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छोटी जगह बडी कमाई: मशरूम उत्पादन

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मशरूम उत्पादन तकनीक सेहत और समृद्धि का संगम

देश में मशरूम उत्पादन की शुरुआत भले ही करीब तीन दशक पहले हुई हो, लेकिन आज यह एक सफल, लाभकारी और आधुनिक व्यवसाय का प्रतीक बन चुका है। ग्रामीण हो या शहरी क्षेत्र हर जगह मशरूम ने अपनी पहचान एक लोकप्रिय, पौष्टिक और स्वादिष्ट सब्जी के रूप में बनाई है। मशरूम उत्पादन न केवल सेहतमंद खाद्य विकल्प है , बल्कि कम निवेश में अधिक आय देने वाला व्यवसाय भी है। यह ग्रामीण युवाओं, महिलाओं और छोटे किसानों के लिए Mini Agri & Industry की तरह तेजी से उभर रहा है।

हर मौसम में संभव खेती: भारत में विविध जलवायु और मौसमों के कारण मशरूम उत्पादन सालभर संभव है। केवल प्रजातियों में बदलाव करके किसान हर मौसम में फसल ले सकते हैं।

सर्दी (नवंबर-फरवरी) रू सफेद बटन मशरूम

गर्मी (अप्रैल-अगस्त) रू पैडीस्ट्रा मशरूम

बरसात (जुलाई-अप्रैल) रू आयस्टर मशरूम

कम जगह भरपूर उत्पादन: मशरूम की खेती के लिए लंबे-चैड़े खेतों की जरूरत नहीं , बस छोटे-छोटे हवादार शेड, लकड़ी की पेटियां, पॉलिथीन बैग या रैक पर्याप्त हैं। मशरूम अन्य फसलों की तुलना प्रतिवर्ग मीटर कई गुना अधिक उत्पादन देता है। यही वजह है कि यह व्यवसाय छोटे किसानों , युवाओं और बेरोजगारों के लिए आय का बड़ा साधन बन रहा है। श्रम प्रधान कार्य होने के कारण रोजगार के नये अवसर भी बढ़ाता है।

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Scientific Cultivation of Mushroom in Laboratory

पौष्टिकता से भरपूर सुपरफूड :

मशरूम में प्रोटीन विटामिन ए , बी , डी एवं  खनिज तत्व जैसे- कैल्शियम, फॉस्फोरस , सोडियम , पोटैशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ताजे मशरूम में लगभग 89 से 91 फीसदी पानी 37 फीसदी प्रोटीन और 0 4 फीसदी वसा होती है। इतना ही नहीं,  इसमें मिलने वाले 19 प्रकार के अमीनो अम्ल इसे अन्य सब्जियों से कई गुना पौष्टिक बनाते हैं। लगभग 200 ग्राम सूखे मशरूम सेवन से शरीर को सभी पोषक  तत्व मिल जाते हैं। मधुमेह, रक्तचाप, मोटापा हृदय रोग और कैंसर जैसे रोगों से जूझ रहे लोगों के लिए मशरूम का सेवन बेहद उपयोगी होता है।

प्रो. आलोक कुमार सिंह, कृषि वैज्ञानिक, उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी का कहना है कि, “मशरूम उत्पादन छोटे किसानों, युवाओं और महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की कुंजी है। सीमित जगह और कम लागत में अधिक आय देने साथ न केवल पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाती है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से प्रशिक्षण लेकर इसे अपनाएँ, तो मशरूम उत्पादन आर्थिक उन्नति का  आधार बन सकता है।”

मशरूम  प्रसंस्करण: मशरूम से बिस्किट, केक, मुरब्बा, सूखा पाउडर, स्नैक्स, पिकल जैसे अनेक मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा रहे है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। मांग को देखते हुए, आज कई ग्रामीण और शहरी युवाओं ने मशरूम प्रसंस्करण इकाइयाँ (चतवबमेेपदह नदपजे) स्थापित कर रोजगार और आय दोनों के नए रास्ते खोले हैं। सही प्रशिक्षण और विपणन व्यवस्था के साथ, मशरूम उत्पादन एक साल भर चलने वाला लाभकारी व्यवसाय बन सकता है

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Production of Mushroom in Small Shed by Farmer

प्रजाति या स्पान का चयन: दुनिया में मशरूम की 2 हजार से अधिक प्रजातिया पाई जाती हैं। अपने देश में लगभग 250 प्रजातिया हैं, जिनमें कुछ ही खानें योग्य हैं। बाकी जहरीली होने के कारण खाने के इस्तेमाल में नही लाया जाता। देश में सर्वाधिक सफेद बटन मशरूम, आयस्टर मशरूम एवं पैडी मशरूम का उत्पादन किया जाता है। ठंड के मौसम-नवम्बर से फरवरी के लिए सफेद बटन मशरूम, गर्मी के मौंसम- अप्रैल से अगस्त के लिए पैडीस्ट्रा मशरूम एवं बरसात के मौंसम- जुलाई से अप्रैल के लिए आयस्टर मशरूम की प्रजाति को चुनाव करना चाहिए।

खाद या सब्सट्रेट तैयार करने की विधि : इसको बनाने में कृषि अपशिष्ट जैसे- भूसा, धान की पुआल, गन्ने की खोई, केले की सूखी पत्तियांे का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन गेहूॅ और धान के पुआल से तैयार की गई खाद को अधिक प्रयोग में लाया जाता है। इसको तैयार करने में गेहू या धान के पुआल का भूसा 5 कुन्तल, मुर्गी की खाद 2 कुन्तल, चोकर 8 किलोग्राम, यूरिया 3 किलोगाम, जिप्सम 10 किलोग्राम और बी.एच.सी. पाउडर 60 ग्राम लेना चाहिए। खाद बनानें का कार्य दो चरणों में किया जाता है। प्रथम चरण में भूसे को पानी से भिगोया जाता है। इसके बाद पक्के फर्स पर फैलाकर उसमें मुर्गी की खाद और चोकर को छिड़क कर पैरों से रौंद कर अच्छी तरह मिलाते हैं। दो-तीन दिन छोड़ने के बाद पलट देते हैं ताकि अवायवीय दशा न बन सके। दो दिन बाद इसमें यूरिया की पूरी मात्रा मिला देते हैं। अब इसको एक वायु श्वसनशील ढेर के रूप में एकत्र कर देते हैं। इसको एक दिन के अन्तर पर पलटाई करते हैं। इस तरह से 3-4 पलटाई करने के बाद प्रथम चरण पूरा हो जाता हे। व्दितीय चरण में इस सामग्री को उपचारित करने का कार्य किया जाता है। इसके लिए एक कक्ष में भाप के लिए ब्रायलर और हवा के लिए एक ब्लोअर लगा होता है। इस कक्ष में सारी सामग्री को भर देते हैं। इसकी उचाई 7-8 फीट रखना चाहिए। अब कक्ष का तापमान 48 से 50 डिग्री सेन्टीग्रड तक भाप के व्दारा बढ़या जाता है। उसके 6 घन्टे बाद तापमान को बढ़ाकर 57 से 59 डिग्री सेन्टीग्रड तक ले जाते हैं। इस तापक्रम तक ले जाने से कक्ष में भरी गई सारी सामग्री पाश्चुरीकृत हो जाती है। 4 से 6 घण्टे तक इसी तापमान पर रखने के बाद 50 से 52 डिग्री सेन्टीग्रड पर घीरे-धीरे लाया जाता है। इसमें तीन-चार दिन का समय लग जाता है। इस तरह से 25 -38 डिग्री सेन्टीग्रड तक सामग्री को लाकर बिजाई की जाती है। 

बिजाई या स्पानिंग का तरीका : मशरूम के बीज को स्पान तथा तैयार खाद में स्पान मिलाने को स्पानिंग कहते हैं। आयस्टर मशरूम के लिए दो विधिया प्रचलित हैं। पहली विधि के अनुसार बीज या स्पान को पूरे खाद में उचित मात्रा में एक साथ मिला दिया जाता है। दूसरी विधि में खाद की 8 से 10 सेंटीमीटर तह बिछाकर उसके उपर बीज छिड़क दिया जाता है। बीज या स्पान की मात्रा का निर्धारण के लिए सूखी खाद के भार का 5 प्रतिशत व गीली खाद के भार का 2 प्रतिशत की दर से प्रयोग करते हैं। स्पान की मात्रा को 5 बढ़ाने से उत्पादन में 50 फीसदी तक की वृद्धि हो जाती है।

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Mushroom Production at Farmer’s Field in Natural Condition

आयस्टर मशरूम उगाने की विधि: पहली विधि में बीज या स्पान मिले खाद को पालीथीन की थैलियों में 2/3 उचाई तक अच्छी तरह भर कर सुतली से बांध देते हैं। इसके लिए 60×45 या 45×30 सेंटीमीटर आकार की थैलिया उपयुक्त रहती हैं। इसके बाद इन भरी हुई थैलियों को 5 -10 मिली मीटर आकार के छेद कर 5-8 सेंटीमीटर की दूरी पर मशरूम उगाने वाले स्थान पर रैक में रख देते हैं। दूसरी विधि में मशरूम उगाने के लिए लकड़ी के फ्रेम प्रयोग में लाये जाते हैं। फ्रेम का आकार 453030 सेंटीमीटर का रखना चाहिए। फ्रेम को पालीथीन सीट के उपर रख कर भूसा भर देते हैं।

उचित देखभाल : इस दौरान मशरूम घर में रखे खाद से भरे थैलों में कवक जाल फैलने लगता है। कमरे का तापमान 22-28 डिग्री सेन्टीग्रड और आपेक्षिक आद्रता 85-90 प्रतिशत के बीच रखते हें। इस दौरान साफ सफाई पर ध्यान दिया जाता है ताकि कीड़े मकोड़े न पनप सके।  15 से 20 दिन में इन थैलियों सफेद रंग का कवक जाल फैल जाता है जिससें खाद भरे थैले अर्ध ठोस आकार का रूप ले लेते हैं। अब इन थैलियों की पालीथीन को काट कर अलग करने के बाद 25 -30 सेंटीमीटर की दूरी पर रख देते हैं। इस समय मशरूम घर में 5-6 घंटे ताजी जने की व्यवस्था कर देना चाहिए। अवश्यकता अनुसार पानी का छिड़काव भी करते रहना चाहिए। रात्रि में प्रकाश के लिए 40 वाट का एक बल्ब 20 फुट लम्बे और 40 फुट चैड़े मशरूम घर में जलाते हैं। इस तरह  6-7 दिनों में मशरूम तोड़ने लायक हो जाती है।

मशरूम की तुड़ाई: अयस्टर मशरूम किनारे से मुड़ना शुरू हो जाय तो तुड़ाई कर लेनी चाहिए। तुड़ाई के लिए साफ चाकू से कटाई करनी चाहिए। मशरूम की तुड़ाई सावघानी पूर्वक हाथ से भी की जा सकती है। एक बार मशरूम की तुड़ाई के बाद 8-10 दिन में दुबारा मशरूम निकल आते हैं। इस तरह से एक बार बीजाई से 40 दिन तक 10 दिन के अन्तराल पर मशरूम का उत्पादन मिलता रहता है।

विपणन — ताजगी का ध्यान रखें :

मशरूम एक जल्दी खराब होने वाली खाद्य प्रदार्थ है। इस कारण 24-48 घंटे के अन्दर बिक्री कर लेना चाहिए। बाजार में बिक्री के लिए 100 गाम व 200 ग्राम की पालीथीन की थैलियों में मशरूम को भरना चाहिए। पालीथीन में भरने से पूर्व लगभग एक घंटे तक छाया में मशरूम को सूखने देना चाहिए। थैलियों में मशरूम को भरने के बाद दोेनों तरफ दो-दो छेद करके बाजार में बिक्री के लिए भेज देना चाहिए।

उत्पादन : मशरूम का उत्पादन सामान्य परिस्थिति में उपयोग में लाई जाने वाली खाद/सब्सट्रैक के कुल भार का लगभग 75 फीसदी उत्पादन होता है। यदि इस  खाद/सब्सट्रैक में उत्पादन को बढ़ाने वाले प्रदाथों को पर्याप्त मात्रा में मिला दिया जाय तो उत्पादन 100 फीसदी के पार तक पहुच जाता है। इस तरह से  10 कुन्तल खाद/सब्सट्रैक के इस्तेमाल से 7 कुन्तल मशरूम का उत्पादन आसानी से हो जाता है।

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Commercial Mushroom Production for Making more Profit

उत्पादन और आर्थिकी : मशरूम एक महत्वपूर्ण उभरती हुई व्यवसायिक नगदी फसल है, जिसकी गावों के साथ शहरों में वर्ष भर माॅग रहती है। मशरूम का बाजार भाव उॅचा होने के कारण किसानों के लिए मशरूम की खती आर्थिक रूप से बहुत लाभकारी साबित होती है। एक 800 वर्गमीटर क्षेत्रफल के शेड एवं 10 कुन्तल खाद/सब्सट्रैक के इस्तेमाल से 7 कुन्तल मशरूम आसानी से पैदा किया जा सकता है। यदि मशरूम की बाजार में बिक्री 80 प्रति किलोग्राम की दर से होती है तो 700 किलोग्राम मशरूम 56 हजार रूपये की एक फसल से प्राप्ति होती है। यदि साल में तीन फसलें तैयार करते हैं तो यह आमदनी छोटी सी जगह से लाखों में होती है। बहरहाल इसमें से उत्पादन लागत निकाल दें तो भी अच्छी खासी कमाई हो जाती है। 

मशरूम उत्पादन और आर्थिकी (Business Layout)

1. उत्पादन इकाई की रूपरेखा

घटकविवरण
कुल क्षेत्रफल800 वर्गमीटर (एक छोटे शेड हेतु)
उपयोग की गई खाद/सब्सट्रेट10 कुन्तल (गेहूं/धान की पुआल आधारित)
प्रयुक्त प्रजातिआयस्टर या बटन मशरूम
प्रति फसल अवधि40–45 दिन
फसल चक्र (सालभर)3 फसलें संभव
परिवेश तापमान22–28°C
आर्द्रता (Humidity)85–90%

2. उत्पादन विवरण

विवरणअनुमानित मात्रा
कुल खाद / सब्सट्रेट10 कुन्तल
मशरूम उत्पादन क्षमता70–75% तक (लगभग 7 कुन्तल)
प्रति थैला उत्पादन (औसतन)1.5–2 किलो
पहली तुड़ाई20 दिन बाद
कुल तुड़ाई चक्र3–4 बार (40 दिनों में)

3. उत्पादन लागत (एक फसल हेतु)

मदअनुमानित व्यय ()
खाद / सब्सट्रेट तैयारी (पुआल, खाद, यूरिया आदि)3,000
स्पान (बीज)2,000
पॉलिथीन थैलियाँ व रस्सी1,000
श्रम व देखभाल3,000
पानी व बिजली1,000
पैकेजिंग व मार्केटिंग2,000
कुल अनुमानित लागत12,000

4. संभावित आय (एक फसल से)

विवरणअनुमानित मूल्य ()
कुल उत्पादन700 किग्रा
औसत बाजार मूल्य₹80 प्रति किग्रा
कुल बिक्री मूल्य56,000
शुद्ध लाभ (एक फसल से)₹56,000 – ₹12,000 = 44,000

5. वार्षिक आय का अनुमान (3 फसलों पर आधारित)

फसल संख्याकुल लाभ ()
पहली फसल₹44,000
दूसरी फसल₹44,000
तीसरी फसल₹44,000
वार्षिक शुद्ध लाभ1,32,000 (लगभग)
  

6. निवेश पर प्रतिफल (ROI)

पैरामीटरमूल्य
वार्षिक निवेश₹36,000 (तीन फसलों की लागत)
वार्षिक आय₹1,68,000
नेट लाभ प्रतिशत200% से अधिक

7. मूल्य संवर्धन (Value Addition) के अवसर

उत्पादसंभावित लाभ
सूखा मशरूम पाउडर3 गुना मूल्य वृद्धि
मशरूम बिस्किट / केकघरेलू उद्योग हेतु उपयुक्त
मुरब्बा / अचारस्थानीय बाजार में उच्च मांग
मशरूम प्रसंस्करण इकाईग्रामीण युवाओं हेतु रोजगार सृजन

8. व्यवसायिक सुझाव

  • कम लागत, उच्च लाभ वाला उद्यम — शुरुआती निवेश 10–15 हजार से संभव।
  • स्थानीय बाजार / होटलों / सुपरमार्केट से सीधा अनुबंध लाभकारी रहेगा।
  • महिला समूह (SHG) व FPO स्तर पर सामूहिक उत्पादन से लागत घटेगी और ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी।
  • प्रसंस्करण इकाई लगाने पर 12 महीने आय की निरंतरता बनी रहती है।

देश में मशरूम उत्पादन सब्सिडी के लिए चल रही प्रमुख योजनाओं के नाम :

           •  मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) योजना

           •  नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) सब्सिडी योजना

           •  राज्य स्तरीय मशरूम मिशन (जैसे Odisha Mushroom & Floriculture Mission)

           •  किसान मशरूम उत्पादन प्रोत्साहन योजना (बिहार)

           •  महिला स्व-सहायता समूह मशरूम उद्यमिता प्रोत्साहन योजना (ओडिशा)

उत्तर प्रदेश में mushroom उत्पादन के लिए निम्नलिखित प्रमुख सब्सिडी योजनाएं चल रही हैं, जो किसानों को आर्थिक मदद और तकनीकी ट्रेनिंग देती हैं:

यूपी की मशरूम उत्पादन सब्सिडी योजनाएं

          •   आत्मनिर्भर कृषक समन्वित विकास योजना (Atmanirbhar Krishak Samnvayit Vikas Yojana):

          •   इस योजना में किसानों को मशरूम यूनिट के लिए लोन प्रदान किया जाता है और केंद्र व राज्य सरकार की तरफ से 3% ब्याज सब्सिडी भी मिलती है।

         •    तकनीकी ट्रेनिंग, वर्कशॉप, और फील्ड विजिट की व्यवस्था होती है ताकि किसान वैज्ञानिक तौर-तरीकों से मशरूम उत्पादन कर सकें।

         •    मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH):

         •    इसके तहत यूपी सरकार प्रतिबद्ध किसानों को मशरूम उत्पादन यूनिट लगाने पर 50% (अधिकतम ₹10 लाख) सब्सिडी देती है।

         •    मशरूम यूनिट सेटअप, कम्पोस्टिंग व स्पॉन उत्पादन इकाई पर यह ग्रांट दी जाती है।

निष्कर्ष :

मशरूम उत्पादन आज भारतीय कृषि में आर्थिक सशक्तिकरण और पोषण सुरक्षा दोनों का मजबूत माध्यम बनकर उभरा है। सीमित जगह, कम पूंजी और कम समय में अधिक लाभ देने वाली यह खेती छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं के लिए स्वरोजगार की सुनहरी राह पैदा करती है।

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