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अगेती मटर की खेती : मतलब मुनाफे का गणित

अगेती मटर की खेती से कैसे कमाएं ज्यादा मुनाफा? जानें बुवाई का सही समय,  बेहतरीन किस्में और प्रति हेक्टेयर मुनाफे का पूरा हिसाब।

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में जैसे ही ठंड की दस्तक शुरू होती है, इन इलाकों के खेतों में किसानों एक खामोश दौड़ शुरू हो जाती है। कौन किसान सबसे पहले अपनी मटर की फसल मंडी तक पहुंचाएगा। यह दौड़ महज जल्दबाजी नहीं, बल्कि उनकी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा होती है, जो उन्हें अन्य किसानों से अलग बनाती हैं, जिसका नाम है अगेती मटर की खेती। समय से पहले बाजार में उतरी मटर की फली न सिर्फ ऊंचे दाम दिलाती है, बल्कि किसानों की आमदनी को भी कई गुना बढ़ा देती है। अगेती मटर की खेती इतनी अहम क्यों है? आइए, इस मुनाफे के गणित को समझते हैं।

मुनाफे का पूरा गणित : ऐसे समझें

बजार के जानकारों के मुताबिक, जब आम मटर की फसल बाजार में आनी शुरू होती है, तब तक अगेती किस्में उगाने वाले किसान अपनी फसल बेचकर मोटा मुनाफा कमा चुके होते हैं। इसके पीछे का सीधा गणित है, कम आपूर्ति और ज्यादा मांग। बाजार की भाषा में इसें “गोल्डन विंडो” कहते हैं। किसानों को इसका फायदा उठाने के लिए समय पर बुवाई और सही किस्म का चुनाव पहली शर्त है।

जलवायु और मिट्टी : फसल की नींव

मटर की खेती के लिए ठंडा मौसम आदर्श माना जाता है, लेकिन अगेती किस्मों को इस तरह विकसित किया गया है कि वे थोड़े गर्म तापमान (10-25°C) में भी अच्छी पैदावार दे देती हैं। अच्छे जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टीए जिसका pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो, सबसे मुफीद होती है।

बुवाई का सही वक्त: देरी का मतलब घाटा

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मैदानी क्षेत्रों में अगेती मटर की बुवाई सितंबर में बारिश समाप्त होने बाद से लेकर अक्टूबर के पहले सप्ताह तक कर लेनी चाहिए। इसमें देरी होने पर न सिर्फ फसल पाले की चपेट में आने का खतरा रहता है, बल्कि बाजार का शुरुआती फायदा भी हाथ से निकल जाता है।

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किन किस्मों पर भरोसा करें किसान

खेत से लेकर मंडी तक चर्चा में रहने वाली प्रमुख अगेती किस्में –

आर्केल (Arkel) — किसानों की पहली पसंद, हरी और लंबी फलियों के लिए मशहूर

  • काशी नंदिनी
  • काशी उदय
  • जवाहर मटर-4
  • पूसा प्रगति
  • पंत मटर.155
  • आजाद मटर.1

बुवाई का सही तरीका और बीज दर :

प्रति हेक्टेयर 80 -100 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है। कतार से कतार की दूरी 30 – 45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 7 – 10 सेमी रखी जाती हैए जबकि बीज को 3.5 सेमी गहराई पर बोया जाता है। एक अहम लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली तकनीक है –  बुवाई से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करनाए जिससे जड़ों में गांठें बनती हैं और नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्राकृतिक प्रक्रिया तेज होती है।

खादउर्वरक : उत्पादन कुंजी है

दलहनी फसल होने के नाते मटर को ज्यादा नाइट्रोजन की दरकार नहीं होती। खेत तैयार करते वक्त 15 -20 टन गोबर की खाद डालने के बाद बुवाई के समय 20-25 किग्रा नाइट्रोजनए 50-60 किग्रा फॉस्फोरस और 40-50 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देना पर्याप्त माना जाता है।

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सिंचाई और निराईगुड़ाई पर विशेषनजर :

मिट्टी में नमी कम होने पर बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। इसके  बाद फूल आने और फली बनने के दौर की सिंचाई सबसे नाजुक मानी जाती है।  इस वक्त पानी की कमी सीधे उपज पर असर डालती है। कुल मिलाकर 3 – 4 सिंचाई काफी होती हैं, लेकिन जलभराव से जड़ सड़न का खतरा रहता है इसलिए सावधानी जरूरी है। इसके साथ ही बुवाई के 20 – 25 दिन बाद पहली और 35 – 40 दिन बाद दूसरी निराई – गुड़ाई की सलाह दी जाती है।

कीटरोगों से जंग :

खेतों में फली छेदक कीट और माहू (एफिड) सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरते हैं। जिनसे निपटने के लिए नीम आधारित कीटनाशकों को प्राथमिकता दी जाती है। वहीं चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) रोग से बचाव के लिए सल्फर युक्त फफूंदनाशकों का छिड़काव और उकठा रोग से बचने के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों तथा फसल चक्र को अपनाना कारगर उपाय माने जाते हैं।

मेहनत का फल  तुड़ाई का मौसम :

बुवाई के महज 55 – 70 दिनों के भीतर अगेती मटर की फलियां तैयार होकर हरी, भरी और चमकदार दिखने लगती हैं। किसान हर 4 – 5 दिन के अंतराल पर तुड़ाई करते हैं ताकि मंडी तक लगातार ताजी उपज पहुंचती रहे। बेहतर प्रबंधन के साथ किसान 80 – 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हरी फली की उपज हो जाती है।

मुनाफे का गणित (अनुमानित, प्रति हेक्टेयर)

लागत:

मदखर्च ()
बीज10,000-15,000
खाद (गोबर+रासायनिक)10,000-12,000
जुताई/मजदूरी (बुवाई-निराई)12,000
सिंचाई4,000
कीट/रोग नियंत्रण4,000
तुड़ाई मजदूरी8,000-10,000
कुल लागतलगभग 48,000-57,000

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मोटा मुनाफा : जिसका था इंतजार

अगैती मटर का औसत बाजार दर 55 रू प्रतिकिलो मानकर चले तो एक हेक्टेयर से 4.5 से 5.5 तक की बिक्री हो जाती है। यदि इसमें से उत्पादन लागत निकाल भी दे तो किसानो अच्छी खासी मोटी कमाई बहुत कम हो जाती है।

निष्कर्ष :

अगेती मटर की खेती सही समय पर बुवाई, उन्नत किस्मों और बेहतर प्रबंधन के दम पर किसानों को कम लागत में मोटा मुनाफा दिलाती है। “गोल्डन विंडो” का फायदा उठाकर किसान महज 55-70 दिनों में तैयार फसल से प्रति हेक्टेयर लाखों रुपए कमा सकते हैं। यही वजह है कि स्मार्ट किसान इसकी खेती को फायदेमंद विकल्प के रूप  में है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश् : FAQ

प्रश्न 1: अगेती मटर की बुवाई कब करनी चाहिए?
उत्तर: उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में अगेती मटर की बुवाई सितंबर में बारिश खत्म होने के बाद से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक कर लेनी चाहिए। देरी होने पर पाले का खतरा बढ़ जाता है और बाजार का शुरुआती फायदा भी हाथ से निकल जाता है।

प्रश्न 2: अगेती मटर की सबसे अच्छी किस्में कौन सी हैं?
उत्तर:आर्केल (Arkel) किसानों की पहली पसंद है, जो हरी और लंबी फलियों के लिए मशहूर है। इसके अलावा काशी नंदिनी, काशी उदय, जवाहर मटर-4, पूसा प्रगति, पंत मटर-155 और आजाद मटर-1 भी लोकप्रिय किस्में हैं।

प्रश्न 3: एक हेक्टेयर अगेती मटर की खेती में कितना खर्च आता है?
बीज, खाद, जुताई-मजदूरी, सिंचाई, कीट-रोग नियंत्रण और तुड़ाई मजदूरी मिलाकर प्रति हेक्टेयर लगभग 48,000 से 57,000 रुपए की लागत आती है।

प्रश्न 4: अगेती मटर की खेती से कितना मुनाफा हो सकता है?
उत्तर: 55 रुपए प्रति किलो के औसत बाजार दर पर एक हेक्टेयर से 4.5 से 5.5 लाख रुपए तक की बिक्री हो सकती है। लागत निकालने के बाद भी किसानों को अच्छी-खासी मोटी कमाई होती है।

प्रश्न 5: अगेती मटर की फसल कितने दिनों में तैयार हो जाती है?
उत्तर: बुवाई के 55-70 दिनों के भीतर अगेती मटर की फलियां तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं। बेहतर प्रबंधन से किसान 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज पा सकते हैं।

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