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जायद में सूरजमुखी की फसल की देखभाल कैसे करें ?

जानें सूरजमुखी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी—खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, रोग-कीट नियंत्रण, कटाई, मड़ाई, उपज और लाभ।

तिलहनों की बढ़ती कीमतें और बदलते मौंसम के चलते किसान सूरजमुखी की खेती की ओर अग्रसर हुए है। सूरजमुखी एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। किसान इसे नकदी फसल के रूप में उगाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान जायद मौंसम में सूरजमुखी की खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। अब तो, भारत सरकार भी खाद्य तेलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘राष्ट्रीय तिलहन मिशन‘ के तहत किसानों को वित्तीय और तकनीकी सहायता भी प्रदान करती हैं। तो आइए बात करते हैं सूरजमुखी की फसल की देखभाल के बारे में किसान भाई किन-किन खास बातों को ध्यान में रखें, ताकि बेहतर उत्पादन और अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सके। 

खरपतवार नियंत्रण : अधिकतर किसान सूरजमुखी की फसल की बुआई का काम पूरा कर चुके होंगे। खड़ी फसल में बुआई 4 से 6 सप्ताह तक खरपतवारांे से  बहुत अधिक हानि पहुॅचती है। इस दौरान फसल को खरपतवारों से बचाना बहुत जरूरी होता हैं। इसके लिए किसान भाई 15 से 20 दिन के अंतर पर 2 से 3 बार निकाई और गुड़ाई करके खेत से सभी तरह के खरपतवारों को निकालने का काम करें। इसके लिए खुरपी या हैण्ड हो का प्रयोग कर सकते है। खेत में  निकाई-गुड़ाई करने से मिट्टी में वायु संचार बढ़ता है जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है और पौधों का विकास अच्छा होता है। खड़ी फसल में रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए एमेजा मेथा बेन्ज खरपतवारनाशी की 75 से 100 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से  700 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर पौधे की 4 से 8  पत्ती की अवस्था पर छिड़काव करने से खरपतवारों की रोकथाम हो जाती है। इसके अतिरिक्त वासालिन 45 ईसी की 1 लीटर मात्रा को 500 से 600 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के समय अथवा बीज में अंकुरण से पूर्व खेत में प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। या फिर पेण्डामिथिलीन दवा की 3 लीटर की मात्रा को 500 -600 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत में अंकुरण से पूर्व छिड़काव करने  से खरपतवारों की रोकथाम हो जाती है। 

सिंचाई : आमूमन जायद में सूरजमुखी की फसल को 8-10 सिंचाईयों की  आवश्यता  होती हैं। किसान भाई जल्दी-जल्दी सिंचाई करने से बचें, क्योंकि इससे जडों के सड़ने और पौाधों के मुरझाने का खतरा बढ़ जाता है। भारी मिट्टी में 15-20 दिनों के अंतराल पर एवं  हल्की मिट्टी में 8-10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जरूरत पड़ती है। फसल में सिंचाई का उपयुक्त समय जानने के लिए जब पौधे मुरझाने लगे तो फसल में हल्की सिंचाई का काम करें। सूरजमुखी की फसल की कुछ क्रांतिक अवस्थाएं होती हैं। उत्पादन की दृष्टि से फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करना बहुत जरूरी होता है। ये क्रांतिक अवस्थाएं है, जैसे पौधों में कली बनते समय, फूल आते समय, एवं फूलो में दाना भरते समय। इन सभी अवस्थाओं में सिंचाई का काम आवश्यक रूप से करना चाहिए। इन अवस्थाओं में सिंचाई में कमी होने से उत्पादन में भारी कमी आ जाती है। खेत से अतिरिक्त जल निकास की व्यवस्था भी होनी चाहिए ताकि अतिरिक्त पानी से पौधों को नुकसान न होे।

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विरलीकरण : अधिकतर किसान बीज की बुवाई छिटकवां विधि से करते हैं। जिससे पौधों की आपस की दूरी निश्चित नही हो पाती और पौधे कमजोर हो जाते है। छिटकवां विधि से बोई गई फसल में विरलीकरण के समय अतिरिक्त पौधों को उखाड़ कर खेत से बाहर कर दे। यह कार्य  बुआई के 15 से 20 दिन बाद करें। संकुल किस्मों को 45 सेंटीमीटर कतार से कतार की दूरी व 15 से 20 सेंटीमीटर पौध से पौध की रखनी चाहिए। संकर किस्मों को 60-70 सेंटीमीटर कतार से कतार की व 25 से 30 सेंटीमीटर पौध से पौध की दूरी रखनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन : सुरजमुखी तिलहनी फसल होने के नाते अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इसके लिए बुआई से 2-3 सप्ताह पूर्व 8-10 टन गोबर की सड़ी हुई खाद अथवा कम्पोष्ट खाद खेत में तैयारी के समय इस्तेमाल करें। रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल किसान भाई मृदा परीक्षण की रिर्पाट की संस्तुति के आधार पर करें। यदि मृदा परीक्षण समय पर ना हो पाया हो, तो ऐसी दशा में अच्छी पैदावार लेने के लिए संकुल किस्मों में 80 किलोग्राम, संकर में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। इन उर्वरकों में नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा किसान भाई बुवाई के समय दे चुके होंगे। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को बुवाई के 25 से 30 दिन बाद खड़ी फसल में टॉप ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करें। सूरजमुखी की फसल में जस्ता और गंधक जैसे पोषक तत्वों को देना भी लाभकारी होता है। इनकी पूर्ति के लिए बुआई के समय खेत में 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। जो किसान बुआई के समय इन तत्वों का इस्तेमाल न कर पाये हो, वे किसान जिंक का इस्तेमाल  फूल आने की अवस्था में खड़ी फसल में  कर सकते हैं। इसके लिए 2.5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 1.25 किलोग्राम चूना की मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। सूरजमुखी की फसल में बोरान एक आवश्यक सूक्ष्म तत्व है। फसल में फूल आने की अवस्था में देने से दानों का विकास अच्छा होता है। खड़ी फसल में इसे देने के लिए 2 ग्राम बोरेक्स प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बना कर छिड़काव करें। इससे फूलों में दाना भरने का प्रतिशत बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त किसान जैव उर्वरकों जैसे एजोटोबैक्टर व पी. एस. बी को भी फसल में दे सकते हैं। इनके प्रयोग के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

मिट्टी चढ़ाना : सूरजमुखी का फूल काफी बड़ा होता हैं, जिससे पौधे गिरने का भय रहता है। नाइट्रोजन की टापड्रेसिंग के बाद, जब पौधे 60-70 सेंटीमीटर उॅचे  हो जाय, तो 10 से 15 सेंटीमीटर मिट्टी चढ़ानंे का काम आवश्यक रूप से करना चाहिए। इससे पौधों के गिरने का डर समाप्त हो जाता हैं।

परसेचन क्रिया : सूरजमुखी परपरागित फसल है। इसलिए इसमें परसेचन क्रिया महत्वपूर्ण होती है। फूल के पूरे मुंडक में एक समान दाना बनने के लिए परसेचन बहुत ही आवश्यक है। सूरजमुखी में यह क्रिया मधुमक्खियों एवं भवरों के द्वारा होती है। लेकिन जिन क्षेत्रों में इनकी संख्या कम होती है, वहां पर कृत्रिम रूप से हाथ द्वारा यह क्रिया सफलतापूर्वक की जा सकती है। फसल में अच्छी तरह फूल आने के बाद हाथों में मुलायम कपड़ा या दस्ताना पहनकर सूरजमुखी के फूल के चारों तरफ अच्छी तरह हाथ को फेरते है। पहले फूल के बाहर की तरफ, फिर अंदर की तरफ हाथ फेरते हैं। इस प्रकार से सूरजमुखी में परसेचन क्रिया अच्छी तरह से हो जाती है। इससे सूरजमुखी की फसल में 20 से 25 प्रतिशत तक उत्पादन में वृद्धि होती है। इस कार्य को फूल खिलने के समय सुबह के 7 से 8 बजे तक कर देनी चाहिए। प्राकृतिक तरीके से परसेचन क्रिया को बढ़ाने के लिए 4-5 मधुमक्खी के बाक्सों को खेत के किनारे रखकर किया जा सकता है। सूरजमुखी की फसल में फूल आते समय कीट नाशकों का छिड़काव न करें।

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चिड़ियों से बचाव : सूरजमुखी की फसल को सर्वाधिक नुकसान तोते पहुंचाते हैं। तोते प्रायः दाने पडने की अवस्था से लेकर दाने पकने की अवस्था तक लगभग एक माह तक अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभी तो पूरी फसल नष्ट कर देते हैं। इनकी रोकथाम के लिए चारों ओर प्रकाश परवर्तित करने वाली एंटी पैरेट रिबन का प्रयोग लाभकारी होता है। इस दौरान फसल की सुबह-शाम निगरानी भी रखे। 

फसल सुरक्षा : सूरजमुखी की फसल को कीट और बीमारियों से सुरक्षा भी करें। फूल गलन या हेडराट सूरजमुखी की प्रमुख बीमारी है। आरम्भ में फूल के पिछले भाग में धब्बा बनता है। बीमारी बढ़ने पर पूरे फूल को गला देता है।  इसकी रोकथाम के लिए डाईथेन एम-45 की 1. 25 -1. 50 किलो ग्राम दवा को 600 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से फूल आने पर दो छिड़काव करना चाहिए। 

जड़ गलन व तना गलन बीमारी फसल की किसी भी अवस्था पर आ सकती है, लेकिन फूलों में दाना बनते समय बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। रोग ग्रस्त पौधे सूखकर जमीन पर गिर जाते है। इसकी रोकथाम के लिए थायरम या कैप्टान से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुआई करना चाहिए।

झुलसा रोग : झुलसा रोग से प्रभावित पौधे की पत्तियां झुलस जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए के लिए मेन्कोजेब/डाईथेन एम-45 1. 25 से 1. 50 किलो ग्राम दवा को 600 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर फसल पर  छिड़काव करें।

कीट : सूरजमुखी की फसल में कई तरह के कीड़े लगते है जैसे दीमक, हरे फुदके, कुतरा कीट। इन कीटों की रोकथाम के लिए इण्डोसल्फान 35 ईसी दवा की 1.5 से 2 लीटर मात्रा को 600 से 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़़काव करें। इससे फसल को हानि पहुॅचाने वाले कीटों से सुरक्षा हो जाती है।

कटाई एवं मड़ाई : सूरजमुखी की फसल की कटाई के समय निम्नलिखित सावधानियाँ रखना बहुत आवश्यक है, ताकि उपज और तेल की गुणवत्ता अच्छी बनी रहे:

  • सही समय पर कटाई करें – जब फूल का पिछला भाग (Back of Head) पीला से भूरा हो जाए, पत्तियाँ सूख जाएँ और लगभग 80–90% बीज पक जाएँ, तभी कटाई करें।
  • अधिक देर न करें – देर से कटाई करने पर पक्षी, बारिश या तेज हवा से बीज झड़ सकते हैं और नुकसान हो सकता है।
  • नमी का ध्यान रखें – कटाई के समय बीजों में लगभग 18–20% नमी हो सकती है। कटाई के बाद उन्हें अच्छी तरह सुखाकर 8–10% नमी तक लाएँ, तभी भंडारण करें।
  • बारिश में कटाई न करें – गीली अवस्था में कटाई करने से फफूंद लगने और बीज की गुणवत्ता खराब होने का खतरा रहता है।
  • सावधानी से कटाई करें – फूल (Head) को तेज हंसिया या चाकू से काटें ताकि बीज गिरें नहीं।
  • अच्छी तरह सुखाएँ – कटाई के बाद फूलों को 2–3 दिन धूप में सुखाएँ, फिर मड़ाई करें।
  • मड़ाई सावधानी से करें – मड़ाई के समय बीज टूटने न पाएँ। टूटे हुए बीज जल्दी खराब हो जाते हैं।
  • भंडारण – साफ, सूखे और हवादार स्थान पर ही बीज रखें। नमी और कीटों से बचाने के लिए बोरियों को फर्श से ऊपर रखें।

विशेष सलाह :

  • यदि पक्षियों का प्रकोप अधिक हो तो फसल पकने के अंतिम 10–15 दिनों में खेत की निगरानी करें।
  • कटाई सुबह की हल्की नमी या शाम के समय करने से बीज झड़ने की संभावना कम रहती है।
  • इन सावधानियों का पालन करने से सूरजमुखी की उपज और तेल की गुणवत्ता दोनों बेहतर रहती हैं।
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उपज एवं लाभ : सूरजमुखी की संकुल किस्मों से 14 -15 कुन्तल एवं संकर किस्मों से 20-25 कुन्तल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन मिल जाता है। सामान्य तौर पर एक हेक्टेयर सूरजमुखी की खेती से संकुल किस्मों में एक लाख रूपये एवं संकर किस्मों से लगभग डेढ़ लाख रूपये का शुद्व लाभ हो जाता हैं। साथ ही इसके पौधों में भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन होने के कारण खेत में पौधा सड़ने के बाद खेत की  उर्वराशक्ति में भी इजाफा होता है। यदि किसान भाई बताई गई इन बातों को ध्यान में रखकर सूरजमुखी की खेती करते हैं तो अच्छे उत्पादन के साथ बेहतर मुनाफा प्राप्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न  (FAQ)

Q1. सूरजमुखी की फसल में पहली सिंचाई कब करें?
उत्तर: मिट्टी की नमी के अनुसार पहली सिंचाई करें। जायद में सामान्यतः 8–10 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। कली बनना, फूल आना तथा दाना भरना सिंचाई की सबसे महत्वपूर्ण अवस्थाएँ हैं।

Q2. सूरजमुखी में कौन-कौन से उर्वरक डालें?
उत्तर: गोबर की सड़ी खाद, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, जिंक सल्फेट, बोरान तथा जैव उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करें।

Q3. सूरजमुखी में सबसे अधिक नुकसान किससे होता है?
उत्तर: दाना बनने से लेकर पकने तक तोते सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। एंटी-बर्ड रिबन और नियमित निगरानी से बचाव किया जा सकता है।

Q4. सूरजमुखी की कटाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: जब फूल का पिछला भाग पीला-भूरा हो जाए और लगभग 80–90% बीज पक जाएँ, तब कटाई करनी चाहिए।

Q5. सूरजमुखी की खेती से प्रति हेक्टेयर कितनी आय होती है?
उत्तर: संकुल किस्मों से लगभग ₹1 लाख तथा संकर किस्मों से लगभग ₹1.5 लाख तक शुद्ध लाभ प्राप्त हो सकता है।

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