धान के खेत की तैयारी कैसे करें
धान के खेत की वैज्ञानिक तैयारी से धान की पैदावार बढ़ाएं। जानें जुताई, पडलिंग, मेड़बंदी, हरी खाद, मृदा परीक्षण, DSR तकनीक और जल प्रबंधन की पूरी जानकारी।

धान हमारे देश की खरीफ मौसम की महतवपूर्ण खाद्यान्न की फसल है। इसकी खेती बडे पैमाने पर किसान भाई करते हैं। धान की अच्छी पैदावार] केवल उन्नत बीज या खाद पर निर्भर नहीं करती] बल्कि खेत की सही तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि खेत की तैयारी वैज्ञानिक तौर-तरीके से की जाए] तो पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं] खेत में खरपतवार कम होते हैं] पानी का सही प्रबंधन होता है और उत्पादन में अच्छी वृद्धि होती है। इसलिए धान की खेती शुरू करने से पहले खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है। आज के इस लेख में इन्ही सब बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
खेत तैयारी का उद्देश्य : धान की खेती में खेत तैयारी का उद्देश्य केवल मिट्टी पलटना नहीं होता] बल्कि मिट्टी की संरचना को सुधारना] नमी संरक्षण] खरपतवार नियंत्रण] पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाना और पौधों के अच्छी बढ़वार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना होता है।
पिछली फसल के अवशेषों का प्रबंधन : धान की खेती शुरू करने से पहले खेत से पिछली फसल के अवशेष] खरपतवार और कंकड़ – पत्थर को हटाकर खेत को साफ करें। इससे खेत की जुताई करना आसान हो जाता है। यदि खेत में पुराने खरपतवार या कीटों के अंडे मौजूद हों] तो वे नई फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए खेत की प्रारंभिक सफाई धान उत्पादन बढ़ाने के लिए बहुत जरूरी कदम माना जाता है। यदि खेत में अवशेष सड़ने के लिए पड़े रहें तो कीट और रोग का प्रकोप बढ़ सकता है। नाइट्रोजन की अस्थायी रूप से कम उपलब्धता कम हो सकती है। किसान फसल अवशेषों को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग करें। इससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ता है और सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं।
उपयुक्त मिट्टी : धान की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है] लेकिन दोमट और चिकनी दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। ऐसी मिट्टी में पानी रोकने की क्षमता अधिक होती है] जिससे धान के पौधों को पर्याप्त नमी मिलती रहती है। धान के खेत का समतल बनाना भी बहुत जरूरी काम होता है ताकि सिंचाई का पानी पूरे खेत में समान रूप से फैल सके।
पहली जुताई : धान के खेत की पहली जुताई गर्मी के मौसम में मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से करनी चाहिए। लगभग 15 & 20 सेमी गहरी जुताई करने से मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है और सूर्य की तेज गर्मी से कई प्रकार के हानिकारक कीट] फफूंद और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। इस प्रक्रिया से मिट्टी भुरभुरी बनकर पौधों की जड़ों के विकास में मदद करती है। यदि खेत में कठोर परत बन गई हो] तो गहरी जुताई करना विशेष रूप से लाभकारी होता है। इससे वर्षा का पानी मिट्टी में अच्छी तरह समाहित होता है और खेत की जलधारण क्षमता में भी वृद्धि होती है।
पलेवा और दूसरी जुताई : पहली जुताई के बाद खेत में हल्की सिंचाई यानी पलेवा करें। जब मिट्टी में उचित नमी आ जाए] तब दूसरी जुताई का काम करें। इससे मिट्टी नरम हो जाती है और बड़े ढेले टूट जाते हैं। दूसरी जुताई के समय खेत में गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट मिलाना बहुत लाभकारी होता है। पोषक तत्व प्रबंधन के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से 100 कुन्टल अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद खेत में मिलाना चाहिए। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता बढ़ती है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व लम्बे समय तक धीरे-धीरे मिलते रहते हैं।
खेत का समतलीकरण : धान की खेती में खेत का समतल होना बहुत आवश्यक होता है। समतल न होने से खेतों में कहीं पानी अधिक भर जाता है ता कहीं पर कम रहता है] जिससे पौधों की वृद्धि समान रूप से नही हो पाती है। आधुनिक तरीके में लेजर लैंड लेवलर या फिर पारंपरिक रूप से पाटा लगाकर खेत को समतल बना लेना चाहिए। धान के खेत को समतल बना लेने से पानी की बचत होती है। लेजर लैंड लेवलिंग तकनीक से 20 & 30 फीसदी पानी की बचत होती है। पौधों की समान वृद्धि होती है। उर्वरकों का सही उपयोग होता है और खरपतवारों के नियंत्रण में भी मदद मिलती है।

मेड़बंदी का महत्व : धान की खेती में पानी को रोककर रखना जरूरी होता है। इसलिए खेत के चारों ओर मजबूत मेड़ बनाने का काम करना चाहिए। मेड़बंदी से बारिश या सिंचाई का पानी खेत से बाहर नहीं निकल पाता। साथ ही पोषक तत्वों और उर्वरकों का बहाव भी रुक जाता है। यदि खेत की मेड़ मजबूत होती है, तो किसान कम पानी में भी धान की अच्छी पैदावार ले सकते हैं। कई किसान मेड़ों पर घास या दलहनी फसलें लगाकर अतिरिक्त लाभ भी प्राप्त करते हैं।
मेड़बंदी के लाभ :
- पानी खेत में रुका रहता है।
- मिट्टी कटाव कम होता है।
- उर्वरक बहकर खेत से बाहर नहीं जा पाते।
नर्सरी वाले खेत की तैयारी : यदि रोपाई विधि से धान की खेती करना है] तो पहले नर्सरी तैयार करनी पड़ती है। नर्सरी की मिट्टी उपजाऊ और भुरभुरी होनी चाहिए। नर्सरी वाले खेत में गोबर की खाद मिलाकर अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए। बीज बुवाई से पहले खेत को समतल कर हल्की नमी बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। हमेशा धान के उन्नत और रोगमुक्त बीजों का चुनाव करना चाहिए। इसे बेहतर पौध तैयार होती है। बीज को उपचातिर कर बुआई करने से फफूंदजनित रोगों की रोकथाम हो जाती है।
पडलिंग का महत्व : धान की खेती में पडलिंग का बहुत महत्व होता है। इस काम को करने के लिए रोपाई से पहले खेत में पानी भरकर मिट्टी को कीचड़ जैसा बनाया जाता है] जिसे पडलिंग कहते हैं। यह धान की खेती का एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। अच्छी तरह पडलिंग करने से खेत में खरपतवार कम उगते हैं। इससे मिट्टी में पानी लंबे समय तक ठहरता है। नाइट्रोजन का लीचिंग कम होता है। पौधों के समुचित विकास के लिए जड़ों को उचित वातावरण मिलता है। यही नही] खेत में धान की बेहन की रोपाई भी आसानी से हो जाती है। पडलिंग के लिए खेत में 5 से 10 सेंटीमीटर पानी भरकर ट्रैक्टर] कल्टीवेटर या पडलर चला कर किया जाता है। इसके बाद खेत को समतल कर धान की रोपाई की जाती है।
मृदा परीक्षण : धान की रोपाई करने से पहले मिट्टी की जांच अवश्य करानी चाहिए। इससे खेत में उपलब्ध पोषक तत्वों की जानकारी मिल जाती है जिससे किसान सही मात्रा में उर्वरकों का उपयोग कर सकता है। इससे उर्वरकों की लागत में कमी आती है। पौधों को संतुलित पोषण मिलता है और मिट्टी की सेहत भी सुधरती है। किसान मृदा परीक्षण का कार्य अपने निकट के कृषि विज्ञान केंद्र या फिर सरकारी मृदा प्रयोगशाला में खेत की मिट्टी के नमूने ले जाकर मिट्टी की जांच करा सकते हैं। मृदा परीक्षण से मिट्टी में पोषक तत्वों की मैजूदगी का पता चलता है।
- नाइट्रोजन कितनी है।
- फास्फोरस व पोटाश का स्तर क्या है?
- जैविक कार्बन कितना है?
- मिट्टी अम्लीय है या क्षारीय।
इसी आधार पर धान की फसल में उर्वरकों की सही मात्रा तय की जाती है। धान की खेती के लिए मिट्टी का आदर्श पीएच लगभग 5-5 से 7-5 उपयुक्त माना जाता है।
हरी खाद का उपयोग :
- धान के खेत की तैयारी में हरी खाद का उपयोग मिट्टी के सेहत के लिए बहुत लाभकारी होता है। इसके लिए ढैंचा] सनई या मूंग जैसी फसलों को खेत में पलटकर हरी खाद बनाई जा सकती है।
- यदि किसान हरी खाद के लिए इन फसलों को खेत में उगाये है तो खेत में इनकी पलटाई का कार्य पौधों पर फूल आते समय आवश्यक रूप से करना चाहिए। धान की फसल के लिए ढैंचा बहुत उपयोगी होता है। ढैंचा को खेत में पलटने के तुरंत बाद खेत में पानी भरकर धान की रोपाई की जा सकती है।
- ढैंचा के अपघटन से 5 & 7 दिनों के भीतर नाइट्रोजन का लगभग 50 फीसदी भाग अमोनिकल रूप में पौधों को उपलब्ध हो जाता है] जिससे धान की वृद्धि तेजी से होती है। ढैंचा की फसल से मिट्टी को प्रति हेक्टेयर लगभग 80 & 120 किलोग्राम नाइट्रोजन] 15 & -20 किलोग्राम फॉस्फोरस और 10 & 12 किलोग्राम पोटाश की प्राप्ति होती है।
- इससे मिट्टी में जैविक कार्बन और नाइट्रोजन की मात्रा में काफी वृद्धि होती है। हरी खाद से मिट्टी की उर्वरता शक्ति बढ़ती है। इससे किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। मिट्टी में जीवांश की मात्रा बढने से मिट्टी भुरभुरी बनती है। इससे मृदा में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता भी बढ़ती है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व : धान की फसल में जिंक की कमी एक आम समस्या है। जिंक की कमी से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पौधे बौने रह जाते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए खेत की तैयारी के समय जिंक सल्फेट 20 & 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर प्रयोग करे।
खरपतवार नियंत्रण : धान की फसल में खरपतवारों का उगना एक बड़ी समस्या है। धान में शुरुआती 30 से 40 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। खेत की तैयारी के दौरान ही इनका नियंत्रण करना जरूरी होता है। गहरी जुताई] पडलिंग और खेत की सफाई से खरपतवारों की काफी हद तक रोकथाम हो जाती हैं। कुछ किसान बुवाई या रोपाई से पहले खेत में पानी भरकर खरपतवार उगने देते हैं और फिर जुताई करके उन्हें नष्ट करने का काम करते हैं।
सिंचाई प्रबंधन : धान अधिक पानी चाहने वाली फसल है। इसलिए खेत में उचित सिंचाई व्यवस्था करना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए खेत में पानी आने और निकालने के लिए नालियां बनानी चाहिए। जहां वर्षा कम होती है, वहां सिंचाई स्रोत की पहले से व्यवस्था करना जरूरी होता है। कभी-कभी अधिक जल भराव भी फसल के लिए नुकसानदायक होता है। इसलिए खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखना भी आवश्यक है।

आधुनिक तकनीकों का उपयोग : आजकल किसान आधुनिक मशीनों और तकनीकों का उपयोग करके खेत की तैयारी को आसान और कम खर्चीला बना रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से रोटावेटर] पावर टिलर] लेजर लैंड लेवलर] पडलर मशीन और जीरो टिलेज जैसी तकनीकों का खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। इन तकनीकों के प्रयोग से समय] मजदूरी और सिचाई जल की काफी बचत होती है।
धान की सीधी बुवाई : कुछ किसान अब धान की सीधी बुवाई भी करते हैं। इसमें खेत को अच्छी तरह समतल और खरपतवार मुक्त रखना बेहद जरूरी होता है। धान की बुवाई की इस विधि को डी एस आर तकनीक कहते हैं। इस विधि में खेत में अधिक पानी भरने की आवश्यकता नहीं होती] जिससे पानी की बचत होती है। इस विधि में खेत की तैयारी के दौरान नमी प्रबंधन और खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पड़ती है।
जल संरक्षण : धान की खेती में अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए खेत की तैयारी के समय जल संरक्षण उपाय भी अपनाना चाहिए। इसके लिए खेत का समतलीकरण] मेड़बंदी और हरी खाद जैसे जैविक खादों का उपयोग पानी बचाने में मददगार साबित होते हैं।
धान के खेत की तैयारी के कुछ आवश्यक वैज्ञानिक चरण :
- मिट्टी परीक्षण
- फसल अवशेष प्रबंधन
- गहरी जुताई
- पलेवा करना
- 2 & 3 जुताई
- जैविक खाद/हरी खाद
- खेत समतली करण
- पडलिंग
- मेड़बंदी
- बेहन की रोपाई/बुवाई
अंत में] किसान भाई धान के खेत की तैयारी के लिए सही समय पर जुताई] समतलीकरण] पडलिंग] जैविक खाद का उपयोग और जल प्रबंधन जैसे उपाय जरूर अपनाए। इस तरह से यदि किसान खेत की तैयारी पर पर्याप्त ध्यान दे] तो कम लागत में गुणवत्तापूर्ण अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। आशा है किसान भाई बताई गई धान के खेत की तैयारी इन बातों को ध्यान में रखकर धान की खेती करेंगे तो अच्छे उत्पादन के साथ बेहतर मुनाफा जरूर प्राप्त होगा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: धान के खेत की पहली जुताई कब करनी चाहिए?
उत्तर: धान के खेत की पहली गहरी जुताई गर्मी के मौसम में करनी चाहिए, जिससे कीट, रोग और खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
प्रश्न 2: धान में पडलिंग क्यों की जाती है?
उत्तर: पडलिंग करने से खेत में पानी लंबे समय तक ठहरता है, खरपतवार कम होते हैं और रोपाई आसान हो जाती है।
प्रश्न 3: धान की खेती के लिए कौन सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?
उत्तर: दोमट और चिकनी दोमट मिट्टी धान की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
प्रश्न 4: धान की खेती में हरी खाद का क्या लाभ है?
उत्तर: हरी खाद मिट्टी में जैविक कार्बन और नाइट्रोजन बढ़ाती है तथा रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम करती है।
Question 5: धान में जिंक की कमी कैसे दूर करें?
उत्तर: खेत की तैयारी के समय 20–25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने से जिंक की कमी दूर होती है।
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