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आम की छाव में अदरक की खेती: दोहरी कमाई का नया  फार्मूला

आम के पुराने बागों में अदरक की खेती से दोहरी कमाई कैसे करें? जानिए वैज्ञानिक तकनीक, लागतलाभ, उन्नत किस्में और उत्पादन की पूरी जानकारी ।

डा जितेन्द्र सिंह

Key Words :  आम बाग में अदरक उत्पादन,  Mango ginger intercropping, अदरक के लिए उपयुक्त जलवायु एवं मिट्टी, अदरक की उन्नत किस्में,  बीज दर, बीजोपचार एवं बुआई विधि, बीज दर, बीजोपचार बुआई विधि,  खाद, उर्वरक सिंचाई प्रबंधन, लाभ एवं आर्थिक विश्लेषण ।

देश में किसानों की आय बढ़ाने के लिए संसाधनों का अधिकतम और वैज्ञानिक उपयोग आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आम और अदरक दोनों ही उच्च व्यवसायिक मूल्य वाली फसलें हैं] लेकिन प्रायः इन्हें अलग अलग उगाया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि आम के पुराने बागों में वर्षों तक खाली पड़ी भूमि किसानों के लिए अतिरिक्त आय का सुनहरा अवसर बन सकती है।

अदरक एक शैडों लविंग यानी छायाप्रिय फसल है जो फलदार वृक्षों के नीचे सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। विशेष रूप से पुराने आम के बाग अदरक उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोणए समुचित पोषण प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों को एक साथ पिरोया जाय तो आम संग अदरक की जुगलबंदी किसानों को दोहरी कमाई  का जरिया बन सकता है।

इस लेख के माध्यम से आम के बागों में अदरक की अंतरफसली खेती की वैज्ञानिक तकनीक] लाभ और संभावनाओं को सरल भाषा में समझाने का प्रयास किया जा रहा है। ताकि  किसान भाई अपनी आमदनी को स्थायी रूप से बढ़ा सकें।

आम के बगीचों का चुनाव : पौधों की बढ़वार की दष्टि से आम की कई तरह की किस्में होती है। ये किस्में बौनी, कम बढ़ने वाली, मध्यम बढ़वार वाली, देशी व बीजू इत्यादि। इनमें कम बढ़वार वाली पौधों की आपस की दूरी 4 से 5 मीटर,  मध्यम बढ़वार वाली पौधों की आपस की दूरी 9 से 10 मीटर, अधिक बढ़वार वाली पौधों की आपस की दूरी 11 से 12 मीटर और देशी एवं बीजू पौधों की आपस की दूरी 15 से 18 मीटर रखी जाती है।

इस तरह आम की अधिक बढ़वार वाली किस्मों के बगीचों का उपयोग अदरक की खेती के लिए करना चाहिए। जिससे बगीचों के अन्दर सभी तरह आधुनिक कषि यंत्रो का प्रयोग व कर्षण क्रियाएं आसानी से की जा सके। उपयुक्त बगीचों का चुनाव करने के बाद सबसे पहले आम के पौधों के चारों ओर 1.20 से 2.40 मीटर आकार का थाला बना लेना चाहिए। जिससे जरूरत के मुताबिक समय – समय पर आम के पौधों की सिंचाई एवं उर्वरक प्रबंधन किया जा सके। थालों के अतिरिक्त खाली बची हुई जगह का इस्तेमाल अदरक की खेती के लिए करते हैं। आम के बगीचे में अदरक की खेती करने के लिए सभी तरह की कर्षण क्रियाएं शुद्ध फसल की भाति करते हैं।

जलवायु : अदरक गर्म और तर जलवायु की फसल है। इसकी खेती समुद्र तल से 1500 मीटर उॅचाई वाले स्थानों तक आसानी से किया जा सकता है। गांठों के विकास के समय तर मौंसम व फसल तैयार होते समय शुष्क मौंसम की आवश्यकता होती है।

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मिट्टी एवं तैयारी : अदरक की खेती के लिए जीवांश युक्त दोमट या बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। क्षारीय मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नही होती। खेत की तैयारी के लिए गर्मी की एक-दो जुताई मिट्टी पलट हल से करने के बाद हैरो या देशी हल चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा बना लेना चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर मिट्टी को सममतल कर देना चाहिए।

प्रजातिया : सामान्यतः अदरक की स्थानीय किस्मों की खेती की जाती है जिससे उत्पादन कम होने के साथ-साथ निम्न गुणवत्ता की अदरक प्राप्त होती है। उन्नतशील किस्मों में रियो-जेनेरिओ, चाइना, कोचीन, वर्धमान, कालीकट, बरूआ, सागर आदि प्रमुख है।

सुरूचि : यह एक अधिक उपज देने वाली प्रजाति है। इसके कंद हरापन लिए पीले रंग के होते है। इस प्रजाति में रोग कम लगता है। इसमें 3.8 प्रतिशत रेशा, तेल 2 प्रतिषत और ओलेरियासिन 10 प्रतिशत पाया जाता है। नई किस्मों में सेलेक्शन-35, कोल-35, कोल-135 आदि हैं।

सुरभि : यह भी अदरक एक अधिक उपज देने वाली प्रजाति है। इस प्रजाति का विकास म्यूटेशन से किया गया है। इस किस्म में कंद अधिक संख्याा में बनते हैं जिनका छिलका गहरे चमकीले रंग का होता है। इसके कंदों में 4 प्रतिशत रेशा, तेल 2.1 प्रतिशत पाया जाता है।

सुप्रभा : इस किस्म के कंद लम्बे, अण्डाकार, चमकीले भूरे रंग के होते हैं। इसमें फुटाव अधिक होता है। यह पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सर्वश्रेष्ठ किस्म है। इसमें 4.4 प्रतिशत रेशा, तेल 1.9 प्रतिशत और ओलेरियासिन 8.91 प्रतिशत पाया जाता है।

बीज की मात्रा : अधिक उत्पादन लेने के लिए अच्छे गुणवत्ता के बीज प्रयोग में लाना चाहिए है। बीज हमेशा विश्वसनीय संस्था से क्रय करना चाहिए। बीज दर बहुत हद तक प्रकंदों के आकार पर निर्भर करती है। बीज के लिए रोग मुक्त कंदों को प्रयोग में लाना चाहिए। कदों को 4-5 सेमी. के टुकड़ों में बाट लेना चाहिए। प्रत्येक टुकड़ों में कम से कम दो आॅखे व भार 25-30 ग्राम होना चाहिए। एक हेक्टेयर की बुआई के लिए लगभग 15-20 कुन्तल कंदों की जरूरत होती है।

बीजोपचार : कंदों को बुआई से पूर्व 0.25 प्रतिषत डाईथेन-एम-45 और बाविस्टीन 0.1 प्रतिषत के घोल में 1 घण्टे तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। इसके बाद एक-दो दिन तक इन कंदों को छाया में सुखाना चाहिए। कंदों को उपचारित करने से फसल को फफूॅद जनित रागों से रोकथाम हो जाती है।

बुआई का तरीका : बगीचे की जमीन को सुविधानुसार छोटी-छोटी क्यारियों में बाटकर 25 से 30 सेन्टीमीटर पंक्तियों की आपसी दूरी व 15-20 सेन्टीमीटर पौधों की आपसी दूरी पर कंदों की बुआई करते हैं। कंदों की बुआई मिट्टी में 4 सेन्टीमीटर की गहराई में करना चाहिए। बुआई के बाद पुआल, घास-फूस, पौधों की पत्तियों व गोबर की सड़ी खाद से अच्छी तरह ढ़क देना चाहिए। ऐसा करने से मिट्टी में नमी संरक्षित रहने के साथ-साथ धूप से अंकुरण पर भी बुरा प्रभाव नही पड़ता।

बोने का समय : बुआई के समय का अदरक के उपज में बहुत असर होता है। सामान्यतः अदरक की बुआई मई-जून में की जाती है। वर्षा आधारित फसल की बुआई पहली वर्षा के ठीक बाद कर देनी चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में अदरक की बुआई अप्रैल से मध्य मई तक  कर देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक : खाद एवं उर्वरक की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाच के परिणाम के आधार पर करना चाहिए। मृदा परीक्षण न हो पाने की दशा में 200 से 250 कुन्तल कम्पोस्ट या गोबर की सडी खाद प्रति हेक्टेयर बुआई के 15 दिन पूर्व  मिट्टी में डालकर मिला देना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 100 किग्रा., फास्फोरस 75 किग्रा. एवं पोटाश 100 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय मिट्टी में डालकर में अच्छी तरह मिला देना चाहिए । नाइट्रोजन की शेष मात्रा को  बुआई के 50-60 दिन बाद फसल में मिट्टी चढ़ाने के पूर्व बुरकाव/टापड्र्रेसिंग करना चाहिए।

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सिंचाई : वर्षा ऋतु में क्यारियों का अतिरिक्त पानी निकालने के लिए उचित जल निकास का प्रबंध करना चाहिए। अदरक की फसल में हमेशा नमी बनाये रखना चाहिए। पहली सिंचाई बुआई के कुछ ही दिन बाद करते हैं। गर्मी के दिनों में 7-8 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

निराई-गुड़ाई : अदरक की फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। फसलोत्पादन पर निराई-गुड़ाई का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। खेत की मिट्टी को भुरभुरा बनाए रखने के लिए आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करना चाहिए। आमतौर पर 2-3 निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती है। गुड़ाई के साथ पौधों में मिट्टी चढ़ानें का काम भी करना चाहिए। घ्यान रहे निराई-गुड़ाई करते समय मिट्टी के अन्दर गांठों को किसी तरह का नुकसान नही पहुचना चाहिए।

फसल सुरक्षा : अदरक की फसल को लगने वाले कीड़े और बीमारियों से काफी नुकसान होता है। अतः फसल से अधिक उत्पादन के लिए फसल सुरक्षा बहुत आवश्यक है।

कुरमुला कीट : यह कीट सफेद रंग का होता है व इसका मुह भूरे रंग का होता है। यह भूमि में रह कर अदरक की गाठों में छेद कर हानि पहुचाता हैं। गाठों के खाए गए भागों में फफूॅद का आक्रमण हो जाता है जिससे गाठे सड़ने लगती हैं।

राइजोम मैगट : राइजोम फलाई अदरक की गाठों पर सफेद रंग के अण्डे देती है । एक दिन पश्चात इन अण्डों से मैगट निकलते हैं। ये मैगट पौधों के तने व गाठ़ों में घुस जाते है। इन प्रभावित गाठों में फफूद आसानी से आक्रमण कर देती हे। अदरक की फसल को कीड़े से बचाने के लिए समेकिन नाशीजीव प्रबंधन की तकनीक अपनानी चाहिए। बुआई के लिए स्वस्थ्य बीज का प्रयोग करना चाहिए। खेत में बुआई से एक माह पूर्व मृदा का सौरीकरण करना चाहिए। जैव अभिकर्ता ट्राईकोडर्मा हरजियानम या स्यूडोमोनास फलोरीसेन्स को 8 से 10 ग्राम प्रति लीटर पानी घोल कर  आधा घंटे डुबोकर रखना चाहिए। इसके बाद छाया में सुखाये जिससे नमी बनी रहे।

प्रकंद विगलन : यह रोग पिथियम ऐफेनीडरमेंटम नामक फफूॅद से फैलता है। इस रोग इस प्रभावित से पौधों की निचली पत्तिया पीली पड़ जाती हैं। इसके बाद पूरा पौधा मुरझाकर सूख जाता है। पौधे के भूमि के समीप का भाग पनपिचा हो जाता हे। बाद में पूरा का पूरा कंद सड़ जाता हे। इसकी रोकथाम के लिए बीज प्रकंदों को 0.25 प्रतिशत सान्द्रता को घुलनशील सेरेसान में बुआई से पूर्व 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए। 

पत्तियों का धब्बा रोग : यह रोग फिलास्टिक्टा जिजीबेरी नामक फफूद के कारण फैलता है। इस रोग इस प्रभावित से पौधों की पत्तिया अण्डाकार या अनियमित के धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में आपस में मिल जाते है। इससे पौधों का विकास रूक जाता है और कंद उत्पादन में भारी कमी आ जाती है।  इसकी रोकथाम के लिए र्बोडों मिश्रण  50: 50: 50 का इस्तेमाल करना चाहिए।

खुदाई : अदरक की फसल बुआई के 7-8 माह बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। जब पौधों की अधिकतर पत्तिया पीली पड़ कर सूखने तो समझना चाहिए फसल की खुदाई के लिए तैयार है। सोठ के उद्देश्य से तैयार की गई फसल को पूर्ण परिपक्व अवस्था में करना चाहिए। अदरक की खुदाई का कार्य फावड़ा, कस्सी या खुरपी से करना चाहिए।

उत्पादन : अदरक का उत्पादन बहुत कुछ समय से की गई कर्षण क्रियाओं, बुआई के लिए प्रयुक्त कंदों का आकार, मिट्टी की उर्वराशक्ति एवं प्रजातियों के उपर निर्भर करता है। सामान्यतः 100 से 150 कुन्तल अदरक और 20-30 कुन्तल सौंठ प्रति हेक्टेयर उपज हेाती है।

अदरक का महत्व : हमारे देश में अदरक को मुख्य रूप से मसाले की फसल के रूप में उगया जाता है। इसका उपयोग साग-सब्जी, चटनी, अचार, टोमैटो सास, चिली सास, सलाद एवं विभिन्न प्रकार के पेय प्रदार्थों को स्वादिष्ट और रूचिकर बनाने में किया जाता है। अदरक औषधीय गुणों से परिपूर्ण होने के कारण औषधि निर्माण में भी इस्लेमाल में लाया जाता है। इसको सुखाकर सोंठ तैयार की जाती है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में अदरक का इस्तेमाल खूब किया जाता है। वर्तमान में इसकी खेती का प्रसार तेजी से हो रहा है क्योकि अन्य मसाले की फसलों की तुलना में अधिक लाभकारी फसल साबित हाती है।

अदरक का औषधीय महत्व : जब यह ताजी रहती है तो अदरक का कहलाती है और सुखाने के बाद सांेठ हो जाती है। यह पाचक, पेट में कब्ज, गैस बनना, वमन, बच्चों के लिए रस के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।  अदरक का रस और शहद मिलाकर चाटते रहने से दमा, श्वास, खाँसी, से लेकर क्षय रोग तक आशातीत सुधार होता है।  जब हिचकी, जमुहाई का अनुपात बढ़ जाता है तो इसका प्रयोग किया जा सकता है। अदरक को भोजन के पूर्व लेने पर भूख खुलती है। अदरक और गुड़ एकत्र कर उसकी पुटली बनाकर उसके रस को नाक में डालने पर आधासीशी दर्द में फायदा होता है।

सौंठ  तैयार करना : अदरक की अच्छी गाठों को छाट कर अलग कर लेते है। इन छाटी गई गाठों को साफ पानी में डाल देते हैं। जब गाठों के उपर का छिलका गल जाय तो साफ करके एक सप्ताह तक धूप में सुखाना चाहिए। तत्पश्चात चूने के पानी और गन्धक से उपचारित करके पनः धूप में सुखाते हैं। इस तरह अदरक से 1/5 हिस्सा सोंठ प्राप्त होती है।

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आम संग अदरक की खेती से लाभ : आम एक एकान्तर फलन वाली फसल है अर्थात पौधों पर एक वर्ष फल आने के बाद दूसरे वर्ष पौधों पर फल नही लगते। इससे आम की फसल लेने वाले किसानों को दूसरे वर्ष फसल से कोई आर्थिक लाभ प्राप्त नही होता। आम में एकान्तर फलन से होने वाली इस आर्थिक हानि की भर पाई आम के बगाचों की खाली जगह में अदरक की खेती करके पूरा कर सकते है। यही नही, वैज्ञानिक सूझबूझ, उन्नत तकनीक के इस्तेमाल एवं फसल के समुचित प्रबंधन के जरिए आम संग अदरक की खेती से शुद्ध फसल की भाति उत्पादन और आय की प्राप्त की जा सकती है।

आम संग अदरक की खेती का आर्थिक विश्लेषण : (एक हेक्टेयर पुराने आम के बाग के लिए)

आधारभूत मान्यताएँ :

  • आम बाग : 8–10 वर्ष या उससे अधिक पुराना
  • आम वृक्षों के बीच उपलब्ध खाली क्षेत्र : लगभग 50–60%
  • अदरक की खेती का क्षेत्र : 0.5 हेक्टेयर (आम के नीचे)
  • अदरक किस्म : सुप्रभा / नादिया / वरदा
  • फसल अवधि : 7–8 माह

अदरक उत्पादन लागत (0.5 हेक्टेयर) :

क्र.मदअनुमानित लागत ()
1बीज अदरक (10–12 क्विंटल @ ₹4,000/क्विंटल)45,000
2भूमि तैयारी एवं क्यारियाँ8,000
3गोबर की खाद / वर्मी कम्पोस्ट12,000
4उर्वरक एवं सूक्ष्म तत्व6,000
5रोपाई एवं निराई–गुड़ाई मजदूरी15,000
6सिंचाई एवं मल्चिंग7,000
7रोग-कीट प्रबंधन5,000
8खुदाई, सफाई एवं ढुलाई12,000
कुल लागत1,10,000

उत्पादन एवं आय :

  • औसत उत्पादन : 80–100 क्विंटल / 0.5 हेक्टेयर
  • औसत बिक्री मूल्य : ₹2,500 प्रति क्विंटल

सकल आय :

90 क्विंटल  X ₹2,500 = ₹2,25,000

शुद्ध लाभ (केवल अदरक से)

₹2,25,000 – ₹1,10,000 = ₹1,15,000

आम से अतिरिक्त लाभ (पहले से स्थापित बाग)

  • आम की औसत शुद्ध आय (हेक्टेयर) : ₹2.5–3.5 लाख
  • अदरक की अंतरफसल से आम उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव नहीं, बल्कि
    • भूमि का बेहतर उपयोग
    • नमी संरक्षण
    • खरपतवार नियंत्रण में सहायता

कुल लाभ की स्थिति (आम + अदरक)

विवरणअनुमानित आय ()
आम से शुद्ध आय3,00,000
अदरक से अतिरिक्त शुद्ध आय1,15,000
कुल शुद्ध आय4,15,000 / हेक्टेयर
  

निष्कर्ष :   आम संग अदरक की अंतरफसली खेती किसानों के लिए एक बेहद लाभकारी मॉडल है। आम बागों में वर्षों से अनुपयोगी पड़ी भूमि को अदरक जैसी छायाप्रियए उच्च मूल्य वाली फसल से जोड़कर न केवल अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है] बल्कि बाग की पूरी उत्पादकता भी बढ़ाई जा सकती है। वैज्ञानिक तकनीकों] उन्नत किस्मों] संतुलित पोषण प्रबंधन और समेकित रोग&कीट नियंत्रण अपनाने से अदरक की उपज एवं गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।

           आम की एकान्तर फलन की समस्या के कारण जिन वर्षों में आम से आय कम या शून्य हो जाती हैए उन वर्षों में  किसानों को अदरक की फसल आर्थिक संबल प्रदान करती है। आम के स्थापित बाग में अदरक की खेती करने से प्रति हेक्टेयर कुल शुद्ध आय में कम से कम 35&40 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है] वह भी बिना आम उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाले। अतः आम संग अदरक की खेती किसानों  की दोहरी कमाई का एक सशक्त फार्मूला है] जो छोटे व मध्यम किसानों के लिए कम जोखिम] लाभ अधिक और स्थायी  आय प्राप्त करने का नया फार्मूला है। खेती का यह मॉडल किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को और आसान बना सकता है।

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2 Comments

  1. वैज्ञानिक तथ्यों और व्यावहारिक सुझावों से भरपूर यह लेख किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है। ऐसी जानकारी वास्तव में खेती को नई दिशा देती है।”

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