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पशुओं के बेहतर पोषण के लिए बरसीम की खेती कैसे करें? जानिए बुवाई से कटाई तक पूरी जानकारी

देश दूध उत्पादन में दुनिया में अग्रणी स्थान रखता है, लेकिन प्रति पशु औसत दूध उत्पादन बढ़ाना आज भी पशुपालन क्षेत्र की बड़ी चुनौती है। इसके प्रमुख कारणों में पशुओं को संतुलित एवं पौष्टिक आहार न मिलना भी शामिल है। पशुओं के बेहतर स्वास्थ्यए दूध उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के लिए हरे चारे की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। इस दृष्टि से बरसीम की खेती पशुपालकों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आती है।

बरसीम रबी मौसम में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी चारा फसल है। इसका हरा चारा स्वादिष्टए सुपाच्य और पौष्टिक होता है। इसमें लगभग 20 – 24 प्रतिशत प्रोटीन के साथ कैल्शियम एवं फॉस्फोरस जैसे आवश्यक खनिज तत्व भी पाए जाते हैं। यही कारण है कि यह दुधारू पशुओं के आहार के लिए विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।

बरसीम की एक और खासियत यह है कि इसकी कटाई कई बार की जा सकती है। इससे सर्दियों में लंबे समय तक हरा चारा मिलता रहता है। इसके अतिरिक्तए इससे अच्छी गुणवत्ता का साइलेज भी तैयार किया जा सकता है, जिसे चारे की कमी के समय उपयोग में लाया जा सकता है।

मिट्टी की सेहत सुधारने में भी उपयोगी :

बरसीम केवल पशुओं के लिए पौष्टिक चारा ही नहीं है, बल्कि खेत की मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक है। दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं की ग्रंथियां बनती हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में मदद करती हैं।

फसल की अंतिम कटाई के बाद इसे खेत में पलटकर हरी खाद के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और अगली फसल के लिए भूमि की गुणवत्ता सुधारने में सहायता मिलती है।

बरसीम की खेती के लिए जलवायु और भूमि :

बरसीम की अच्छी बढ़वार के लिए ठंडी एवं अर्धशुष्क जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। बीज के अंकुरण और शुरुआती बढ़वार के लिए लगभग 15 – 25 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल रहता है। अधिक वर्षा और जलभराव वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए कम उपयुक्त होते हैं।

इसकी खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है, लेकिन अच्छी जल निकासीए पर्याप्त नमी धारण क्षमता और उचित वायु संचार वाली भूमि बेहतर परिणाम देती है। अम्लीय मिट्टी में इसकी बढ़वार प्रभावित हो सकती है।

खेत की तैयारी और उन्नत किस्मों का चयन :

बरसीम के बीज आकार में छोटे होते हैं, इसलिए खेत को भुरभुराए समतल और खरपतवार रहित बनाना आवश्यक है। खेत की गहरी जुताई के बाद दो – तीन बार हल या कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए। सिंचाई की सुविधा के अनुसार छोटी क्यारियां बनाना भी उपयोगी रहता है।

अच्छे उत्पादन के लिए स्थानीय कृषि जलवायु के अनुकूल प्रमाणित उन्नत किस्मों का चयन करें। बरसीम लुधियाना-1, वरदान, पूसा जाइंट, वरुणा, बीज खरीदते समय वर्तमान क्षेत्रीय सिफारिशों और प्रमाणित बीज की उपलब्धता की पुष्टि अवश्य करें।

बीज की मात्रा और उपचार पर दें विशेष ध्यान :

एक हेक्टेयर खेत की बुवाई के लिए लगभग 25 – 30 किलोग्राम अच्छी गुणवत्ता वाले बीज की आवश्यकता होती है। बीज साफ, स्वस्थ और खरपतवार के बीजों से मुक्त होना चाहिए। बरसीम के बीज में कसनी नामक खरपतवार के बीजों की मिलावट होने की आशंका रहती है, इसलिए बीज की शुद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।

जहां बरसीम पहली बार उगाई जा रही हो, वहां राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार करना लाभकारी होता है। इससे जड़ों में प्रभावी ग्रंथियों के विकास और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद मिलती है।

बरसीम की बुवाई का सही समय :

उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में बरसीम की बुवाई का उपयुक्त समय सितंबर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के अंत तक माना जाता है। सामान्यतः अक्टूबर का पहला पखवाड़ा अच्छी पैदावार के लिए अनुकूल रहता है।

बुवाई की सही विधि अपनाएं :

बरसीम की बुवाई तैयार खेत में छोटी – छोटी क्यारियां बनाकर की जा सकती है। पर्याप्त नमी वाली क्यारियों में बीज को समान रूप से छिड़कें। सूखे खेत में छिटकवां बुवाई करने के बाद हल्की हैरो या अन्य उपयुक्त विधि से बीज को मिट्टी के संपर्क में लाएं और आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करें।

बीज को बहुत गहराई में नहीं बोना चाहिएए क्योंकि छोटे बीजों के अंकुरण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

खाद एवं उर्वरक का संतुलित प्रबंधन :

अच्छी तरह सड़ी हुई 100-200 कुन्तल गोबर या कम्पोस्ट की खाद को बुआई एक माह पूर्व खेत में डालकर मिट्टी पलट हल से जुताई कर मिला दे। बरसीम की अच्छी पैदावार लेने के लिए 20-30 किलोग्राम नाईट्रोजन एवं 80-90 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से दे। उर्वरक की पूरी मात्रा अन्तिम जुताई के समय खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। नाईट्रोजन की मात्रा प्रारम्भ में देने से पौधों बढ़वार अच्छी होती है तथा जडों में छोटी-छोटी ग्रन्थियॉ बन जाती है। इन ग्रन्थियों में पाये जाने वाले राईजोबियम नामक जीवाणु वातावरण में उपलब्ध नाईट्रोजन को भेजन के रूप में बदलने लगते हैं। इस प्रकार से पौधें अपनी नत्रजन की पूर्ति खुद कर लेते हैं। बरसीम की फसल को बोरान और मोलिब्लेडनम तत्व देना भी लाभकारी होता है।

सिंचाई प्रबंधन :

फसल की पहली सिंचाई बुआई के बाद पौधे दिखाई देते ही करना चाहिए। इसके बाद प्रत्येक सप्ताह के अन्तर पर 2-3 सिंचाई करनी चाहिए। तत्पष्चात फरवरी माह के अन्त तक 20-25 दिन के अन्तराल पर तथा मार्च से मई माह तक 10 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। आमतौर से बरसीम के प्रत्येक कटाई के बाद 4 से 5 सटीमीटर गहरी सिंचाई करनी चाहिए।

कटाई का रखें ध्यान :

सामान्यतः पहली कटाई बुवाई के लगभग 40 – 45 दिन बाद की जा सकती है। इसके बाद मौसम और फसल की बढ़वार के अनुसार लगभग 20 – 35 दिन के अंतराल पर कटाई की जाती है। कटाई जमीन से लगभग 5 सेंटीमीटर ऊपर करना उपयोगी रहता हैए ताकि पौधों का पुनर्विकास हो सके। उचित प्रबंधन में एक मौसम के दौरान लगभग 5 – 6 कटाइयां संभव हो सकती हैं।

फसल सुरक्षा में बरतें सावधानी :

बरसीम में सामान्यतः रोगों और कीटों का प्रकोप सीमित रह सकता हैए लेकिन कुछ परिस्थितियों में सेमीलूपर, चने की सूंडी, थ्रिप्स, माहू और ग्रासहॉपर जैसे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं।

कीट दिखाई देने पर पहले उनकी सही पहचान करें और समेकित कीट प्रबंधन अपनाएं। किसी भी कीटनाशक का प्रयोग केवल वर्तमान कृषि विशेषज्ञ की सलाहए उत्पाद के लेबल और पशुओं के लिए निर्धारित सुरक्षित प्रतीक्षा अवधि के अनुसार ही करें। चारे की कटाई और पशुओं को खिलाने से पहले दवा की निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन करना अत्यंत जरूरी है।

बीज उत्पादन से बढ़ सकती है किसानों की आय :

बरसीम की खेती केवल हरे चारे तक सीमित नहीं है। किसान चाहें तो फसल के एक हिस्से को बीज उत्पादन के लिए भी रख सकते हैं। बीज तैयार करने के लिए फसल की बुआई लाईन में करनी चाहिए। बरसीम की तीन कटाइयॉ करने के बाद फसल को बीज बनने के लिए छोड़ देना चाहिए। चारे की कटाई बंद करने का उचित समय फरवरी का अंतिम सप्ताह या मार्च का प्रथम सप्ताह होता है। फसल में तब तक सिंचाई नही करनी चाहिए, जब तक पौधों में फूल वाली कलियॉ न निकलना षुरू हो जाय।  पौधों में कलियॉ दिखाई देते ही सिंचाई कर देना चाहिए। देर से बुआई करने पर व जिन क्षेत्रों में  मार्च माह में अधिक गर्मी पडती हो वहॉ बरसीम की केवल दो कटाइयॉ करनी चाहिए। बरसीम की फसल में अप्रैल माह में फूल खिलने लगते हैं। पौधों में बीज बनकर मई के अन्त तक फसल पक कर तैयार हो जाती है। पकी हुई फसल को उचित समय पर कटाई अवष्य करे। हाथ पीट कर या बैलों व्दारा मड़ाई करके बीज को अलग कर लेते हैं। देर से कटाई करने पर बीज का उपदन कम हो जाता है। अच्छी तरह तैयार की गई फसल से एक हेक्टेयर से 6-7 कुन्तल तक बीज का उत्पादन हो जाता है। बीज को अच्छी तरह साफ कर, सुखा कर व अच्छे पात्रों में भरकर उचित स्थान पर भण्डारण करना चाहिए।

इसके लिए उपयुक्त किस्म, समय पर बुवाई, परागण की अनुकूल परिस्थितियां और उचित फसल प्रबंधन आवश्यक हैं।

फसल में फूल आने और बीज पकने के दौरान सिंचाई एवं कटाई का प्रबंधन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। बीज पूरी तरह पकने पर समय से कटाई, मड़ाई, सफाई और उचित भंडारण करें। इससे अगली बुवाई के लिए गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध होने के साथ अतिरिक्त आय की संभावना भी बनती है।

प्रति हेक्टेयर कितना मिल सकता है उत्पादन :

 चारे का उत्पादन फसल के उचित प्रबंधन एवं प्रजातियों के चुनाव पर निर्भर करता है। चारे के उद्ेदष्य से तैयार की गई फसल से प्रति हेक्टेयर 1000 से 1200 कुन्तल तक हरा चारा का उत्पादन हो जाता है। बीज उत्पादन के उद्ेदष्य से तैयार की गई फसल से प्रति हेक्टेयर 500 से 600 कुन्तल तक हरा चारा व 4 से 6 कुन्तल बीज का उत्पादन होता है। चारे के अतिरिक्त बीज की बिक्री से किसानों को अतिरिक्त लाभ होता है।

निष्कर्ष :

बरसीम की खेती पशुपालकों को पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराने, दुधारू पशुओं के पोषण में सुधार करने और खेत की मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने का उपयोगी माध्यम है। यदि किसान प्रमाणित बीज, उचित बुवाई, संतुलित पोषण, समय पर सिंचाई और सही कटाई प्रबंधन अपनाएंए तो बरसीम पशुपालन आधारित कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने में योगदान दे सकती है।

बरसीम की खेती पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न  (FAQ)

प्रश्न 1: बरसीम की बुवाई कब करनी चाहिए?

उत्तर: उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में सामान्यतः सितंबर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के अंत तक बरसीम की बुवाई की जाती है। स्थानीय मौसम और कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश के अनुसार समय चुनें।

प्रश्न 2: एक हेक्टेयर में बरसीम का कितना बीज लगता है?

उत्तर: सामान्यतः 25–30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता हो सकती है। बीज की गुणवत्ता और बुवाई की विधि के अनुसार मात्रा समायोजित करें।

प्रश्न 3: बरसीम की पहली कटाई कब करनी चाहिए?

उत्तर: सामान्यतः बुवाई के लगभग 40–45 दिन बाद पहली कटाई की जा सकती है। वास्तविक समय मौसम और फसल की बढ़वार पर निर्भर करता है।

प्रश्न 4: बरसीम की खेती से क्या लाभ होता है?

उत्तर: बरसीम पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराती है, पशुओं के पोषण में सहायक होती है और दलहनी फसल होने के कारण मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण में योगदान देती है।

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