सतावर की व्यावसायिक खेती : जड़ों में छिपा है मोटा मुनाफा
सतावर वैज्ञानिक खेती की पूरी जानकारी। जानें जलवायु, मिट्टी, बीज, रोपाई, उत्पादन, लागत, बाजार भाव और लाखों का मुनाफा प्रति हेक्टेयर कैसे प्राप्त करें ?
वर्तमान में खेती की बढती लागत और घटता मुनाफा के दौर में औषधीय फसलों की खेती किसानों के लिए बहुत लाभकारी साबित हो रही है। औषधीय फसलों में सतावर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। आयुर्वेद में शतावरी के नाम से प्रसिद्ध यह पौधा न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है बल्कि किसानों के लिए कम लागत में अधिक लाभ देने वाली नकदी फसल के रूप में भी जाना जाता है।
सतावर की जड़ों की मांग आयुर्वेदिक दवा कंपनियों, हर्बल उद्योगों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लगातार बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कम पानी, कम देखभाल और हल्की भूमि में भी अच्छी पैदावार देती है।
एक बार पौध तैयार होने के बाद किसान 18 से 24 महीनों में लाखों रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं। यही कारण है कि देश के अनेक प्रगतिशील किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सतावर की व्यावसायिक खेती की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।
यदि वैज्ञानिक तकनीकों, जैविक प्रबंधन और सही बाजार रणनीति के साथ इसकी खेती की जाए, तो सतावर किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यही वजह है कि सतावर को भविष्य की “ग्रीन गोल्ड” औषधीय फसल भी कहा जा रहा है।
वनस्पतिक परिचय :
औषधीय खेती में सतावर तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यह अपनी औषधीय उपयोगिता के साथ-साथ विशिष्ट वनस्पतिक संरचना के कारण भी खास पहचान रखती है। आयुर्वेद में शतावरी के नाम से प्रसिद्ध यह बहुवर्षीय औषधीय लता लिलिएसी कुल का महत्वपूर्ण पौधा है।
देश के जंगलों, झाड़ियों और हल्की छायादार भूमि में यह प्राकृतिक रूप से उगता है। इसका पौधा कम संसाधनों के उपयोग से भी अच्छी वृद्धि करने की क्षमता रखती है। सतावर का पौधा पतली, फैलने वाली और कांटेदार लताओं वाला होता है, जो आसपास के पेड़-पौधों या अन्य सहारों के माध्यम से ऊपर की ओर बढ़ता है।
इसकी शाखाएं अपेक्षाकृत कठोर एवं लकड़ी जैसी दिखाई देती हैं। पौधे की पत्तियां अत्यंत पतली, सुईनुमा और हरे रंग की होती हैं, जबकि छोटे-छोटे कांटे इसकी प्रमुख पहचान माने जाते हैं। सितम्बर से अक्टूबर के बीच सतावर में छोटे, सफेद और हल्की सुगंध वाले फूल गुच्छों के रूप में निकलते हैं। फूल आने के बाद इसमें छोटे गोल फल विकसित होते हैं, जो शुरुआत में हरे रंग के रहते हैं और पकने पर लाल अथवा काले रंग में बदल जाते हैं।
इन फलों के भीतर छोटे बीज पाए जाते हैं, जिनका उपयोग नई पौध तैयार करने में किया जाता है। सतावर का सबसे महत्वपूर्ण एवं आर्थिक रूप से उपयोगी भाग इसकी जड़ें होती हैं। पौधे के आधार भाग से निकलने वाली लंबी, मांसल और सफेद रंग की गुच्छेदार जड़ों का उपयोग औषधीय निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है। ये जड़ें सामान्यतः 30 से 100 सेंटीमीटर लंबी तथा 1 से 2 सेंटीमीटर मोटी होती हैं। जड़ों के ऊपर हल्का भूरा आवरण पाया जाता है, जिसे हटाने पर अंदर सफेद गूदा दिखाई देता है।
औषधीय दृष्टि से सतावर की जड़ों में सतावरिन सहित कई महत्वपूर्ण ग्लाइकोसाइड, पोषक तत्व और जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं, स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक, दुग्धवर्धक औषधियों और शक्तिवर्धक उत्पादों के निर्माण में व्यापक रूप से किया जा रहा है। बढ़ती मांग के चलते अब सतावर केवल एक औषधीय पौधा नहीं, बल्कि किसानों के लिए लाभकारी व्यावसायिक फसल के रूप में भी तेजी से उभर रही है।

उपयुक्त किस्में : भारत में सतावर की कई किस्में पाई जाती हैं। हैं। इनमें व्यावसायिक खेती के लिए Asparagus racemosus को सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इसकी बाजार मांग अधिक होती है तथा इसकी जड़ों में औषधीय तत्वों की मात्रा बेहतर पाई जाती है।
एस्पेरेगस रेसीमोसम (Asparagus filicinus)
यह सतावर की सबसे महत्वपूर्ण एवं व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली किस्म है। आयुर्वेदिक औषधियों में मुख्यतः इसी प्रजाति की जड़ों का उपयोग किया जाता है। इसकी जड़ें लंबी, सफेद एवं गुच्छेदार होती हैं। यह शक्तिवर्धक, दुग्धवर्धक तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली औषधियों में प्रयोग की जाती है।
एस्पेरेगस फिलिसिनस (Asparagus filicinus)
इसे विरलकन्द शतावर भी कहा जाता है। इसके कंद छोटे, मांसल तथा गुच्छों में पाए जाते हैं। इसका उपयोग पारंपरिक औषधीय उपचारों में किया जाता है।
एस्पेरेगस गोनोक्लाडोस (Asparagus gonoclados)
इसे कुन्तपत्रा शतावर कहा जाता है। यह झाड़ीनुमा पौधा होता है, जिसके कंद छोटे एवं मोटे होते हैं। इसके फूल सफेद तथा फल पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं।
एस्पेरेगस एडसेंडेंस (Asparagus adscendens)
इस प्रजाति को कई स्थानों पर सफेद मूसली के समान उपयोग में लाया जाता है। इसकी जड़ों का उपयोग शक्तिवर्धक एवं यौन स्वास्थ्य संबंधी औषधियों में किया जाता है।
एस्पेरेगस आफीसीनेलिस (Asparagus officinalis)
यह मुख्यतः सब्जी एवं सूप बनाने के लिए उपयोग की जाती है। बड़े शहरों एवं होटल उद्योग में इसकी मांग अधिक रहती है। विदेशों में इसकी खेती व्यावसायिक स्तर पर की जाती है।
एस्पेरेगस सारमेंटोसस (Asparagus sarmentosus)
इसे महाशतावरी भी कहा जाता है। इसकी लता अपेक्षाकृत बड़ी होती है और यह मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है। औषधीय दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
एस्पेरेगस प्लुमोसस (Asparagus plumosus)
यह सजावटी उपयोग के लिए प्रसिद्ध प्रजाति है। इसकी पत्तियां आकर्षक एवं मुलायम होती हैं, इसलिए इसे बगीचों एवं घरों में सजावटी पौधे के रूप में लगाया जाता है।
उपयुक्त जलवायु एवं भूमि :
सतावर की सफल और व्यावसायिक खेती के लिए अनुकूल जलवायु और उपयुक्त भूमि का चयन बहुत जरूरी होता है। सतावर की अच्छी वृद्धि एवं जड़ों के बेहतर विकास के लिए 10 से 40 डिग्री सेंटीग्रेड तक का तापमान उपयुक्त रहता है, जबकि 25 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पौधों की बढ़वार के लिए सबसे अनुकूल होता है। अत्यधिक ठंड और पाले की स्थिति पौधों की वृद्धि पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए अधिक ठंड वाले क्षेत्रों में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है।
सतावर की खेती 600 से 1000 मि.मी. के बीच वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। वर्षा ऋतु के दौरान पौधों की वृद्धि तेजी से होती है और जड़ों का विकास बेहतर होता है। हालांकि, खेत में जलभराव की स्थिति फसल के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। खेत में अधिक नमी से जड़ों में सड़न की समस्या उत्पन्न होने लगती है।
इसका पौधा हल्की छायादार परिस्थितियों में बेहतर विकास करता है। प्राकृतिक रूप से यह जंगलों में झाड़ियों और छोटे वृक्षों के सहारे बढ़ता हुआ देखा जाता है। इसी कारण खेतों में भी आंशिक छाया वाली भूमि सतावर की खेती के लिए लाभकारी मानी जाती है। समुद्र तल से लगभग 400 से 1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है। हिमालयी क्षेत्रों की हल्की ढलानदार भूमि में इसकी प्राकृतिक वृद्धि अधिक देखने को मिलती है।
सतावर की विशेषता है कि यह कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती है। फसल सूखा सहन करने में सक्षम है। गर्म जलवायु में जड़ों का विकास अच्छा होता है। हल्की नमी वाली मिट्टी में उपज और गुणवत्ता दोनों बेहतर मिलती हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में सतावर की खेती खूब लोकप्रिय हो रही है।
उपयुक्त मिट्टी :
सतावर की सफल खेती के लिए बलुई दोमट तथा जैविक पदार्थों से भरपूर भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। ऐसी मिट्टी में जड़ों का फैलाव अच्छा होता है। सतावर की खेती के लिए मिट्टी भुरभुरी, हल्की तथा अच्छी जल निकासी वाली होनी चाहिए, साथ ही उसमें पर्याप्त जैविक पदार्थ एवं नमी बनाए रखने की क्षमता भी होनी आवश्यक है।
इसके लिए 6-0 से 8-0 पीएच मान वाली भूमि उपयुक्त रहती है। हल्की क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। वहीं भारी चिकनी तथा जलभराव वाली मिट्टी इस फसल के लिए हानिकारक मानी जाती है। ऐसी भूमि में जड़ों का विकास रुक जाता है और सड़न की समस्या बढ़ने लगती है।

खेत की तैयारी :
सतावर की जड़ों का विकास मिट्टी के अंदर गहराई तक होता है। इसलिए इसकी खेती के लिए खेत की अच्छी तैयारी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। अच्छे तैयार खेत में जड़ों का फैलाव बेहतर होता है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में अच्छी मिलती है।
खेत की पहली जुताई गर्मी के मौसम में मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। इससे मिट्टी भुरभुरी बनती है तथा पुराने खरपतवार, कीट एवं रोगजनक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद 2 से 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए, ताकि खेत में बड़े ढेले न रहें।
जैविक खाद का प्रयोग :
अच्छी गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने के लिए खेत में पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट खाद जरूर मिलानी चाहिए। प्रति एकड़ 4-5 टन गोबर की खाद प्रयोग करना चाहिए। वर्मी कम्पोस्ट एवं जैविक खाद का प्रयोग करने से जड़ों की गुणवत्ता बेहतर होती है। इन खादों का उपयोग खेत की तैयारी के समय करना चाहिए।
एक औषधीय फसल है, इसलिए इसकी खेती में संतुलित एवं जैविक पोषण प्रबंधन का विशेष महत्व होता है। उचित पोषण मिलने से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है तथा जड़ों की गुणवत्ता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है।
खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ 4&5 टन सड़ी हुई गोबर खाद या कम्पोस्ट खाद मिलाना लाभकारी रहता है। इसके अतिरिक्त वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली, जीवामृत तथा अन्य जैविक खादों का उपयोग करने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जड़ों में औषधीय गुण बेहतर विकसित होते हैं।
रोपाई के बाद प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में अतिरिक्त जैविक खाद देना लाभदायक रहता है। रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने से पौधे स्वस्थ रहते हैं, रोग कम लगते हैं तथा उच्च गुणवत्ता की कंदिल जड़ें प्राप्त होती हैं।
मेड़ एवं क्यारियां बनाना :
सतावर के खेत से समय पर अतिरिक्त जल निकास की व्यवस्था करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। जलभराव होने पर जड़ों में सड़न रोग लग सकता है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए खेत में लगभग 20-25 सेमी ऊंची मेड़ियां या उठी हुई क्यारियां बनानी चाहिए। मेड़ों के बीच लगभग 60 सेमी दूरी रखें। इससे जड़ों का विकास अच्छा होता है तथा जलभराव की समस्या नहीं होती।
खरपतवार नियंत्रण :
खेत की तैयारी के समय खेत से सभी तरह के खरपतवार एवं पुरानी फसल के अवशेष हटा देना चाहिए। साफ एवं खरपतवार मुक्त खेत में पौधों की वृद्धि तेजी से होती है।
खरपतवार पौधों से पोषक तत्व, नमी एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे जड़ों का विकास प्रभावित होता है। रोपाई के लगभग 30 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए तथा आवश्यकता अनुसार 2-3 बार खरपतवार नियंत्रण करना लाभकारी रहता है। जैविक मल्चिंग, सूखी घास या पत्तियों का उपयोग करने से खरपतवार कम उगते हैं तथा मिट्टी में नमी भी बनी रहती है।
बीज एवं पौध की तैयारी : सतावर की खेती के लिए स्वस्थ एवं गुणवत्तायुक्त पौध तैयार करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसकी खेती मुख्यतः बीज एवं जड़ों व्दारा दोनों माध्यमों से की जाती है, लेकिन व्यावसायिक खेती में बीज द्वारा पौध तैयार करना अधिक लाभकारी होता है।
बीज की मात्रा : सतावर की खेती में प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा रोपण विधि पर निर्भर करती है। खेत में सीधे बीज बोने पर लगभग 4 – 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर जरूरत होती है। नर्सरी बनाकर पौध तैयार करने पर लगभग 1 से 1.5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। बीज का अंकुरण सामान्यत कम से 30 – 40 फीसदी होता है, इसलिए अच्छे एवं ताजे बीज का चयन करें। बोवाई से पहले बीज को 24 घंटे पानी में भिगोने से अंकुरण बेहतर होता है। एक हेक्टेयर खेत की रोपाइे के के लिए लगभग 35000 से 45000 पौधों की आवश्यकता पड़ती है।
नर्सरी तैयार करना : सतावर की नर्सरी सामान्यत वर्षा ऋतु में तैयार की जाती है। इसके लिए लगभग 1 × 10 मीटर आकार की उभरी हुई क्यारियाँ बनाई जाती हैं। क्यारियों में गोबर खाद, बालू एवं मिट्टी का मिश्रण मिलाया जाता है, जिससे मिट्टी भुरभुरी एवं जल निकासी युक्त बनी रहे। बीजों को 1 से 1.5 सेंटीमीटर गहराई पर बोया जाता है तथा ऊपर से हल्की मिट्टी या गोबर खाद की परत डालकर ढक दिया जाता है। इसके बाद हल्की सिंचाई की जाती है, जिससे अंकुरण अच्छा हो सके। एक एकड़ के क्षेत्र में खेती के लिए लगभग 100 वर्ग फीट की एक पौधशाला पर्याप्त होती है
इसकी की नर्सरी सामान्यत 45 से 60 दिनों में रोपाई योग्य तैयार हो जाती है। अनुकूल तापमान एवं उचित नमी मिलने पर बीज लगभग 15 – 25 दिनों में अंकुरित हो जाते हैं। नर्सरी में नियमित हल्की सिंचाई करें। जब पौधों में 3 से 4 पत्तियाँ विकसित हो जाएँ और उनकी ऊँचाई लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर हो जाए, तब उन्हें मुख्य खेत में रोपाई के लिए उपयुक्त माना जाता है।
कंदों द्वारा पौध तैयार करना :
सतावर की खेती पुराने पौधों की जड़ों से भी की जा सकती है। खुदाई के समय प्राप्त छोटे अंकुर युक्त कंदों को अलग करके सीधे खेत या पॉलीबैग में लगाया जाता है। इससे पौधे तेजी से विकसित होते हैं तथा जीवित रहने की संभावना अधिक रहती है।
रोपाई का समय : सतावर की रोपाई सामान्यतः वर्षा ऋतु में की जाती है। जून से जुलाई का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। वर्षा ऋतु में मिट्टी में पर्याप्त नमी होने से पौधों का जमाव अच्छा होता है।
रोपाई की दूरी : अच्छे उत्पादन के लिए पौधों के बीच उचित दूरी रखना आवश्यक होता है। पौधे से पौधे एवं कतार से कतार की दूरी 60 सेमी रखी जाती है। इस दूरी पर पौधों को पर्याप्त पोषण, प्रकाश एवं वायु संचार मिलता है तथा जड़ों का विकास उत्तम होता है।
गड्ढों की तैयारी : रोपाई के लिए लगभग 4 से 5 इंच गहरे गड्ढे बनाएं। प्रत्येक गड्ढे में गोबर की सड़ी खाद या वर्मी कम्पोस्ट अच्छी तरह मिलाएं। जैविक खाद का उपयोग जड़ों की वृद्धि में सहायक होता है।
रोपाई : रोपाई करते समय पौधों को सावधानीपूर्वक नर्सरी से निकालना चाहिए, ताकि उनकी जड़ों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। तैयार गड्ढों में पौधों को सीधा लगाकर उनके चारों ओर मिट्टी अच्छी तरह दबा दी जाती है। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना आवश्यक होता है, जिससे पौधों की जड़ों का मिट्टी से अच्छा संपर्क बन सके और पौधों की स्थापना शीघ्र हो सके । सामान्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 42000 पौधों की आवश्यकता होती है।
सतावर में सहारा (ट्रोलिंग) प्रबंधन : सतावर एक आरोही औषधीय फसल है। इसकी बेलें सहारे के माध्यम से ऊपर की ओर बढ़ती हैं। इसलिए पौधों की अच्छी वृद्धि, स्वस्थ विकास तथा अधिक उत्पादन के लिए सहारा प्रबंधन आवश्यक होता है। यदि बेलों को उचित सहारा न मिले तो वे जमीन पर फैल जाती हैं, जिससे रोग एवं फफूंद का प्रकोप बढ़ सकता है । सहारा देने से पौधों को पर्याप्त धूप, वायु एवं स्थान मिलता है, जिससे बेलों का अच्छा फैलाव, जड़ों का बेहतर विकास होता है। रोपाई के लगभग 2–3 माह बाद जब बेलें बढ़ने लगें, तब सहारा देना शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए बांस, लकड़ी के डंडे, तार एवं जाली प्रणाली का उपयोग किया जाता है। आधुनिक ट्रोलिंग व्यवस्था में खेत में 2–3 मीटर की दूरी पर मजबूत खंभे लगाकर उनके बीच तार बांधे जाते हैं।
फसल सुरक्षा :
सतावर Asparagus racemosus की फसल में सामान्यतः रोग एवं कीटों का प्रकोप कम देखा जाता है, फिर भी उचित प्रबंधन न होने पर कुछ समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से जलभराव, अत्यधिक नमी तथा खेत में खरपतवार की अधिकता से जड़ सड़न एवं फफूंद जनित रोग बढ़ सकते हैं।
प्रमुख रोग एवं समस्याएं
- जड़ सड़न रोग
- फफूंद संक्रमण
- दीमक एवं मिट्टी के कीट
- अधिक नमी से पौध गलन
नियंत्रण उपाय
- खेत में उचित जल निकासी बनाए रखें।
- जलभराव की स्थिति न बनने दें।
- समय-समय पर निराई-गुड़ाई करें।
- रोगग्रस्त पौधों को तुरंत हटाएं।
- बीज एवं पौध उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग करें।
- नीम खली एवं जैविक कीटनाशकों का प्रयोग लाभकारी रहता है।
खुदाई का उपयुक्त समय :
सतावर Asparagus racemosus की जड़ों की खुदाई रोपाई के 18–24 माह बाद की जाती है । अधिक उत्पादन के लिए कुछ किसान 30–40 माह बाद खुदाई करते हैं। खुदाई के लिए अप्रैल–मई का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, जब फल पूरी तरह पक जाते हैं। खुदाई से पहले हल्की सिंचाई कर मिट्टी को नरम बना लेना चाहिए, ताकि कंदिल जड़ों को बिना नुकसान सावधानीपूर्वक निकाला जा सके। खुदाई के समय कुछ कंद जमीन में छोड़ देने से पुनः पौध विकास में सहायता मिलती है। निकाली गई जड़ों को साफ पानी से धोकर उनका बाहरी छिलका एवं कठोर रेशा हटाया जाता है। इसके बाद जड़ों को 4–6 इंच के समान छोटे टुकड़ों में काटकर हल्की धूप या छाया में सुखाया जाता है। सूखने के बाद जड़ों की मोटाई, लंबाई एवं गुणवत्ता के आधार पर ग्रेडिंग की जाती है। वैज्ञानिक तरीके से खुदाई एवं सुखाने पर जड़ों की गुणवत्ता, औषधीय गुण, भंडारण क्षमता तथा बाजार मूल्य बेहतर मिलता है।
भंडारण :
सतावर Asparagus racemosus की सूखी जड़ों का सही भंडारण करना अत्यंत आवश्यक होता है, ताकि उनकी गुणवत्ता, औषधीय गुण एवं बाजार मूल्य लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। यदि जड़ों में नमी रह जाती है तो उनमें फफूंद की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
भंडारण से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जड़ें पूरी तरह सूख चुकी हों। इसके बाद जड़ों की ग्रेडिंग कर साफ एवं समान आकार वाली जड़ों को अलग कर लेना चाहिए। सूखी जड़ों को नमी रहित, ठंडी एवं हवादार स्थान पर संग्रहित करना सबसे उपयुक्त माना जाता है।
भंडारण के लिए एयरटाइट बोरी, प्लास्टिक कंटेनर या बंद पैकिंग सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। जड़ों को सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए, बल्कि लकड़ी के तख्तों पर रखना बेहतर रहता है। समय-समय पर भंडारित सामग्री की जांच करते रहना चाहिए ताकि नमी, कीट या फफूंद का प्रकोप होने पर तुरंत नियंत्रण किया जा सके।
उचित भंडारण प्रबंधन से सतावर की जड़ों की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है तथा किसानों को बाजार में बेहतर कीमत प्राप्त होती है।
उत्पादन :
सतावर का उत्पादन भूमि की उर्वरता, पौध प्रबंधन, सिंचाई, पोषण तथा खेती की विधियों पर निर्भर करती है। यदि फसल की देखभाल सही तरीके से की जाए, तो किसान कम लागत में अच्छी गुणवत्ता की जड़ों का अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
सतावर की जड़ों की खुदाई रोपाई के 18 से 24 माह बाद की जाती है। इस अवधि में पौधों की कंदिल जड़ें पूरी तरह विकसित हो जाती हैं। व्यावसायिक खेती में एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 40 से 50 क्विंटल सूखी जड़ें प्राप्त हो सकती हैं। किसान वैज्ञानिक तकनीकों एवं जैविक प्रबंधन अपनाकर इससे अधिक उत्पादन भी प्राप्त कर सकते हैं।
सतावर की ताजी जड़ों में लगभग 85 से 90 प्रतिशत पानी होता है। इसलिए खुदाई के बाद सफाई, छिलाई एवं सुखाने की प्रक्रिया के बाद वजन काफी कम हो जाता है। लगभग 10 प्रतिशत भाग ही सूखी जड़ों के रूप में प्राप्त होता है।
प्रति हेक्टेयर अनुमानित लागत :
सतावर की खेती में शुरुआती लागत अपेक्षाकृत अधिक होती है, क्योंकि यह लंबी अवधि की फसल है। मुख्य खर्च खेत की तैयारी, पौध, जैविक खाद, सिंचाई एवं श्रम पर आता है।
| खर्च का विवरण | अनुमानित लागत (रु.) |
| खेत की तैयारी एवं जुताई | 15,000 – 20,000 |
| बीज/पौध सामग्री | 20,000 – 30,000 |
| गोबर खाद एवं जैविक खाद | 25,000 – 35,000 |
| रोपाई एवं श्रम | 15,000 – 20,000 |
| सिंचाई एवं देखभाल | 10,000 – 15,000 |
| सहारा (ट्रेलिस) व्यवस्था | 10,000 – 20,000 |
| अन्य खर्च | 10,000 – 15,000 |
कुल अनुमानित लागत :
लगभग ₹1.0 लाख से ₹1.5 लाख प्रति हेक्टेयर
उत्पादन एवं बिक्री :
सामान्यतः 18–24 माह की फसल से लगभग 40–50 क्विंटल सूखी जड़ें प्राप्त हो सकती हैं। बाजार में सतावर की सूखी जड़ों का मूल्य गुणवत्ता एवं मांग के अनुसार बदलता रहता है।
औसत बाजार मूल्य :
- ₹200 से ₹250 प्रति किलोग्राम
- उच्च गुणवत्ता एवं जैविक उत्पाद को अधिक कीमत मिल सकती है।
संभावित आय :
सकल आय=कुल उत्पादन×बाजार मूल्य प्रति किलोग्राम
यदि किसान को औसतन 45 क्विंटल सूखी जड़ें प्राप्त हों और औसत बाजार मूल्य ₹200 प्रति किलोग्राम मिले, तो— 4500×200 = 900000 Rs.
शुद्ध लाभ : सतावर Asparagus racemosus की खेती में यदि कुल लागत लगभग ₹1.5 लाख प्रति हेक्टेयर मानी जाए, तो औसतन ₹7.5 लाख तक का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है। उच्च गुणवत्ता, जैविक उत्पादन तथा बेहतर बाजार संपर्क होने पर किसानों को इससे और अधिक लाभ मिलने की संभावना रहती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
प्रश्न 1: सतावर की खेती के लिए कौन सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?
उत्तर : बलुई दोमट एवं अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी सतावर की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
प्रश्न 2 : सतावर की फसल कितने समय में तैयार होती है?
उत्तर : सतावर की जड़ों की खुदाई सामान्यतः 18 से 24 माह बाद की जाती है।
प्रश्न 3: सतावर की खेती में प्रति हेक्टेयर कितना उत्पादन मिलता है?
उत्तर : वैज्ञानिक खेती करने पर लगभग 40 से 50 क्विंटल सूखी जड़ें प्राप्त हो सकती हैं।
प्रश्न 4 : सतावर की खेती से कितना लाभ होता है?
उत्तर : एक हेक्टेयर से लगभग ₹7 से ₹8 लाख तक का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
प्रश्न 5 : सतावर की खेती के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?
उत्तर : जून से जुलाई का समय रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
यदि आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो, तो इसे अन्य किसान भाइयों के साथ जरूर साझा करें और खेती से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट khetikibaate.com नियमित पढ़ते रहें।

