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समृद्धि की सुनहरी शुरुआत 10 साहीवाल गायों के साथः डेयरी बिजनेस

Transform Your Future with 10 Sahiwal Cows : Dairy Business

दूध की हर बूंद में छिपा है उज्जवल भविष्य

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A Ideal Small Dairy in Rural Area

हमारे देश में गाय सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परम्परा और जीवन पद्धति का अहम हिस्सा रही है। अपने अद्भुत गुणों और उपयोगिता के कारण वैदिक काल से ही इसे ‘गौ माता’ का दर्जा प्राप्त हैं। जब देश की अर्थव्यवस्था कृषि, गाय और गांव पर आधारित थी, तब भारत को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था।

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के वैश्विक अध्ययन के अनुसार, 18वीं शताब्दी तक भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, जिसकी वैश्विक जीडीपी में 24 फीसदी हिस्सेदारी थी। आज यह घटकर महज 7.8 फीसदी रह गई है।

आज बात करेंगे कि कैसे आप सिर्फ 10 साहीवाल गायों से डेयरी बिजनेस शुरू करके न केवल अच्छी आमदनी कमा सकते हैं, बल्कि ग्रामीण रोजगार, पोषण और पर्यावरण संरक्षण में भी अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं। इस लेख में आप जानेंगे- सही स्थान का चयन और पशुशाला निर्माण, चारा प्रबंधन,  पूंजी निवेश, आय-व्यय और लाभ, सरकारी योजनाएँ व सब्सिडी की जानकारी, जोखिम प्रबंधन के सुझाव और सबसे ज़रूरी, कैसे करें शुरुआत और कैसे बढ़ाएँ आमदनी ?

गौ-पालान का महत्व:

आज जब आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है, तब गौपालन का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह केवल दूध उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण में नई संभावनाओं के व्दार खोलता है। एक सामान्य गाय जितने मूल्य का चारा प्रतिदिन खाती है, उससे पाँच गुना अधिक मूल्य का गोबर प्रतिदिन देती है। आंकड़ों के अनुसार, एक गाय औसतन 10 किलोग्राम गोबर प्रतिदिन देती है। आधुनिक कम्पोस्ट तकनीक से एक किलोग्राम गोबर से लगभग 30 किलोग्राम जैविक खाद तैयार की जा सकती है।

K V K, Tawang, ICAR, North East Region, (Animal Husbandry)  वरिष्ठ वैज्ञानिक, डॉ. जयदीप सिंह का  कहना है कि, “आज भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। अब गौपालन केवल दूध उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गौपालन को किया जाए तो यह ग्रामीण भारत की आर्थिक और सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।“

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A Small Traditional Dairy Shed

प्राकृतिक खेती:

इतना ही नही, इसके गोबर और गौमूत्र से जीवामृत और घन जीवामृत तैयार कर प्राकृतिक खेती को बढावा दिया जा सकता हैं। यानी सिर्फ गोबर और गौमूत्र से ही किसान को रोजाना अच्छी-खासी आय का स्रोत प्राप्त हो सकता है। हमें इनके वैज्ञानिक, आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व को समझना होगा। देसी नस्लें अपनी अनुकूलन क्षमता, स्वास्थ्य लाभ और कम खर्चीले पालन के कारण अमूल्य हैं।

औषधीय गुणों से भरपूर दूध:

विदेशी नस्लों के दूध में पाया जाने वाला ए-1 बीटा-केसीन प्रोटीन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है। इससे किडनी, लीवर और कई अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ता है। वहीं देसी गाय के दूध में पाया जाने वाला ए-2 बीटा प्रोटीन आसानी से पच जाता है और शरीर को रोगों से बचाता है।

नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल की रिपोर्ट भी कहती है कि देसी गाय का दूध, घी और गोमूत्र जर्सी गायों की तुलना में कहीं अधिक गुणकारी हैं। देशी गायों पर हुए शोध बताते हैं कि इनका दूध रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। डॉक्टरों का कहना है कि पीलिया से पीड़ित नवजात शिशुओं के लिए गिर गाय का दूध औषधि के समान है।

पर्यावरण संरक्षण:

देशी गायों के शरीर में पाया जाने वाला सूर्यकेतु स्नायु सूर्य की ऊर्जा को सोखकर हानिकारक विकिरणों को रोकता है। यह गुण न केवल वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मदद करता है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन को भी बनाए रखता है।

ग्रामीण उद्योग:

गौपालन से हमें दूध, दही, घी जैसे पोषक उत्पादों के साथ-साथ गोबर, गोमूत्र, सींग, चमड़ा जैसे बहुमूल्य उप-उत्पाद भी मिलते हैं। इनसे कई प्रकार के ग्रामोद्योग भी विकसित किए जा सकते हैं। गाय के गोबर और गोमूत्र से आज अनेक उद्योग विकसित हो रहे हैं। गोबर से गोबर गैस, वर्मी कम्पोस्ट, स्लरी खाद, डिस्टेम्पर, फायरप्रूफ खपरैल बनाने काम किया जा रहा हैं। गोमूत्र से जैविक कीटनाशक, पंचगव्य साबुन, फिनायल, जैविक फ्यूमिगेशन, हर्बल उत्पाद, तो सींग और चमड़े से सजावटी वस्तुएँ और उपयोगी हस्तशिल्प तैयार की जाती हैं। गौपालन पोषण, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और संस्कृति, चारों स्तंभों को मजबूती से जोड़ने का काम करता है। यदि वैज्ञानिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से गौपालन की शुरूआत करें, तो यह ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने का सशक्त आधार बन सकता है।

कैसे शुरू करें 10 शाहीवाल गायों से डेयरी बिजनेस

प्रारंभिक कार्य योजना:

पशुशाला निर्माण के लिए स्थान का चयन: पशुशाला निर्माण के लिए नमी रहित, सममतल, ठोस, उॅचे और अच्छे जल निकास वाले स्थान का चुनाव करना चाहिए। पशुओं के अच्छे पोषण हेतु हरे चारे के लिए कुछ कृषि योग्य भूमि भी होनी चाहिए। पशुशाला मुख्य मार्ग से जुड़ी होनी चाहिए। पशुशाला के सभी भवनों में स्वच्छ वायु और प्रकाश का आवागमन अच्छी तरह होना चाहिए। पशुशाला के आस-पास वृक्ष लगाने चाहिए। पशुओं के पीने, साफ-सफाई एवं अन्य कामों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध होना चाहिए। आधुनिक ढंग से पशुओं को रखने की प्रमुख रूप से तीन विधियां प्रयोग में लाई जाती हैं। जो निम्नवत हैं- दुग्धशाला विधि, खुली हवा विधि एवं पशुशाला विधि।

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Modern Dairy Farm with Indigenous Cows

दुग्धशाला विधि: इस विधि में पशुओं को पशुशाला में बांध कर रखा जाता है। चारा-दाना एक साथ खिलाया जाता है। दूध निकालने का कार्य अलग स्थान पर किया जाता है। इस विधि में कम जगह की आवश्यकता होती है। यह विधि कम संख्या में पशु पालने के लिए उपयुक्त होती है।

खुली हवा विधि: इस विधि में पशुओं को बाड़े में न रखकर खुले जगह में बाड़ों के अन्दर रखा जाता है। खर्चे की दृष्टि से यह बहुत ही सस्ती विधि है। देशी नस्ल के पशुओं को पालने के लिए अधिक उपयुक्त विधि है।

पशु शाला विधि: इस विधि में पशुओं को पशुशाला में बांध कर रखा जाता है और यही पर दूध निकालने का कार्य भी किया जाता है। पशुशाला में प्रत्येक पशु को निश्चित जगह दी जाती है।

उपयुक्त पशु आवास का निर्माण: एक सुव्यवस्थित, स्वच्छ और वैज्ञानिक दृष्टि से निर्मित पशु आवास न केवल पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, बल्कि डेयरी व्यवसाय की सफलता की कुंजी भी है। अच्छी पशुशाला का निर्माण पशुओं की संख्या, पशुओं की नस्ल एवं स्थान की उपलब्धता के अनुसार प्रायः दो तरह से किया जाता है। एक पंक्ति विधि और दो पंक्ति विधि। एक पंक्ति विधि का प्रयोग 20 से कम पशुओं के लिए अपनाई जाती है। अधिक संख्या में पशुओं को पालने के लिए दो पंक्ति विधि वाली पशुशाला का निर्माण करना चाहिए। इस विधि से एक साथ 80 से 100 तक पशु रखे जा सकते हैं। दो पंक्ति विधि वाली पशुशाला का निर्माण दो तरह से मुॅह से मूॅह एवं पूॅछ से पूछ विधि से किया जाता है।

मुख से मुख प्रणाली: इस व्यवस्था में बीच में चारा डालने की जगह होती है, जिससे दोनों ओर के पशु एक साथ खा सकते हैं। यह कम जगह में अधिक पशु रखने के लिए उपयुक्त है, इसलिए छोटे व मध्यम डेयरियों के लिए उपयोगी है। इसमें चारे-दाने की देखरेख आसान होती है और कम श्रम में पशुओं को समय पर आहार दिया जा सकता है। इसकी कमी यह है कि श्वास संबंधी बीमारी एक पशु से दूसरे में जल्दी फैल सकती है।

पूछ से पूछ प्रणाली : इस विधि में पशु का मुह एक दूसरे के विपरीत दिशा में होता है। इस विधि में दूध निकालना, बाड़े की साफ-सफाई का कार्य आसानी से होता है। इस विधि में पशुओं में आपस में रोग फैलने का भय कम होता है। प्रत्येक पशु को पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ हवा उपलब्ध होती है।

एक पंक्ति वाले बाड़े का निर्माण: इस विधि में बाड़े की चैड़ाई 18 फीट रखी जाती है। इसमें 4 फीट चारा-दाना देने के लिए रास्ता, 2.5 फीट नांद, 5.5 फीट पशु को खड़ा होने के लिए, 2 फीट मलमूत्र निकास के लिए एवं 4 फीट दुग्ध के लिए स्थान छोड़ा जाता हे। प्रत्येक पशु को 4 फीट चौड़ा स्थान दिया जाता है।

दो पंक्ति वाले बाड़े का निर्माण: इस विधि में बाड़े की चैड़ाई 30 फीट रखनी चाहिए। इसमें प्रत्येक ओर पशुओं के लिए 3-4 फीट चारा-दाना देने के लिए रास्ता, 2.5-3 फीट नांद, 4.5-5 फीट खड़ा होने के लिए, 1.5 – 2 फीट मलमूत्र निकास के लिए एवं 3 फीट दुग्ध मार्ग के लिए स्थान छोड़ा जाता है। प्रत्येक पशु को लगभग 4 फीट चौड़ा स्थान दिया जाता है। बाड़े की बीच की उचाई 15 – 18 फीट तक रखनी चाहिए। बाड़े की छत का निर्माण टीन या एस्बेस्कास की चादर से बनाया जा सकता है।

पशु चयन: साहीवाल गायों का क्रय भरोसेमंद सरकारी या फिर किसी मान्यता प्राप्त डेयरी/प्रजनन केंद्र से ही खरीदें। 4-5 गायें दूध देने वाली (Lactating), बाकी गर्भित या जल्द ब्याने वाली खरीदें। ऐसा करने से वर्ष भर दुग्ध उत्पादन मिलता रहता है।

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Pure Shahiwal Breed In Modern Dairy

साहिवाल गाय की प्रमुख विशेषताएँ:

  • साहिवाल गायें देसी नस्ल की सबसे भरोसेमंद दुग्ध उत्पादक हैं।
    • औसतन 10 – 14 लीटर दूध प्रति दिन देती हैं।
    • इनका दूध ए-2 प्रकार का होता है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है।
    • कम रोग, कम रखरखाव और लंबी दुग्ध अवधि इनकी खासियत है।
    • साहिवाल गायें गर्मी-सहनशील होती हैं एवं उत्तर भारत के मौसम के लिए उपयुक्त।
    • इस नस्ल की गायों में बीमारियाँ कम व रखरखाव भी सस्ता होता हैं।

चारा व्यवस्था:

  • हरा चारा में नेपियर घास, बरसीम, मक्का, ज्वार, सुडान घास आदि शामिल करें।
    • सूखा चारा के लिए भूसा, धान का पुआल व सूखी कडबी का इस्तेमाल करें।
    • दाना के लिए दाना मिश्रण,सरसों खली, मक्का, चोकर, खनिज मिश्रण आदि का प्रयोग करें।
    • एक साहिवाल गाय को औसतन 25-30 किलो हरा चारा, 5-6 किलो सूखा चारा और 4-5 किलो दाना की आवश्यकता प्रतिदिन होती है।

अच्छे पशु आवास गृह से लाभ:

  • प्रति पशु अधिकतम उत्पादन प्राप्त होता है।
  • पशुओं को विपरीत मौंसम एवं परिस्थितियों से आसानी से बचाव हो जाता हे।
  • पशुओं में होने वाली रोग-बीमारियों से रोकथाम हो जाती है।
  • पशुओं को चारा-दाना समय से उपलब्ध कराना आसान हो जाता है।
  • दुग्ध उत्पादन स्वच्छ और साफ-सुथरे तरीक से होना सभ्भव हो जाता है।
  • कम श्रम और व्यय में पशुओं की अच्छी तरह देखभाल हो जाती है।
  • अच्छे गुणवत्ता के पशु तैयार करने में मदद मिलती है।
  • प्रत्येक पशु को रहने के लिए पर्याप्त स्थान मिलता है।

साहीवाल नस्ल की गायों के खरीदारी के कुछ विस्वसनीय स्थान:

  • राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI), कर्नाल
    • गोकुल डेयरी फामर्रू मंगल कॉलोनी, कर्नाल, हरियाणा
    • हर्षित गुप्ता डेयरी फार्म, हरियाणा
    • कर्नाल – डेयरी हब ऑफ इंडिया
    • गुप्ता डेयरी फार्म, कर्नाल, हरियाणा
    • पशुशाला (Pashusala.com)
    • एनिमल मार्केट ऐप

खरीदारी से पहले ध्यान देने वाली कुछ खास बातें:

  • कम से कम 3.4 फार्म से कोटेशन लें
    • गाय का स्वास्थ्य जांच कराएं
    • दूध उत्पादन रिकॉर्ड मांगें
    • परिवहन की व्यवस्था सुनिश्चित करें
    • बीमा की तुरंत व्यवस्था करें
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Modern Dairy With Indigenous Breed

10 शाहीवाल गायों के साथ डेयरी व्यवसाय – आय और व्यय विश्लेषण

प्रारंभिक निवेश: 10 शाहीवाल गायों के साथ डेयरी व्यवसाय शुरू करने के लिए कम से कम 8 -10 लाख पंूजी निवेश की जरूरत पडती है।

मुख्य निवेश:

  • शाहीवाल गायों की खरीद  ₹5.00 लाख   (10 गाय /₹50,000 प्रति गाय)
    • शेड निर्माणरू ₹2.00 लाख                    (1,200 वर्ग फुट आवश्यक)
    • दूध निकालने की मशीन                         ₹25,000
    • चारा काटने की मशीन                          ₹15,000
    • पानी और बिजली कनेक्शन                    ₹40,000 (बोरवेल, मोटर सहित)
    • अन्य खर्च                                             ₹50,000 (विविध उपकरण)

मासिक परिचालन व्यय :

कुल मासिक व्यय                           ₹82,600

चारा और दाना ( मुख्य खर्च)               ₹66,600

  • दाना (Concentrate) ₹45,000
    • हरा चारा                     ₹12,000
    • सूखा चारा                    ₹9,600

अन्य मासिक व्यय :

पशु चिकित्सा                 ₹1,500

मजदूरीरू                       ₹8,000

  • बिजली                          ₹3,000बीमा                             ₹1,500 (4.5 प्रतिशत वार्षिक प्रीमियम का 112)

  • अन्य खर्च                       ₹2,000

मासिक आय (Monthly Income)

कुल मासिक आय 1.67 लाख

मुख्य आय स्रोत

            दूध बिक्री                                       ₹1.62 लाख

            प्रति गाय दैनिक उत्पादन                 12 लीटर

            कुल दैनिक उत्पादन                          120 लीटर

            मासिक उत्पादन                               3,600 लीटर / ₹45 लीटर

            गोबर बिक्री                                      ₹2,000 प्रति माह

            बछड़े बिक्री                                      ₹3,000 प्रति माह (वार्षिक औसत)

लाभदायकता विश्लेषण (Profitability Analysis )

मासिक शुद्ध लाभ                                            ₹84,400

वार्षिक शुद्ध लाभ                                            ₹10.13 लाख

मुख्य वित्तीय संकेतक

  • निवेश पर वापसी (ROI)                 122 प्रतिशत
    • पेबैक अवधि 9.8 महीने
    • दूध उत्पादन लागत                         ₹22.94 प्रति लीटर
    • प्रति लीटर लाभ                               ₹22.06

पांच वर्ष का वित्तीय अनुमान

वार्षिक मुद्रास्फीति (6 फीसदी) और दूध मूल्य वृद्धि (8 फीसदी ) को ध्यान में रखते हुए

  • वर्ष 1              ₹10.13 लाख लाभ
    • वर्ष 2              ₹12.14 लाख लाभ
    • वर्ष 3              ₹13.95 लाख लाभ
    • वर्ष 4              ₹15.73 लाख लाभ
    • वर्ष 5              ₹17.71 लाख लाभ

5 साल में कुल लाभ र ₹61.36 लाख

सरकारी सब्सिडी :

NABARD डेयरी उद्यमिता विकास योजना

  • सामान्य श्रेणी 25 फीसदी सब्सिडी (अधिकतम ₹1.25 लाख)
    • SC/ST श्रेणी 33.33 फीसदी सब्सिडी (अधिकतम ₹1.67 लाख)

पशु बीमा योजना :

  • सामान्य श्रेणी  50 फीसदी सब्सिडी बीमा प्रीमियम पर
    • SC/ST श्रेणी 70 फीसदी सब्सिडी बीमा प्रीमियम पर
    • बीमा प्रीमियम ₹3,150 प्रति गाय वार्षिक

अन्य सहायता

  • उत्तर प्रदेश डेयरी नीति 2022,    10 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी (अधिकतम ₹5 करोड़ तक)
  • मुख्यमंत्री डेयरी विकास योजना / डेयरी सहकारी समिति लोन योजना – इन योजनाओं के तहत 25 दृ 35 प्रतिशत अनुदान प्राप्त किया जा सकता है।
  • कृषि ऋण पर ब्याज सब्सिडी रू 5 प्रतिशत तक

जोखिम प्रबंधन और सुझाव:

  • पशु स्वास्थ्य समस्याएं नियमित टीकाकरण और पशु चिकित्सक जांच आवश्यक कराएं।
  • दूध मूल्य में उतार-चढ़ाव कोऑपरेटिव से जुड़ना और वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स तैयार करना।
  • चारे की बढ़ती कीमतें- खुद का चारा उत्पादन के लिए 1-2 एकड़ जमीन की आवश्यकता पडती है।
  • मौसमी दूध उत्पादन में कमी- गर्मियों में 10-15 प्रतिशत तक कम उत्पादन हो सकता है।

आवश्यक सुझाव :

  • पशु बीमा  ₹2,240 प्रति गाय वार्षिक सब्सिडी के साथ बीमा कराएं।
    • आपातकालीन फंड 3 महीने का ऑपरेटिंग कैश रिजर्व जरूर रखें।
    • KCC लोन सुविधा तरलता समस्याओं के लिए उपयोग में लाएं।
    • वैकल्पिक आय दही, घी, खोआ, पनीर उत्पादन की व्यवस्था करें।

विभिन्न परिस्थितियों में आय और व्यय अनुमान:

वर्तमान परिस्थिति (12 लीटर/गाय /दिन / ₹45/लीटर)

  • मासिक लाभ ₹84,400
    • वार्षिक ROI 122 प्रतिशत

आशावादी परिस्थिति (15 लीटर/गाय/दिन / ₹50/लीटर)

  • मासिक लाभ ₹1.47 लाख
    • वार्षिक ROI 213 प्रतिशत

निराशावादी परिस्थिति (10 लीटर/गाय/दिन / ₹40/लीटर)

  • मासिक लाभ ₹42,400
    • वार्षिक ROI 61.3 प्रतिशत  (निवेश पर लाभ)

निष्कर्ष:

10 साहीवाल गायों से शुरू की जाने वाली डेयरी योजना एक लाभकारी एवं स्थायी व्यवसाय का मॉडल है, जो 10 महीने में निवेश की गई पूंजी की वापसी का रिटर्न देने में सक्षम है। यह किसानों के साथ ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए आर्थिक सम्वृद्धि और आत्मनिर्भरता प्रदान करता है। यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से संचालित किया जाए तो प्रति वर्ष 10 से 12 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया जा सकता है।

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