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वैज्ञानिक तरीके से करें बाजरा की खेती : कम लागत में अधिक उत्पादन और मुनाफा

बाजरा की वैज्ञानिक खेती की सम्पूर्ण जानकारी — उन्नत किस्में, बुआई, खाद प्रबंधन, रोग नियंत्रण, उत्पादन, चारा एवं प्रति हेक्टेयर आय-व्यय विश्लेषण।

आज जलवायु परिवर्तन] अनियमित वर्षा और बढ़ती खेती लागत किसानों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर रही हैं] ऐसे समय में किसान बाजरा की खेती अपनाकर इन चुनौतियों का बखूबी मुकाबला कर सकते है। बाजरा एक ऐसी फसल है जो कम पानी] कम लागत और कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती है। कभी पारंपरिक और गरीबों का अनाज समझा जाने वाला बाजरा आज पोषण] स्वास्थ्य और बाजार मांग के कारण “सुपर फूड” की श्रेणी में शामिल हो चुका है। यही कारण है कि देश ही नहीं] बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बाजरा केवल खाद्यान्न सुरक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का भी मजबूत विकल्प बनता जा रहा है। सूखा सहनशील होने के कारण यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी फसल है जहाँ सिंचाई के साधन सीमित हैं। बाजरे के दानों में प्रोटीन, खनिज लवण, आयरन, कैल्शियम एवं विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जबकि इसका हरा चारा पशुओं के लिए अत्यंत पौष्टिक माना जाता है।

वर्तमान समय में वैज्ञानिक खेती तकनीकों, उन्नत किस्मों, संतुलित पोषण प्रबंधन तथा रोग-कीट नियंत्रण के माध्यम से बाजरा की खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। यदि किसान आधुनिक सस्य विधियों को अपनाएँ, तो बाजरा की फसल से कम लागत में अधिक उत्पादन एवं बेहतर मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।

जलवायु :

  • सामान्यतः बाजरा की खेती कम वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है। इसकी खेती 40 सेमी. से लेकर 200 सेंमी. वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलता पूर्वक की जा सकती है। फसल की अच्छी वृद्धि के लिए शुष्क एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है।
  • पौधों में फूल लगते समय व दाना बनते समय तेज धूप और स्वच्छ मौंसम की आवश्यकता होती है। इस समय वर्षा होना फसल के लिए बहुत हानिकारक साबित होता है। पौधों की अच्छी बढ़वार व विकास के लिए 28-32 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सबसे उपयुक्त होता है।

मिट्टी का चुनाव :

  • बाजरा की खेती उचित जल निकास वाली लगभग सभी तरह की भूमियों में की जा सकती है। लेकिन बलुई दोमट मिट्टी बाजरा के लिए सर्वोंत्तम होती है। वैसे बाजरे की खेती के लिए अधिक उपजाउ व भारी मिट्टी उपयुक्त नही होती है।
  • खेत की तैयारी के लिए गर्मी में एक गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से करना चाहिए। इसी समय 100 से 120 कुन्तल/हेक्टेयर देशी खाद खेत में अच्छी तरह बिखेर देते है। इसके बाद 2-3 बार कल्टीवेटर से जुताई कर हर बार पाटा चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा व सममतल बना लेना चाहिए। बुआई के समय खेत में किसी भी प्रकार के खरपतवार नही होने चाहिए।

भूमि शोधन :

खेत में फसल को दीमक व अन्य कीड़े-मकोड़ों से हाॅनि पहॅुचने की संभावना होने पर उपयुक्त रसायन से भूमि शोधन कर लेना चाहिए। इसके लिए अंतिम जुताई के समय इण्डोसल्फान 4 प्रतिशत या क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण की 25 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव कर अच्छी तरह मिला चाहिए।

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प्रजातियों का चुनाव :

  • बाजरे की खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए सदैव उन्नतशील या संकर प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए। प्रजातियों का चुनाव सिंचित व असिंचित दशा, मृदा की किस्म, रोगरोधिता एवं क्षेत्र विशेष के लिए उपयुक्तता के आधार पर करना चाहिए।
  • बाजरे की संकुल प्रजातिया पूसा बाजरी, पूसा- 334, डब्लू- सी.सी.- 75, राज- 171, एच. सी.- 4, आई.सी.सी.पी.- 8203, एम. पी.- 155, एम. पी.- 221, पी.सी.बी.- 158, बिजय कम्पाजिट इत्यादि।
  • संकर प्रजातिया- पूसा-23, पूसा-322, पूसा-415, पूसा-605, एम.एच.-415, सी.सी.-356, एच.एच.बी.- 94, एच.एच.-180, एच.एच.-182 इत्यादि। इसके अतिरिक्त बहुत सी प्राईवेट कम्पनिया भी उच्च गुणवत्ता के संकर बीज का उत्पादन कर बिक्री कर रही हैं।

राज्यवार बाजरा की उन्नत किस्में : किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी एवं वर्षा की स्थिति के अनुसार कृषि वैज्ञानिकों की सलाह लेकर उपयुक्त किस्म का चयन करना चाहिए।

राजस्थान

  • आरएचबी-177
  • आरएचबी-173
  • आरएचबी-234
  • एमपीएमएच-17
  • आईसीएमएच-356

उत्तर प्रदेश

  • आईसीएमवी-221
  • पूसा कम्पोजिट-443
  • एचएचबी-67 सुधारित
  • राज-171
  • नंदी-70

हरियाणा

  • एचएचबी-67 सुधारित
  • एचएचबी-94
  • एचएचबी-146
  • एचएचबी-197

गुजरात

  • जीएचबी-538
  • जीएचबी-558
  • जीएचबी-732
  • आईसीएमएच-451

महाराष्ट्र

  • शांति
  • सबूरी
  • आईसीटीपी-8203
  • धानशक्ति

मध्य प्रदेश

  • आईसीएमवी-155
  • राज-171
  • पूसा कम्पोजिट-612
  • एचएचबी-67 सुधारित

कर्नाटक

  • आईसीटीपी-8203
  • धानशक्ति
  • आईसीएमएच-356
  • एमएल-365

तमिलनाडु

  • को-7
  • को-9
  • टीएनबीएच-10
  • केएमवी-221

आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना

  • धानशक्ति
  • आईसीएमएच-451
  • आईसीटीपी-8203
  • पीएचबी-3

बिहार एवं झारखंड

  • पूसा कम्पोजिट-443
  • आईसीएमवी-221
  • राज-171
  • नंदी-70

प्रमुख विशेषताएँ

  • सूखा सहनशील किस्में
  • अधिक दाना एवं चारा उत्पादन
  • रोग एवं कीट प्रतिरोधी
  • कम अवधि में पकने वाली किस्में
  • पोषक तत्वों से भरपूर दाना

बीज की मात्रा :

बीज की मात्रा बीज के किस्म, बीज की गुणवत्ता, बीज के आकार, अंकुरण प्रतिशत, बोने की विधि, बोने का समय एवं मिट्टी में नमी के प्रतिशत आदि पर निर्भर करती है। सामान्यतः एक हैक्टेयर खेत की बुआई के लिए अच्छी गुणवत्ता का 4-5 किग्रा. बीज पर्याप्त होता है। बीज हमेशा किसी विश्वसनीय संस्थान से क्रय करना चाहिए।

बीज शोधन :

  • फसल को बीज जनित बीमारियों से बचाने के लिए बुआई से पूर्व बीज को फफूद नाशक रसायन से शोधित करना आवश्यक होता है। इसके लिए थायरम या कैप्टान नामक दवा से प्रति किलोग्राम बीज में 2-2.5 ग्राम दवा मिलकर उपचारित कर लेना चाहिए।
  • इसके अतिरिक्त अधिक उपज प्राप्त करने के लिए बीज को जैविक खाद जैसे एजोटोबैक्टर व पी.एस.बी. से उपचारित कर लेने से 15 से 20 प्रतिशत तक उपज बढ़ जाती है।
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बोने का उचित समय :

  • खरीफ मौंसम में बाजरे की बुआई 15 जून से 15 जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। लेकिन जुलाई का प्रथम पखवारा का समय सबसे उपयुक्त होता है। वर्षा आधारित खेती के लिए मानसून की पहली बारिस के तुरन्त बाद बाजरे की बुआई कर देना चाहिए।
  • देर से बारिस के कारण या फिर लगातार बारिस के कारण खेत में बुआई संभव न होने की दशा में बाजरे की नर्सरी में पौध तैयार कर रोपाई भी किया जा सकता है। नर्सरी में पौध 2-3 सप्ताह में तैयार हो जाती है। खेत में तैयार पौधों की रोपाई हल्की वर्षा के दिनों में करना चाहिए। पौधों की रोपाई अगस्त माह के प्रथम सप्ताह तक अवश्य कर देनी चाहिए।  बाजरे की समय पर बुआई न करने से उपज में काफी कमी आ जाती है। 

बोने की विधि :

  • सामान्यतः बाजरा की बुआई छिटकवाॅ विधि से की जाती है। छिटकवा बुआई से फसल के उपज पर बहुत ही बुरा असर पडता है। अधिक पैदावार के लिए बीज की बुआई हमेशा पंक्तियों में करना चाहिए। पंक्तियों में बुआई देशी हल के पीछे कूड़ में या फिर सीडड्रिल व्दारा 2-3 सेमी. की गहराई में बुआई करनी चाहिए।
  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेंमी. तथा पौध से पौध की दूरी 15 सेमी. रखना उत्पादन की दृष्टि से सर्वाेत्तम रहता है। इस दूरी पर बुआई से खेत में इच्छित पौध संख्या 1.75 लाख से 2 लाख प्रति हेक्टेयर बरकरार रहती है। 

विरलीकरण : पौध से पौध के बीच उचित अंतर बनाये रखने के लिए विरलीकरण बहुत जरूरी होता है। पहला विरलीकरण का काम बुआई के 10-15 दिनों बाद तथा दूसरी बार 20-25 दिनों बाद करना चाहिए।

पोषक तत्व प्रबंधन :

  • बाजरा की खेती में जैविक खादों का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है। जैविक खादों के प्रयोग से पौघों सभी आवश्यक पोषक तत्वों की प्राप्ति हो जाती है। ये खादें मिट्टी की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में सुधार भी होता है। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के परिणाम के आधार पर करना चाहिए।
  • देशी खाद 100 से 120 कुन्तल/हेक्टेयर खेत की तैयारी के समय देना चाहिए। मृदा परीक्षण न हो पाने की दशा में  संकर प्रजातियों के लिए 100-120 किग्रा. नाईट्रोजन, 50-60 किग्रा. फास्फोरस एवं 40-50 किग्रा. पोटाश का प्रयोग करना चाहिए।
  • संकुल प्रजातियों में 40-50 किग्रा. नाईट्रोजन, 30-40 किग्रा. फास्फोरस एवं 20-30 किग्रा. पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। मिट्टी में जिंक की कमी होने पर 25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए।
  • नाईट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय प्लेसमेंट विधि देना चाहिए। यदि उचित दूरी व गहराई पर उर्वरक देने की सुविधा न हो तो इन उर्वरकों का मिश्रण बनाकर अन्तिम जुताई से पूर्व खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए।
  • शेष नाईट्रोजन की आधी मात्रा को दो बार में देना चाहिए। पहली बुआई के 20-25 दिन बाद व दूसरी बालिया निकलते 40-45 दिन पर दाना बनते समय देना चाहिए।

सिंचाई :

सामान्यतः बारानी क्षेत्रों में सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता पड़ती है। लेकिन उन्नतशील और संकर किस्मों से भरपूर उत्पादन प्राप्त करने के लिए 3 ंिसंचाईयों की आवश्यकता होती है। प्रथम सिंचाई फूटाव के समय, व्दितीय बाल निकलते समय एवं तीसरी सिंचाई बाल में दाना बनते समय करनी चाहिए। अतिरिक्त पानी खेत में नही ठहरने देना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :

बाजरे की फसल में खरपतवारों से काफी नुकसान पहुॅचता है। बुआई के 3 सप्ताह बाद निकाई-गुड़ाई करके खरपतवारों को निकाल देना चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए एट्राजीन दवा की 0.5 किग्रा. मात्रा को लगभग 800 लीटर पानी में घोल बना कर बुआई के तुरन्त बाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। खेत में दवा छिड़कते समय पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

रोग तथा कीट नियंत्रण :

बाजरे की फसल को कीट – व्याधियों से काफी नुकसान पहुचता है। अतः अधिक उपज लेने के लिए समय से कीट – व्याधियों के रोकथाम के उपाय करना चाहिए है।

तना बेधक कीट :

इस कीट का प्रकोप शुरूआत में पत्तियों पर तथा बाद में गिडार तनें को हानि पहुचाना शुरू कर देती हैं। इसके नियंत्रण के लिए 4 प्रतिशत सेविन रसायन की 15 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए।

तना मक्खी :

यह फसल की शुरूआत की अवस्था में हाॅनि पहुॅचाता है। इस कीट इल्ली सबसे हानिकारक होती है। इल्लिया पहले तने में छेद करती है और बाद में मुख्य तने को काट देती हैं। इस कीट का प्रकोप बादल घिरे होने पर अधिक होता है।

सफेद ग्रब्स :

यह कीट पौधों की जड़ों को नुकसान पहुॅचाता है। बाजरा का सबसे हानि कारक कीट है। इसकी लार्वा अवस्था फसल को सबसे अधिक हानि पहुॅचाती है।

रोकथाम :

दोनों कीटों के नियंत्रण के लिए थिमेट 10 जी 15 से 20 किग्रा. या फ्यूराडान 3 जी 25-30 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बुआई के समय मिलाना चाहिए।

अर्गट रोग :

यह बाजरे की एक भयंकर बीमारी है। इसका प्रकोप संकर किस्मों में अधिक होता है। इसका प्रकोप पौधों में फूल आते समय होता है। इस बीमारी में बालियों से चिपचिपा, गुलाबी रंग का मीठा स्राव निकलने लगता है।

संक्रमित पौधों के नीचे खेत में सफेद धब्बे दिखाई पड़तें हैं जो पौधे तरल प्रदार्थ गिरने के कारण बनते हैं। रोग ग्रसित पौधों को काटकर जला देना चाहिए। बीज को थीरम या एग्रोसन से उपचारित कर बोना चाहिए। शीघ्र पकने वाली व रोग अवरोधी प्रजातियों की बुआई करनी चाहिए।

दाने का कडुआ रोग :

यह बीमारी भी बाजरे की फसल को काफी नुकसान  पहुॅचाती है। इसका प्रकोप फसल में भुट्टा निकलते समय होता है। पौधों में भुट्टों के लगने पर दानों की जगह कवक के काले बीजाणु भर जाते हैं। यह बीज जनित बीमारी है। इसलिए बीज को बोने से पूर्व थीरम या एग्रोसन जी.एन. नामक दवा से 3 ग्राम प्रतिकिग्रा. बीज की दर से अवश्य उपचारित कर लेना चाहिए। खड़ी फसल में 0.15 प्रतिशत वाईटावैक्स दवा का छिड़ाकव करना लाभकारी होता है।

कटाई एवं मड़ाई :

बाजरे की विभिन्न किस्में 70 से 100 दिन में पक कर तैयार हो जाती हैं। दानों 20 प्रतिशत तक नमी रह जाय, तब बालियों की कटाई कर लेना चाहिए। पहले बालियों की कटाई कर सुरक्षित स्थान पर पहुचा दें। बाद में खड़ी फसल को एक साथ कटाई कर कड़बी के रूप में पशुओं के खिलाने के लिए इस्तेमाल में लेना चाहिए। बालियों की मड़ाई बैंलों या थ्रेसर से करके दानों को अच्छी तरह सुख लेना चाहिए। भण्डारण के समय अनाज में 12-14 प्रतिशत से अधिक नमी नही रहनी चाहिए।

उत्पादन:

बाजरे की फसल की उचित देखरेख और उन्नत सस्य क्रियायें अपनाकर खेती करने पर संकर किस्मों से 35-40 व देशी किस्मों से 15-20 कुन्तल /हेक्टेयर उत्पादन आसानी से होता है।

चारा उत्पादन : हरा चारा 250-300 कुन्तल व सूखी कड़बी 80-125 कुन्तल /हेक्टेयर तक प्राप्त हो जाती है।  बाजरा की सूखी कड़बी (भूसा/चारा) की कीमत क्षेत्र, गुणवत्ता, मौसम और मांग के अनुसार बदलती रहती है। सामान्यतः देश के अधिकांश राज्यों में इसकी बिक्री निम्न दरों पर होती है—

  • सामान्य गुणवत्ता की सूखी कड़बी : ₹250 से 450 प्रति क्विंटल
  • अच्छी गुणवत्ता एवं हरी पत्तियों वाली कड़बी : ₹500 से 800 प्रति क्विंटल
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों या पशुपालक इलाकों में : ₹800 से 1200 प्रति क्विंटल तक कीमत मिल सकती है।

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा एवं गुजरात जैसे राज्यों में पशुपालन अधिक होने के कारण बाजरा की सूखी कड़बी की मांग अच्छी रहती है। यदि किसान कड़बी को साफ-सुथरे तरीके से सुखाकर गठ्ठर बनाकर बेचें, तो बेहतर दाम प्राप्त हो सकते हैं।

बाजरा की खेती का आय एवं व्यय विश्लेषण (प्रति हेक्टेयर)

1. खेती में अनुमानित लागत (व्यय)

मदअनुमानित खर्च (रु.)
खेत की तैयारी एवं जुताई6,000 – 8,000
बीज एवं बुवाई2,500 – 3,500
उर्वरक एवं खाद5,000 – 7,000
सिंचाई एवं श्रम4,000 – 6,000
खरपतवार एवं कीट नियंत्रण3,000 – 4,000
कटाई एवं मड़ाई5,000 – 7,000
अन्य आकस्मिक खर्च2,000 – 3,000
कुल अनुमानित लागत28,000 – 38,000 रु.

2. संभावित उत्पादन

  • औसत दाना उत्पादन : 35–40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • हरा चारा उत्पादन : 250–300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
  • सूखा चारा उत्पादन : 80–125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

3. संभावित आय

स्रोतअनुमानित आय (रु.)
दाना बिक्री (₹2500–3000 प्रति क्विंटल)87,500 – 120,000
चारा बिक्री20,000 – 31,250
कुल सकल आय107,500 – 151,250 रु.

4. शुद्ध लाभ

शुद्ध लाभ = सकल आय कुल लागत

सकल आय = ( 107,500 – 151,250 रु.)
कुल लागत  = ( 28,000 – 38,000 रु.)

संभावित शुद्ध लाभ : 79,500  से 113,250  रुपये प्रति हेक्टेयर

बाजरा एक ऐसी फसल है जो कम पानी, कम लागत और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी किसानों को अच्छा उत्पादन एवं लाभ देने की क्षमता रखती है। वैज्ञानिक खेती तकनीकों, उन्नत किस्मों, संतुलित पोषण प्रबंधन तथा समय पर रोग-कीट नियंत्रण अपनाकर किसान बाजरा की खेती को अधिक लाभकारी बना सकते हैं। वर्तमान समय में बढ़ती पोषण जागरूकता और बाजार मांग को देखते हुए बाजरा किसानों की आय बढ़ाने, पशुओं के लिए पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने तथा खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली महत्वपूर्ण फसल बनकर उभर रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल :  (FAQ)

प्रश्न 1:  बाजरा की बुआई का सही समय क्या है?

उत्तर : खरीफ मौसम में 15 जून से 15 जुलाई तक बाजरा की बुआई उपयुक्त मानी जाती है।

प्रश्न 2:  बाजरा की खेती में प्रति हेक्टेयर कितना बीज लगता है?

उत्तर : सामान्यतः 4–5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।

प्रश्न 3:  बाजरा की खेती से कितना उत्पादन मिलता है?

उत्तर : संकर किस्मों से 35–40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हो सकता है।

प्रश्न 4:  बाजरा की सूखी कड़बी कितने रुपये क्विंटल बिकती है?

उत्तर : गुणवत्ता एवं मांग के अनुसार ₹250 से ₹1200 प्रति क्विंटल तक कीमत मिल सकती है।

प्रश्न 5:  बाजरा की खेती में कितना लाभ होता है?

उत्तर : वैज्ञानिक खेती अपनाने पर प्रति हेक्टेयर लगभग ₹80 हजार से ₹1 लाख तक शुद्ध लाभ प्राप्त हो सकता है।

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