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शिमला मिर्च की खेती :  ये  तीन बातें कराएंगी भरपूर उत्पादन

शिमला मिर्च की वैज्ञानिक खेती की पूरी जानकारी जानें। उन्नत किस्मों, स्वस्थ पौध, रोपाई, खाद-उर्वरक, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, रोग-कीट नियंत्रण, कटाई और उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक पढ़ें।

हरी शिमला मिर्च के साथ लाल, पीली और नारंगी रंग की शिमला मिर्च ने किसानों की आमदनी को खूब बढ़ाया है। खुले खेत से लेकर संरक्षित खेती तक शिमला मिर्च का भरपूर उत्पादन लिया जा सकता है। सामान्य किस्मों से जहां अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है, वहीं संकर किस्में उत्पादन क्षमता को और अधिक बढानें का काम करती है। शिमला मिर्च की खेती से कमाई को देखकर बड़ी संख्या में किसान आर्कषित हो रहे हैं। बाजार मांग भी तेजी से बढ़ रही है। यदि किसान सही किस्म का चुनाव, गुणवत्तापूर्ण पौध, संतुलित खाद एवं उर्वरक, ड्रिप सिंचाई और समय पर रोग-कीट नियंत्रण जैसी आधार भूत कृषि क्रियाओं का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाय, तो फसल की गुणवत्ता के साथ उत्पादन और मुनाफा को और बढ़ाया जा सकता है।  

बाजार मांग : शिमला मिर्च की मांग घरेलू बाजार, होटल, रेस्टोरेंट और प्रसंस्करण उद्योग में पूरे वर्ष बनी रहती है। हरी शिमला मिर्च के साथ-साथ लाल, पीली और नारंगी रंग की शिमला मिर्च की भी बाजार मांग बढ़ी है।

उन्नत किस्मों का चयन : किस्म का चुनाव स्थानीय जलवायु, बाजार की मांग और खेती के तरीके के आधार पर करना चाहिए। खुले खेत के लिए कैलिफोर्निया वंडर, सोलन भरपूर और सोलन शक्ति जैसी किस्में उपयोगी हैं। कैलिफोर्निया वंडर के फल चमकीले हरे और आकर्षक होते हैं, जबकि सोलन भरपूर के फल घंटीनुमा, गहरे हरे तथा लगभग 50-60 ग्राम के होते हैं। हिमाचल कृषि विभाग के अनुसार सोलन भरपूर की औसत उपज लगभग 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है, हालांकि यह क्षेत्र और प्रबंधन के अनुसार बदल सकती है।

संरक्षित खेती में रंगीन शिमला मिर्च के लिए बॉम्बे, नताशा, टॉर्टेक, महारत्न, तवनी प्लस, स्वर्ण, फिफरटा, ऑरोविले, इंद्रा और भारत जैसी हाइब्रिड किस्में उपलब्ध हैं। बीज खरीदते समय अधिकृत विक्रेता से प्रमाणित बीज लें और अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या उद्यान विभाग की अनुशंसा को प्राथमिकता अवश्य दें।

जलवायु : शिमला मिर्च को न बहुत अधिक गर्म और न अत्यधिक ठंडी जलवायु पसंद है। पौध की अच्छी वृद्धि के लिए सामान्यतः मध्यम तापमान और पर्याप्त नमी अनुकूल रहती है। बीज अंकुरण के लिए लगभग 24-25° सेन्टीग्रेड तापमान तथा मिट्टी का लगभग 20-25° सेन्टीग्रेड तापमान उपयुक्त माना गया है।

अत्यधिक गर्मी, पाला, लगातार वर्षा और खेत में पानी भरने से फूल झड़ सकते हैं, फल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है तथा रोग बढ़ सकते हैं। इसलिए गर्म क्षेत्रों में उपयुक्त मौसम में रोपाई करें और बरसात के समय जल निकास की विशेष व्यवस्था जरूर रखें।

मिट्टी और खेत की तैयारी

शिमला मिर्च के लिए अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट से दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। लगभग पीएच 6-7 वाली मिट्टी में फसल अच्छी रहती है। खेत में पानी रुकने से जड़ संबंधी रोगों का खतरा बढ़ता है, इसलिए भारी तथा जलभराव वाली भूमि में ऊंची क्यारियां या मेड़ बनाना लाभकारी है।

खेत की 2-3 बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाएं। अंतिम जुताई के समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाएं। खुले खेत में हिमाचल कृषि विभाग द्वारा सामान्य/संकर शिमला मिर्च के लिए लगभग 200-250 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की अनुशंसा दी गई है।

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पौध तैयार करना और बुवाई

व्यावसायिक खेती में सीधे खेत में बीज डालने की बजाय स्वस्थ पौध तैयार करके रोपाई करना अधिक उपयोगी है। नर्सरी के लिए रोगमुक्त, अच्छी जल निकासी वाली जगह चुनें। क्यारियों में महीन मिट्टी, अच्छी सड़ी जैविक खाद और साफ पानी की व्यवस्था रखें।

बीज को प्रमाणित स्रोत से खरीदें। सामान्य किस्मों की बीज दर क्षेत्र एवं उत्पादन प्रणाली के अनुसार लगभग 750-900 ग्राम प्रति हेक्टेयर, जबकि संकर किस्मों में लगभग 200-250 ग्राम प्रति हेक्टेयर तक रखी जाती है।

बीज उपचार के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ द्वारा अनुशंसित जैविक एजेंट जैसे ज्तपबीवकमतउं का उपयोग किया जा सकता है। बीजोपचार करते समय उत्पाद के लेबल पर दी गई मात्रा और विधि के अनुसार करें।

लगभग 6 सप्ताह की स्वस्थ पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। रोपाई के समय पौध लगभग 10-15 सेंटीमीटर ऊंची और स्वस्थ होनी चाहिए।

रोपाई और दूरी :

खुले खेत में सामान्यतः 60 सेंटीमीटर कतार से कतार और 45 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी उचित रहती है।

रोपाई शाम के समय या बादल वाले मौसम में करें। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। शुरुआती दिनों में पौधों को पर्याप्त नमी मिलना जरूरी है, लेकिन पानी जमा न होने दें।

संरक्षित खेती में किस्म, पौधों की वृद्धि और प्रणाली के अनुसार दूरी अलग रखी जा सकती है। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग अपनाने से पानी की बचत तथा खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलती है।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

शिमला मिर्च में केवल यूरिया का अधिक प्रयोग करने से पौधे अत्यधिक बढ़ सकते हैं, लेकिन फल उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषण देना सबसे अच्छा होता है।

एक व्यावहारिक खुले खेत की अनुशंसा में गोबर की खाद के साथ लगभग 200 किलोग्राम यूरिया, 475 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 90 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर का उपयोग बताया गया है। यूरिया की बची मात्रा को दो भागों में बांटकर पहली खुराक रोपाई के लगभग एक महीने बाद और दूसरी फूल आने से पहले देने की सलाह दी गई है।

हालांकि उर्वरक की वास्तविक मात्रा मिट्टी की जांच, किस्म और क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है। इसलिए मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट को आधार बनाना अधिक वैज्ञानिक और किफायती रहेगा।

सिंचाई प्रबंधन

शिमला मिर्च में नमी की कमी होने पर पौधों की वृद्धि, फूल और फल प्रभावित होते हैं। दूसरी ओर लगातार अधिक पानी देने से जड़ों में सड़न और अन्य रोग बढ़ सकते हैं।

गर्म मौसम में आवश्यकता के अनुसार लगभग 4-7 दिन के अंतराल पर तथा ठंडे मौसम में लगभग 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है। मिट्टी, मौसम और वर्षा के अनुसार अंतराल घटाना-बढ़ाना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई शिमला मिर्च के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। इससे पौधे की जड़ के पास नियंत्रित मात्रा में पानी पहुंचता है, पत्तियां अनावश्यक रूप से गीली नहीं होतीं और उर्वरकों को फर्टिगेशन के माध्यम से देने में सुविधा मिलती है। मल्चिंग के साथ ड्रिप सिंचाई करने से नमी संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण दोनों बेहतर होते हैं।

खरपतवार प्रबंधन

शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्व और प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। रोपाई के बाद खेत को नियमित रूप से देखते रहें और आवश्यकतानुसार 2- 3 बार निराई-गुड़ाई करें। लगभग 30-40 दिन बाद पौधों के पास मिट्टी चढ़ाने से पौधे मजबूत होते हैं।

जैविक मल्च, सूखी घास अथवा उपयुक्त प्लास्टिक मल्च का उपयोग करके खरपतवार कम किए जा सकते हैं। रासायनिक खरपतवारनाशी का प्रयोग केवल स्थानीय कृषि विभाग/लेबल की वर्तमान अनुशंसा के अनुसार ही करें, क्योंकि फसल की अवस्था और उत्पाद के अनुसार मात्रा बदल सकती है।

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रोग प्रबंधन

शिमला मिर्च में डैम्पिंग ऑफ, फल सड़न, चूर्णी फफूंद, जीवाणु धब्बा और जीवाणु मुरझान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

बचाव के मुख्य उपाय :

  • स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें।
  • नर्सरी में अधिक पानी न दें।
  • खेत में जल निकास अच्छा रखें।
  • रोगग्रस्त पौधों और फलों को निकालकर नष्ट करें।
  • एक ही खेत में लगातार शिमला मिर्चध्मिर्च की खेती न करेंय फसल चक्र अपनाएं।
  • सिंचाई का पानी संक्रमित खेत से स्वस्थ खेत में जाने से रोकें।
  • बरसात के मौसम में खेत में पानी जमा न होने दें।

चूर्णी फफूंद और फल सड़न के लक्षण आने पर अनुशंसित फफूंदनाशी का उपयोग करना चाहिए। किसी भी रसायन का छिड़काव करने से पहले वर्तमान लेबल, फसल की अवस्था, प्रतीक्षा अवधि और स्थानीय कृषि विभाग की स्वीकृत अनुशंसा अवश्य देखें।

कीट प्रबंधन

शिमला मिर्च में थ्रिप्स, माहू, सफेद मक्खी और फल छेदक प्रमुख समस्या बन सकते हैं। ये कीट पत्तियों और कोमल भागों का रस चूसकर पौधों को कमजोर करते हैं। कुछ रस चूसक कीट वायरस रोगों को फैलाने में भी भूमिका निभा सकते हैं।

समेकित कीट प्रबंधन अपनाना अधिक सुरक्षित और प्रभावी है। खेत का नियमित निरीक्षण करें, संक्रमित पत्तियों को हटाएं, पीले/नीले चिपचिपे ट्रैप का उपयोग करें तथा अत्यधिक संक्रमित पौधों को अलग करें। फल छेदक की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप उपयोगी हो सकते हैं।

कीटों की आर्थिक क्षतिस्तर के अनुसार ही कीटनाशक का प्रयोग करें। किसान को बाजार में उपलब्ध किसी भी दवा की मात्रा अनुमान से नहीं लेनी चाहिए। लेबल पर दी गई फसल-विशिष्ट मात्रा और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ खासकर कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों की सलाह का पालन करना चाहिए।

कटाई एवं तुड़ाई

हरी शिमला मिर्च की तुड़ाई तब करें जब फल पूर्ण आकार ले लें, चमकदार हरे और बाजार योग्य हो जाएं। बहुत अधिक देर तक पौधे पर फल छोड़ने से अगले फूल और फलों के विकास पर असर पड़ सकता है। इस लिहाज से मिर्च की तुड़ाई समय पर अवश्य करें।

फल तोड़ते समय डंठल के साथ सावधानी से कटाई करें ताकि पौधे की शाखा न टूटे। सामान्यतः फल की मांग और बाजार भाव के अनुसार कई तुड़ाइयां की जाती हैं। रंगीन शिमला मिर्च को लाल, पीले या नारंगी रंग में पूरी तरह विकसित होने पर तोड़ा जाता है।

तुड़ाई के बाद फलों को सीधे तेज धूप में न रखें। छाया में रखकर आकार, रंग और गुणवत्ता के अनुसार ग्रेडिंग करें तथा क्षतिग्रस्त फल अलग कर दें। साफ प्लास्टिक क्रेट या उपयुक्त पैकिंग सामग्री में परिवहन करने से फल दबने और खराब होने से बचते हैं।

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उत्पादन और लाभ बढ़ाने के व्यावहारिक उपाय

अच्छी खेती में केवल अधिक पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। किसान को स्वस्थ पौध, सही दूरी, संतुलित पोषण, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, समय पर रोग-कीट नियंत्रण का पूरा पैकेज अपनाना चाहिए।

खुले खेत में सामान्य किस्मों से लगभग 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और संकर किस्मों से लगभग 125-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज आसानी से मिल जाती है। बेहतर प्रबंधन और क्षेत्र विशेष के लिए उपयुक्त कुछ किस्में इससे अधिक उत्पादन भी दे सकती हैं, लेकिन किसान को बीज कंपनी के दावे के बजाय अपने क्षेत्र के परीक्षण एवं स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के आधार पर खेती करना चाहिए।

सफलता के मुख्य सूत्र : ये कुछमुख्य स्टेप शिमला मिर्च की खेती को और लाभकारी बनातें है।

अच्छा बीज → स्वस्थ पौध → समय से रोपाई → 60 × 45 सेमी दूरी → मृदा परीक्षण आधारित खाद एवं उर्वरक प्रयोग → ड्रिप सिंचाई → मल्चिंग → नियमित निगरानी → समय पर रोग-कीट नियंत्रण → सही अवस्था में तुड़ाई → ग्रेडिंग व पैकेजिंग → बाजार तक सुरक्षित परिवहन।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्  (FAQ)

प्रश्न 1. शिमला मिर्च की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी उपयुक्त है?
उत्तर: अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट से दोमट मिट्टी शिमला मिर्च की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

प्रश्न 2. शिमला मिर्च की रोपाई कितनी दूरी पर करनी चाहिए?
उत्तर: खुले खेत में सामान्यतः 60 × 45 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपाई करना उपयोगी रहता है।

प्रश्न 3. शिमला मिर्च में ड्रिप सिंचाई क्यों उपयोगी है?
उत्तर: ड्रिप सिंचाई से पौधों की जड़ों तक नियंत्रित मात्रा में पानी पहुंचता है। इससे पानी की बचत होती है और फर्टिगेशन के माध्यम से पोषक तत्वों को भी पौधों तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है।

प्रश्न 4. शिमला मिर्च की प्रमुख उन्नत किस्में कौन-सी हैं?
उत्तर: खुले खेत के लिए कैलिफोर्निया वंडर, सोलन भरपूर और सोलन शक्ति जैसी किस्मों का उपयोग किया जाता है। संरक्षित खेती में विभिन्न रंगों वाली हाइब्रिड किस्मों को अपनाया जाता है।

प्रश्न 5. शिमला मिर्च में कौन-कौन से प्रमुख कीट लगते हैं?
उत्तर: शिमला मिर्च की फसल में थ्रिप्स, माहू, सफेद मक्खी और फल छेदक प्रमुख कीट हैं। समय पर निगरानी और उचित प्रबंधन से इनके प्रकोप को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 6. शिमला मिर्च की अच्छी उपज कैसे प्राप्त करें?
उत्तर: स्वस्थ पौध, उपयुक्त किस्म, उचित पौध दूरी, संतुलित पोषण, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग तथा समय पर रोग एवं कीट प्रबंधन अपनाकर अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

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