बाढ़ के बाद किसान कैसे करें मृदा प्रबंधन
Soil Management After Floods: Scientific and Practical Solutions
बाढ़ के बाद खेत की मिट्टी को उपजाऊ कैसे बनाएं, बाढ़ के बाद मिट्टी की देखभाल, बाढ़ के बाद भूमि का उचित प्रबंधन में ध्यान देने वाली खास बातें
बाढ़ न सिर्फ फसलों को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, संरचना और उर्वरता पर भी गहरा असर डालती है। लंबे समय तक खेतों में पानी ठहरने से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत बह जाती है, गाद और रेत का जमाव हो जाता है तथा पोषक तत्वों की भारी हानि होती है। इसके अलावा मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी से सूक्ष्मजीव संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में बाढ़ के बाद मिट्टी का सही प्रबंधन करना बेहद जरूरी हो जाता है। उचित प्रबंधन के व्दारा न केवल मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक सेहत को पुनर्जीवित किया जा सकता है, बल्कि आने वाले रबी सीजन में फसल की पैदावार और किसानों की आय भी सुरक्षित की जा सकती है। इस लेख के माध्यम से देश के किसानों को बाढ़ के बाद मृदा प्रबंधन का व्यावहारिक, प्रमाणिक और वैज्ञानिक उपायों की जानकरी देने का प्रयास किया जायगा। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, कृषि विस्तार विभाग, के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष ए. के. सिंह का कहना है कि, “बाढ़ के बाद खेतों में जल निकासी व्यवस्था को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है; अन्यथा मिट्टी की संरचना और उर्वरता दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।”

दूसरे एक्सपर्ट उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी, के मृदा विज्ञानी प्रो. संजय शाही का मानना है कि, “बाढ़ के बाद मिट्टी में नाइट्रोजन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी हो जाती है, इसलिए किसानों को तुरंत मिट्टी परीक्षण कराकर उर्वरक प्रबंधन करना चाहिए। साथ ही राइजोबियम, पीएसबी और अजोटोबैक्टर जैसे जैव उर्वरकों का प्रयोग बाढ़ग्रस्त मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को पुनर्जीवित करने में कारगर साबित होता है।”
बाढ़ के बाद मृदा होने वाले परिवर्तन : बाढ़ के बाद मिट्टी बीमार पड़ जाती है जिससे मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक गुण तेजी से प्रभावित होते हैं।
1. भौतिक परिवर्तन : (Physical Change)
- लंबे समय तक पानी भरने से मिट्टी का कण संरचना टूट जाता है, जिससे यह भारी और सख्त हो जाती है।
- पानी भरे रहने से मिट्टी के छिद्र पानी और गाद से भर जाते हैं, जिससे हवा का प्रवेश रुक जाता है।
- गाद और महीन मिट्टी के कण सतह पर जमने से पानी का रिसाव और निकास कम हो जाता है।
- बाढ़ की धारा उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत को काटकर बहा ले जाती है और कहीं कहीं पर गाद, रेत जमा कर देती है।
2. रासायनिक परिवर्तन : (Chemical Change)
- मिट्टी में पानी भरे रहने से ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और अवायवीय दशा बनती है।
- डिनिट्रीफिकेशन और लीचिंग से नाइट्रोजन की भारी हानि होती है।
- फास्फोरस पानी के बहाव से धुल जाता है या अवायवीय दशा में अघुलनशील रूप में बदल जाता है।
- पोटाश, जिंक, आयरन, मैग्नीशियम लीचिंग या ऑक्सीकरण-अपचयन के कारण इनकी उपलब्धता बदलती है।
- कुछ क्षेत्रों में पानी सूखने के बाद मिट्टी पर लवणों की परत जम जाती है।
- अवायवीय दशा में हाइड्रोजन सल्फाइड, मिथेन, आयरन और मैंगनीज जैसे तत्व विषैले रूप में जमा हो सकते हैं।
3. जैविक परिवर्तन : ( Biological Change)
- बाढ़ के दौरान मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी से एरोबिक जीवाणु मर जाते हैं और अवायवीय जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं।
- उपयोगी सूक्ष्मजीव जैसे नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु की संख्या घट जाती है।
- सूक्ष्मजीवों की असंतुलित गतिविधि से पोषक चक्र बाधित हो जाता है और फसलों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो जाती है।
- बाढ़ग्रस्त मिट्टी में हानिकारक कवक और बैक्टीरिया की वृद्धि हो सकती है, जो आगे चलकर पौधों की बीमारियों का कारण बनते हैं।
बाढ़ के बाद भूमि का उचित प्रबंधन में ध्यान देने वाली खास बातें :
बाढ़ के बाद भूमि को फिर से उपजाऊ बनाना आवश्यक है ताकि किसानों को बेहतर पैदावार मिल सके। किसान निम्न बातों को ध्यान में रखकर तैयारी करें।

खेत का अवलोकन और सफाई :
किसान बाढ़ के बाद सबसे पहले खेत की स्थिति का भौतिक अवलोकन करें। जैसे ही पानी का जमाव खत्म हो, खेत में आई गाद, सिल्ट, कचरा, झाड़ियाँ और अन्य मलबे को खेत से हटाने का काम करें। यदि मिट्टी में किसी प्रकार के रसायन या संदूषक होने की संभावना हो, तो इसकी सूचना स्थानीय मृदा विभाग को जरूर दें। साथ ही, खेत में बने गहरे गड्ढों या असमान सतह को समतल करना चाहिए, ताकि भविष्य में पानी का बहाव बेहतर हो सके।
जल निकासी और सूखने की प्रक्रिया :
बाढ़ के बाद खेत में रुके पानी को बाहर निकालना अत्यंत आवश्यक होता है। विशेष कर उन स्थानों पर ध्यान देने की जरूरत होती है, जहां जमीन नीची है और पानी ज्यादा देर तक ठहरता है। इसके लिए प्राकृतिक या कृत्रिम जल निकासी प्रणाली जैसे नालियाँ या पाइप लाइन बनाई जानी चाहिए ताकि पानी तेजी से निकल सके। मिट्टी की ऊपरी सतह के सूखने के बाद ही अगली कृषि गतिविधियाँ जैसे जुताई या अन्य भूमिगत कार्य शुरू करना चाहिए।
खेत की मिट्टी को पलटना और जैविक सुधार :
जब मिट्टी में पर्याप्त नमी रह जाए तो 15 से 30 सेंटीमीटर गहराई तक हल या कल्टीवेटर चलाना जरूरी होता है। इससे मिट्टी में हवा का संचालन बेहतर होता है और हानिकारक डिनाइट्रीफिकेशन की प्रक्रिया रुकती है। जहां खेत में रेत या गाद की मोटी परत जम गई हो, वहां गहरी जुताई करके ऊपरी परत को मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिलाना चाहिए। इससे मिट्टी की संरचना और जल संचयन क्षमता सुधरती है। मिट्टी में ऑक्सीजन की उपलब्धता और सूक्ष्म जीवाणुओं की गतिविधि बढ़ाने के लिए जीवामृत, घनजीवामृत, कम्पोस्ट वर्मी कम्पोस्ट या गोबर की खाद डालना बहुत लाभकारी होता है।

पोषक तत्वों की रिकवरी :
बाढ़ के कारण मिट्टी से नाइट्रोजन, पोटेशियम और बोरॉन जैसे आवश्यक पोषक तत्व बह जाते हैं। इस स्थिति में सब्जियों, बगीचों और फलों की फसल के लिए खाद को कम मात्रा में और कई बार में डालना उचित रहता है, क्योंकि एक साथ भारी मात्रा में खाद डालने से पौधों की जड़ों को नुकसान हो सकता है। मिट्टी की जड़ों को मजबूती देने और पौधों की वृद्धि को बढ़ाने के लिए पत्तियों पर पोषक तत्वों का छिड़काव या फोलियर स्प्रे करना भी लाभकारी होता है। बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग सावधानी से करना चाहिए क्योंकि अधिक मात्रा में यह विषाक्तता भी पैदा कर सकता है। बाढ़ के बाद भारी धातु जैसे आयरन, मैंगनीज, एल्यूमिनियम की विषाक्तता बढ़ सकती है। इसके लिए जैविक व रासायनिक सुधार दोनों करें – जैसे कम्पोस्ट व माइक्रो न्यूट्रिएंट्स का संतुलन। अधिक सल्फर या सल्फाइड होने पर सल्फर को निष्क्रिय करने के लिए कैलक्लाइन या जिप्सम इस्तेमाल करें.
मिट्टी की जाच :
बाढ़ के बाद खेत की मिट्टी की जाच अवश्य कराना चाहिए, क्योंकि इस दौरान मिट्टी का पीएच और रासायनिक गुण बदल सकते हैं। खेत के विभिन्न हिस्सों में गाद और रेत की मात्रा अलग अलग हो सकती है, इसलिए अलग-अलग स्थानों से नमूने लेकर परीक्षण कराना चाहिए। बाढ़ की वजह से मिट्टी का पीएच अम्लीय या क्षारीय हो सकता है। पीएच बढ़ाने के लिए चूना या कैल्शियम कार्बोनेट का प्रयोग करें। यह अम्लीयता कम करता है, मिट्टी को बाँझ होने बचाता है, और फसलें स्वस्थ रहती हैं। क्षारीय मिट्टी के लिए जिप्सम का उपयोग किया जा सकता है। परीक्षण के परिणामों के आधार पर मिट्टी की संरचना और पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए खाद, चूना, जिप्सम या सल्फर का प्रयोग करना चाहिए।
जैव विविधता का संरक्षण :
मिट्टी की सेहत सुधारने और दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने के लिए फसल चक्र अपनाना आवश्यक है। दालें, तिलहन या नाइट्रोजन फिक्स करने वाले पौधे जैसे मटर, सोयाबीन और मूँगफली की खेती से मिट्टी की गुणवत्ता तेजी से सुधरती है। इसके साथ ही कवर क्रॉप्स जैसे मूंग, उडद और क्लोवर लगाने से मिट्टी की पकड़ मजबूत होती है और नाइट्रोजन की पूर्ति होती है।

कटाव और क्षरण रोकथाम :
बाढ़ के बाद भूमि कटाव और क्षरण आम समस्या है। जहां कम गहराई तक कटाव हुआ हो, वहां मिट्टी को पलटकर या भरकर खेत को समतल किया जा सकता है। गहरे कटाव वाले क्षेत्रों में भूमि सुधार संबंधी मशीनों का प्रयोग या भराव तकनीक अपनाना आवश्यक हो जाता है। खेत की सीमाओं पर वृक्ष, झाड़ियाँ या शेल्टर बेल्ट लगाने से भविष्य में होने वाले कटाव और क्षरण को काफी हद तक रोका जा सकता है।
निष्कर्ष
बाढ़ के बाद खेत की मिट्टी सतही तौर पर ही नहीं, बल्कि गहराई तक प्रभावित होती है। ऐसे में, सही मृदा प्रबंधन ही मिट्टी को पुनर्जीवित कर सकता है, जिससे किसान न केवल आने वाले रबी सीजन में अच्छी पैदावार पा सकेंगे बल्कि आय और कृषि की उत्पादकता को भी स्थिर रख पाएँगे।

