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प्रति हेक्टेयर लाखों की कमाई के लिए करें अनार की वैज्ञानिक खेती

अनार की वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान 1 हेक्टेयर से ₹10–13 लाख तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। जानिए उन्नत किस्में, खेती की पूरी तकनीक, रोग-कीट प्रबंधन, लागत, उत्पादन और अधिक मुनाफे के आसान उपाय।

अनार एक बेहद लोकप्रिय, पौष्टिक और मूल्यवान फसल है। इसकी बढ़ती मांग, आकर्षक बाजार भाव और निर्यात के कारण किसानों के लिए बहुत लाभदायक फसल है। अनार विटामिन, खनिज लवण, एंटीऑक्सीडेंट तथा अन्य स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से भरपूर फल हैं। इसका नियमित सेवन शरीर को ऊर्जा और ताजगी प्रदान करता है।

शोध बताते है कि इसके बीज का तेल तथा फलों का रस स्तन एवं प्रोस्टेट कैंसर, हृदय रोग तथा उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायक होता है। लोगो की स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण देश-विदेश के बाजारों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

देश में मांग की तुलना में अनार का उत्पादन कम होने कारण किसानों को अच्छा  मूल्य मिल जाता है। यदि किसान उन्नत किस्मों का चयन, अच्छा और नियमित देखभाल करें, तो कम क्षेत्रफल से भी अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। इसकी व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है।

जलवायु : अनार की फसल को  विभिन्न मौंसम और परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। इसके लिए शुष्क एवं अर्ध शष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके पौधे सूखा और पाला आसानी से सहन कर लेते हैं। फलों के पकने के समय शुष्क और गर्म मौंसम की आवश्यकता होती हे। आर्द्र जलवायु में फलों के फटने की समस्या होती है। अनार के लिए औसतन 28 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। 4 डिग्री सेल्सियस से कम ताप पौधों के लिए हानिकारक होता है।

मिट्टी का चुनाव : उत्पादन की दृष्टि से अनार के लिए अच्छे जल निकास वाली गहरी दोमट मृदा सर्वांत्तम होती है। लेकिन इसकी खेती हल्की व क्षारीय भूमि में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। अनार के सफल उत्पादन के लिए 6.5 से 7.5 तक मिट्टी का पी.एच. मान उपयुक्त होता है।

प्रजातिया : अनार उत्पादन में किस्मों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सदैव उन्नतशील किस्मों का चुनाव करना चाहिए। अनार की गणेश, बेदाना, मृदुला, ढोकला, स्पेनिस रूबी, पेपर शेल, ज्योति, घोलक, अराक्ता, जलोढ़, मसाकेट, जलौर सीडलेस आदि प्रमुख उन्नतशील किस्में हैं। इन किस्मों की रोपाई से अधिक उत्पादन व स्वादिष्ट फल प्राप्त होते हैं। अनार दाना उत्पादन के लिए अभी तक कोई किस्म विकसित नही हुई है। अधिकतर जंगली अनार के पौधों से अनार दाना तैयार किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के लिए अनार की उन्नत किस्में :

किस्मप्रमुख विशेषताएँऔसत फल वजन
भगवा (Bhagawa)सबसे लोकप्रिय व्यावसायिक किस्म, आकर्षक गहरा लाल रंग, मीठा स्वाद, मुलायम बीज, लंबी दूरी तक परिवहन योग्य, निर्यात के लिए उपयुक्त250–350 ग्राम
गणेश (Ganesh)महाराष्ट्र से विकसित, गुलाबी दाने, मुलायम बीज, अच्छी उपज, घरेलू बाजार के लिए उपयुक्त200–300 ग्राम
मृदुला (Mridula)गहरे लाल दाने, अधिक मिठास, उच्च उपज, जीवाणु झुलसा रोग के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील250–300 ग्राम
अरक्ता (Arakta)गहरे लाल छिलका एवं दाने, आकर्षक रंग, प्रसंस्करण एवं ताजे उपयोग दोनों के लिए उपयुक्त250–350 ग्राम
ज्योति (Jyoti)मध्यम आकार के फल, अच्छी गुणवत्ता, नियमित उत्पादन200–250 ग्राम
रूबी (Ruby)चमकीले लाल दाने, अच्छा स्वाद, ताजा बाजार के लिए उपयुक्त220–280 ग्राम
फुले भगवा सुपर (Phule Bhagwa Super)भगवा का उन्नत चयन, बड़े फल, अधिक उपज, उत्कृष्ट गुणवत्ता300–400 ग्राम

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उत्तर प्रदेश के लिए सर्वश्रेष्ठ किस्में

  • भगवा – व्यावसायिक खेती एवं निर्यात के लिए सर्वोत्तम।
  • मृदुला – अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता के लिए।
  • गणेश – शुरुआती किसानों तथा स्थानीय बाजार के लिए उपयुक्त।
  • फुले भगवा सुपर – बड़े आकार के फल और अधिक लाभ के लिए उत्कृष्ट।

किस्म चयन के सुझाव

  • निर्यात एवं बड़े बाजार: भगवा, फुले भगवा सुपर
  • स्थानीय फल मंडी: गणेश, मृदुला
  • जूस एवं प्रसंस्करण: अरक्ता, मृदुला
  • अधिक लाभकारी व्यावसायिक बाग: भगवा सबसे अधिक अनुशंसित।

विशेष सलाह : यदि उत्तर प्रदेश में नई व्यावसायिक बागवानी स्थापित कर रहे हैं, तो भगवा या फुले भगवा सुपर को प्रमाणित नर्सरी से लेकर लगाना सबसे अच्छा होता है। ये किस्में बेहतर बाजार मूल्य, उच्च उपज और फलों की गुणवत्ता के कारण किसानों के बीच सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।

प्रवर्धन विधि: अनार के पौधे बीज एवं कायिक प्रवर्धन के व्दारा तैयार किए जाते हैं। कायिक या वनस्पति विधि में कलम, गूटी और दाब आदि प्रचलित विधिया हैं। बीज से तैयार पौधों की अपेक्षा कलमी पौधों में फल आना जल्दी शुरू हो जाता है। बीज के व्दारा तैयार पौधे 8-9 माह में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।

कलम विधि से पौध तैयार करने के लिए उत्तम गुणों वाले मात्र वृक्ष से 20-25 सेंमी. लम्बी एक वर्ष पुरानी शाखाओं को काट कर 1000 पी.पी.एम. के आई.बी.ए. या कटेक्स हार्मान से उपचारित करके नर्सरी में लगाना चाहिए। नर्सरी में कलम लगाने का उचित समय फरवरी-मार्च और जुलाई-अगस्त माह का होता है।

इन कलमों को 25 गुणा 10 सेंमी. आकार के पाली बैग में भी आसानी तैयार किया जा सकता है। पाली बैग में रेत, गोबर की खाद और मिट्टी की बराबर मात्रा का मिश्रण भर कर कलमों को लगाते हैं। गूटी और दाब विधि से भी पौधे तैयार किए जा सकते हैं। लेकिन कलम विधि से अनार के पौधे तैयार करना अधिक सरल और उपयुक्त होता है।

पौध रोपण : नर्सरी में पहले से तैयार पौधों को स्थाई रूप से खेत में 4 मीटर की दूरी पर 80X80X80 सेंमी. आकार के गड्ढ़े बनाकर लगाते हैं। बरसात में पौध रोपण का उचित समय जुलाई – अगस्त माह एवं सर्दियों में जनवरी – फरवरी माह का होता है।

खाद एवं उर्वरक : गड्ढों में पौध रोपने के पूर्व 1:1:1 के अनुपात में गोबर की खाद, रेत और मिट्टी का मिश्रण बनाकर गड्ढों की भराई की जाती है। दीमक की समस्या वाले क्षेत्र में 250 ग्राम प्रति गड्ढा की दर से नीम की खली का प्रयोग करना चाहिए।

अनार के एक वर्ष पुराने पौधों को 150 ग्राम नाईट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस एवं 50 ग्राम पोटाश देने की संस्तुत की जाती हे। नाईट्रोजन की मात्रा को आगामी 5 वर्ष तक 100 ग्राम प्रति वर्ष की दर से बढ़ाते जाते हैं। इसी तरह फास्फोरस और पोटाश की मात्रा आगामी 5 वर्ष तक 50 ग्राम प्रति वर्ष/पौधे की दर से बढ़ाते जाते हैं।

पाच वर्ष या उसके बाद प्रति पौधा/वर्ष 30 किग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद देते हैं। रासायनिक उर्वरकों में 500 ग्राम नाईट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 300 ग्राम पोटाश प्रति वर्ष/पौधा देते हैं। इन उर्वरकों में नाईट्रोजन की 300 ग्राम मात्रा तथा फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा फूल आने के लगभग 4 सप्ताह पहले देना चाहिए। शेष नाईट्रोजन की मात्रा को फल लगते समय देना चाहिए।

सिंचाई : अधिक उत्पादन और अच्छी गुणवत्ता के फलोत्पादन के लिए सिंचाई का समुचित प्रबंध करना अति आवश्यक होता है। पानी की कमी के आभाव में फलों का फटना आरम्भ हो जाता है। गर्मी के मौंसम में 7-10 दिन व सर्दी के मौंसम 15 – 20 दिन के अन्तराल में सिंचाई करना चाहिए। फूल बनते समय व फलों के पकते समय सिंचाई का विशेष ध्यान देना जरूरी होता है।

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कटाई-छटाई: अनार के पौधों को उचित आकार प्रदान करने के लिए कटाई-छटाई का विशेष महत्व होता हे। अच्छी तरह पौधों को साधने के लिए पौधों को एक तनीय या बहु तनीय आकार में ढाला जाता है। एक तना वाला पौध तैयार करने के लिए जमीन से एक तना को छोड़कर अन्य को काट कर अलग कर दिया जाता है।

इसमें मुख्य तने से एक मीटर की उचाई पर शाखाओं को विकसित होने देते हैं। कई तने वाले पौधों को तैयार करने के लिए जमीन से 3-4 तनों को छोड़कर अन्य को काट कर अलग कर दिया जाता है। ऐसे पौधों में हवा व प्रकाश अच्छी तरह लगता है जिससे फूल और फल अधिक संख्या में लगते हैं। एक तना वाले पौधों में तना छेदक कीटों के प्रकोप बढ़ने की अधिक संभावना होती है।

बहार उपचार: अनार में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं जिसे बहार कहते हैं। अम्बे बहार जनवरी-फरवरी माह में, मृग बहार जून-जुलाई माह में एवं हस्त बहार सितम्बर-अक्टूबर माह में आती है। अनार में वर्ष में कई बार फूल और फल आना उपज व गुणवत्ता की की दृष्टि से उपयुक्त नही होता ।

इसलिए तीन बहार में से एक बहार का उत्पादन लेने के  लिए किए जाने वाले प्रबंध को बहार उपचार कहते हैं। बहार का चुनाव मौंसम, सिंचाई, बाजार माग, फलों की गुणवत्ता के अनुसार करते हैं। शुष्क क्षेत्रों में मृग एवं हस्त बहार की फसल लेना चाहिए।

बहार नियंत्रण के लिए पौधों की उम्र के अनुसार ढेड़ से दो माह के लिए सिंचाई बंद कर दी जाती है और हल्की गुड़ाई करके जड़ों को खुला छोड़ दिया जाता है। जैसी ही पत्तियां पीली पड़ना शुरू हो जाय तो पौधों में थाला बनाकर उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक देकर सिंचाई कर देते हैं।

फसल सुरक्षा :

फलों का फटना : अनार के फलों का फटना एक सामान्य समस्या है। फटे फलों में फफूद और जीवाणुओं का आक्रमण बढ़ जाता है। फलों का फटना प्रमुख रूप से बोरान, कैल्शियम, पोटाश आदि तत्वों की कमी एवं असंतुलित सिंचाई के कारण होता है। मृग बहार की फसल में यह समस्या अधिक होती है। फलों का फटनें से बचाने के लिए बोरेक्स 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त सिंचाई का समुचित प्रबंध करना चाहिए। फलों को फटने से बचाने के लिए जेब्रेलिक एसिड 15 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना काफी लाभकारी होता है।

छाल खाने वाला कीट : यह कीट पौधों की छाल खाकर नुकसान पहुचाता है। इस कीट की इल्लिया तनों और शाखाओं के अन्दर सुरंग बना लेता है जिससे शाखाएं कमजोर हो जाती हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए सूखी शाखाओं को काटकर जला देना चाहिए। छिद्रों में तार डालकर इल्लियों को मारा भी जा सकता हे। छेदों में केरोसिन तेल डालकर मिट्टी से बंद कर देने से इल्लिया मर जाती हैं। इण्डोसल्फान 35 ई.सी. दवा की 2 मिली. मात्रा को प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करने से प्रभावी तरीके से नियंत्रण हो जाता है।

मिली बग: इस कीट के छोटे निम्फ और शिशु पत्त्यिों और कोमल टहनियों से रस चूसते हैं। नवम्बर-दिसम्बर माह में इस कीट का प्रकोप अधिक बढ़ता है। कीट का अधिक प्रकोप होने पर फल नही बनते। कीट एक लसलसा द्रव छोड़ता है जिससे काला कवक लग जाता है।

इस कीट के रोकथाम के लिए अनार के बाग के आस-पास के पौधे जो इसके संरक्षण का काम करते हैं, उनको नष्ट कर देते हैं। कीटों को पेड़ पर चढ़ने से रोकने के लिए 30 से 40 सेमी. चैड़ी 400 गेज एल्काथीन की पट्टी सतह से 60 सेंमी. उॅचाई पर तने के चारों ओर अच्छी तरह बांध देते हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 5 से 10 सेमी. चैड़ी ग्रीस की परत चढ़ाने से कीट पौधो पर नही चढ़ पाते। 

स्केल कीट : यह कीट पौधों के तनों एवं फलों में छोटे काले धब्बे व दाग उत्पन्न करते हैं। इसके प्यूपा और वयस्क फल लगी कोमल टहनियों का रस चूस कर हानि पहुचाते हैं। कीट का प्रकोप अधिक होने पर समूचा पौधा सूख जाता है। रोकथाम के लिए प्रभावित टहनियों को काट कर अलग कर देना चाहिए। रोगोर 1 प्रतिशत का घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

पत्ती एवं फल धब्बा रोग : इस राग से मृग बहार की फसल अधिक प्रभावित होती है। बरसात में अधिक नमी के कारण पत्तियों और फलों के उपर फफूद के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। प्रभावित पत्तिया गिर जाती हैं। फलों में सड़न शुरू हो जाती है। इसकी रोकथाम के लिए मैंकाजेब या डाईथेन एम-45 दवा का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बना कर 15 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतनुसार 2-3 छिड़काव करना चाहिए।

फल सड़न : इस रोग में फलों और वृन्तों पर गोल, काले धब्बे पड़ जाते हैं। सड़े फलों से तीव्र दुर्गंध आने लगती है। रोग धीरे-धीरे पूरे फलों पर फैल जाता हे। इस रोग के नियंत्रण के लिए फूल बनने के बाद 10-15 दिन के अन्तराल पर मैंकाजेब या डाईथेन एम-45 दवा का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

अंतर्वती फसलें : शुरूआत के तीन वर्षों तक अनार के पौधे काफी छोटे होते हैं। इस दौरान फसल से कोई व्यवसायिक उत्पादन भी नही होता। अतः खेत में खाली पड़े स्थान को फसलों को उगाने के लिए उपयोग में लाकर अतिरिक्त लाभ कमाया जा सकता है। अंतर्वती फसलों के रूपम में कम बढ़ने वाली सब्जी की फसलें जैसे टमाटर, बैंगन, मिर्च, भिण्डी, पालक, चैलाई, मूली, गाजर, मटर आदि बखूबी उत्पादन किया जा सकता है।

उत्पादन: पौध रोपण के एक वर्ष बाद ही फल आने लगते हैं , लेकिन पौधों के समुचित विकास के लिए दो-तीन वर्ष तक फसल नही लेना चाहिए। पौधों पर फूल आने के 5-6 माह बाद फल पकने शुरू हो जाते हैं। फलो का रंग जैसे ही हरे से हल्का पीला या लाल में बदलना शुरू हो जाय तो समझना चाहिए की फल पकने की अवस्था में आ गए हैं।

पके फलों की तुड़ाई का कार्य तुरन्त कर लेना चाहिए अन्यथा फल फटने लगते हैं। उत्पादन मुख्य रूप से पौधों की उम्र, फसल की देख-रेख, पौधों के आकार पर निर्भर करती है। फसल से प्रारम्भ में उत्पादन कुछ कम मिलता है। लेकिन 8-10 वर्ष पुराने पौधों से 180 से 200 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हो जाता है।

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एक हेक्टेयर अनार (Pomegranate) की खेती का आय-व्यय विवरण

नोट: यह विवरण वैज्ञानिक खेती, ड्रिप सिंचाई एवं अच्छी प्रबंधन व्यवस्था के आधार पर पूर्ण उत्पादन (4–5 वर्ष बाद) का अनुमान है। क्षेत्र, किस्म, बाजार मूल्य एवं उत्पादन के अनुसार आय-व्यय में अंतर हो सकता है।

मदअनुमानित लागत ()
भूमि की तैयारी20,000
पौधे (625 पौधे @ ₹80)50,000
गड्ढे की खुदाई एवं रोपण35,000
गोबर की खाद (15–20 टन)40,000
उर्वरक एवं सूक्ष्म पोषक तत्व45,000
ड्रिप सिंचाई एवं रखरखाव (वार्षिक)20,000
सिंचाई एवं बिजली15,000
खरपतवार नियंत्रण15,000
कीटनाशी एवं फफूंदनाशी40,000
छंटाई एवं पौध संरक्षण25,000
मजदूरी70,000
तुड़ाई, ग्रेडिंग एवं पैकिंग70,000
परिवहन एवं विपणन35,000
अन्य आकस्मिक खर्च20,000
कुल लागत₹5,00,000

उत्पादन एवं आय

विवरणअनुमान
पौधों की संख्या625
औसत उत्पादन15–18 टन/हेक्टेयर
औसत बिक्री मूल्य₹100/kg
सकल आय₹15,00,000–18,00,000

शुद्ध लाभ

विवरणराशि
सकल आय₹15,00,000–18,00,000
कुल लागत₹5,00,000
शुद्ध लाभ₹10,00,000–13,00,000 प्रति हेक्टेयर

लागत-लाभ अनुपात (B:C Ratio)

  • लगभग 1 : 3.0 से 1 : 3.6

अनार की खेती की महत्वपूर्ण बातें :

  • अनार का बाग 3–4 वर्ष में व्यावसायिक उत्पादन देना शुरू करता है।
  • 5वें वर्ष से 12–15 वर्ष तक अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।
  • ड्रिप सिंचाई, संतुलित पोषण, समय पर छंटाई तथा फल छेदक एवं बैक्टीरियल ब्लाइट का प्रभावी नियंत्रण लाभप्रदता बढ़ाने में महत्वपूर्ण है।
  • यदि फल की ग्रेडिंग, पैकेजिंग और सीधे थोक मंडी, सुपरमार्केट या निर्यात बाजार में बिक्री की जाए तो शुद्ध लाभ और अधिक हो सकता है।

निष्कर्ष :

अनार एक उच्च मूल्य वाली बागवानी फसल है, जिसकी वैज्ञानिक एवं उन्नत खेती से किसान कम क्षेत्रफल में भी उत्कृष्ट उत्पादन और अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उपयुक्त किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, ड्रिप सिंचाई, बहार प्रबंधन तथा रोग-कीटों का समय पर नियंत्रण अपनाकर फल की गुणवत्ता और उत्पादकता दोनों बढ़ाई जा सकती हैं। बढ़ती घरेलू एवं निर्यात मांग को देखते हुए अनार की व्यावसायिक खेती किसानों की आय दोगुना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।  

अनार की खेती पर  अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्  : ( FAQ )

1. अनार की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी कौन-सी है?
अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी, जिसका pH 6.5–7.5 हो।

2. अनार की खेती के लिए सबसे अच्छी किस्म कौन-सी है?
गणेश, मृदुला, अरक्ता, भगवा, ज्योति, स्पेनिस रूबी और जालौर सीडलेस प्रमुख किस्में हैं।

3. एक हेक्टेयर में कितने अनार के पौधे लगाए जाते हैं?
4 × 4 मीटर दूरी पर लगभग 625 पौधे लगाए जा सकते हैं।

4. अनार का पौधा कितने वर्ष बाद उत्पादन देना शुरू करता है?
व्यावसायिक उत्पादन सामान्यतः 3–4 वर्ष बाद प्रारंभ होता है।

5. एक हेक्टेयर अनार की खेती से कितना उत्पादन मिलता है?
पूर्ण विकसित बाग से लगभग 15–18 टन (अच्छे प्रबंधन में 18–20 टन तक) उत्पादन प्राप्त हो सकता है।

6. अनार की खेती से कितनी कमाई होती है?
औसतन ₹10–13 लाख प्रति हेक्टेयर शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जो उत्पादन एवं बाजार मूल्य पर निर्भर करता है।

7. अनार के फलों के फटने का मुख्य कारण क्या है?
अनियमित सिंचाई तथा बोरॉन, कैल्शियम एवं पोटाश की कमी प्रमुख कारण हैं।

8. अनार में बहार उपचार क्यों किया जाता है?
बेहतर गुणवत्ता, अधिक उत्पादन और बाजार की मांग के अनुसार एक समान फल उत्पादन प्राप्त करने के लिए।

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