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पशुओं को  जानलेवा बीमारियों से बचाव के व्यावहारिक उपाय

किसानों और पशुपालको की छोटी-सी लापरवाही भी उन्हें लाखों का नुकसान पहुँचा सकती है। जानिए पशुओं की प्रमुख बीमारियों की पहचान, बचाव, उपचार और समय पर टीकाकरण की पूरी जानकारी, क्योकि स्वस्थ पशु ही समृद्ध किसान की पहचान है।

भारत एक विशाल पशुधन आबादी वाला देश है। यहा की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में हमेशा से पशुपालन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।  आज भी पशुपालन करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आय और आजीविका का प्रमुख स्रोत है। देश की कुल पशुधन आबादी लगभग 53.57 करोड़ है जिनमें 19.24 करोड़ गौवंश, 10.99 करोड भैस, 7.43 करोड भेड़ एवं 14.89 करोड बकरी की आबादी है। छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसान दूध उत्पादन तथा पशुपालन के माध्यम से अपनी आजीविका मजबूत करते हैं। ऐसे में पशुओं का स्वस्थ रहना केवल पशुपालक के लिए ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अधिकांश पशुपालक वैज्ञानिक तौर-तरीकों की बजाय पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं। रोगों की जानकारी, समय पर टीकाकरण और उचित प्रबंधन के अभाव में हर वर्ष बड़ी संख्या में पशु गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाने से किसानों को बहुत आर्थिक नुकसान होता हैं। इससे दूध उत्पादन घटता है, उपचार पर भारी खर्च आता है और कई बार पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है।

पशु चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इलाज से बेहतर बचाव होता है। इस सूत्र को अपनाकर अधिकांश संक्रामक एवं चयापचयी रोगों से आसानी से पशुओं  को बचा जा सकता है। नियमित टीकाकरण, संतुलित आहार, साफ-सुथरा पशुशाला वातावरण और समय पर पशु चिकित्सक से संपर्क पशुओं को स्वस्थ रखने का सबसे प्रभावी तरीका है। आइए, आज हम पशुओं में होने वाले विभिन्न रोगों, उनके प्रमुख लक्षणों, कारणों तथा उनके व्यावहारिक निदान एवं प्रभावी उपचार के बारे में विस्तार से जानते हैं।

मिल्क फीवर : अधिक दूध देने वाले पशुओं की गंभीर समस्या

मिल्क फीवर मुख्यतः अधिक दूध देने वाली गाय, भैंस और कभी-कभी बकरियों में ब्याने के 72 घंटे के भीतर देखने को मिलता है। आमतौर से तीसरे से पाचवें ब्यात में इस बीमारी का असर अधिक होता है। तुरन्त ब्याई हुई बकरी, भेड़ और सुअरियों में भी यदा कदा यह बीमारी देखने को मिलती है। शरीर में कैल्शियम की अचानक कमी इस बीमारी का प्रमुख कारण होती है। प्रभावित पशु चारा-दाना छोड़ देता है, कान, थन और पैर ठंडे पड़ जाते हैं तथा गर्दन पीछे की ओर मुड़ जाती है।

ऐसे लक्षण दिखाई देने पर स्वयं उपचार करने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। समय पर कैल्शियम उपचार मिलने पर अधिकांश पशु शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं।

बांझपन : उत्पादन घटाने वाली बड़ी चुनौती

यदि पशु बार-बार गर्भाधान के बाद भी गर्भधारण नहीं करता या लंबे समय तक गर्भित नहीं होता, तो उसे बांझपन की समस्या माना जाता है। इसके पीछे हार्मोन असंतुलन, कुपोषण, प्रजनन अंगों की खराबी, गर्भाशय संक्रमण या आनुवंशिक कारण हो सकते हैं।

इससे बचाव के लिए पशुओं को संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन, खनिज मिश्रण तथा विटामिन युक्त भोजन देना आवश्यक है। नियमित प्रजनन जांच भी करानी चाहिए।

सुर्रा रोग : मक्खियों से फैलने वाला जानलेवा संक्रमण

पशुओं की एक भयानक बीमारी है। सुर्रा रोग डास मक्खियों के माध्यम से फैलता है और गर्म एवं आर्द्र क्षेत्रों में अधिक देखा जाता है। इस रोग में पशु के शरीर में खून की कमी हो जाती है, भूख समाप्त हो जाती है, शरीर कमजोर पड़ जाता है तथा कई पशुओं में चक्कर आने और गोल-गोल घूमने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

समय पर उपचार न मिलने पर पशु की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए मक्खियों पर नियंत्रण और शीघ्र चिकित्सकीय उपचार अत्यंत आवश्यक है।

पशु प्लेग (रेन्डरपेस्ट) : अत्यधिक संक्रामक बीमारी

इस बीमारी को महामारी, पशु प्लेग, पकवा, बेदन, शीतला आदि नामों से भी जानते है। यह विषाणु जनित रोग अत्यंत तेजी से एक पशु से दूसरे पशु में फैलता है। तेज बुखार, आंख और नाक से पानी बहना, मुंह में छाले, दुर्गंधयुक्त दस्त, दातों से कटकटाहट की आवाज तथा अत्यधिक कमजोरी इसके प्रमुख लक्षण हैं।

ऐसे पशुओं को तुरंत अलग रखें और पशु चिकित्सक की सलाह पर उपचार एवं टीकाकरण कराएं। संक्रामक रोगों में देरी पूरे पशुधन के लिए खतरा बन सकती है।

थिलेरियोसिस : किलनियों से फैलने वाला रोग

यह बीमारी विशेष रूप से संकर एवं विदेशी नस्ल के पशुओं में अधिक पाई जाती है। किलनियों के काटने से यह रोग फैलता है। पशु को तेज बुखार, शरीर में खून की कमी, कमजोरी तथा लसीका ग्रंथियों में सूजन दिखाई देती है। पशु के शरीर का तापमान 105 से 107 डिग्री फहरेनहाइट तक आ जाता है।

पशुशाला में नियमित सफाई, किलनी नियंत्रण तथा कीटनाशकों का वैज्ञानिक उपयोग इस बीमारी की रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय है।

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निमोनिया : मौसम बदलते ही बढ़ जाता है खतरा

यह पशुओं के फेफड़े की बीमारी है। इस बीमारी को फुप्फुस दाह, फेफड़े के प्रदाह फुप्फुसार्ति के नामों से भी जाना जाता है। यह बीमरी एक प्रकार के जीवाणु व्दारा फैलती है। ठंड, बारिश, अचानक तापमान परिवर्तन तथा भीगने के कारण पशुओं में निमोनिया होने की संभावना बढ़ जाती है। प्रभावित पशु को तेज बुखार, तेज सांस चलना, खांसी तथा नाक से गाढ़ा स्राव निकलने लगता है।

ऐसे पशुओं को टाट, बोरे या कम्बल से ढ़क कर पशु को गर्मी प्रदान करें। पशुशाला को गर्म  रखने के उपाय करें और गुनगुना पानी दें तथा तुरंत कुशल पशु चिकित्सक से उपचार कराएं।

एकटंगा (ब्लैक क्वार्टर) : युवा पशुओं के लिए घातक रोग

इस बीमारी को लगड़िया, जहरबाद, फड़ सूजन आदि नामों से जानते हैं।  यह जीवाणु जनित संक्रामक रोग प्रायः तीन वर्ष तक की आयु वाले पशुओं में अधिक पाया जाता है। वर्षा ऋतु में इस बीमारी का असर ज्यादा होता है। प्रभावित अंग में दर्दयुक्त सूजन, दबाने पर चरचराहट तथा पशु का लंगड़ाकर चलना इसके प्रमुख लक्षण हैं।

इस रोग का सबसे प्रभावी बचाव समय पर टीकाकरण है। विशेषकर वर्षा ऋतु से पहले टीका अवश्य लगवाना चाहिए।

खुरपका-मुंहपका : दूध उत्पादन पर सीधा असर

खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) पशुओं  की सबसे गंभीर संक्रामक बीमारियों में से एक है। यह बीमारी मुख्य रूप से गाय, भैस, भेड़, बकरी और सूअर में होती है। इस रोग में मुंह, जीभ, मसूड़ों तथा खुरों में छाले पड़ जाते हैं, पशु खाना छोड़ देता है और दूध उत्पादन तेजी से घट जाता है।

बीमारी के निदान के लिए रोगी पशु के मुह को तीन-चार बार पोटैशिायम परमैग्नेट 1 ग्राम/लीटर या बोरिक एसिड 5ग्राम/लीटर या फिर फिटकरी 5 ग्राम/लीटर पानी में घोल कर धुलाई करें। पशु के खुरों को फिनायल 40 मिली लीटर/प्रति लीटर पानी में घोल कर सफाई करें। बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें। निर्धारित समय पर एफएमडी का टीका अवश्य लगवाएं।

गला घोटू : मानसून में बढ़ जाता है प्रकोप

गला घोटू (हेमोरेजिक सेप्टीसीमिया) मानसून के दौरान तेजी से फैलने वाली गंभीर जीवाणु जनित बीमारी है। इसमें तेज बुखार, गर्दन एवं गले में सूजन, सांस लेने में कठिनाई तथा अत्यधिक कमजोरी दिखाई देती है। पशु के मुॅह से घुर्र-घुर्र की आवाज आने लगती है।

समय पर उपचार न मिलने पर 24 घंटे के भीतर पशु की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए वर्षा ऋतु शुरू होने से पहले टीकाकरण कराना अत्यंत आवश्यक है।

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उपचार से बेहतर बचाव

आमतौर से गाय, भैंस, भेड़ एवं बकरी में लगाए जाने वाले प्रमुख टीकों की  समय-सारिणी दी गई है। पशुओं को बीमारियों से बचाने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार समय पर टीकाकरण अवश्य कराना चाहिए।

पशुरोग (टीका)पहली खुराकबूस्टर/पुनः टीकाकरण
गाय/भैंसखुरपका-मुंहपका (FMD)4 माह की आयु के बादप्रत्येक 6 माह में
गलघोंटू (HS)6 माह की आयुवर्ष में 1 बार (मार्च–मई)
ब्लैक क्वार्टर (BQ)6 माह की आयुवर्ष में 1 बार, विशेषकर वर्षा से पहले
लम्पी स्किन डिजीज (LSD)4 माह या उससे अधिक सामान्यतः वार्षिक
एन्थ्रेक्स (प्रभावित क्षेत्रों में)6 माह की आयुवर्ष में 1 बार
   
भेड़एंटरोटॉक्सिमिया (ET)3 माह की आयु21–30 दिन बाद बूस्टर, फिर वर्ष में 1 बार
पीपीआर (PPR)3–4 माह की आयु3 वर्ष में 1 बार (या स्थानीय निर्देशानुसार)
शीप पॉक्स3 माह की आयुवर्ष में 1 बार (स्थानिक क्षेत्रों में)
एफएमडी (FMD)4 माह की आयुप्रत्येक 6 माह में
एन्थ्रेक्स (स्थानिक क्षेत्रों में)6 माह की आयुवर्ष में 1 बार
बकरीपीपीआर (PPR)3–4 माह की आयु3 वर्ष में 1 बार (या स्थानीय निर्देशानुसार)
एंटरोटॉक्सिमिया (ET)3 माह की आयु21–30 दिन बाद बूस्टर, फिर वर्ष में 1 बार
गोट पॉक्स3 माह की आयुवर्ष में 1 बार
एफएमडी (FMD)4 माह की आयुप्रत्येक 6 माह में
एन्थ्रेक्स6 माह की आयुवर्ष में 1 बार

टीकाकरण के समय बरती जाने वाली महत्वपूर्ण सावधानियाँ :

  • केवल स्वस्थ पशुओं का ही टीकाकरण कराएं।
  • कृमिनाशक दवा (Deworming) टीकाकरण से लगभग 10–15 दिन पहले देना लाभकारी रहता है।
  • टीके हमेशा कोल्ड चेन (2–8°C) में सुरक्षित रखें।
  • टीकाकरण के बाद पशु को 30–60 मिनट तक निगरानी में रखें।
  • गर्भित पशुओं में कुछ टीकों के लिए विशेष सावधानी आवश्यक होती है। इसलिए पशु चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

पशुओं को स्वस्थ रखने की कुछ खस व्यावहारिक बातें।

  • सभी पशुओं का नियमित टीकाकरण कराएं।
    • संतुलित एवं पौष्टिक आहार के साथ खनिज मिश्रण अवश्य दें।
    • पशुशाला को प्रतिदिन साफ एवं सूखा रखें।
    • मक्खी, मच्छर एवं किलनियों पर प्रभावी नियंत्रण रखें।
    • बीमार पशु को तुरंत अलग रखें।
    • स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराएं।
    • मौसम के अनुसार पशुओं को गर्मी और ठंड से बचाएं।
    • नवजात बछड़ों की विशेष देखभाल करें।
    • पशुओं का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराएं।
    • किसी भी बीमारी में स्वयं दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

निष्कर्ष :

पशुओं की अधिकांश बीमारियों पर समय रहते नियंत्रण पाया जा सकता है, बशर्ते पशुपालक जागरूक हों और वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों को अपनाएं। नियमित टीकाकरण, संतुलित पोषण, स्वच्छ पशुशाला, परजीवी नियंत्रण तथा पशु चिकित्सक की समय पर सलाह न केवल पशुओं को स्वस्थ रखती है, बल्कि दूध उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि करती है। स्वस्थ पशु ही एक समृद्ध किसान और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्  : F.A.Q.

Q1. पशुओं में सबसे सामान्य संक्रामक रोग कौन-कौन से हैं?
उत्तर: खुरपका-मुंहपका (FMD), गला घोटू (HS), ब्लैक क्वार्टर (BQ), थिलेरियोसिस और सुर्रा प्रमुख संक्रामक रोग हैं।

Q2. पशुओं को बीमारियों से कैसे बचाया जा सकता है?
उत्तर: नियमित टीकाकरण, संतुलित आहार, स्वच्छ पशुशाला, परजीवी नियंत्रण, स्वच्छ पेयजल और समय पर पशु चिकित्सक की सलाह से अधिकांश बीमारियों की रोकथाम की जा सकती है।

Q3. खुरपका-मुंहपका रोग के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
उत्तर: मुंह और खुरों में छाले, तेज लार गिरना, चारा न खाना, बुखार तथा दूध उत्पादन में कमी इसके प्रमुख लक्षण हैं।

Q4. मिल्क फीवर किस कारण होता है?
उत्तर: ब्याने के बाद शरीर में कैल्शियम की अचानक कमी होने से मिल्क फीवर होता है, विशेषकर अधिक दूध देने वाले पशुओं में।

Q5. गला घोटू रोग से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय क्या है?
उत्तर: मानसून से पहले नियमित टीकाकरण और पशुओं की उचित देखभाल इस रोग से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।

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