल से लगभग 87 लाख टन प्रतिवर्ष बैंगन का उत्पादन किया जाता है। आज बैगन की सुधरी खेती के हर पहलू के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि किसानों को प्रति इकाई क्षेत्रफल भरपूर उत्पान और लाभ मिल सके।
अनुकूल जलवायु :
बैंगन की फसल को लम्बे और गर्म मौंसम की आवश्यकता होती है। पौधों की बढ़वार के लिए 13 से 21 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान सबसे उपयुक्त रहता है। पाला से बैंगन को बहुत हानि पहुॅचती है। बैंगन की लम्बे किस्मों की अपेक्षा गोल किस्में पाले के प्रति अधिक सहनशील होती हैं।
कैसी हो मिट्टी :
बैंगन की खेती विभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। लेकिन अधिक उत्पादन के लिए जीवांश युक्त व अच्छे जल निकास वाली मटियार दोमट व बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का पी. एच. मान 5.5 से 6.5 तक होना चाहिए।
खेत की सही तैयारी :
खेत की एक गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से करनी चाहिए। इसके बाद 2-3 बार हैरो व कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। खेत की जुताई से पूर्व 250 कुन्तल प्रति हैक्टेयर की दर से गोबर की खाद प्रयोग करना चाहिए। बाद में पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। खेत को पौध रोपण के पूर्व सुविधा अनुसार छोटी -छोटी क्यारियाॅ में बाॅट लेना चाहिए। इसी समय खेत में सिंचाई हेतु नालिया भी बना लेना चाहिए।

सही बीज चयन :
अधिक उत्पादन के लिए हमेशा स्वस्थ और गुणवत्तायुक्त बीज प्रयोग में लाना चाहिए। बीज किसी विश्वसनीय संस्था से क्रय करना चाहिए। सामान्यतः एक हेक्टेयर खेत की रोपाई हेतु पौध तैयार करने के लिए 300 से 400 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है।
उन्नत एवं संकर किस्में :
बैंगन की किस्मों को प्रमुख रूप से दो लम्बा ओर गोल किस्मों में बाटा गया हैं। स्थानीय बाजार में जिन किस्मों की माग अधिक हो, खेती के लिए उन्हीं किस्मों का चुनाव करना चाहिए।
लंबी किस्में :
- Pusa Purple Long – मध्यम अवधि, गहरे बैंगनी लंबे फल, अच्छी उपज।
- Pusa Kranti – रोग सहनशील, आकर्षक रंग, बाजार में अधिक मांग।
- Pusa Anurag – उच्च उत्पादन क्षमता, एकसमान फल।
- Arka Sheel – कीट-रोग सहनशील, दक्षिण भारत में लोकप्रिय।
- Pant Samrat – उत्तर भारत के लिए उपयुक्त, बेहतर गुणवत्ता।
- Punjab Sadabahar – वर्षभर उत्पादन के लिए उपयुक्त।
गोल किस्में :
- Pusa Purple Round – चमकदार गोल फल, अच्छी बाजार मांग।
- Arka Navneet – संकर किस्म, अधिक उपज और आकर्षक आकार।
- Narendra Baingan-1 – पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त।
- Pant Rituraj – अच्छी गुणवत्ता और उच्च उत्पादन।
- Punjab Bahar – रोग सहनशील एवं बेहतर पैदावार।
संकर किस्में (Hybrid) :
- Pusa Hybrid-6
- Arka Anand
- Mahyco Hybrid Brinjal
- US 44

किस्में चयन करते समय रखें ध्यान :
- स्थानीय बाजार में मांग
- मौसम व क्षेत्र की अनुकूलता
- रोग व कीट प्रतिरोध क्षमता
- उत्पादन अवधि
Other Important Varieties :
लम्बी किस्में : पूसा क्रान्ति, पूसा अनुराग, पूसा परपिल क्लस्टर, अर्काशील, पन्त सम्राट, पूसा अनुपम, अर्का कुसुमकर, आजाद क्रान्ति, पूसा संकर, पूसा अनमोल, पंजाब बरसाती, सदाबहार बैंगन, पंजाब चमकीला इत्यादि।
गोल किस्में : ग्रीन लाग, नरेन्द्र बैंगन -1, नरेन्द्र संकर -1, नरेन्द्र संकर-2, पंत ऋतुराज, पंजाब बहार, पंजाब नीलम, जामुनी गोला, पंजाब-8, जामुनी गोला,स्वर्ण श्री इत्यादि।
संतुलित पोषण प्रबंधन :
अधिक उत्पादन और गुणवत्तापूर्ण फल पाने के लिए बैंगन में संतुलित पोषण प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। केवल रासायनिक खाद पर निर्भर रहने के बजाय जैविक + रासायनिक + सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग बेहतर परिणाम देता है। रोपाई से पहले मिट्टी की जाँच अवश्य कराएँ। परीक्षण रिपोर्ट के अनुसार ही उर्वरकों की मात्रा तय करें।
बैंगन की फसल में पोषण प्रबंधन का विशेष महत्व है। पोषण कमी से पौधों के समुचित विकास और बढ़वार नही हो पाती है जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः भूमि में उचित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराना अति आवश्यक होता है। परीक्षण रिपोर्ट के अनुसार ही उर्वरकों की मात्रा तय करें। जाॅच न हो पाने की दशा में 250 से 300 कुन्तल गोबर की सडी खाद प्रति हेक्टेयर की दर दें। 2 – 3 टन वर्मी कम्पोस्ट यदि उपलब्ध हो। 250 किग्रा नीमखली मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और कीट नियंत्रण में मदद मिलती है।
इनको रोपाई के 15 दिन पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला दें। रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 150 किग्रा., फास्फोरस 60 किग्रा. एवं पोटाश 60 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष दो तिहाई मात्रा को टापड्रेसिंग के रूप में पौध रोपण के 30 दिन और 45 दिन बाद खड़ी फसल में देना चाहिए। बैंगन में जिंकए बोरॉन और मैग्नीशियम की कमी अक्सर देखी जाती है। इसके लिए जिंक सल्फेट 25 किग्रा/हेक्टेयर बेसल के रूप में दें। 0.5% जिंक या 0.2% बोरॉन का पर्णीय छिड़काव करें । फूल एवं फल बनने के समय विशेष ध्यान दें। इस अवस्था में पोटाश की मात्रा बढ़ाने से फल का आकार और चमक बेहतर होती है।
संतुलित पोषण के लाभ :
- पौधों की मजबूत बढ़वार
- अधिक फूल और फल सेटिंग
- बड़े, चमकदार और बाजार योग्य फल
- 25–30% तक अधिक उत्पादन
बीजोपचार : रोगमुक्त फसल की मजबूत सीढी
बैंगन की फसल को बीज जनित बीमारियों से बचाने के लिए बीज को थीरम या कैप्टान नामक दवा से 2.5 – 3 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीज को छाया में सुखा कर बोने के प्रयोग में लाए।

बुआई का सही समय : देश में बैंगन की खेती तीनों मौंसम शरदकालीन, ग्रीष्मकालीन एवं वर्षाकालीन मौंसम में की जाती है। बीज की बुआई एवं पौध रोपण का समय तालिका के अनुसार करना चाहिए।
| क्.सं. | फसल | बीज की बुआई | रोपण का समय |
| 1. | शरद कालीन | मई – जून | जून -जुलाई |
| 2. | ग्रीष्म कालीन | नवम्बर – दिसम्बर | दिसम्बर – जनवरी |
| 3. | वर्षाकालीन | मार्च – अप्रैल | अप्रैल – मई |
पौध तैयार करना : एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए लगभग 40 से 50 वर्गमीटर क्षेत्रफल में नर्सरी तैयार करना चाहिए। नर्सरी के लिए उचे स्थान का चुनाव करना चाहिए। नर्सरी के लिए हल्की दोमट या रेतीली दोमट भूमि अच्छी रहती है। पौधशाला की मिट्टी को अच्छी तरह तैयार कर 15 सेंटीमीटर उॅची व 1.25 सेंटीमीटर चैड़ी एवं जरूरत के मुताबिक लमबी क्यारिया बना लेना चाहिए। बुआई से पूर्व बीज को थीरम या कैप्टान से 2.5 – 3 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए। बनाई गई क्यारियों में बीज को पक्तियों लगभग 5-6 सेंटीमीटर की दूरी व 1.0 -1.5 सेंटीमीटर की गहराई पर बुआई करना चाहिए। बुआई के बाद बीज को अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद की 1.0 सेंटीमीटर माटी पर्त से ढक देना चाहिए। इसके उपर घास-पूस की तह बिछा देते हैं। अच्छे अंकुरण के लिए हजारे से समय – सयम पर सिंचाई भी करते रहना चाहिए। अंकुरण के बाद घास – पूस को सावधानी पूर्वक हटा देना चाहिए। इस तरह से ग्रीष्म और वर्षा ऋतु में 4 सप्ताह व शरद ऋतु में 6 से 8 सप्ताह में पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।
रोपाई की विधि : उचित दूरी का महत्व
पौधशाला से पौध निकालने से 1 – 2 दिन पूर्व हल्की सिंचाई कर देना चाहिए। ताकि जड़ों को बिना हानि पहुचाएं पौधे निकाले जा सके। गोल बैंगन की किस्मों को 75 सेमी. पंक्ति से पंक्ति और 60 सेमी. पौध से पौध की दूरी पर रोपाई करनी चाहिए। लम्बी किस्मों को पंक्तियों और पौधों की दूरी क्रमशः 60 गुणा 60 सेमी. पर करना चाहिए। रोपाई के बाद एक हल्की सिंचाई करना चाहिए ताकि पौधे अच्छी तरह से खेत में जड़े जमा सके।
सिंचाई प्रबंधन : कब और कितनी दें पानी
गर्मी में बैंगन की फसल को निरन्तर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। सामान्यतः गर्म मौंसम में 8 – 10 दिन एवं सर्दी के मौंसम में 12 -15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। खेत में पौध रोपण के तुरन्त बाद एक हल्की सिंचाई करें। पहली हल्की सिंचाई हजारे से पौधों के थालों में सुबह – साम 2 -3 दिन तक करना बहुत ही लाभकारी होता है। वर्षा कालीन फसल की सिंचाई वर्षा पर निर्भर करती है। इस मौसम में ध्यान देना चाहिए कि खेत में अतिरिक्त पानी न जमा होने पाए अन्यथा पौधे पीले पड़कर मरना शुरू हो जाते हैं।
खरपतवार नियंत्रण : शुरुआती 60 दिन क्यों हैं महत्वपूर्ण
बैंगन के खेत को शुरूआत में रोपाई के 50 से 60 दिनों तक सभी प्रकार के खरपतवारों से मुक्त रखना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए समय-समय पर खेत में निकाई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। निकाई-गुड़ाई के समय पौधों में मिट्टी चढ़ाने का कार्य भी कर देना चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवारों के नियंत्रण के लिए लासों 2 किलोग्राम या टोक-ई-25 की 1.25 किलोग्राम दवा को लगभग 600 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के तुरन्त बाद खेत में छिड़काव करना चाहिए।
फसल सुरक्षा कवच : बैंगन की फसल को कीड़े और बीमारियों से बहुत हानि पहुचती है। अधिक उत्पादन की दृष्टि से फसल सुरक्षा करना बहुत आवश्यक होता है। फोमोप्सिस अंगमारी बैंगन की प्रमुख बीमारी है। यह एक प्रकार के कवक व्दारा फैलती है। इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर नियमित गोल, धूसर व भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। आगे चलकर फलों को भी सड़ा देते है। इसकी रोकथम के लिए ब्लाईटास्क-50 या मैंकोजेब दवा की 2.5 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 8 – 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।
जीवाणु उकठा बीमारी जीवाणुओं से फैलती है। यह रोग पौधे की निचली पत्तियों से शुरू होता है। तने को काटकर देखने पर भूरा जमा हुआ प्रदार्थ दिखाई देता है। इसकी रोकथम के लिए पौध रोपण से पूर्व 10 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर आधा मिनट डुबोकर रोपाई करें।
बैंगन का तना एवं फल छेदक कीट एक बहुत ही नुकसान पहुचाने वाला कीट है। शुरू में यह कीट पौधे के तने में घुस कर खाना शुरू कर देता है। जिससे पौधा मुरझा कर गिर जाता है। बाद में फल लगने पर फलों अन्दर घुस कर खाना शुरू कर देते हैं। इसके नियंत्रण के लिए इन्डोसल्फान 35 ई.सी. या मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. के 0.05 सक्रिय घोल को 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
जैसिड पत्तियों का रस चूसने वाला एक कीट है। इस कीट से प्रभावित पौधे की पत्तियां पीली पड़कर उपर की ओर मुड़ जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. दवा की 1 लीटर मात्रा को लगभग 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।
समय पर तुड़ाई : बैंगन के फलों की तुड़ाई पूर्ण विकसित व मुलायम अवस्था में करना चाहिए। आमूमन पौधों में फूल लगने के 8 से 10 दिन बाद फल तुडाई योग्य हो जाते हैं। तुड़ाई के सयम रोग व कीट ग्रस्त फलों को छाट कर अलग कर देना चाहिए। बैंगन के फलों का भण्डारण मौंसम पर निर्भर करता है।
गर्मी के मौसम में खुले छायादार स्थान पर 1 -2 दिन व सर्दी के मौंसम में 4 – 5 दिनों तक सुरक्षित भण्डारण किया जा सकता है। फलों को कृतिम रूप से 85-90 प्रतिषत आपेक्षिक आद्रता और 7-10 सेंटीग्रेड तापमान पर 7 से 8 दिनों तक भण्डारण कर सकते हैं।

उत्पादन : सामान्यतः बैंगन की उपज 250 से 300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है। उन्नत तकनीक एवं समुचित प्रबंधन एवं संकर किस्मों के प्रयोग से 600 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार होती है।
1 हेक्टेयर में अनुमानित लागत (व्यय)
| मद | अनुमानित लागत (₹) |
| खेत की तैयारी (जुताई, पाटा आदि) | 18,000 |
| गोबर खाद / जैविक खाद | 35,000 |
| बीज (संकर किस्म) | 8,000 |
| नर्सरी एवं रोपाई मजदूरी | 20,000 |
| रासायनिक उर्वरक | 25,000 |
| कीटनाशी/फफूंदनाशी | 20,000 |
| सिंचाई (ड्रिप/पानी/बिजली) | 22,000 |
| निराई-गुड़ाई व अन्य श्रम | 28,000 |
| तुड़ाई एवं परिवहन | 30,000 |
| अन्य आकस्मिक खर्च | 14,000 |
कुल अनुमानित लागत: ₹2,20,000 – ₹2,40,000 प्रति हेक्टेयर
उत्पादन एवं आय
- औसत उत्पादन (स्मार्ट खेती से): 450 – 600 क्विंटल/हेक्टेयर
- औसत बाजार भाव (मध्यम दर): ₹18 – ₹22 प्रति किलोग्राम
औसत गणना (500 क्विंटल × ₹20/kg)
50,000 किग्रा × ₹20
₹10,00,000 सकल आय
अनुमानित शुद्ध लाभ
| विवरण | राशि (₹) |
| सकल आय | 10,00,000 |
| कुल लागत | 2,30,000 (औसत) |
| शुद्ध लाभ | ₹7,50,000 से अधिक |
निष्कर्ष :
स्मार्ट तकनीक, उन्नत संकर किस्म, संतुलित पोषण और सही बाजार रणनीति अपनाने पर बैंगन की खेती अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकती है। परंपरागत खेती की तुलना में स्मार्ट खेती से 30 – 40 फीसदी तक अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता प्राप्त होती है, जिससे किसानों की आय में काफी इजाफा होता है।

