मोटे अनाज का सुपरस्टार : ज्वार की उन्नत खेती
कम पानी, कम लागत और अधिक मुनाफा देने वाली ज्वार की खेती किसानों के लिए बेहतरीन विकल्प बन रही है। जानिए ज्वार की वैज्ञानिक खेती, उन्नत किस्में, खाद प्रबंधन, रोग नियंत्रण और प्रति हेक्टेयर ₹1.25 लाख तक लाभ कमाने के प्रभावी तरीके।
मौंसम का बदलता मिजाज, घटते जल संसाधन और बढ़ती खेती लागत के बीच किसानों के सामने फसलों का चयन एक बड़ी चुनौती बन गया है जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन, लाभ और भरपूर पोषण दे सकें। ऐसे में ज्वार एक महत्वपूर्ण लाभकारी फसल साबित हो सकती है। है। सूखा सहन करने की अद्भुत क्षमता, कम लागत में उत्पादन तथा दाने और हरे चारे दोनों के रूप में उपयोगिता के कारण ज्वार को किसानों की भरोसेमंद फसल माना जाता है।
श्रीअन्न ज्वार पोषण का उत्कृष्ट स्रोत है, जिसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम तथा एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं।ग्लूटेन-मुक्त होने के कारण यह मधुमेह, हृदय रोग और मोटापे के जोखिम को कम करने में सहायक माना जाता है तथा संतुलित पोषक आहार के लिए एक आदर्श अनाज है।
भारत के लगभग सभी राज्यों में ज्वार की खेती की जाती है, लेकिन कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसका विशेश महत्व है। बावजूद इसके, अधिकांश किसान अभी भी इसकी खेती पारंपरिक तरीकों से करते हैं, जिसके कारण संभावित उत्पादन का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप ज्वार की औसत उपज अन्य प्रमुख खाद्यान्न फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम बनी रहती है।
वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि यदि ज्वार की खेती उन्नत किस्मों, संतुलित पोशण प्रबंधन, उचित जल एवं खरपतवार नियंत्रण तथा वैज्ञानिक खेती तकनीकों के साथ की जाए तो इसकी उत्पादकता और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। आइए जानते हैं वे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपाय, जिनकी मदद से ज्वार की फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
मिट्टी का चुनाव :
ज्वार की खेती अच्छे जल निकास वाली किसी भी भूमि में की जा सकती है, लेकिन दोमट मिट्टी इसके लिए सर्वोंत्तम होती है। असिंचित क्षेत्रों में ज्वार की खेती अच्छी जल धारण क्षमता वाली भूमि में करना चाहिए। ज्वार की फसल में अम्लीय और क्षारीय लवणों को सहन करने की क्षमता होती है।
खेत की तैयारी :
खेत की तैयारी के लिए पहली जुताई मिट्टी पलट हल से करने के बाद हैरो या देशी हल चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा बना लेना चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर देना चाहिए। बुआई के समय खेत में किसी भी प्रकार के खरपतवार नही होने चाहिए।
प्रजातिया :
अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए हमेशा उन्नतशील एवं संकर प्रजातियों की ही बुआई करनी चाहिए। अधिक पैदावार के लिए निम्नलिखित प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए। मउ टा. 1, मउ टा. 2, वर्षा, सी.एस.वी. 1 सी.एस.वी. 2, सी.एस.वी. 3, सी.एस.वी.4, सी.एस.वी. 5, सी.एस.वी. 6, सी.एस.वी. 10, सी.एस.वी. 13 । संकर प्रजातिया- सी.एस.एच. 5, सी.एस.एच. 9, सी.एस.एच. 14, सी.एस.एच. 16 इत्यादि। इसके अतिरिक्त बहुत सी प्राईवेट कम्पनिया संकर बीज का उत्पादन कर बिक्री कर रही हैं। इन संस्थाओं के संकर बीज को खरीद कर बुआई की जा सकती है।
ज्वार की प्रमुख उन्नतशील एवं संकर प्रजातियाँ :
1. उन्नतशील (Varieties)
| प्रजाति | अवधि (दिन) | विशेषताएँ |
| CSV 15 | 110–120 | सूखा सहनशील, अच्छी उपज |
| CSV 17 | 105–115 | दाना एवं चारा दोनों के लिए उपयुक्त |
| CSV 20 | 110–120 | रोग प्रतिरोधी, उच्च उत्पादकता |
| CSV 23 | 115–125 | अच्छी दाना गुणवत्ता |
| CSV 27 | 100–110 | वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त |
| CSV 30F | 95–105 | शीघ्र पकने वाली, चारे हेतु भी उपयुक्त |
| M 35-1 (मालदांडी) | 120–130 | सूखा सहनशील, उत्तम दाना गुणवत्ता |
| SPV 2217 | 105–115 | उच्च उपज क्षमता |
2. संकर (Hybrid) प्रजातियाँ
| संकर प्रजाति | अवधि (दिन) | विशेषताएँ |
| CSH 14 | 105–110 | उच्च उपज, सूखा सहनशील |
| CSH 16 | 105–115 | दाना एवं चारा दोनों के लिए उपयुक्त |
| CSH 18 | 110–120 | अधिक उत्पादन क्षमता |
| CSH 23 | 100–110 | रोग एवं कीट प्रतिरोधी |
| CSH 25 | 105–115 | बेहतर दाना गुणवत्ता |
| CSH 30 | 95–105 | शीघ्र पकने वाली, उच्च उपज |
| CSH 35 | 100–110 | वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त |
| CSH 36 | 105–115 | अधिक दाना एवं चारा उत्पादन |
चारा हेतु लोकप्रिय ज्वार प्रजातियाँ
- CSV 21F
- CSV 30F
- HC 136
- HC 171
- PC 23
- SSG 59-3 (मल्टीकट)
उत्तर प्रदेश एवं पूर्वी भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए CSV 17, CSV 23, CSV 27, CSH 25 तथा CSH 30 विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती हैं।

बीज की मात्रा :
बीज दर बीज के प्रकार, बीज के आकार, अंकुरण प्रतिशत, बोने की विधि, बोने का समय एवं मिट्टी में नमी के प्रतिशत आदि पर निर्भर करती है। सामान्यतः एक हैक्टेयर खेत की बुआई के लिए 12-15 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। इस प्रकार एक बीघे खेत के लिए 3 से 3.5 किग्रा. बीज पर्याप्त रहता है।
बीजोपचार :
बीजों के अच्छे अंकुरण और फफूद जनित बीमारियों से बचाव के बीज शोधन आवश्यक होता है। इसके लिए थीरम या एग्रोसन जी.एन. नामक दवा 3 ग्राम प्रतिकिग्रा. बीज की दर से अच्छी तरह मिलाकर उपचारित करना चाहिए। दीमक के प्रकोप से बचाव के लिए प्रति किग्रा. बीज को 25 मिली लीटर क्लोरपाइरीफास से उपचारित करना चाहिए।
बोने का समय :
किसान भाई जून के आखिरी सप्ताह से बुआई का कार्य शुरू कर सकते हैं। लेकिन ज्वार के बुआई का सबसे उपयुक्त समय जुलाई का प्रथम सप्ताह होता है। बुआई में देरी करने से उपज में काफी कमी आ जाती है।
बोने की विधि :
आमतौर पर ज्वार की बुआई छिटकवा विधि से की जाती है जो पूरी तरह अनुचित और अवैज्ञानिक है। छिटकवा बुआई से फसल के उपज पर बहुत ही बुरा असर पडता है। अधिक पैदावार के लिए बुआई हमेशा लाइनों में करनी चाहिए। लाईन में बुआई के लिए देशी हल के पीछे कूड़ में या फिर सीडड्रिल व्दारा 3-4 सेमी. की गहराई में बुआई करनी चाहिए। लाइन से लाईन की दूरी 40 से 45 सेमी. तथा पौध से पौध की दूरी 15-20 सेमी. रखने से अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है।
विरलीकरण :
पौध से पौध के बीच उचित अंतर बनाये रखने के लिए विरलीकरण बहुत जरूरी होता है। पहला विरलीकरण का काम बुआई के 10-15 दिनों बाद तथा दूसरी बार 20-25 दिनों बाद विरलीकरण का काम करना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक :
ज्वार की फसल में गोबर या कम्पोष्ट की खाद 100 कुन्तल देना लाभकारी होता है। देषी खाद को खेत की तैयारी के समय अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए। संकर एवं उन्नत प्रजातियों के लिए 100-120 किग्रा. नाईट्रोजन, 50 किग्रा. फास्फोरस एवं 40 किग्रा. पोटाश देना चाहिए। नाईट्रोजन की आधी मात्रा फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय बीज से 3-5 सेमी. दूर व नीचे देना चाहिए। यदि उचित दूरी व गहराई पर उर्वरक देने की सुविधा न हो तो इन उर्वरकों का मिश्रण बनाकर अन्तिम जुताई से पूर्व खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए। षेश नाईट्रोजन की मात्रा को बुआई के 30-35 दिन बाद पौधों को विरलीकरण करते समय दो लाइनों के बीच में टापड्रेसिंग करना चाहिए। असिंचित दषा में इन उर्वरकों की मात्रा को घटाकर आधी कर देनी चाहिए तथा उर्वरकों की पूरी मात्रा को बुआई के समय ही दे देना चाहिए। इन रासायनिक उर्वरकों की पूर्ति यूरिया, फास्फेट एवं म्यूरेट आफ पोटाश से की जा सकती है।

सिंचाई : सामान्यतः ज्वार की खेती बारानी क्षेत्रों में वर्षा आधारित की जाती है। लेकिन उन्नतषील और संकर प्रजातियों से अधिक उत्पादन लेने के लिए समय से वर्षा न होने पर सिंचाई करना आवष्यक होता है। ज्वार की फसल में बाल निकलते समय और दाना भरते समय सिंचाई अवष्य करनी चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण : फसल में खरपतवारों का उचित नियंत्रण न होने से उपज में 20 से 60 फीसदी तक कमी हो जाती है। अतः खेत से खरपतवारों को निकालने के लिए बुआई के 3 सप्ताह बाद निकाई-गुड़ाई करके खरपतवारों को निकाल देना चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए एट्राजीन दवा की 2 किग्रा. मात्रा को लगभग 800 लीटर पानी में घोल बना कर बुआई के तुरन्त बाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। खेत में दवा छिड़कते समय पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
रोग तथा कीट नियंत्रण : ज्वार की फसल को रोग व कीट से काफी नुकसान होता है। अतः अधिक उपज लेने के लिए समय से रोग और कीट नियंत्रण के उपाय करना आवष्यक होता है।
दाने का कडुआ रोग : यह ज्वार की फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुचाने वाली बीमारी है। इसका प्रकोप फसल में भुट्टा निकलते समय होता है। पौधों में भुट्टों के लगने पर दानों की जगह कवक के काले बीजाणु भर जाते हैं। यह बीज जनित बीमारी है। इसलिए बीज को बोने से पूर्व थीरम या एग्रोसन जी.एन. नामक दवा से 3 ग्राम प्रतिकिग्रा. बीज की दर से अवष्य उपचारित कर लेना चाहिए।
अर्गट रोग : इस बीमारी का प्रकोप संकर ज्वार में अधिक होता है। इसका प्रकोप पौधों में फूल आते समय होता है। पुष्प शाखा पर स्थित स्पाईका से चिपचिपा, गुलाबी रंग का मीठा स्राव निकलने लगता है। संक्रमित पौधों के नीचे खेत में सफेद धब्बे दिखाई पड़तें हैं जो पौधे तरल प्रदार्थ गिरने के कारण बनते हैं। रोग ग्रसित पौधों को काटकर जला देना चाहिए। बीज को थीरम या एग्रोसन से उपचारित कर बोना चाहिए। षीघ्र पकने वाली प्रजातियों की बुआई करनी चाहिए।
ज्वार का किट्ट :
ज्वार की यह बीमारी पौधे की किसी भी अवस्था में लग सकती है। लेकिन बालिया आते समय या उसके बाद यह बीमारी अधिक लगती है। पहले पौधे की निचली पत्तियों पर रोग का असर दिखता है, फिर उसके बाद उपर की तरफ बढ़ता है। पत्तियों पर लाल या बैंगनी रंग के धब्बे पड़ते हैं। तत्पष्चात पत्तिया समय से पहले सूख जाती हैं। इसके रोक थाम के लिए 30 किग्रा. गंधक का चूर्ण प्रति हैक्टेयर की दर से बुरकाव करना चहिए।
तना मक्खी : यह कीट फसल की प्रारम्भिक अवस्था में हॅानि पहुचाता है। सूड़िया पहले तने में छेद करती है। बाद में मुख्य तने को काट देती हैं। इस कीट का प्रकोप बादल घिरे होने पर अधिक होता है। मोनोक्रोटोफास दवा की एक लीटर मात्रा को लगभग 800 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।
ईयर हेड मिज : यह लाल रंग का प्रौढ़ कीट होता है। यह कच्ची बालियों में दाने से रस चूसता है जिससे दाने सूख जाते हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए इण्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.5 लीटर को लगभग 800 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।

कटाई एवं मड़ाई : देशी जातिया 80-85 दिन व संकर प्रजातिया 120-125 दिन में पक कर तैयार हो जाती हैं। चारे के लिए तैयार की गई फसल फूल आने पर 60-65 दिन में काटने योग्य तैयार हा जाती है। फसल पकने पर भुट्टे के हरे दाने, सफेद या हल्के पीले हो जाते हैं। दानों में नमी जब 25 प्रतिशत रह जाय तो भुट्टों की कटाई कर लेनी चाहिए। भुट्टों की मड़ाई बैंलों या थ्रेसर से करके दानों को अच्छी तरह सुख लेना चाहिए। भण्डारण करते समय अनाज में 12 प्रतिशत से अधिक नमी नही रहनी चाहिए।
उत्पादन : उचित सस्य क्रियायें अपनाने पर संकर प्रजातियों से 35-40 उन्नत प्रजातियों 15-30 कुन्तल कुन्तल/हेक्टेयर उत्पादन होता है। चारे के लिए कड़बी की उपज 100-150 कुन्तल /हेक्टेयर तक प्राप्त होती है। ज्वार की फसल को चारे के रूप में प्रयोग करने में सावधानी बर्तनी चाहिए। पौधों की छोटी अवस्था में एक घातक तत्व पाया जाता है, जो पषुओं के स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है। इस अवस्था में अधिक चारा खिलाने से पषु की मृत्यु भी हो जाती है। ज्वार को छोटी अवस्था में चारे के लिए प्रयोग में नही लाना चाहिए। लेकिन फसल की अवधि बढ़ने, सिंचाई करने एवं वर्षा होने से हानिकारक तत्व धीरे-धीरे कम होता चला जाता है।
ज्वार की खेती का प्रति हेक्टेयर आय एवं व्यय का अनुमानित विवरण
नोट: यह विवरण सामान्य परिस्थितियों एवं वैज्ञानिक खेती पद्धति पर आधारित अनुमान है। वास्तविक लागत एवं आय क्षेत्र, किस्म, उत्पादन स्तर तथा बाजार भाव के अनुसार घट -बढ़ सकती है।
| मद | अनुमानित लागत (रु.) |
| भूमि तैयारी (जुताई, पाटा आदि) | 8,000 |
| उन्नत बीज (10–12 किग्रा) | 2,500 |
| बीज उपचार एवं बुवाई | 2,000 |
| गोबर की खाद/जैविक खाद | 5,000 |
| उर्वरक (NPK) | 8,500 |
| खरपतवार नियंत्रण | 3,500 |
| सिंचाई एवं जल प्रबंधन | 3,000 |
| कीट एवं रोग नियंत्रण | 2,500 |
| मजदूरी (निराई-गुड़ाई आदि) | 6,000 |
| कटाई, मड़ाई एवं परिवहन | 7,000 |
| कुल अनुमानित लागत | 48,000 |
उत्पादन एवं आय
| विवरण | मात्रा |
| औसत दाना उत्पादन | 45 क्विंटल/हेक्टेयर |
| हरा/सूखा चारा उत्पादन | 100 क्विंटल/हेक्टेयर |
| ज्वार का औसत बाजार भाव | ₹3,200/क्विंटल |
| चारे का औसत मूल्य | ₹300/क्विंटल |
सकल आय
- दाना बिक्री से आय = 45 × 3,200 = ₹1,44,000
- चारा बिक्री से आय = 100 × 300 = ₹30,000
कुल सकल आय = ₹1,74,000 प्रति हेक्टेयर
शुद्ध लाभ
| विवरण | राशि (रु.) |
| कुल सकल आय | 1,74,000 |
| कुल लागत | 48,000 |
| शुद्ध लाभ | 1,26,000 |
लाभ-लागत अनुपात (B:C Ratio)
1 : 3.6
अर्थात् ज्वार की वैज्ञानिक खेती में लगाए गए प्रत्येक ₹1 पर लगभग ₹3.6 का प्रतिफल प्राप्त हो सकता है।
निष्कर्ष
उन्नत किस्मों, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर बुवाई तथा कीट-रोग नियंत्रण अपनाकर किसान ज्वार की खेती से प्रति हेक्टेयर लगभग ₹1.20 से 1.30 लाख तक शुद्ध लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यदि दाने के साथ चारे का भी उचित विपणन किया जाए तो लाभ और अधिक बढ़ सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) – ज्वार की वैज्ञानिक खेती
Q1. ज्वार की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी कौन-सी है?
उत्तर: ज्वार की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है। यह फसल हल्की अम्लीय और क्षारीय मिट्टी में भी अच्छी तरह बढ़ सकती है।
Q2. ज्वार की बुवाई का सही समय क्या है?
उत्तर: ज्वार की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय जुलाई का प्रथम सप्ताह होता है। अधिक देरी करने से उत्पादन में कमी आ सकती है।
Q3. एक हेक्टेयर में ज्वार के लिए कितनी बीज मात्रा लगती है?
उत्तर: सामान्यतः एक हेक्टेयर खेत के लिए 12–15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।
Q4. ज्वार की अधिक उपज देने वाली उन्नत किस्में कौन-सी हैं?
उत्तर: मऊ टा. 1, मऊ टा. 2, CSV सीरीज (CSV 1 से CSV 15) तथा संकर किस्में जैसे CSH 5, CSH 9, CSH 14, CSH 16 आदि अधिक उपज देने वाली किस्में हैं।
Q5. ज्वार की फसल से प्रति हेक्टेयर कितना उत्पादन मिल सकता है?
उत्तर: उन्नत खेती तकनीक अपनाने पर 30–40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दाना तथा 100–150 क्विंटल तक चारा प्राप्त हो सकता है।
Q6. ज्वार की फसल में कितनी खाद एवं उर्वरक डालनी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः 100–120 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फॉस्फोरस और 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देना लाभकारी होता है।
Q7. क्या ज्वार की खेती कम पानी में की जा सकती है?
उत्तर: हाँ, ज्वार सूखा सहन करने वाली फसल है और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह उगाई जा सकती है।
Q8. ज्वार की फसल से औसतन कितना लाभ होता है?
उत्तर: वैज्ञानिक खेती अपनाने पर प्रति हेक्टेयर लगभग ₹1.20 लाख से ₹1.30 लाख तक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
Q9. ज्वार में सबसे खतरनाक रोग कौन-सा है?
उत्तर: दाने का कड़ुआ रोग (Karnal Bunt/Smutt type) ज्वार की सबसे हानिकारक बीमारियों में से एक है, जो उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
Q10. ज्वार की कटाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: जब दानों में लगभग 25% नमी रह जाए और दाने हल्के पीले या सफेद हो जाएं, तब फसल की कटाई करनी चाहिए।
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