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सफेद सोना : मखाना खेती बन रही है किसानो की नई ताकत

मखाना की खेती :  कमाई, सरकारी सब्सिडी और राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की पूरी जानकारी

उथले पानी में उगने वाली मखाना की फसल अब किसानों के लिए गहरी कमाई का जरिया बन रही है। अब तो इसे राष्ट्रीय मखाना बोर्ड, सरकारी सब्सिडी और वैश्विक बाजार का सहारा मिल रहा है। तालाब के ठहरे पानी की सतह पर बड़े-बड़े गोल पत्ते और उसके नीचे कीचड़ में काले, गोल बीज जिन्हें स्थानीय लोग गुर्री कहते हैं। यही काले बीज भुनकर जब बाजार में पहुँचते हैं तो लोग उन्हें मखाना और कारोबारी सफेद सोना कहते हैं। कभी व्रत-उपवास तक सीमित रहा मखाना अब शहरों की रसोई में सुपरफूड के रूप में जगह बना चुका है। इसके पीछे किसान की महनत हैं, वैज्ञानिकों की सलाह है और नीतिगत फैसले भी अहम हैं।

एक फसल, रूप अनेक

मखाना सिंघाड़े की तरह जल की सतह पर तैरने वाली फसल है। इसके बीजों को प्रसंस्कृत कर सूखे फल (लावा) के रूप में बेचा जाता है। यह पौष्टिक तत्वों से भरपूर है। किसानों और ग्रामीणों के लिए अच्छी आय देने वाली नकदी फसल भी है। फलाहार में इसकी खपत बड़े पैमाने पर होती है। इसे सब्जी के रूप में, घी में भूनकर, हलवा बनाकर, नमकीन और स्नैक्स में भी खूब इस्तेमाल किया जाता है। बाजार में साल भर माँग बनी रहती है, इसीलिए किसान इसे भरोसेमंद नकदी फसल मानते हैं।

बिहार का दबदबा, देश की संभावना

देश में मखाना उत्पादन का बड़ा हिस्सा बिहार से आता है। राज्य कृषि विभाग के आँकड़ों के मुताबिक देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग 85 प्रतिशत है। अन्य स्रोत तो इसे 90 फीसदी तक बताते हैं। उत्पादन मुख्य रूप से मिथिलांचल के नौ जिलों में केंद्रित है। मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया, सीतामढ़ी और किशनगंज में इसकी बड़े पैमाने पर खेती होती है। सर्वाधिक उत्पादन इसका सहरसा में होता है।

रकबे और उत्पादन के आँकड़े पर जाय तो बिहार में लगभग 35,000 हेक्टेयर में मखाना की खेती होती है। उत्पादन की बात करें तो लगभग 10,000 टन मखाने के वार्षिक उत्पादन के आकड़े मिलतें हैं। इस तरह से बिहार के मखाना उद्योग का कारोबार लगभग 3,000 करोड़ रुपये का है।

पहचान के मोर्चे पर बड़ी उपलब्धि 2022 में मिली, जब मिथिला मखाना को भौगोलिक संकेतक (जीआई) का दर्जा दिया गया। यहाँ से मखाना अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान और इंग्लैंड जैसे देशों को भेजा जाता है।

सरकार की नई पहल : राष्ट्रीय मखाना बोर्ड

इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा नीतिगत मोड़ केंद्रीय बजट 2025-26 में आया। वित्त मंत्री ने बिहार में मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की, जिसका मकसद उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन को बढ़ावा देना था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 सितंबर 2025 को पूर्णिया में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का उद्घाटन भी किया। सरकार का यह कदम आने वाले दिनों में इस व्यवसाय के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

मखाना बोर्ड के पीछे बड़ा वित्तीय आधार है। केंद्र की छह वर्षीय (2025-26 से 2030-31) योजना 476.03 करोड़ रुपये की है। बोर्ड के काम में किसानों को प्रशिक्षण, बाजार तक पहुँच, निर्यात को बढ़ावा और आईसीएआर, नाबार्ड व कृषि विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी शामिल हैं। बोर्ड का लक्ष्य स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी अधिक उपज देने वाली किस्मों को बढ़ावा देना भी है। यह उस कमी को दूर करने की कोशिश है, जिसे मखाना किसान वर्षों से प्रतिक्षारत थे। उन्नत तकनीक और किस्मों का विकास पर्याप्त स्तर पर न हो पाने से स्थानीय किस्मों का चयन अनुभव के आधार पर करना पड़ता है। 

मखाना खेती को बढ़ावा को लेकर राज्य स्तर पर भी कई कदम उठे हैं। बिहार सरकार ने 2026-27 के लिए मखाना विकास योजना शुरू की है, जिसमें किसानों और उद्यमियों को खेती, प्रसंस्करण इकाइयों, ब्रांडिंग और निर्यात के लिए सब्सिडी देने का काम करेगी। इसके तहद मखाना खेती की लागत पर 75 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है, और सफाई, ग्रेडिंग व रोस्टिंग मशीनों के लिए अलग अनुदान मिलता है। यही नही, बुनियादी ढाँचागत विकास पर भी सरकार ध्यान दे रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2026 की शुरुआत तक बोर्ड ने उत्पादन क्षेत्रों के पास नए कार्गो टर्मिनल और कोल्ड स्टोरेज इकाइयों की वार्षिक कार्ययोजनाओं को मंजूरी दे दी है।

खेती : पारंपरिक तरीक और उसकी चुनौतियाँ

जगह का चुनाव: 

मखाने की खेती वहाँ हो सकती है जहाँ पानी का भराव स्थिर रहे और गहराई लगभग 3 से 6 फीट हो। कम गहरे तालाबों, पोखरों, सरोवरों और बावड़ियों में भी यह अच्छी होती है। जिन क्षेत्रों में पानी की तलहटी में दलदली मिट्टी होती है, वहाँ ह्यूमस अधिक मिलता है, इसलिए वह भूमि ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है। काली मिट्टी सर्वोत्तम है। तालाब की मिट्टी और पानी अम्लीय हो तो चूने का प्रयोग करके ही खेती शुरू करनी चाहिए।

बुआई से पहले तालाब से सभी प्रकार के खरपतवार अगस्त-सितंबर तक निकाल देने चाहिए। पानी अधिक होने से खरपतवारनाशी उपयुक्त नहीं होते, इसलिए खरपतवार हाथ से चुनकर या कटाई करके निकालते हैं।

बुआई : आमतौर पर बुआई नवंबर से दिसंबर के बीच होती है। पुराने जल क्षेत्रों में, जहाँ पिछले सालों से खेती होती रही हो, सीधे बीज बोना ज्यादा लाभकारी रहता है। नए तालाबों में रोपाई बेहतर मानी जाती है, जिसे दिसंबर से जनवरी तक पूरा कर लेना चाहिए। एक एकड़ जल क्षेत्र के लिए 30 से 40 किलो बीज पर्याप्त रहता है। बीज को 5 से 7 दिन पानी में भिगोकर जूट के बोरे में भरकर छायादार जगह रखने से जमाव अच्छा होता है। बुआई के बाद हल्का पाटा लगाना भी उपयोगी होता है।

फसल की तैयारी : फसल जुलाई-अगस्त में तैयार होती है, पर बीज इकट्ठा करना कठिन काम है। जून से ही फल फटने लगते हैं और बीज सतह पर आकर एक-दो दिन में फिर तलहटी में बैठ जाते हैं। एक फल में आमतौर पर 40 से 70 बीज बनते हैं और 100 बीजों का औसत वजन 80 से 100 ग्राम होता है।

सबसे कठिन चरण : बीज जुटाना

मखाना खेती का असली श्रम यहीं दिखता है। तलहटी में बार-बार गोते लगाकर बीज एक जगह जमा किए जाते हैं, फिर बाँस के विशेष उपकरण में भरकर बाहर लाए जाते हैं। जमीन पर इन्हें पैरों से चलकर रगड़ा जाता है ताकि बीज का आवरण फट जाए। इसके बाद सफाई करके बोरों में भरकर प्रसंस्करण के लिए भेजा जाता है। एक एकड़ जल क्षेत्र से बीज इकट्ठा करने में 6 से 7 श्रमिकों को 5 से 6 दिन लग जाते हैं। इस काम में अधिकतर अनुभवी मजदूर या फिर मल्लाह समुदाय के लोग लगे हैं।

यह श्रम-प्रधान और जोखिम भरा काम है। यही वजह है कि बोर्ड की प्राथमिकताओं में खेती के आधुनिकीकरण और मशीनीकृत करने पर जोर है। विशेषज्ञों के अनुसार बोर्ड तालाब आधारित पारंपरिक श्रम से आगे बढ़कर खेत-प्रणाली आधारित खेती पर जोर दे रहा है।

लवा : जहाँ बनता है असली मूल्य

इकट्ठे किए गए दानों को पहले आकार के अनुसार छलनी से अलग कर ग्रेडिंग की जाती है। अच्छी तरह सुखाने के बाद अनुभवी लोग इन्हें भूनकर लावा बनाते हैं। लावा पॉलीथिन बैग में सामान्य तापमान पर कई दिन तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है।

बीज के वजन का लगभग 30 से 40 प्रतिशत लावा मिलता है, यानी 100 किलो बीज से 35 से 40 किलो लावा तैयार होता हैं। बाजार में बिक्री के लिए लावा तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है। बड़े आकार का रसगुल्ला, मध्यम आकार का समुंधा और छोटे आकार का ठुर्री कहलाता है।

कमाई का गणित

सामान्यतः बाजार में प्रसंस्कृत मखाना 800 से 1200 रुपये प्रति किलो बिकता है। औसतन एक एकड़ जल क्षेत्र से 5 से 6 क्विंटल मखाना पैदा होता है। इस हिसाब से एक एकड़ की खेती से 8 से 12 लाख तक की  आय होती है। बेहतर प्रबंधन और देखभाल से उत्पादन और बढ़ाया जा सकता है।

मखाना किसान की पीड़ा

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आँकड़े लेखक के आकलन पर आधारित हैं और वर्तमान बाजार भाव इनसे अलग हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में स्नैक्स और स्वास्थ्य-आहार बाजार में माँग बढ़ने से खुदरा कीमतें कई गुना ऊँची दिखती हैं।

जरूरी प्रश्न यह कि किसान तक लाभ का कितना हिस्सा पहुँचता है। यह पूरी तरह बिचैलियों की भूमिका पर निर्भर करता है। बाजार में उचे दामों में बिकने वाला मखाना बिचैलिए महज 120-150 प्रति किलो की दर से खरीदी करते हैं। सरकार का अब इस ओर ध्यान गया है। एक रिर्पाेट के अनुसार मखाना बोर्ड बिचैलियों को हटाकर किसान से सीधे निर्यात कराने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए निर्यातकों को एफएसएसएआई नियमों, ऑर्गेनिक सत्यापन-प्रमाणन और निर्यात पैकेजिंग मानकों के पालन में मदद जरूरी देगा।

चुनौतियाँ जो बाकी हैं :

  • रकबे और उत्पादन के वास्तविक आँकड़ों की कमी जो नीति-निर्माण के लिए जरूरी हैं।
  • श्रम और सुरक्षा की कोई गारण्टी नही है।
  • बीज संग्रह का काम चुनौती पूर्ण है।
  • मशीनीकरण अभी शुरुआती दौर में है।
  • मखाना प्रसंस्करण की पारंपरिक विधि में मेहनत और अपव्यय दोनों ज्यादा हैं।
  • तालाबों और आर्द्रभूमि पर आधारित इस फसल के लिए जल संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।
  • तालाबों में मखाने के साथ मत्स्य पालन से अतिरिक्त लाभ संभव है, पर इसके लिए वैज्ञानिक नजरिया विकसित करना होगा।

कठिन परीक्षा  :

असली परीक्षा तब होगी, जब योजनाओं का लाभ तालाब में गोता लगाते उस किसान तक पहुँचेगा। आज भी कंधे तक पानी में उतरकर बीज निकालता है। अगर उसे बेहतर बीज, मशीन, सही दाम और सीधा बाजार मिला, तो मखाना सचमुच किसानों के लिए सफेद सोना साबित हो सकता है।

भविष्य की राह :

देश में मुख्य रूप से बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में मखाने की खेती होती है। तालाब, पोखर और सरोवर जैसे ग्रामीण जल संसाधनों में इसकी बड़ी संभावना मौजूद है, बशर्ते पारंपरिक खेती को आधुनिकता का पुट दिया जाए। मखाना बोर्ड और सब्सिडी योजनाओं के आने से नीतिगत कार्य अब धरातल पर उतरने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।

मखाना खेती पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1 : मखाना की खेती कहाँ की जाती है?
उत्तर : मखाना की खेती मुख्य रूप से तालाब, पोखर, सरोवर और स्थिर पानी वाले जल क्षेत्रों में की जाती है। बिहार मखाना उत्पादन का प्रमुख राज्य है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल और असम में भी इसकी खेती होती है।

प्रश्न 2 : मखाना की खेती के लिए कैसी जगह उपयुक्त होती है?
उत्तर : जहाँ पानी लंबे समय तक स्थिर रहता हो और पानी की गहराई लगभग 3 से 6 फीट हो, वह स्थान मखाना की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। दलदली तथा जैविक पदार्थ से भरपूर तलहटी वाले जल क्षेत्र भी अच्छे माने जाते हैं।

प्रश्न 3 : मखाना की बुआई कब की जाती है?
उत्तर : मखाना की बुआई सामान्यतः नवंबर से दिसंबर के बीच की जाती है। नए जल क्षेत्रों में दिसंबर से जनवरी के बीच पौधों की रोपाई की जा सकती है।

प्रश्न 4 : एक एकड़ में कितने मखाना बीज की आवश्यकता होती है?
उत्तर : सामान्यतः एक एकड़ जल क्षेत्र के लिए लगभग 30 से 40 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। वास्तविक मात्रा खेती की पद्धति और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5 : मखाना की फसल कब तैयार होती है?
उत्तर : मखाना की फसल सामान्यतः जुलाई-अगस्त के आसपास तैयार होती है। इस दौरान पके फलों से बीज प्राप्त किए जाते हैं।

प्रश्न 6 : मखाना के बीज कैसे एकत्र किए जाते हैं?
उत्तर : पके फल से निकलने वाले बीज पानी की तलहटी में बैठ जाते हैं। श्रमिक पानी में उतरकर या गोता लगाकर इन बीजों को एकत्र करते हैं। यह मखाना खेती का सबसे अधिक श्रम वाला कार्य है।

प्रश्न 7 : काले मखाना बीज से सफेद मखाना कैसे तैयार होता है?
उत्तर : काले बीजों को सुखाने, साफ करने, ग्रेडिंग और विशेष तरीके से भूनने के बाद उनका कठोर आवरण टूटता है और अंदर का सफेद भाग बाहर निकलता है। इसी सफेद भाग को मखाना या लावा कहा जाता है।

प्रश्न 8 : राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का उद्देश्य क्या है?
उत्तर : राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का उद्देश्य मखाना उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, किसानों के प्रशिक्षण, बाजार उपलब्धता और निर्यात को बढ़ावा देना है।

प्रश्न 9 : क्या मखाना की खेती पर सरकारी सब्सिडी मिलती है?
उत्तर : हाँ, मखाना खेती और इससे जुड़े प्रसंस्करण कार्यों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सहायता और अनुदान का प्रावधान है। अनुदान की राशि योजना, राज्य और कार्य के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

प्रश्न 10 : मिथिला मखाना क्या है?
उत्तर : मिथिला क्षेत्र में उत्पादित मखाना को मिथिला मखाना कहा जाता है। इसे वर्ष 2022 में भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग प्राप्त हुआ।

प्रश्न 11 : क्या मखाना के साथ मछली पालन किया जा सकता है?
उत्तर : हाँ, उचित जल प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर मखाना के साथ मछली पालन किया जा सकता है। इससे एक ही जल क्षेत्र से किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है।

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