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लैवेंडर की खेती कैसे करें : बैंगनी खुशबू और सुनहरी कमाई

लैवेंडर की खेती कैसे करें? जानिए जलवायु, मिट्टी, शेर-ए-कश्मीर किस्म, रोपाई, खाद, सिंचाई और प्रति एकड़ 20-40 किलो तेल की पैदावार।

बैंगनी रंग के फूलों की कतारें, हवा में घुली मीठी महक और बाज़ार में ऊँची कीमत। किसान को फायदा ही फायदा। लैवेंडर की खेती इन दिनों किसानों को अपनी ओर खींच रही है। इसके फूलों से निकलने वाला वाष्पशील सुगंधित तेल सुगंध की दुनिया में ख़ास जगह रखता है और परफ्यूम उद्योग की पहली पसंद में गिना जाता है।

क्यों है लैवेंडर की खेती इतनी ख़ास ?

लैवेंडर लैमियेसी कुल का झाड़ीदार बहुवर्षीय पौधा है। इसकी लगभग 28 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके तेल में करीब 40 प्रतिशत लिनालाइल एसिटेट और 30 प्रतिशत लिनालूल होता है। ये यौगिक मानव उपयोग के लिए सुरक्षित हैं, मन को सुकून देने वाली खुशबू देते हैं और जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता भी रखते हैं।
यही वजह है कि परफ्यूम उद्योग, सौंदर्य प्रसाधन, औषधि निर्माण और गंधायुर्वेद में इसकी भारी माँग है। देश में इसकी खेती कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सफलतापूर्वक हो रही है।

कैसी चाहिए आबोहवा और मिट्टी ?

जलवायु : लैवेंडर ठंडी जलवायु का पौधा है। इसे समशीतोष्ण मौसम और खुली धूप चाहिए। यह सूखा और पाला दोनों सह लेता है, और समुद्र तल से ज़्यादा ऊँचाई वाली ज़मीन पर भी उग सकता है। बढ़वार के लिए 25-30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान ठीक रहता है। फूल आते समय 60-65 प्रतिशत आर्द्रता और साफ आसमान ज़रूरी है।

भूमि का चयन : अच्छे जल निकास वाली, गहरी, उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे बेहतर है। इसका पीएच मान सामान्य से हल्का क्षारीय होना चाहिए। उदासीन से क्षारीय भूमि, यानी पीएच 7 से 8.4 के बीच, में भी अच्छी खेती हो सकती है। खुली धूप और अच्छे वायु संचार वाली ज़मीन सबसे उत्तम मानी जाती है। जलभराव वाली ज़मीन पर यह फसल नहीं टिकती।

कौन-सी किस्म चुनें ?

तेल के लिए मुख्यतः तीन प्रजातियाँ उगाई जाती हैं:
• लैवेंडुला एंगुस्टीफोलिया (ट्रू लैवेंडर): सबसे बेहतरीन तेल इसी से मिलता है
• लैवेंडुला लैटीफोलिया (स्पाइक लैवेंडर)
• लैवेंडुला इंटरमीडिया (लैवेंडिन)

उन्नत किस्मों में कारलोवो, मैलेट-9, डायले, एनले, कॉम्पैक्टा, ग्रोसो, काजन लुक, हेम्स, एरोमा, स्वीटेस्ट और वेनेस वॉउल्स अर्ली प्रमुख हैं।
सीमैप, लखनऊ ने ‘शेर-ए-कश्मीर’ नाम की किस्म विकसित की है, जिसकी तेल उत्पादन क्षमता दूसरी किस्मों से करीब 80 से 100 प्रतिशत ज़्यादा है। इसके अलावा ए.एम.-1, ए.एम.-2, ए.एम.-3, ए-5, ए-7, ए-8, ए-9, बी-2 और बी-11 जैसे अधिक पैदावार वाले क्लोन भी तैयार किए गए हैं।

बीज या कलम? जवाब है कलम :

लैवेंडर बीज और कलम दोनों से तैयार हो सकता है, लेकिन बीज से उगाए पौधों में बढ़वार, रंग, सुगंध और तेल की मात्रा घट जाती है। इसलिए व्यावसायिक खेती के लिए कलम से तैयार पौधे ही बेहतर हैं।

बीज से पौध : नवंबर-दिसंबर में तैयार क्यारियों में बुवाई करें। प्रति वर्ग मीटर 2 से 2.5 ग्राम बीज डालें और उन्हें मिट्टी में 1-2 सेमी गहरा बोएँ।
कलम से पौध : ध्यान रखे ये बातें

• एक-दो साल पुरानी शाखाओं का उपयोग करें। पौधे के ऊपरी 15-20 सेमी हिस्से की कलम लें।
• कलमें नर्सरी में अक्टूबर से मार्च तक लगाई जा सकती हैं। मैदानी इलाकों में अक्टूबर-नवंबर और पहाड़ी क्षेत्रों में फरवरी-मार्च का समय ज़्यादा उपयुक्त है।

• कलमों को 5×5 या 10×10 सेमी की दूरी पर दो-तिहाई मिट्टी में गहरे दबाएँ।
• लगाने से पहले उन्हें 500 पीपीएम के आई.बी.ए. घोल से उपचारित कर लें।

खेत की तैयारी और रोपाई :

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें, फिर दो बार कल्टीवेटर चलाएँ। हर जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरी बना लें। सुविधा के अनुसार तैयार पौधों को पंक्तियों में रोपें।
• रोपाई का समय: अक्टूबर-नवंबर। जहाँ सिंचाई के साधन न हों, वहाँ बरसात में अगस्त-सितंबर में रोपाई करें।
• दूरी: लाइन से लाइन 1.2 से 1.4 मीटर और पौधे से पौधे करीब 35-40 सेमी।
• पौधों की संख्या: ज़्यादा उत्पादन के लिए प्रति एकड़ 8 से 10 हज़ार पौधे लगाएँ।

खाद-उर्वरक : पोषण संतुलन ही सफलता की कुंजी

खाद और उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जाँच के नतीजों के आधार पर तय करें।
• खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ 200 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद डालें।
• रासायनिक उर्वरक प्रति एकड़: नाइट्रोजन 40 किग्रा, फॉस्फोरस 40 किग्रा और पोटाश 30 किग्रा।
• फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें।
• नाइट्रोजन खड़ी फसल में टॉपड्रेसिंग के रूप में दें, साल भर में 3-4 बार में।
• ज़रूरत हो तो सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी प्रयोग किया जा सकता है।

सिंचाई : कम पानी, ज़्यादा फायदा

पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करें। लैवेंडर की फसल में कभी ज़्यादा पानी न दें। खेत सूखने से पहले ही हल्की सिंचाई कर देना सही रहता है। रोपाई के पहले साल ज़्यादा सिंचाई की ज़रूरत पड़ती है, जबकि बाद के वर्षों में पौधे सूखा सहने लगते हैं और कम पानी में काम चल जाता है।

खरपतवार पर रखें विशेष नज़र :
पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई ज़रूरी है। यह काम फावड़ा, खुरपी या कुदाल से करें। तीन साल से पुरानी फसल में निराई-गुड़ाई लाइनों के बीच मशीन से की जा सकती है। खरपतवारों का नियंत्रण मार्च-अप्रैल, मई-जून और जुलाई में करना चाहिए।

रोग और कीट : खतरा कम पर सावधानी ज़रूरी
लैवेंडर की फसल में कीट और बीमारियों का प्रकोप बहुत कम होता है। फफूँद से फैलने वाले जड़ गलन और उकठा रोग से कभी-कभी नुकसान होता है।
• रोग नियंत्रण: बेविस्टिन का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
• कीट नियंत्रण: थायोडान का 0.5 प्रतिशत घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करें।
• तेल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बायोपेस्टीसाइड का प्रयोग ज़्यादा फायदेमंद है।

कटाई : सही वक्त, सही तरीका
व्यावसायिक नज़रिए से फसल का उत्पादन तीसरे साल के बाद ही मिलना शुरू होता है, और उसके बाद अगले 3-4 साल तक अच्छी पैदावार मिलती रहती है।
• पहला साल: मई से जुलाई के बीच जब फूल आने लगें, तो फूलों को टहनी सहित दराँती से काट लें।
• दूसरा साल: जब 70-80 प्रतिशत फूल खिल जाएँ, तब कटाई शुरू करें।
• सबसे अच्छा समय: कटाई सुबह शुरू करें, जब धूप खिली हो और हल्की गर्मी हो।

कितनी होगी पैदावार ?
• फूल: पहले और दूसरे साल उत्पादन बहुत कम रहता है। तीसरे साल से फूलों का उत्पादन 20-25 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुँच जाता है।
• तेल: अलग-अलग प्रजातियों में तेल की मात्रा 0.5 से 1.5 प्रतिशत मिलती है। प्रति एकड़ 20 से 40 किलो सुगंधित तेल का उत्पादन हो सकता है।

फसल आर्थिकी :
लैवेंडर की खेती में एक एकड़ पर पहले वर्ष लगभग ₹1.26 लाख (पौधे, खाद, रोपाई, सिंचाई, निराई आदि) और दूसरे वर्ष करीब ₹27 हज़ार का अनुमानित खर्च आता है, जबकि इन दोनों वर्षों में व्यावसायिक आय लगभग नहीं के बराबर होती है। तीसरे वर्ष से प्रति एकड़ 20-40 किलो सुगंधित तेल मिलने लगता है, और सीएसआईआर अरोमा मिशन के अनुसार जम्मू-कश्मीर के लैवेंडर तेल का बाज़ार भाव लगभग ₹10,000 प्रति किलो है, जबकि कम ग्रेड का तेल इससे काफ़ी कम दाम पर बिकता है। वार्षिक खर्च (खेती और आसवन मिलाकर) ₹72 हज़ार से ₹1 लाख के बीच बैठता है, इसलिए भाव ₹5,000 प्रति किलो और उत्पादन 20 किलो रहे तो वार्षिक शुद्ध लाभ सिर्फ़ ₹28 हज़ार के आसपास रहता है, 30 किलो तेल और ₹7,000 के भाव पर यह लगभग ₹1.23 लाख, और 40 किलो तेल व ₹10,000 के भाव पर करीब ₹2.98 लाख तक पहुँच सकता है। जबकि मध्यम स्थिति में लगभग ₹3.4 लाख और अच्छी स्थिति में ₹10 लाख से अधिक का शुद्ध लाभ संभव है। यानी लैवेंडर की कमाई तेल के भाव, गुणवत्ता और बिक्री की व्यवस्था पर बहुत निर्भर करती है, इसलिए बड़े रकबे में लगाने से पहले छोटे प्लॉट पर परीक्षण और खरीदार तय कर लेना समझदारी भरा कदम होता है।

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