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हल्दी की व्यावसायिक खेती से भरपूर कमाई

किसान भाई जानें हल्दी की वैज्ञानिक खेती की पूरी जानकारी—उन्नत किस्में, जलवायु, बुआई, खाद, सिंचाई, रोग नियंत्रण, उत्पादन, प्रसंस्करण तथा एक हेक्टेयर की लागत, आय और मुनाफा।

देश और दुनिया में हल्दी की बढ़ती मांग ने किसानों के लिए इसे  बेहद  लाभकारी नकदी फसल बना दिया हैं। मसाले के साथ-साथ औषधीय, खाद्य प्रसंस्करण, कॉस्मेटिक और आयुर्वेदिक उद्योगों में हल्दी की मांग लगातार बढ़ रही हैं। विश्व के कुल हल्दी उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत भारत में पैदा होता है, जबकि देश में उत्पादित करीब 95 प्रतिशत हल्दी की खपत घरेलू बाजार में ही हो जाती है। स्पाइसेस बोर्ड के आँकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 11.5 लाख टन हल्दी का उत्पादन होता है। इसमें से लगभग 1.7–1.8 लाख टन करीब 15–16%  हल्दी का निर्यात किया जाता है, जबकि शेष उत्पादन का उपयोग घरेलू खपत एवं प्रसंस्करण उद्योगों में होता है। उल्लेखनीय है कि निर्यात की यह मात्रा अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद वैश्विक हल्दी व्यापार में भारत की लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में यदि किसान उन्नत किस्मों, वैज्ञानिक खेती, संतुलित पोषण, प्रभावी फसल प्रबंधन और उचित प्रसंस्करण तकनीकों को अपनाएँ, तो वे न केवल बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैंए बल्कि अपनी आमदनी में अच्छी – खासी वृद्धि भी कर सकते हैं। आज के इस लेख में हल्दी की व्यावसायिक खेती के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे ।

जलवायु : हल्दी ग्रीष्म कालीन फसल है। इसको अच्छी तरह फलनें-फूलने के लिए गर्म और तर जलवायु की आवश्यकता होती है। हल्दी की खेती 1500 मीटर उचाई वाले स्थानों तक सफलता पूर्वक की जा सकती है। पौधों की वृद्धि पर तापमान का विशेष महत्व होता है। हल्दी की अच्छी फसल के लिए 20 – 30 डिग्री सेन्टीग्रेड तक औसत तापमान की आवश्यकता होती है। 22 डिग्री सेन्टीग्रेड से कम तापमान पर पौधों की बढ़वार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसकी फसल के लिए शुरूआत में कम वर्षा, बढ़वार के समय अधिक वर्षा एवं पकते समय शुष्क वातावरण उपयुक्त रहता है।

भूमि : हल्दी की खेती उत्तम जल प्रबंध के व्दारा विभिन्न प्रकार की मृदाओं में किया जा सकता है। लेकिन, भरपूर उत्पादन की दृष्टि से हल्दी के लिए बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा सर्वोंत्तम रहती है। इसके पौधों को छाया वाले स्थान में भी उगा सकते है।

खेत की तैयारी : हल्दी के लिए खेत की तैयारी मानसून आने के पूर्व शुरू कर देनी चाहिए। अप्रैल या मई में मिट्टी पलट हल से दो जुताई करने के बाद हैरो व देशी हल चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा बना लेना चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर देना चाहिए। समतल खेत में 3×3 में 4×2 मीटर आकार की छोटी – छोटी क्यारियों में बाट लेना चाहिए। निचली भूमियों में क्यारियों को और छोटा कर व दो क्यारियों के बीच पानी निकलने के लिए 30 सेंटीमीटर जगह छोड़ देना चाहिए।

हल्दी की प्रमुख उन्नत किस्में : देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए अनेक उन्नत एवं अधिक उपज देने वाली हल्दी की किस्में विकसित की गई हैं। इन किस्मों का चयन स्थानीय जलवायु, मिट्टी तथा बाजार की मांग को ध्यान में रखकर करना चाहिए। अवधि  और क्षेत्र के अनुसार सही किस्म का चयन करने से उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

हल्दी की किस्मों को फसल की परिपक्वता अवधि (Maturity Duration) के आधार पर मुख्यतः अल्पकालीन, मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है। 

1. अल्पकालीन (Early Maturing) किस्में  : (7–8 माह में तैयार होने वाली)

  • कृष्णा (Krishna)
  • सुगंधम (Sugandham)
  • सुगुना (Suguna)
  • बी.एस.आर.-1 (BSR-1)
  • कोयम्बटूर-1 (CO-1)

विशेषताएँ : शीघ्र तैयार होने वाली, समय पर विपणन के लिए उपयुक्त तथा अच्छी गुणवत्ता वाली उपज।

2. मध्यकालीन (Medium Duration) किस्में  :  (8–9 माह में तैयार होने वाली)

  • स्वर्णा (Swarna)
  • रोमां (Roma)
  • सोनिया (Sonia)
  • रश्मि (Rashmi)
  • प्रतिभा (Pratibha)
  • प्रगति (Pragati)

विशेषताएँ : उच्च उत्पादन क्षमता, बेहतर करक्यूमिन (Curcumin) प्रतिशत तथा अधिकांश क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।

3. दीर्घकालीन (Late Maturing) किस्में : (9–10 माह में तैयार होने वाली)

  • सुदर्शन (Sudarshan)
  • सुरोमा (Suroma)
  • सागर (Sagar)
  • बरूआ (Barua)

विशेषताएँ : लंबे समय तक खेत में रहने के कारण अधिक प्रकंद विकास, उच्च उपज तथा प्रसंस्करण उद्योग के लिए उपयुक्त।

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बीज एवं बीजदर : हल्दी की बुआई के लिए बीज के रूप में प्रकंदों का इस्तेमाल करते हैं। ये प्रकंद दो प्रकार के अण्डाकार व गोलाकार होते है। दोनों तरह के प्रकंदों को बीज के लिए प्रयोग में लाते हैं। बीज के लिए रोग मुक्त प्रकंदों को प्रयोग में लाना चाहिए। प्रत्येक प्रकंदों में दो आखे और वजन कम से कम 25 ग्राम अवश्य होना चाहिए। प्रकंदों को टुकड़ों में काटकर भी बुआई की जा सकती है। एक हेक्टेयर की बुआई के लिए लगभग 12-15 कुन्तल प्रकंदों की जरूरत होती है। बीज हमेशा विश्वसनीय संस्था से क्रय करना चाहिए। कंदों को टाट के बोरों में लपेटकर 24 घंटे तक रख देने से अंकुरण अच्छा होता है।

बीजोपचार : कंदों को बुआई से पूर्व 0.25 प्रतिशत डाईथेन-एम-45 और बाविस्टीन 0.1 प्रतिशत के घोल में 1 घण्टे तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। इसके बाद एक-दो दिन तक इन कंदों को छाया में सुखाना चाहिए। कंदों को उपचारित करने से फसल को फफूद जनित रागों से रोकथाम हो जाती है।

बुआई का तरीका : कंदों की बुआई समतल खेत में क्यारियों या फिर मेंडों पर की जाती है। खेत को सुविधानुसार छोटी-छोटी क्यारियों में बाटकर 45 से 50 सेन्टीमीटर पंक्ति से पंक्ति व 20-25 सेन्टीमीटर बीज की आपसी दूरी पर कंदों की बुआई करते हैं। कंदों की बुआई मिट्टी में 4 सेन्टीमीटर की गहराई में करना चाहिए।

बोने का समय : हल्दी की बुआई का उपयुक्त समय अप्रैल से लेकर जुलाई तक होता है।

खाद एवं उर्वरक : हल्दी की फसल को काफी मात्रा में पोषक तत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जाच के उपरान्त करना चाहिए। मृदा परीक्षण न हो पाने की दशा में लगभग 300 कुन्तल कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर की दर से  बुआई के 15 दिन पूर्व खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 100 किग्रा., फास्फोरस 50 किग्रा. एवं पोटाश 50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए। फास्फोरस की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।

नाइट्रोजन की पूरी मात्रा को दो बराबर भागों में बाटकर बुआई के क्रमशः 40 व 90 दिन पर फसल को देना चाहिए। इसी प्रकार पोटाश की पूरी मात्रा को भी दो बराबर भागों में बाटकर प्रथम खेत तैयार करते समय व व्दितीय किस्त 90 दिन बाद देना चाहिए।

सिंचाई एवं जल निकास : गर्मी के दिनों में अप्रैल माह में बोई गई फसल में 10-12 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। हल्दी की फसल में प्रकंद निर्माण के समय खेत में हरहाल में नमी बनाये रखना चाहिए अन्यथा उत्पादन में भारी कमी हो जाती है। वर्षा ऋतु में खेत में अतिरिक्त पानी की वजह से प्रकंदों का विकास समुचित ढंग से नही हो पाता है। अतः हल्दी की फसल में उचित जल निकास का प्रबंध अवश्य करना चाहिए। इसके लिए खेत के चारों ओर 50 सेंटीमीटर चैड़ी व 60 सेंटीमीटर गहरी नाली बना देना चाहिए।

निराई-गुड़ाई : खरपतवार भूमि से पोषक तत्वों, स्थान, नमी एवं धूप आदि के लिए प्रतिस्पर्धा करतें हैं। इसलिए हल्दी की फसल को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। आमतौर पर खरपतवारों की रोकथाम के लिए 2-3 निराई-गुड़ाई पर्याप्त होती है। फसलोत्पादन पर निराई-गुड़ाई का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। गुड़ाई के साथ पौधों में मिट्टी चढ़ानें से प्रकंदों का विकास अच्छा होता है। निराई-गुड़ाई करते समय मिट्टी के अन्दर गांठों को नुकसान नही पहुचना चाहिए। फसल में यह कार्य 60, 120 और 150 दिन बाद करना चाहिए।

खुदाई : हल्दी की फसल बुआई के लगभग 7-9 महीने बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। हल्दी की अगेती किस्में 7-8 महीने, मध्यकालीन किस्में 8-9 महीने एवं पिछैती किस्में 9-10 महीने में खुदाई के लिए तैयार हो जाती हैं। जब पौधों की अधिकतर पत्तिया पीली पड़ कर सूखने लगे तो समझना चाहिए फसल की खुदाई के लिए तैयार है। खुदाई का कार्य फावड़ा, कस्सी या खुरपी से करना चाहिए। खुदाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि गाठें कटने न पाए।

उत्पादन : फसल का उत्पादन किस्मों, कर्षण क्रियाओं, बुआई के लिए प्रयुक्त कंदों का आकार, मिट्टी की उर्वरा शक्ति आदि के उपर निर्भर करता है। औसतन 200 से 250 कुन्तल प्रति हेक्टेयर कच्ची हल्दी की उपज हो जाती है। इस तरह से हल्दी के प्रसंस्करण के बाद 40 से 50  कुन्तल सूखी हल्दी प्राप्त होती है।

फसल सुरक्षा : हल्दी की फसल को लगने वाले कीड़े और बीमारियों से काफी नुकसान होता है। भरपूर फसलोत्पादन के लिए फसल सुरक्षा एक बहुत ही आवश्यक पहलू होता है। इस फसल को मुख्य रूप निम्नलिखित कीट और बीमारियों से हानि पहॅुचती है।

 तना छेदक कीट : इस कीट से फसल को बहुत हानि पहुचती है। इसकी सूडिया कोमल तनों में प्रवेश कर अनदर से खाना शुरू करती हैं। पौधे पीले पड़कर सूखना शुरू हो जाते हैं। प्रभावित पौधों की अहनियों के उपरी भाग में छेद दिखाई देने लगते हैं। इन छिद्रों से एक प्रकार का द्रव निकलता है। इस कीट की रोकथाम के लिए प्रभावित पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। मैलाथियान नामक दवा का 0.1 प्रतिशत का घोल तैयार कर फसल पर आवश्यकतानुसार एक या दो छिड़काव करना चाहिए।

थ्रिप्स : ये छोटे – छोटे कीट होते हें जो पौधों की पत्तियों एवं अन्य मुलायम भागों का रस चूसते हैं। इससे पौधों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस कीट की रोकथाम के लिए 0.03 प्रतिशत एल्ड्रिन 20 ई. सी. छिड़काव एक सप्ताह के अनतराल पर आवश्यकतानुसार करना चाहिए।

प्रकंद या जड़ विगलन: यह रोग पिथियम ऐफेनीडरमेंटम नामक फफूद से फैलता है। इस रोग इस प्रभावित से पौधों की निचली पत्तिया पीली पड़ जाती हैं। इसके बाद पूरा पौधा मुरझाकर सूख जाता है। पौधे के भूमि के समीप का भाग पनपिचा हो जाता है। बाद में पूरा का पूरा कंद सड़ जाता है। इसकी रोकथाम के लिए बीज प्रकंदों को 0.25 प्रतिशत सान्द्रता को घुलनशील सेरेसान में बुआई से पूर्व 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए। 

पत्ती का धब्बा रोग : यह रोग ट्रेफिना मेकुलस और कोलीटोट्रीकम केप्सिकाई नामक फफूॅद के व्दारा फैलता है। रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों के नसों के उपर अण्डाकार व अनियमित आकार के धब्बे दिखाई पड़ते हैं जो बाद में आपस में मिल जाते है। इससे पौधों का विकास रूक जाता है और कंद उत्पादन में भारी कमी आ जाती है।  इसकी रोकथाम के लिए 0.3 प्रतिशत बलाईटोक्स या 0.25 प्रतिशत डाईथेन एम-45 का 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। र्बोडों मिश्रण 50:  50:  50 का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

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हल्दी तैयार करने की प्रक्रिया :

उबालना : कच्ची हल्दी को बाजार में बिक्री के लिए व्यापारिक हल्दी में बदलना पड़ता है। इसके लिए हल्दी में तीन क्रियाए करनी पड़ती हैं। प्रथम हल्दी की गाठों को उबालना, व्दितीय गाठों को सुखाना, तृतीय गाठों को चमकाना, चतुर्थ गाठों को रंग चढ़ाना। कच्ची हल्दी की गाठों को स्वच्छ जल से अच्छी तरह धुल कर साफ कर देना चाहिए। इसके बाद ताबे की कड़ाही अथवा मिट्टी के बड़े पात्र में आग पर उबलनें के लिए रख दें। इन गाठों को तब तक उबालनें देना चाहिए जब तक की एक विशेष प्रकार की गंध के साथ पात्र से सफेद रंग का धुआ न निकलने लगे।

सुखना : उबली हुई गाठों को सुखानें में 10 से 12 दिन का समय लगता है। इनको बांस के बिछौने पर 5-7 सेंमी. पर्त बनाकर सुखाया जाता है।  उपर की पत्र जल्दी सूखती हैं लेकिन रंग में खराबी आ जाती है। रात के समय गाठों के ढक देना चाहिए। कृतिम रूप से 60 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर गाठों को सुखाया जाता है।

चमकाना: आमतौर पर हल्दी की ये सूखी गाठे आकर्षक नही होती हैं। बाजार में अच्छा मूल्य पाने के लिए सूखी गाठ को रगड़ व खरोचकर चमकाना पड़ता है। यह काम मशीन व्दारा भी किया जा सकता है।

रंग चढ़ना : बाजार में ग्राहको को आक्रर्षित करने के लिए गाठों के बाहरी सतह पर रंग चढ़ाया जाता है। इस क्रिया को दो तरह से सूखी एवं गीली विधि से किया जाता है। ड्रम में हल्दी का चूर्ण ढाल कर 10 मिनट तक रंग चढ़ाने के बाद धूप में सुखाया जाता है।

एक  हेक्टेयर हल्दी की खेती का अनुमानित आय-व्यय विवरण

अनुमानित व्यय

मदअनुमानित लागत ()
भूमि की तैयारी (जुताई, पाटा, बेड बनाना)20,000
बीज (20–25 क्विंटल @ ₹35–40/kg)85,000
बीज उपचार एवं रोपाई15,000
गोबर की खाद/कम्पोस्ट (20–25 टन)35,000
रासायनिक उर्वरक एवं सूक्ष्म पोषक तत्व25,000
सिंचाई20,000
खरपतवार नियंत्रण18,000
कीट एवं रोग नियंत्रण12,000
मजदूरी (गुड़ाई, निराई, मिट्टी चढ़ाना आदि)55,000
कटाई एवं खुदाई35,000
उबालना, सुखाना एवं पॉलिशिंग40,000
परिवहन एवं अन्य आकस्मिक खर्च20,000
कुल अनुमानित लागत₹3,80,000

अनुमानित आय

विवरणमात्रा
ताजी हल्दी का उत्पादन300 क्विंटल
सूखी हल्दी (लगभग 20% रिकवरी)60 क्विंटल
औसत बिक्री मूल्य₹11,000 प्रति क्विंटल

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सकल आय = 60 × ₹11,000 = ₹6,60,000

लाभ का विवरण

विवरणराशि ()
कुल सकल आय6,60,000
कुल लागत3,80,000
शुद्ध लाभ₹2,80,000
लाभ-लागत अनुपात (B:C Ratio)1 : 1.74

यदि अच्छी गुणवत्ता एवं बेहतर बाजार मिले

  • सूखी हल्दी का भाव ₹13,000–15,000 प्रति क्विंटल मिलने पर
  • सकल आय ₹7.8–9.0 लाख/हेक्टेयर तक हो सकती है।
  • शुद्ध लाभ ₹4–5 लाख/हेक्टेयर तक प्राप्त किया जा सकता है।

हल्दी की खेती पर  अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्  : ( FAQ )

प्रश्न 1. हल्दी की खेती के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन-सा है?

उत्तर : हल्दी की बुआई का सबसे उपयुक्त समय अप्रैल से जुलाई तक होता है। सिंचित क्षेत्रों में अप्रैल–मई तथा वर्षा आधारित क्षेत्रों में जून–जुलाई में बुआई करना बेहतर माना जाता है।

प्रश्न 2. हल्दी की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?

उत्तर : अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट या मटियार दोमट मिट्टी हल्दी की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। मिट्टी का pH 5.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। ,d

प्रश्न 3. एक हेक्टेयर में हल्दी के लिए कितने बीज की आवश्यकता होती है?

उत्तर : एक हेक्टेयर में सामान्यतः 12–15 क्विंटल स्वस्थ एवं रोगमुक्त प्रकंद (बीज) की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4. हल्दी की फसल कितने समय में तैयार हो जाती है?

उत्तर : किस्म के अनुसार हल्दी की फसल 7 से 10 महीने में तैयार हो जाती है। अगेती किस्में 7–8 माह तथा पछेती किस्में 9–10 माह में तैयार होती हैं।

 प्रश्न 5. हल्दी की खेती में प्रति हेक्टेयर कितना उत्पादन मिलता है?

उत्तर : वैज्ञानिक खेती अपनाने पर 200–300 क्विंटल कच्ची हल्दी तथा प्रसंस्करण के बाद 40–60 क्विंटल सूखी हल्दी प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 6. हल्दी की खेती से कितना लाभ होता है?

उत्तर : सामान्य बाजार भाव पर ₹2.5 से ₹3 लाख तक शुद्ध लाभ प्राप्त हो सकता है। यदि प्रसंस्करण और बेहतर विपणन किया जाए तो लाभ ₹4–5 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुँच सकता है।

प्रश्न 7. हल्दी की फसल में प्रमुख रोग एवं कीट कौन-से हैं?

उत्तर : तना छेदक, थ्रिप्स, प्रकंद (जड़) विगलन तथा पत्ती धब्बा रोग हल्दी की प्रमुख समस्याएँ हैं। समय पर बीजोपचार एवं समेकित रोग-कीट प्रबंधन अपनाने से इनका प्रभाव कम किया जा सकता है।

प्रश्न 8. हल्दी की प्रसंस्करण प्रक्रिया क्या है?

उत्तर : कटाई के बाद हल्दी को उबालना, सुखाना, पॉलिशिंग (चमकाना) तथा ग्रेडिंग की जाती है। इससे गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं।

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