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अधिक कमाईके लिए करें अदरक की वैज्ञानिक खेती

अदरक की वैज्ञानिक खेती की पूरी जानकारी— उन्नत किस्में, बीज, खाद, सिंचाई, रोग नियंत्रण और लागत-लाभ  विश्लेषण के साथ  एक  हेक्टेयर में ₹3 लाख तक कमाई कैसे करें।

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मसाला फसलों में अदरक एक ऐसी फसल है जिसकी मांग पूरे साल बनी रहती है। भारतीय रसोई में अदरक का एक विशेष स्थान है। देश के लगभग हर घर में सब्जी, चटनी, अचार, सूप और विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थों में इसका खूब उपयोग किया जाता है। इसके अलावा अदरक में अनेक औषधीय गुण भी पाए जाते हैं, जिसके कारण आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा में भी इसका व्यापक उपयोग होता है। यही कारण है कि बाजार में अदरक की मांग लगातार तेजी से बढ़ रही है।

भारत अदरक उत्पादन में विश्व के प्रमुख देशों में से एक है और विश्व उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा भारत में ही पैदा होता है। देश के कई राज्यों में किसान अदरक की खेती करके अच्छी आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। यदि किसान आधुनिक तरीके और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर अदरक की खेती करें तो कम क्षेत्रफल में भी बेहतर उत्पादन लेकर अच्छा लाभ कमा सकते हैं।

अदरक का महत्व और उपयोग :

अदरक केवल मसाले की फसल ही नहीं है बल्कि यह एक औषधीय पौधा भी है। ताजी अवस्था में इसे अदरक कहा जाता है जबकि सुखाने पर यह सोंठ बन जाती है। अदरक का उपयोग अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ट और सुगंधित बनाने में किया जाता है।

अदरक में पाचक गुण पाए जाते हैं और यह पेट से संबंधित कई समस्याओं में लाभकारी है। गैस, अपच, सर्दी-खांसी और गले के संक्रमण में अदरक का प्रयोग घरेलू औषधि के रूप में किया जाता है। अदरक का रस और शहद मिलाकर लेने से खांसी, दमा और गले की खराश में राहत मिलती है।

इसके अलावा अदरक से अनेक प्रकार के प्रसंस्कृत उत्पाद भी बनाए जाते हैं जैसे—अदरक पाउडर, अदरक का अचार, अदरक कैंडी, अदरक चाय मिश्रण आदि। इन उत्पादों के कारण अदरक का बाजार और भी विस्तृत हो गया है।

उपयुक्त जलवायु :

अदरक गर्म एवं आर्द्र जलवायु की फसल है। इसकी खेती उन क्षेत्रों में अच्छी होती है जहाँ पर्याप्त वर्षा और मध्यम तापमान उपलब्ध हो। सामान्यतः 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान अदरक की वृद्धि के लिए उपयुक्त माना जाता है।

यह फसल समुद्र तल से लगभग 1500 मीटर तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से उगाई जा सकती है। कंदों के विकास के समय नमी युक्त मौसम तथा फसल पकने के समय शुष्क मौसम अनुकूल होता है। अदरक की खेती हल्की छाया में भी अच्छी होती है, इसलिए इसे पुराने आम या अन्य बगीचों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

मिट्टी का चयन और खेत की तैयारी :

अदरक की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली जीवांशयुक्त दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। भारी, जलभराव वाली और क्षारीय मिट्टी में अदरक की खेती सफल नहीं होती।

खेत की तैयारी के लिए गर्मियों में एक-दो बार मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद 2–3 बार हैरो या देशी हल चलाकर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। अंतिम जुताई के समय खेत को समतल कर देना चाहिए ताकि वर्षा का पानी खेत में न रुके।

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उन्नत किस्में :

अदरक की कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं जिनसे अधिक उत्पादन और अच्छी गुणवत्ता प्राप्त होती है। प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं—

रियो-डी-जेनेरियो, चाइना, कोचीन, वर्धमान, कालीकट, बरुआ और सागर।

इसके अलावा कुछ उन्नत किस्मों का विवरण इस प्रकार है—

सुरूचि :

यह अधिक उपज देने वाली किस्म है। इसके कंद पीले और हल्के हरे रंग के होते हैं। इस किस्म में रोगों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। इसमें लगभग 3.8 प्रतिशत रेशा, 2 प्रतिशत तेल तथा लगभग 10 प्रतिशत ओलियोरेसिन पाया जाता है।

सुरभि :

यह किस्म म्यूटेशन विधि से विकसित की गई है और अधिक उत्पादन देती है। इसके कंदों की संख्या अधिक होती है तथा उनका रंग गहरा और चमकीला होता है। इसमें लगभग 4 प्रतिशत रेशा और 2.1 प्रतिशत तेल पाया जाता है।

सुप्रभा :

इस किस्म के कंद लम्बे, अण्डाकार और चमकीले भूरे रंग के होते हैं। इसमें फुटाव अधिक होता है और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए यह किस्म विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है।

बीज की मात्रा और चयन :

  • अदरक की खेती में बीज के रूप में कंदों का उपयोग किया जाता है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए स्वस्थ और रोगमुक्त कंदों का चयन करना चाहिए।
  • कंदों को 4–5 सेंटीमीटर आकार के टुकड़ों में काट लेना चाहिए। प्रत्येक टुकड़े में कम से कम दो आँखें होनी चाहिए तथा उनका वजन लगभग 25–30 ग्राम होना चाहिए।
  • एक हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई के लिए लगभग 15 से 20 क्विंटल बीज कंद की आवश्यकता होती है।

बीजोपचार :

  • बुआई से पहले बीज कंदों का उपचार करना बहुत आवश्यक है ताकि रोगों से बचाव हो सके।
  • कंदों को डाइथेन-एम-45 (0.25 प्रतिशत) और बाविस्टीन (0.1 प्रतिशत) के घोल में लगभग एक घंटे तक डुबोकर रखना चाहिए। इसके बाद उन्हें छाया में 1–2 दिन तक सुखाना चाहिए।
  • बीजोपचार से फफूंदजनित रोगों का खतरा काफी कम हो जाता है और अंकुरण भी अच्छा होता है।

बुआई का तरीका :

  • अदरक की बुआई क्यारियों में करना अधिक उपयुक्त होता है।
  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी लगभग 25 से 30 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। कंदों को लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए।
  • बुआई के बाद खेत को पुआल, सूखी घास या पत्तियों से ढक देना चाहिए। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और अंकुरण बेहतर होता है।
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बुआई का समय :

अदरक की बुआई का समय क्षेत्र की जलवायु पर निर्भर करता है। सामान्यतः वर्षा आधारित क्षेत्रों में अदरक की बुआई मई-जून में की जाती है। पहली वर्षा के तुरंत बाद बुआई करना सबसे अच्छा माना जाता है। सिंचित क्षेत्रों में अदरक की बुआई अप्रैल से मध्य मई तक की जा सकती है।

खाद एवं उर्वरक :

अदरक की अच्छी पैदावार के लिए जैविक खाद का प्रयोग बहुत लाभकारी होता है। प्रति हेक्टेयर लगभग 200 से 250 क्विंटल गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट बुआई से 15 दिन पहले खेत में मिला देना चाहिए।

रासायनिक उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा इस प्रकार है—

  • नाइट्रोजन – 100 किग्रा
  • फास्फोरस – 75 किग्रा
  • पोटाश – 100 किग्रा

नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय देनी चाहिए। शेष नाइट्रोजन की मात्रा बुआई के 50–60 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन :

अदरक की फसल को नियमित नमी की आवश्यकता होती है। वर्षा ऋतु में खेत में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पानी जमा न हो।

गर्मी के मौसम में 7–8 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। अत्यधिक सूखे की स्थिति में सिंचाई की आवृत्ति बढ़ाई जा सकती है।

निराई-गुड़ाई :

अदरक की फसल को खरपतवार से मुक्त रखना बहुत जरूरी है। सामान्यतः 2–3 बार निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती है।

निराई के साथ-साथ पौधों के पास मिट्टी चढ़ाना भी आवश्यक है, जिससे कंदों का विकास अच्छा होता है।

रोग और कीट प्रबंधन :

अदरक की फसल में कई प्रकार के कीट और रोग लग सकते हैं जिनसे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कुरमुला कीट :

यह कीट मिट्टी में रहकर कंदों को नुकसान पहुँचाता है। इससे कंदों में छेद हो जाते हैं और बाद में सड़न रोग लग जाता है।

राइजोम मैगट :

यह कीट कंदों में अंडे देता है और उनसे निकलने वाले लार्वा कंदों को खाकर नुकसान पहुँचाते हैं।

इन कीटों से बचाव के लिए स्वस्थ बीज का प्रयोग करना चाहिए तथा खेत की साफ-सफाई बनाए रखनी चाहिए।

प्रकंद विगलन रोग :

यह रोग फफूंद के कारण होता है। इसके प्रभाव से पौधे की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और धीरे-धीरे पौधा सूख जाता है।

इससे बचाव के लिए बीज कंदों को बुआई से पहले फफूंदनाशक दवा से उपचारित करना चाहिए।

पत्तियों का धब्बा रोग :

इस रोग में पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। इसकी रोकथाम के लिए आवश्यकतानुसार बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए।

फसल की खुदाई :

अदरक की फसल सामान्यतः 7 से 8 महीने में तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली होकर सूखने लगें तो समझना चाहिए कि फसल खुदाई के लिए तैयार है। खुदाई का कार्य फावड़ा, कुदाल या खुरपी से सावधानीपूर्वक करना चाहिए ताकि कंदों को नुकसान न पहुंचे।

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उत्पादन :

अदरक की उपज कई बातों पर निर्भर करती है जैसे किस्म, मिट्टी की उर्वरता और खेती की तकनीक।

सामान्य परिस्थितियों में अदरक की उपज लगभग 100 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो सकती है। यदि इसे सुखाकर सोंठ बनाया जाए तो लगभग 20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है।

सोंठ तैयार करने की प्रक्रिया :

अदरक से सोंठ बनाने के लिए अच्छी गुणवत्ता के कंदों का चयन किया जाता है। इन कंदों को पहले पानी में धोकर साफ किया जाता है। इसके बाद इन्हें धूप में सुखाया जाता है।

सुखाने के बाद चूने के पानी और गंधक से उपचारित करके पुनः धूप में सुखाया जाता है। इस प्रकार लगभग पाँच भाग अदरक से एक भाग सोंठ प्राप्त होती है।

सोंठ बनाने पर अतिरिक्त लाभ :

यदि अदरक को सुखाकर सोंठ बनाई जाए तो लगभग 20–25% उत्पाद सोंठ के रूप में प्राप्त होता है और इसका बाजार मूल्य अधिक होता है। इस स्थिति में किसान की आय और भी बढ़ सकती है।

अदरक की खेती का लागत-लाभ विश्लेषण : (प्रति हेक्टेयर)

अदरक की खेती में प्रारम्भिक लागत अपेक्षाकृत अधिक होती है क्योंकि इसमें बीज कंद की मात्रा अधिक लगती है। लेकिन यदि खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो उत्पादन अच्छा मिलता है और किसान को अच्छा लाभ प्राप्त हो सकता है। नीचे एक हेक्टेयर अदरक की खेती का एक अनुमानित लागत-लाभ विश्लेषण दिया गया है।

अनुमानित लागत (प्रति हेक्टेयर)

क्र.मदअनुमानित खर्च (रु.)
1खेत की जुताई व तैयारी12,000
2बीज कंद (15–20 क्विंटल @ ₹4000/क्विंट60,000 – 80,000
3गोबर की खाद / कम्पोस्ट15,000
4रासायनिक उर्वरक10,000
5बीजोपचार व कीटनाशी / फफूंदनाशी6,000
6बुआई व मजदूरी10,000
7निराई-गुड़ाई व मिट्टी चढ़ाना12,000
8सिंचाई व अन्य खर्च8,000
9खुदाई, सफाई व परिवहन12,000

कुल अनुमानित लागत = लगभग 1,45,000 – 1,65,000 प्रति हेक्टेयर

अनुमानित उत्पादन :

अच्छे प्रबंधन की स्थिति में अदरक का उत्पादन सामान्यतः

120 – 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त हो सकता है।

बाजार मूल्य (औसत)

अदरक का बाजार मूल्य मौसम और मांग के अनुसार बदलता रहता है। सामान्यतः थोक बाजार में इसका औसत मूल्य लगभग

30 – 40 प्रति किलोग्राम माना जा सकता है।

कुल आय (प्रति हेक्टेयर)

यदि औसत उत्पादन 130 क्विंटल (13,000 किग्रा.) माना जाए और औसत कीमत 35 प्रति किग्रा. मिले तो

कुल आय = 13,000 × 35 = 4,55,000

शुद्ध लाभ

विवरणराशि
कुल आय₹4,55,000
कुल लागत₹1,55,000 (औसत)

शुद्ध लाभ 3,00,000 प्रति हेक्टेयर

निष्कर्ष :

अदरक एक लाभकारी मसाला फसल है जिसकी बाजार में हमेशा अच्छी मांग रहती है। यदि किसान उन्नत किस्मों का चयन, बीजोपचार और वैज्ञानिक पद्धति से खेती करें तो वे कम क्षेत्र में भी अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान समय में मसाला फसलों की बढ़ती मांग को देखते हुए अदरक की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक बेहतर विकल्प बन सकती है। किसान एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये तक शुद्ध लाभ आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

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