अश्वगंधा की वैज्ञानिक खेती : कम लागत में अधिक लाभ देने वाली औषधीय फसल
अश्वगंधा की वैज्ञानिक खेती की पूरी जानकारी । उन्नत किस्में, बुवाई, खाद, सिंचाई, उत्पादन, बाजार भाव, लागत, आय एवं लाभ का विस्तृत विवरण।
आज के दौर में हमारे देश की कृषि अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। बढ़ती उत्पादन लागत, जलवायु परिवर्तन, सीमित जल संसाधन तथा पारंपरिक फसलों में घटता मुनाफा ने किसानों को नई संभावनाओं की तलाश के लिए प्रेरित कर रहा है। ऐसे समय में औषधीय एवं सुगंधित फसलों की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है। इन फसलों में अश्वगंधा एक ऐसी बहुमूल्य औषधीय फसल है, जिसकी मांग देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी खूब है। इस फसल की विशेष बात यह है कि अश्वगंधा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है । इसकी खेती में अपेक्षाकृत कम सिंचाई] कम उर्वरक और कम लागत की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि यह छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए भी एक लाभदायक नकदी फसल के रूप में उभर रही है। इसकी खेती मुख्यतः महाराष्ट्रए राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब के साथ अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर की जाती है ।
फसल का महत्व :
अश्वगंधा (Withania somnifera) को आयुर्वेद में विशेष स्थान प्राप्त है। इसे “भारतीय जिनसेंग”, “विंटर चेरी” तथा “शक्ति एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली औषधि” के रूप में जाना जाता है। इसकी जड़ों, पत्तियों और बीजों में पाए जाने वाले जैव सक्रिय तत्व अनेक आयुर्वेदिक, यूनानी तथा हर्बल औषधियों के निर्माण में उपयोग किए जाते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, तनाव कम करने, ऊर्जा एवं कार्यक्षमता में वृद्धि करने तथा विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में इसका व्यापक उपयोग होता है।
भारत विश्व में अश्वगंधा उत्पादन का प्रमुख केंद्र है। आयुर्वेदिक दवाओं] स्वास्थ्य पूरकों (Health Supplements) और प्राकृतिक चिकित्सा उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण इसकी खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यदि किसान अश्वगंधा की खेती वैज्ञानिक तकनीकों, उन्नत किस्मों और उचित प्रबंधन के साथ करने से कम समय में अच्छा उत्पादन और लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
इस लेख में अश्वगंधा की वैज्ञानिक खेती से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे- उपयुक्त जलवायु, भूमि चयन, उन्नत किस्में, बीज एवं बुवाई, पोषण प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, रोग एवं कीट प्रबंधन, कटाई तथा विपणन की विस्तृत जानकारी देने का पूरा प्रयास किया गया है ताकि किसान इस औषधीय फसल से अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकें।
जलवायु एवं तापमान :
अश्वगंधा की खेती के लिए उष्ण एवं अर्ध-शुष्क जलवायु सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। यह फसल 500&600 मिमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी होती है। बीजों के अंकुरण के लिए 20–25°C तापमान उपयुक्त रहता है, जबकि पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए 25–32°C तापमान सर्वोत्तम माना जाता है। फसल के पकने के समय शुष्क मौसम अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक उत्पादन में सहायक होता है। इसकी फसल अत्यधिक नमी और जलभराव को सहन नहीं कर पाती, इसलिए वर्षा वाले क्षेत्रों में खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था करना आवश्यक है।
उपयुक्त भूमि :
अश्वगंधा की खेती हल्की बलुई तथा बलुई-दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है। अच्छी जल निकास वाली भूमि में जड़ों का विकास अच्छा होता है। इसकी खेती के लिए भूमि का पीएच मान 7.0 से 8.0 के बीच होना चाहिए। शोध बताते है कि लवणीय मृदा में खेती करने तथा लवणीय जल से सिंचाई करने पर अश्वगंधा की जड़ों में एल्केलॉइड्स की मात्रा में वृद्धि हो सकती है।
खेत की तैयारी :
अश्वगंधा की अच्छी वृद्धि जड़ों के समुचित विकास तथा अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए खेत की अच्छी तैयारी करना अत्यंत आवश्यक होता है। अच्छी तरह तैयार, भुरभुरी तथा जल निकासयुक्त खेत अश्वगंधा की सफल खेती के लिए आदर्श माना जाता है। इसके लिए –
o सबसे पहले खेत को मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करके छोड दें।
o इसके बाद 2 -3 बार कल्टीवेटर या देशी हल चलाकर मिट्टी भुरभुरी बनाएं।
o खेत से खरपतवार एवं पुराने अवशेष निकाल दें।
o अंतिम जुताई के समय 8 – 10 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं।
o जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ उसकी जलधारण क्षमता एवं सूक्ष्मजीव गतिविधियों को बढाती है।
o यदि खेत में दीमक या भूमि जनित रोगों की समस्या हो तो नीम खली का प्रयोग लाभकारी रहता है।
o नीम की खली के इस्तेमाल करने से भूमि में उपस्थित हानिकारक कीट व बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं।
उन्नत किस्में :
अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक उत्पादन के लिए उन्नत प्रजातियों का चयन आवश्यक है। अश्वगंधा की व्यावसायिक खेती के लिए प्रमुख उन्नत प्रजातियाँ हैं।
- जवाहर अश्वगंधा-20
- पोषिता
- डब्ल्यूएस-90
- डब्ल्यूएस-100
- अश्वगंधा-134
- नागौरी
नोट: इन किस्मों में जड़ों की गुणवत्ता अच्छी होती है तथा बाजार मूल्य भी अधिक मिलता है।

पौधशाला में पौध की तैयारी :
अश्वगंधा की फसल की सीधी बुवाई भी किया जा सकता है] लेकिन अच्छा उत्पादन एवं निर्यात के लिए गुणवत्ता वाली जड़ों की पौधशाला में पौध तैयार करके बुवाई करना अच्छा होता है। बुवाई से पहले बीज को पानी में भिगोकर 24 घंटे के लिए छोड़ दिया जाता है। खराब एवं पानी के ऊपर तैरने वाले बीजों को अलग कर लेना चाहिए। बीज को थायरम 4 – 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। पानी से भीगे बीज को अंकुरण पूर्व तैयार पौधशाला में बुवाई कर मिट्टी से ढक देना चाहिए। पौधे तैयार करने समय गर्म एवं नमी युक्त खाद इस्तेमाल करने से बीजों का अंकुरण अच्छा होता है। इस तरह से पौधशाला में 35 से 40 दिन के अंदर पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
फसल की बुवाई :
अश्वगंधा की अच्छी फसल के लिए पौधे से पौधे की दूरी 5 से 10 सेमी तथा लाइन से लाइन की दूरी 20 से 25 सेमी रखना चाहिए। अश्वगंधा की खेती बीज को सीधे खेत में बुवाई करके या पौधशाला में पौधे तैयार करके दोनों तरह से किया जा सकता है। खेत में पौधे की रोपाई 12 से 15 सेमी. होने पर करनी चाहिए। इस तरह एक हेक्टेयर भूमि में लगभग अश्वगंधा के 2 से 3 लाख पौधों की रोपाई की जा सकती है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन :
अश्वगंधा की खेती में जैविक खाद या गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग बहुत महत्व पूर्ण होता है। रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल रोगों को बढ़ावा देता है। अमोनियम नाइट्रेट एवं जिंक फॉस्फेट के प्रयोग करने से जड़ों का विकास अच्छा होता है। अश्वगंधा औषधीय फसल है, इसलिए रासायनिक उर्वरकों का उपयोग अधिक नही करना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक की मात्रा :
o गोबर की सड़ी खाद 4 – 5 टन प्रति एकड़
o वर्मी कम्पोस्ट 1 – 2 टन प्रति एकड़
रासायनिक उर्वरक :
o नत्रजन : 8 -12 किग्रा प्रति एकड़
o फास्फोरस : 12-16 किग्रा प्रति एकड़
o पोटाश : 8-12 किग्रा प्रति प्रति एकड़
नत्रजन की अधिक मात्रा देने से जड़ों की गुणवत्ता घट सकती है] इसलिए संतुलित उर्वरक प्रबंधन करना अति आवश्यक है।

सिंचाई एवं जल-प्रबंधन :
अश्वगंधा कम पानी वाली फसल है। इसकी खेती सिंचित व असिंचित दोनों परिस्थितियों में की जा सकती है। पौधे के जड़ों तक मिट्टी में नमी बनी रहे] लेकिन खेत में पानी कभी नहीं लगना चाहिए। ज्यादा जलभराव पर पौधे की जड़ों के सड़ने की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। चूँकि अश्वगंधा बरसात की फसल है, इसलिए समुचित जल-प्रबंधन के उपाय करना आवश्यक होता है।
सिंचाई के मुख्य अवस्थाएं :
o अंकुरण के समय हल्की नमी आवश्यक है।
o खेत में जलभराव बिल्कुल नहीं होना चाहिए।
o आवश्यकता अनुसार 1&2 हल्की सिंचाई पर्याप्त होती हैं।
o अत्यधिक सिंचाई से जड़ सड़न रोग बढ़ सकता है।
खरपतवार नियंत्रण :
फसल के शुरुआती चरण में खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक होता है। खरपतवार नियंत्रण से पौधों की वृद्धि अच्छी होती है तथा जड़ों का विकास बेहतर होता है। यदि अश्वगंधा की बढ़ी फसल में ज्यादा खर-पतवार दिखाई देते हो तो उसके नियंत्रण के लिए आइसोप्रोटयूरॉन का छिड़काव करना चाहिए।
निराई एवं गुड़ाई :
जड़ों की अच्छी वृद्धि विकास के लिए पौधे की रोपाई करने के 20 से 25 दिन बाद हल्की गुड़ाई करना चाहिए। ऐसा करने से पौधों की अच्छी बढ़त होती है तथा जड़ों को जमीन के अंदर गहराई तक बढ़ने में मदद मिलती है।
o बुवाई के 20 – 25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें।
o आवश्यकता अनुसार दूसरी निराई 45 दिन बाद करें।
फसल सुरक्षा : रोग एवं कीट प्रबंधन
यह एक औषधीय फसल है। इसलिए अश्वगंधा में रोग एवं कीट का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है। रोग व कीट नियंत्रण के लिए कम से कम रसायनों का प्रयोग करना चाहिए। इनके नियंत्रण के लिए जैविक नियंत्रण ही प्रमुख रूप से अपनाना चाहिए। माहू की रोकथाम के लिए मिथाइल ऑक्सी-डीमेटान 25 ई.सी. दवा की 2 मिली मात्रा को एक लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। फसल में जड़ गलन के लिए फसल की हल्की-गुड़ाई करके कुछ दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए। अश्वगंधा की फसल में पूर्ण-बढ़वार होने पर पौधशाला की बुवाई के पहले बीज को बाविस्टिन की 4 से 5 ग्राम की मात्रा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
फसल की परिपक्वता एवं खुदाई :
अश्वगंधा की फसल लगभग 160 – 180 दिन में परिपक्व होकर खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लगें एवं फल लाल हो जाएँ] तब खुदाई करनी चाहिए।
खुदाई की विधि :
· पौधों को जड़ सहित उखाड़ें।
· जड़ों को पौधों से अलग करें।
· साफ पानी से धोकर मिट्टी हटाएँ।
· जड़ों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर धूप में सुखाया जाता है।
कटाई उपरांत प्रसंस्करण :
अश्वगंधा की प्रसंस्करण सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है] क्योंकि उनकी गुणवत्ता का निर्धारण करता है। प्रसंस्करण के लिए स्थान साफ एवं सुरक्षित होना चाहिए। इसके लिए जड़ों को अच्छी तरह धोकर साफ करने के बाद छिलका हटाकर उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर सुखाकर प्रसंस्करण यंत्र में डालना चाहिए। अश्वगंधा की जड़ों का मूल्य उनकी मोटाई एवं लंबाई के आधार पर तय होता है। अच्छी ग्रेड की जड़ों का बाजार मूल्य अधिक मिलता है। ध्यान रहे कि प्रसंस्करण के समय जड़ों में नमी 10&12 से अधिक नहीं होनी चाहिए। जड़ों के टुकड़े और बीज को सुरक्षित जगह पर जहाँ नमी न हो भण्डारण करना चाहिए।
रासायनिक तत्वों का विश्लेषण :
अश्वगंधा की जड़ों में कई प्रकार के एल्केलॉइड्स पाए जाते हैं, जिसमें सोमनीन, विथानिन, विथेनोलाइड्स, विथाफेरिन तथा निकोटिनाइल ग्लूकोसाइड प्रमुख हैं।
जड़ों के उपयोगिता :
इसकी जड़ों से दुर्बलता,कमजोरी, तपेदिक, ज्वर, गठिया, नपुंसकता, उदर विकार, मस्तिष्क की थकान, मांसपेशियों की सूजन, मांसपेशियों की थकान, प्रसूता स्त्रियों में कमजोरी में बनी औषधियाँ रामबाण का काम करती हैं।
पत्तियों की उपयोगिता :
इसकी पत्तियों को उपयोग रस-तरल की औषधि में किया जाता है। अश्वगंधा की पत्तियाँ जोड़ों की सूजन की दूर करने व त्वचा रोग के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं।
उत्पादन : बीज की गुणवत्ता] मिट्टी, जलवायु एवं वैज्ञानिक प्रबंधन पर निर्भर करता है। इस तरह से तैयार फसल से सूखी जड़ों का उत्पादन 5 – 6 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो जाता है।
o सूखी जड़ों का उत्पादन : 5 – 6 क्विंटल प्रति एकड़
o बीज उत्पादन : 40 – 60 किलो प्रति एकड़
बाजार भाव : वर्तमान समय (2026) में अश्वगंधा की सूखी जड़ों का औसत थोक बाजार मूल्य ₹150–250 प्रति किलोग्राम के बीच चल रहा है। देश की प्रमुख मंडियों जैसे नीमच, मंदसौर, सीहोर एवं विदिशा (मध्य प्रदेश) में हाल के भाव लगभग ₹155–180 प्रति किलोग्राम दर्ज किए गए हैं।
उच्च गुणवत्ता, मोटी जड़, कम नमी तथा अच्छी ग्रेडिंग वाली अश्वगंधा को ₹250–400 प्रति किलोग्राम तक मूल्य मिल सकता है, जबकि जैविक (Organic) एवं निर्यात गुणवत्ता की जड़ों का मूल्य इससे भी अधिक हो सकता है।

वर्तमान बाजार भाव (अनुमानित)
| गुणवत्ता | मूल्य ₹/ किग्रा |
| सामान्य मंडी गुणवत्ता | 150–200 |
| अच्छी ग्रेडिंग वाली जड़ | 200–300 |
| प्रीमियम/ऑर्गेनिक गुणवत्ता | 300–500+ |
| निर्यात गुणवत्ता (विशेष अनुबंध) | 500–1200 |
ध्यान देने की बात यह है कि अश्वगंधा का भाव जड़ों की मोटाई, एल्केलॉइड्स की मात्रा, नमी प्रतिशत, ग्रेडिंग, मांग तथा बिक्री के माध्यम (मंडी, व्यापारी, प्रोसेस और निर्यात) पर निर्भर करता है। कई बार सीधे आयुर्वेदिक कंपनियों या प्रोसेसिंग इकाइयों को बेचने पर किसानों को मंडी की तुलना में बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।
अश्वगंधा की खेती का प्रति एकड़ आय एवं व्यय का विवरण :
अश्वगंधा एक कम लागत वाली औषधीय फसल है, जिसकी खेती से किसानों को अच्छी आय प्राप्त हो सकती है। उत्पादन, बाजार मूल्य एवं प्रबंधन के आधार पर लाभ में अंतर हो सकता है। नीचे प्रति एकड़ खेती का एक अनुमानित आर्थिक विश्लेषण दिया गया है।
प्रति एकड़ लागत (व्यय)
| प्रति एकड़ उत्पादन : | औसत उत्पादन | ||
| सूखी जड़ें | 5-6 क्विंटल | ||
| बीज | 40–60 किलोग्राम | ||
प्रति एकड़ आय : यदि सूखी जड़ों का औसत बाजार मूल्य ₹180–250 प्रति किलोग्राम माना जाए, तो—
| विवरण | राशि (₹) | ||
| 500-600 किग्रा सूखी जड़ × ₹180-250/किग्रा | 80000 – 1,50000 | ||
| 50 किग्रा बीज × ₹120/किग्रा | 6,000 | ||
| कुल सकल आय | 80,000 से 1.50 लाख | ||
शुद्ध लाभ = 80,000 से 1.50 लाख – कुल लागत 26,000
कुल शुद्ध लाभ = 54,000 से 1.24 लाख रुपये
उन्नत खेती में संभावित लाभ :
यदि अच्छी गुणवत्ता के बीज, वैज्ञानिक प्रबंधन तथा उचित बाजार उपलब्ध हो, तो सूखी जड़ों का उत्पादन 5–6 क्विंटल प्रति एकड़ तथा बिक्री मूल्य ₹180–250 प्रति किलोग्राम तक प्राप्त हो सकता है। ऐसी स्थिति में प्रति एकड़ 80,000 से 1.50 लाख रुपये तक की सकल आयतथा54,000 से 1.24 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
अश्वगंधा की खेती की कुछ ध्यान देने वाली खास बातें ।
- उचित भूमि का चयन करें – अश्वगंधा की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली बलुई-दोमट या हल्की दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। मिट्टी का pH मान 7.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए।
- जलभराव से बचाव करें – खेत में किसी भी स्थिति में पानी नहीं रुकना चाहिए। जलभराव से जड़ों में सड़न की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
- समय पर बुवाई करें – अधिक उत्पादन एवं अच्छी गुणवत्ता वाली जड़ों के लिए बुवाई अगस्त के अंतिम सप्ताह से सितंबर के प्रथम सप्ताह के बीच करना उपयुक्त रहता है।
- उन्नत एवं प्रमाणित बीज का चयन करें – उच्च उपज और गुणवत्तायुक्त जड़ों के उत्पादन के लिए केवल उन्नत एवं प्रमाणित प्रजातियों के बीजों का ही प्रयोग करें।
- संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाएँ – अच्छी जड़ वृद्धि एवं औषधीय गुणों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जैविक खाद तथा आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करें।
- खाद एवं उर्वरकों का विवेकपूर्ण प्रयोग करें – अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जड़ों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें – फसल के प्रारंभिक विकास काल में खरपतवारों की नियमित निगरानी एवं समय पर नियंत्रण आवश्यक है।
- जैविक खेती को प्राथमिकता दें – जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट तथा जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा दें, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों बढ़ते हैं।
- सिंचाई का उचित प्रबंधन करें – आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने से जड़ों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- कटाई सही समय पर करें – जड़ों में अधिकतम औषधीय तत्व प्राप्त करने के लिए फसल की कटाई पूर्ण परिपक्वता पर ही करें।
- जड़ों की खुदाई एवं सुखाने में सावधानी बरतें – खुदाई के समय जड़ों को क्षति न पहुँचने दें तथा खुदाई के बाद उन्हें छाया में अच्छी तरह सुखाकर ही भंडारण करें।
निष्कर्ष :
अश्वगंधा एक महत्वपूर्ण औषधीय एवं कम लागत वाली नकदी फसल है, जिसकी मांग देश और विदेश दोनों बाजारों में लगातार बढ़ रही है। यह फसल कम पानी, कम उर्वरक तथा सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। यदि किसान उपयुक्त भूमि का चयन, उन्नत किस्मों का उपयोग, संतुलित पोषण प्रबंधन, समय पर खरपतवार नियंत्रण तथा उचित कटाई एवं प्रसंस्करण जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाएँ, तो अच्छी गुणवत्ता की जड़ों का उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. अश्वगंधा की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी कौन सी है?
उत्तर: अच्छी जल निकासी वाली बलुई-दोमट या हल्की दोमट मिट्टी, जिसका pH 7.0 से 8.0 के बीच हो, सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
Q2. अश्वगंधा की बुवाई का सही समय क्या है?
उत्तर: अगस्त के अंतिम सप्ताह से सितंबर के प्रथम सप्ताह तक बुवाई करना सबसे उपयुक्त रहता है।
Q3. अश्वगंधा की फसल कितने दिनों में तैयार हो जाती है?
उत्तर: सामान्यतः फसल 160 से 180 दिनों में परिपक्व होकर खुदाई के लिए तैयार हो जाती है।
Q4. प्रति एकड़ अश्वगंधा का कितना उत्पादन मिलता है?
उत्तर: वैज्ञानिक खेती अपनाने पर 5 से 6 क्विंटल सूखी जड़ तथा 40 से 60 किलोग्राम बीज का उत्पादन प्राप्त हो सकता है।
Q5. अश्वगंधा की खेती में प्रति एकड़ कितना लाभ होता है?
उत्तर: उत्पादन एवं बाजार मूल्य के आधार पर लगभग ₹54,000 से ₹1.24 लाख प्रति एकड़ तक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
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